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भारत का नागरिक होने को लेकर क्या कहता है Citizenship Act, 1955?

नागरिकता (संशोधन) बिल, 2019 को मोदी कैबिनेट ने मंज़ूरी दे दी है. 4 दिसंबर को. अब ये बिल संसद में पेश किया जाएगा. इसे केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पेश करेंगे. इसे मोदी सरकार के सबसे विवादित बिल्स में गिना जा रहा है. माना जा रहा है कि जब शाह इस बिल को संसद में पेश करेंगे, तो अच्छी खासी बहस देखने को मिलेगी.

ये बिल Citizenship Act, 1955 में संशोधन यानी बदलाव करके लाया जा रहा है. लेकिन, ये नागरिकता कानून, 1955 है क्या?

संविधान के आर्टिकल 11 ने संसद को ये अधिकार दिया कि संसद नागरिकता के संबंध में पैमाना तय करे. इसी अधिकार के तहत संसद नागरिकता कानून, 1955 लेकर आई. इस अधिनियम में ये बताया गया कि 26 जनवरी, 1950 के बाद से भारत का नागरिक कौन होगा? कैसे उनकी नागरिकता समाप्त की जा सकती है.

# नागरिक होने की शर्त क्या है?

Citizenship Act, 1955 के तहत भारत का नागरिक होने की कुछ शर्तें हैं. इस कानून में नागरिकता के आधार तय किए गए. जन्म, वंश, पंजीकरण, प्राकृतिक और भूमि अर्जन. अब इन्हें थोड़ा विस्तार से समझते हैं.

सबसे पहले जन्म के आधार पर मिलने वाली नागरिकता पर बात करते हैं-

# 1955 के एक्ट में जन्म को भारत की नागरिकता का आधार बताते हुए कहा गया कि अगर 26 जनवरी, 1950 के बाद किसी का जन्म भारत में हुआ है तो उसे भारत का नागरिक माना जाएगा. लेकिन इस नियम के बाद मुश्किल ये हो गई कि माता-पिता के बारे में कोई सटीक नियम नहीं थे.

#इस नियम के हिसाब से अगर किसी विदेशी का बच्चा भी भारत में पैदा होता तो उसे अपने आप संवैधानिक तौर पर भारत की नागरिकता मिल जाती. फिर इस ऐक्ट में संशोधन हुआ 1986 में. इस संशोधन में बताया गया कि 26 जनवरी, 1950 के बाद भारत में पैदा हुआ शख्स भारत का नागरिक होगा लेकिन उसके माता-पिता दोनों का या उनमें से किसी एक का भारतीय नागरिक होना ज़रूरी है.

# 2003 में इसमें फिर से संशोधन हुआ. इसमें कहा गया कि 26 जनवरी, 1950 के बाद भारत में पैदा हुआ व्यक्ति भारत का नागरिक होगा लेकिन उसके माता और पिता दोनों भारत के नागरिक होने चाहिए, या माता-पिता में से एक भारत का नागरिक हो और दूसरा अवैध प्रवासी न हो. प्रवास के सारे क़ानूनी कागज़ात उसके पास होने चाहिए.

असम में पहले ड्राफ्ट में बाहर हो चुके लोगों के लिए NRC का दूसरा और तीसरा ड्राफ्ट लाया गया
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अब बात करते हैं वंश के आधार पर नागरिकता कीः

# Citizenship Act, 1955 में कहा गया कि 26 जनवरी, 1950 के बाद से विदेश में पैदा हुआ वो व्यक्ति भी भारत का नागरिक होगा जिसके पिता भारत के नागरिक होंगे. लेकिन ये लिंग के आधार पर भेदभावपूर्ण था.

# इसलिए 1992 में इस एक्ट में संशोधन हुआ. प्रावधान जुड़ा कि 26 जनवरी, 1950 के बाद से विदेश में पैदा हुआ वो व्यक्ति भारत का नागरिक माना जाएगा जिसके पिता या माता दोनों या दोनों में कोई एक भी भारत का नागरिक हो.

# इसके बाद एक संशोधन और हुआ. जिसमें जोड़ा गया कि नागरिकता तभी मिलेगी जब पैदा होने के साल भर के अंदर बच्चे को उस देश की भारतीय एम्बेसी में रजिस्टर कराया गया हो.

पंजीकरण के आधार पर भी भारत के नागरिक होने का अधिकार मिलने का नियम इस एक्ट में है. जैसे अगर किसी शख्स ने भारत के नागरिक से शादी की तो उसे भारत की नागरिकता मिलेगी. लेकिन इसके लिए शर्त ये थी कि जिस नागरिक से शादी हो रही है वो 7 साल से भारत में रह रहा हो.

#कौन नहीं हो सकते हैं भारत के नागरिक

Citizenship Act 1955 के तहत अवैध प्रवासी भारत के नागरिक नहीं हो सकते. एक्ट के तहत उन लोगों को अवैध प्रवासी माना जाएगा जो या तो बिना ज़रूरी कागज़ों के भारत में रह रहे हैं, या वीज़ा की अवधि ख़त्म होने के बाद भी भारत में रह रहे हैं.

अवैध तौर पर रह रहे प्रवासी को The Foreigners Act, 1946 और The Passport (Entry into India) Act, 1920 के तहत या तो जेल भेजा जा सकता है या वापस उसके देश डिपोर्ट किया जा सकता है.

इसके साथ ही ऐसे भी Citizenship Act, 1955 में नागरिकता समाप्त करने के नियम भी तय किए गए थे.

अब संशोधन बिल के बाद NRC का ख़तरा मंडरा रहा है असम में लोग ख़ुद को रजिस्टर कराने के लिए परेशान हैं
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# कैसे समाप्त हो सकती है नागरिकता?

मोटामोटी तीन तरीक़ों से नागरिकता समाप्त करने के नियम बनाए गए इस एक्ट में.
–  स्वैच्छिक त्याग.  माने ख़ुद से आप अपनी नागरिकता छोड़ दें.

–  टर्मिनेशन. माने आपकी नागरिकता बर्ख़ास्त की जाए. अगर आपने किसी और देश की नागरिकता ले ली तो भारत की नागरिकता आपसे छिन जाएगी.

– और एक तरीका था आपको आपकी नागरिकता से वंचित करना. सरकार आपकी नागरिकता छीन सकती है अगर नागरिक किसी तरह के राष्ट्र विरोधी काम में लिप्त पाया जाता है. मसलन आप किसी दुश्मन देश के लिए जासूसी कर रहे हों. चलते युद्ध में देश के ख़िलाफ़ काम कर रहे हों.

ये तो हुई नागरिकता एक्ट, 1955 की बात. अब जानते हैं कि नए बिल में ऐसा क्या है जिस पर बवाल हो रहा है.

# क्या बदलाव हैं नए बिल में ?

#इस बिल के पारित हो जाने के बाद अफगानिस्तान, बांग्लादेश या पाकिस्तान के अल्पसंख्यक बिना किसी Legal Document के भारत में रहने के हकदार हो जाएंगे. पहले ऐसा होने के लिए उन्हें भारत में 12 साल शरणार्थी के तौर पर गुज़ारना होता था, लेकिन नए बिल के मुताबिक, वो बस 7 साल में ही इसके लिए एलिजिबल हो जाएंगे. एक दम आसान भाषा में कहें तो सरकार इस बिल के ज़रिए ‘अवैध प्रवासियों’ की परिभाषा बदलने की तैयारी कर रही है. इस बिल को पहली बार लोकसभा में 15 जुलाई, 2016 को पेश किया गया था.

#कौन हैं ये माइनॉरिटीज़ और बीजेपी को इससे क्या फायदा होगा ?

पाकिस्तान, बांग्लादेश और आफगानिस्तान में माइनॉरिटीज़ हैं हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई धर्म के लोग. 4 जनवरी, 2019 को सिलचर की रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने भी इस बिल को पास कराने की बात की थी. सरकार के इस कदम से वोटों की ज़बरदस्त खुशबू आ रही है, क्योंकि असम में ऐसे लोगो की अच्छी खासी जमात है, जो बांग्लादेश से आए हैं और धर्म से हिंदू हैं. अब उन्हें भारत में रहने का संवैधानिक हक मिल जाएगा.

देश भर से इस संशोधन के लिए तर्क वितर्क हो रहा है लेकिन विरोध में आवाज़ें ज़्यादा मुखर हो रही हैं
देश भर से इस संशोधन के लिए तर्क वितर्क हो रहा है लेकिन विरोध में आवाज़ें ज़्यादा मुखर हो रही हैं

# क्या है सरकार का पक्ष?

भाजपा का कहना है कि जिन लोगों का धार्मिक आधार पर उत्पीड़न हो रहा है, संपत्तियां ज़ब्त की जा रही हैं, पूजा-पाठ पर हमले किए जा रहे हैं, महिलाओं को निशाना बनाया जा रहा है उन्हें सहज सरल तरीक़े से नागरिकता देना ही इस विधेयक का उद्देश्य है. इसे सांप्रदायिक दृष्टिकोण से देखना बंद किया जाना चाहिए. घुसपैठिए, घुसपैठिए होते हैं, उनमें जो लोग उत्पीड़न के कारण आते हैं, उनमें अंतर करना हमारा नैतिक और संवैधानिक कर्तव्य बनता है.

असम प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेता विजय गुप्ता इस बिल पर कहते हैं, “लोकतांत्रिक देश में संसद से बड़ा और क्या हो सकता है. हमारी पार्टी के नेताओं ने इस मुद्दे पर सभी घटक दलों के साथ बात की है. इस बातचीत का ही नतीजा है कि इस बिल का पहले जो प्रारूप था और अब जो प्रारूप आएगा उसमें अंतर होगा. हम पहले से सार्वजनिक तौर पर कहते आ रहे है कि धार्मिक उत्पीड़न के तहत पड़ोसी देशों से आने वाले शरणार्थियों को भारत की नागरिकता दी जाएगी. अब जो भी होगा वो संसद के पटल पर ही होगा.

नागरिकता संशोधन बिल का पूरे नॉर्थ-ईस्ट में भारी विरोध हो रहा है
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#और विपक्ष के तर्क क्या हैं

असम के किसान नेता अखिल गोगोई कहते हैं, “भारत का संविधान हमारे सांसदों को भारतीय नागरिकों के हक में काम करने का अधिकार देता है लेकिन मौजूदा सरकार बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान जैसे देशों के नागरिकों को यहां लाकर बसाने के लिए यह बिल लेकर आई है. भले ही इस बिल से असम के लोगों का जीवन खतरे में क्यों न पड़ जाए. यह बिल पूरी तरह से असंवैधानिक है और हम इसका विरोध करते है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में लिखा हुआ है कि धर्म के आधार पर किसी को नागरिकता नहीं दी जा सकती. भाजपा इस विधेयक के ज़रिए हिंदूत्व का एजेंडा मज़बूत करना चाहती है.”

वहीं, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि ये विधेयक भारत के संविधान के मूल सिद्धांतों के ख़िलाफ़ है. विपक्षी तर्क कह रहे हैं कि ये विधेयक अगर पारित हो गया तो भारत का संवैधानिक विचार ही मूल रूप से बदल जाएगा. भारत और पाकिस्तान जब दो देश बने तो पाकिस्तान मुसलमानों का देश बना था लेकिन हिंदुस्तान की कल्पना ये थी कि ये सभी धर्मों, जाति के लोगों के लिए बराबरी का देश होगा.


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