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सरकार के गड़बड़झालों पर नज़र रखने वाले CVC की नियुक्ति कैसे होती है?

सेंट्रल विजिलेंस कमिश्नर. केंद्रीय सतर्कता आयुक्त. CVC. सरकारी अमले में करप्शन पर नज़र रखने वाली अथॉरिटी. देश के नए CVC चुने गए हैं संजय कोठारी. राष्ट्रपति के सचिव हैं. इसके अलावा सरकार ने बिमल जुल्का को अगला सेंट्रल इन्फॉर्मेशन कमिश्नर (CIC) चुना है. 18 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई मीटिंग में इन दो नामों पर फैसला हुआ. इसके अलावा आंध्रा बैंक के पूर्व CEO सुरेश एन पटेल CVC में कमिश्नर होंगे. पंजाब लोक सेवा आयोग की पूर्व सदस्य अनीता पांडोव इन्फॉर्मेशन कमिश्नर होंगी.

कांग्रेस ने CVC को लेकर सवाल उठाए हैं. संजय कोठारी को चुनने पर कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार CVC के पद पर अपना ‘रबर स्टैम्प’ चाहती है. उन्होंने कहा, “देश में सीवीसी एक बहुत ही महत्वपूर्ण संस्थान है. ये भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ निगेहबान है. इसलिए ये ज़रूरी है कि इस महत्वपूर्ण पद पर नियुक्ति ऐसे व्यक्ति की हो जिसकी ईमानदारी सवालों से परे हो. नियुक्ति की प्रकिया भी पारदर्शी होनी चाहिए. इसके अलावा प्रक्रिया पर कांग्रेस ने सरकार को घेरा है.

पूरा विवाद क्या है?

CVC की नियुक्ति के लिए एक सर्च कमेटी बनाई गई थी. इसके सदस्य वित्त सचिव राजीव कुमार थे. टेलीग्राफ की एक ख़बर के मुताबिक, राजीव कुमार ने भी CVC पद के लिए अप्लाई किया था. उन्हें सर्च समिति ने CVC पद के लिए शॉर्टलिस्ट किया था. अब इस पर विवाद हो गया. लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं. अधीर रंजन चौधरी. जो समिति CVC का चुनाव करती है, उसके सदस्य हैं. उन्होंने सवाल पूछा,

कोई आदमी अपने ही चयन के लिए सर्च कमेटी का सदस्य कैसे हो सकता है? सर्च कमेटी बनाने का पूरा उद्देश्य ही खत्म हो जाता है, अगर सर्च कमेटी के एक सदस्य ने खु़द पद के लिए आवेदन कर रखा हो, उसे शॉर्टलिस्ट किया गया हो और CVC की पोस्ट के लिए सिफारिश की गई हो.

इसके अलावा CIC के अपॉइंटमेंट पर उन्होंने कहा कि CIC को लेकर सरकार ने एडवांस में कोई डॉक्यूमेंट नहीं दिया. उन्होंने इसे तय प्रक्रिया से अलग भटकाव बताया.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, यह पूछने पर कि क्या अधीर रंजन इन नामों से सहमत थे, उन्होंने जवाब दिया,

मेरे पास और कोई ऑप्शन नहीं था. मैंने पहले ही अपनी असहमति दर्ज करवा दी थी, इसलिए बहस व्यर्थ है. यहां तक कि पीएम ने भी मेरी असहमति को स्वीकार किया था. इसके बाद नाम चुन लिए गए और मुझे नहीं लगा कि बहस करने में कोई पॉइंट है, क्योंकि वो बहुमत में हैं.

ये पहली बार नहीं है जब विपक्ष CVC की नियुक्ति से असहमत हुआ हो. 2010 में CVC को लेकर विवाद हुआ था, जब सरकार ने टेलीकॉम सेक्रेटरी पीजे थॉमस को नियुक्त करने का फैसला किया था. तब लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज थीं. ये मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया था और मार्च 2011 में उनकी नियुक्ति रद्द कर दी गई.

लोकसभा में विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी CVC को चुनने वाली समिति में हैं. फोटो: LSTV
लोकसभा में विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी CVC को चुनने वाली समिति में हैं. फोटो: LSTV

CVC के बारे में

सेंट्रल विजिलेंस कमीशन. केंद्रीय सतर्कता आयोग. विजिलेंस का मतलब होता है निगरानी या क्लोज वॉच रखना. सतर्क रहना. ये संस्था सरकार में भ्रष्टाचार के मामलों पर निगरानी रखती है. इसे लेकर सतर्क रहती है. ये एक गैर संवैधानिक संस्था है. मतलब संविधान में इसका प्रावधान नहीं था. इसे 1964 में एक प्रस्ताव से बनाया गया. संथानम कमिटी की सिफारिश पर. इस आयोग का जो चेयरपर्सन या मुखिया होता है, उसे सेंट्रल विजिलेंस कमिश्नर (CVC) कहते हैं. CVC चार साल या 65 साल की उम्र तक अपने पद पर रह सकता है. इसके बाद वो किसी पद पर नहीं रह सकता.

2003 में CVC को वैधानिक दर्जा मिला. इसके लिए लॉ पास किया गया. 2004 में आयोग को ताकत मिली कि वो भ्रष्टाचार की शिकायतें ले सकता है. ये कार्यपालिका से स्वतंत्र होता है. आयोग का हेडक्वार्टर नई दिल्ली में है. CVC अपनी प्रक्रिया खु़द रेगुलेट करता है. अपने नियम खु़द बना सकता है. इसके लिए किसी की इजाज़त की ज़रूरत नहीं होती.

CVC का काम क्या होता है?

– आयोग सरकार से जुड़े किसी ऑफिस के मिसयूज की शिकायत देखता है. भ्रष्टाचार की शिकायत व्हिसल ब्लोअर भी कर सकता है. मतलब वो शख्स जो भ्रष्टाचार का खुलासा करता है. व्हिसल ब्लोअर्स ऐक्ट के तहत उसे सुरक्षा भी मिलती है.

– CVC का काम सरकार के मंत्रालयों में भ्रष्टाचार को लेकर नज़र रखना है. इसमें व्हिसल ब्लोअर की शिकायत पर पूछताछ करना या करवाना भी शामिल है.

– केंद्र सरकार अगर कहे कि प्रिवेंशन ऑफ करप्शन ऐक्ट, 1988 के तहत किसी पब्लिक सर्वेंट पर भ्रष्टाचार का आरोप है. इसमें केंद्र के ग्रुप ए के अधिकारी या किसी तय स्तर के अधिकारी हो सकते हैं.

– करप्शन के मामले में सीबीआई का सहयोग करना. प्रिवेंशन ऑफ करप्शन ऐक्ट से जुड़े किसी मामले में सीबीआई को CVC डायरेक्शन दे सकता है. CBI की जांच का रिव्यू कर सकता है. अप्लीकेशन जो पेंडिंग हैं, उनका भी रिव्यू कर सकता है.

– केंद्र सरकार अगर अनुशासन के मामलों पर ऑल इंडिया सर्विसेज से जुड़े नियम बना रही हो तो उसे CVC से सलाह लेनी होती है.

– डायरेक्टर ऑफ एनफोर्समेंट की नियुक्ति के लिए कमिटी बनाई जाती है. इस कमिटी का चेयरमैन CVC होता है.

– प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग ऐक्ट, 2002 के तहत संदिग्ध ट्रांजेक्शन की शिकायत भी यहां होगी.

-जब CVC किसी मामले की पूछताछ कर रहा होता है तो उसके पास सिविल कोर्ट की पॉवर आ जाती हैं. जैसे- सबूत मंगाना, डॉक्यूमेंट मंगाना, किसी की हाजिरी लगवाना, कोई भी सूचना कहीं से मंगाना.

– केंद्र सरकार को CVC सलाह देता है कि आगे क्या एक्शन लें कि करप्शन ना हो या कम हो. अगर सलाह नहीं मानी गई तो केंद्र सरकार को इसका कारण भी बताना होता है.

– अपने काम पर सालाना रिपोर्ट राष्ट्रपति को भेजता है.

हर मंत्रालय में चीफ विजिलेंस ऑफिसर (CVO) होता हैं. ये मंत्रालय और CVC के बीच लिंक का काम करता हैं. ये ऑर्गनाइजेशन में होने वाले करप्शन की खबर CVC को देता है.

संजय कोठारी डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग (DoPT) में सचिव रह चुके हैं. फोटो: DoPT
संजय कोठारी डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग (DoPT) में सचिव रह चुके हैं. फोटो: DoPT

लोकपाल-लोकायुक्त ऐक्ट, 2013 से शक्तियों में किए गए बदलाव

– डायरेक्टर ऑफ प्रॉसिक्यूशन केंद्र सरकार अपॉइंट करती है. इसके लिए CVC सिफारिश करता है.

– SP या उससे ऊपर लेकिन CBI डायरेक्टर से नीचे के पद पर नियुक्ति के लिए एक सेलेक्शन कमिटी होगी, जिसके सदस्य CVC से होंगे.

– लोकपाल की तरफ से की गई शिकायतों की शुरुआती जांच की शक्ति CVC के पास होगी.

CVC के सदस्य कौन होते हैं?

– चेयरपर्सन- सेंट्रल विजिलेंस कमिश्नर (CVC)
– ज़्यादा से ज़्यादा दो विजिलेंस कमिश्नर

CVC की नियुक्ति कैसे होती है?

CVC को प्रेसिडेंट नियुक्त करते हैं. इसके लिए प्रेसिडेंट खु़द निर्णय नहीं लेते हैं. इसके लिए तीन सदस्यीय कमिटी होती है, जो सिफारिश करती है.

कमिटी में कौन-कौन होते हैं?

1. प्रधानमंत्री (कमिटी के अध्यक्ष)

2. गृहमंत्री

3. लोक सभा में विपक्ष के नेता

CVC को कौन हटा सकता है?

राष्ट्रपति हटा सकता है.

किन शर्तों पर?

– CVC के दीवालिया होने पर
– नैतिक मूल्यों के खिलाफ दोषी पाए जाने पर
– अपने पद से अलग लाभ के पद पर होने पर
– काम करने में असक्षम- मानसिक स्थिति सही ना होने पर
– कोई ऐसी जिम्मेदारी जिसकी वजह से CVC इस पद पर नहीं रह सकते
– करप्शन का चार्ज (मिसबिहेवियर)- ऐसे मामलों को राष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट रेफर कर देते हैं

CVC का संगठन

CVC का संगठन तीन पार्ट में बंटा होता है:

1. सचिवालय
2. Chief Technical Examiners’ Wing (CTE)
3. Commissioners for Dept. Inquires

1. सचिवालय: इसमें सचिव, उप सचिव, संयुक्त सचिव जैसे पदाधिकारी होते हैं.

2. Chief Technical Examiners’ Wing (CTE): इसमें चीफ इंजीनियर होते हैं. सपोर्टिंग इंजीरियरिंग स्टाफ होता है. इनका काम होता है, कॉन्स्ट्रक्शन से जुड़े कामों का ऑडिट करना. शिकायत की जांच करना और दिल्ली की संपत्तियों का इवैलुएशन करने और तकनीकी भ्रष्टाचार में सीबीआई की मदद करना. CVC को सलाह देना भी इनका काम होता है.

3. Chief Technical Examiners’ Wing (CTE): इसमें वो अधिकारी होते हैं जो भ्रष्टाचार के मामलों में गवाहों और आरोपियों से पूछताछ करते हैं.

CVC का अधिकार-क्षेत्र

– ऑल इंडिया सर्विसेज- ग्रुप ए से जुड़े लोगों के मामले
– पब्लिक सेक्टर बैंक में रैंक 5 या उससे ऊपर के लोगों के मामले
– RBI, NABARD और SIDBI के ग्रेड D या उससे ऊपर के कर्मचारी से जुड़े मामले
– पब्लिक सेक्टर यूनिट में चीफ एग्जीक्यूटिव या एग्जीक्यूटिव के मामले
– जनरल इंश्योरेंस कंपनी के मैनेजर या उससे ऊपर की पोस्ट
– LIC में सीनियर डिविजनल मैनेजर या उससे ऊपर की पोस्ट

ये भी जान लीजिए कि पहले CVC निट्टूर श्रीनिवास राउ थे. अंतरिम CVC शरद कुमार हैं. वहीं अगले CVC संजय कोठारी होंगे.


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