Submit your post

Follow Us

Cinematograph Bill 2021 क्या है, जिसके लागू होने पर सिनेमा के अच्छे दिन खत्म!

‘हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी’ और ‘इस रात की सुबह नहीं’ जैसी फिल्मों के डायरेक्टर सुधीर मिश्रा ने 26 जून 2021 को एक ट्वीट किया,

सिनेमैटोग्राफ एक्ट में प्रस्तावित ये अमेंडमेंट फिल्म मेकिंग को असंभव बना देगा. सभी फिल्म बॉडीज़ को सरकार से बात करने की जरुरत है.

मशहूर डायरेक्टर विशाल भारद्वाज ने ट्वीट किया, फिल्म सर्टिफिकेशन पर कानून लाने का ये कैसा अजीब प्रस्ताव है. सेंसर सर्टिफिकेट का मतलब ही क्या है अगर किसी की भी शिकायत पर एक फिल्म को फिर से एग्ज़ामिन किया जा सके.

दिग्गज एक्टर कमल हासन ने लिखा,

सिनेमा, मीडिया और साहित्य से जुड़े लोग भारत के तीन आइकॉनिक बंदर होने का जोखिम नहीं उठा सकते. बुराई के बारे में देखना, सुनना और बोलना ही लोकतंत्र को कमज़ोर करने की कोशिशों के खिलाफ एकमात्र दवा है.

उन्होंने एक और ट्वीट किया. लिखा,

कृपया कुछ करें, आज़ादी को लेकर अपनी चिंता व्यक्त करें.

 

कुछ ऐसा ही अनुराग कश्यप, फरहान अख्तर और दिबाकर बैनर्जी जैसे महत्वपूर्ण फिल्म मेकर्सने भी कहा. इंडियन मेनस्ट्रीम सिनेमा से इतर पैरलल सिनेमा के स्तंभ माने जाने वाले अदूर गोपालाकृष्णन ने प्रस्तावित अमेंडमेंट को ‘सुपर सेंसर’ बताया.

ऐसा कहा गया सरकार द्वारा प्रस्तावित सिनेमैटोग्राफ बिल 2021 के लिए. बात करेंगे कि क्या हैं वो अमेंडमेंट्स जो सरकार लाना चाहती है. उन्हें लाने के लिए क्या तर्क दे रही है. फिल्ममेकर्स और फिल्म फ्रेटर्निटी से जुड़े लोग सरकार के इस कदम को अभिव्यक्ति की आज़ादी पर किए हमले की तरह क्यों देख रहे हैं. साथ ही बताएंगे कि उन्होंने सरकार के प्रस्ताव पर क्या सुझाव दिए हैं. एक-एक कर इन सभी पॉइंट्स पर बात करेंगे. एक-एक कर, क्योंकि क्रोनोलॉजी समझना बहुत जरुरी है.

Spotlight (1)


# सरकार ने फरमान जारी कर क्या कहा?

सेंसरशिप. ऐसा शब्द जिसे हमेशा से सत्ताधारियों का प्यार मिला है. फिर चाहे वो किसी भी देश या प्रांत से वास्ता रखते हों. वहीं, पब्लिक ने हमेशा सेंसरशिप को शक की नज़र से देखा है. इतिहास खंगाल कर देखें तो समझ आा जाएगा कि सेंसरशिप को लेकर जनता का ऐसा रवैया क्यों रहा है. जैसे 1975 की इमरजेंसी का दौर याद कीजिए. इंदिरा सरकार हर विरोधी आवाज़ का दमन करने के लिए अग्रसर थी. कहीं से पता चला कि अमृत नाहटा ने पॉलिटिकल सटायर फिल्म बनाई है. ‘किस्सा कुर्सी का’. फिल्म सरकार की छवि पर लांछन न लगा दे इस डर से सरकार ने फिल्म के प्रिंटस जला दिए. सरकार ने अपनी मनमानी चलाई. लेकिन कब तक चलती. 1977 में इमरजेंसी हट गई. साथ ही सत्ता में आई जनता दल की सरकार. उम्मीद थी कि इमरजेंसी के दौर में ‘किस्सा कुर्सी का’ जो हश्र हुआ, अब उसके उलट कुछ किया जाएगा. 1978 में फिल्म रिलीज़ तो की गई. लेकिन सेंसर बोर्ड के सुझाए कट्स के साथ. मॉरल ऑफ द स्टोरी ये है कि सरकार चाहे कोई भी हो, सेंसरशिप के प्रति उनके प्रेम पर शक नहीं किया जा सकता.

Kissa Kursi Ka 1
किस्सा कुर्सी का, वो फिल्म जिसके प्रिंटस सरकार ने जला दिए थे.

खैर. फिल्म में कट्स सुझाए सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन यानी CBFC ने. जिसे आम बोलचाल की भाषा में सेंसर बोर्ड भी कहा जाता है. हालांकि, सेंसर बोर्ड और सर्टिफिकेशन का मतलब बिल्कुल अलग-अलग है. खैर, सेंसर बोर्ड अस्तित्व में आया सिनेमैटोग्राफ एक्ट, 1952 की बदौलत. अब यहां आयरनी ये है कि जिस सिनेमैटोग्राफ एक्ट के तहत फिल्म सेंसरशिप को एस्टैब्लिश किया गया, वो भारत पर राज करने वाले ब्रिटिशर्स की देन थी. दरअसल, भारत में फिल्म सेंसरशिप पर लगाम कसने के लिए अंग्रेजों ने 01 अगस्त, 1920 को सिनेमैटोग्राफ एक्ट, 1918 लागू किया था. मूल तौर पर ये एक्ट दो पैमानों पर बात करता था. पहला, सिनेमा हाउसेज़ को लाइसेंस देने के ऊपर. दूसरा, फिल्मों को पब्लिक एग्जीबिशन के आधार पर सर्टिफिकेट देना. भारत आज़ाद हुआ. लेकिन आज़ाद देश की सरकार को लगा कि फिल्मों के पर कुतरे जाने के लिए इस एक्ट की जरुरत है. 1949 में इस एक्ट में नए अमेंडमेंट्स लाए गए. जिसके तहत रीज़नल नहीं बल्कि सेंट्रल लेवल पर सेंसर बोर्ड का गठन किया जाना था. 1951 में सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सेंसर का गठन किया. हालांकि, 1983 में जाकर इसका नाम बदलकर सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन कर दिया गया.

Censorship 1
सेंसरशिप किसी एक देश या समाज का मसला नहीं, ये प्रॉब्लम यूनिवर्सल है.

जब सेंसरशिप बोर्ड बनाने का अधिकार केंद्र सरकार के पास आया तब इस एक्ट को फिर से लागू किया गया. सिनेमैटोग्राफ एक्ट 1952 के नाम से. कट टू 2021. अब केंद्र सरकार ने इसी सिनेमैटोग्राफ एक्ट में अमेंडमेंट लाने का फैसला लिया है. 18 जून को सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने ये घोषणा की. चूंकि सरकार नया एक्ट लाने जा रही है. इसलिए कानून के अंतर्गत पब्लिक कंसल्टेशन का नोटिस देना जरुरी होता है. सरकार ने भी दिया. लेकिन यहां भी अपना हाथ ऊपर रखा. किस भी नए एक्ट को लागू करने से पहले कम से कम 30 दिनों का पब्लिक नोटिफिकेशन देना होता है. यानी कि इस पीरियड में लोग एक्ट को लेकर अपने सुझाव सरकार को सौंप सकते हैं. ये कानून है. लेकिन केंद्र सरकार ने इसे नज़रअंदाज़ करते हुए पब्लिक को सिर्फ 14 दिनों का समय दिया. अब कथा का निष्कर्ष ये है कि जनता 02 जुलाई तक अपने सुझाव सरकार को भेज सकती है. बाकी बिल के इस ड्राफ्ट में क्या है, अब उन पॉइंट्स की बात करते हैं.


# पायरेसी पर क्या किया?

मौजूदा सिनेमैटोग्राफ एक्ट (1952) में पायरेसी के लिए कोई सख्त क़ानून नहीं है. जिस कारण इस नए ड्राफ्ट में सेक्शन 6AA जोड़ा गया है. जिसके अनुसार फ़िल्म की बिना अधिकार रिकॉर्डिंग करने की मनाही होगी. अगर कोई इस नियम का उल्लंघन करता हुआ पाया जाएगा तो उस व्यक्ति के खिलाफ़ सख्त कार्रवाई होगी. आरोपी को तीन महीने से लेकर तीन साल तक की जेल हो सकती है. या उसे तीन लाख का जुर्माना भरना पड़ेगा. साथ ही जिस फ़िल्म की उस व्यक्ति ने पायरेसी की होगी उसके पूरे प्रोडक्शन मूल्य का 5% भी जुर्माने में जोड़ा जा सकता है. सजा और जुर्माना दोनों भी हो सकता है. सरकार का कहना है कि पायरेसी से हर साल एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री का बहुत नुकसान होता है. इस बिल के ज़रिए पायरेसी करने वालों पर लगाम लगेगी.


# सरकार किसी भी फिल्म पर कार्रवाई कर सकती है?

अब आते हैं उस पॉइंट पर जिसे पढ़कर लोग सरकार की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं. बात ये है कि अगर ये बिल लागू हो जाता है तो केंद्र सरकार को CBFC द्वारा दिए गए सर्टिफिकेट को पुनः परिक्षण का आदेश देने की पावर मिल जाएगी. मतलब है कि अगर सरकार को ये लगा कि किसी फ़िल्म में सेक्शन 5B (प्रिंसिपल फॉर गाइडेंस इन सर्टिफाइंग फ़िल्म्स) का उल्लंघन हुआ है तो सरकार CBFC को फ़िल्म का सर्टिफिकेशन रद्द करने या बदलाव करने का आदेश दे सकेगी. आगे बढ़ने से पहले ब्रीफ में समझ लीजिए कि सेक्शन 5B क्या कहता है.

Raja Harishchandra
मतलब अब सरकार ‘राज्य हरिश्चंद्र’ जैसी फिल्म का भी सर्टिफिकेट फिर से जांच सकती है.

अगर कोई फ़िल्म या फ़िल्म का कोई सीन देश की अखंडता के खिलाफ़, देश की शांति के खिलाफ़, देश की नैतिकता के खिलाफ़, दूसरे देशों से संबंधों को खराब करने, देश का माहौल बिगाड़ने लायक लगता है तो सरकार इस पर रोक लगा सकती है. लेकिन साल 2000 में कर्नाटक हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से CBFC के किसी भी फ़ैसले को ओवररूल करने या बदलने के अधिकार छीन लिए और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फ़ैसले का समर्थन किया. इस फ़ैसले के बाद सरकार के पास सिर्फ़ इतनी पावर थी कि वे CBFC बोर्ड के हेड को फ़िल्म पर दुबारा विचार करने की राय दे सकें. बाकी मौजूदा एक्ट में सेक्शन 6 के आधार पर सरकार के पास फ़िल्म सर्टिफिकेशन की प्रोसीडिंग की रिकॉर्डिंग देखने का भी अधिकार है. सौ बातों की एक बात ये है कि नया लागू होने के बाद केंद्र सरकार को CBFC के फैसलों को बदलने का अधिकार मिल जाएगा. मान लीजिए कि किसी फिल्म को सालों पहले सर्टिफिकेट मिल चुका है. रिलीज़ भी की जा चुकी है. और अब जाकर कोई उस फिल्म के खिलाफ शिकायत करे या सरकार को खुद लगे कि फिल्म देश की अखंडता के खिलाफ है. या किसी एंटी सोशल एलिमेंट को बढ़ावा दे रही है. तो ऐसे में सरकार के पास इतनी अथॉरिटी होगी कि वो उस फिल्म का सर्टिफिकेट रद्द कर सके. जिस सेंसर बोर्ड को खुद से संचालित होना चाहिए, वो खुद से खड़ा तक नहीं हो पाएगा.


# नई एज कैटेगरी लाना चाहते हैं

ये ड्राफ्ट उम्र की कैटेगरी के हिसाब से भी फिल्मों का बंटवारा करना चाहता है. जैसे अब तक फ़िल्मों को चार सर्टिफिकेट दिए जाते हैं.

#1. यूनिवर्सल (U): पहली कैटेगरी है ‘यूनिवर्सल’. ये सर्टिफिकेट मिलने का मतलब है कि फिल्म कोई भी देख सकता है. बच्चे, बूढ़े सब.

#2. यूनिवर्सल/ एडल्ट (U/A): जिन फिल्मों को U/A सर्टिफिकेट मिलता है, उन्हें भी कोई भी देख सकता है लेकिन 12 साल या उससे छोटी उम्र के बच्चों को इस सर्टिफिकेट वाली फिल्में अपने पेरेंट्स की निगरानी में देखनी होंगी.

#3. एडल्ट (A): एडल्ट यानी वयस्क. ‘A’ सर्टिफिकेट मिलने वाली फिल्मों को केवल 18 साल या उससे बड़ी उम्र के लोग ही देख सकते हैं.

#4. स्पेशल (S): वो फिल्में जिन्हें समाज के किसी खास तबके के लिए बनाया गया हो. जैसे डॉक्टर, इंजीनियर, साइंटिस्ट्स आदि. ऐसी फिल्मों को ‘S’ सर्टिफिकेट दिया जाता है.

अब इस नए ड्राफ्ट में उम्र संबंधित नई कैटेगरी जुड़ गई हैं. जैसे,

#1. U/A 7+ – 7 साल से ऊपर के ही बच्चे इस सर्टिफिकेट की फ़िल्मों को देखें, वो भी माता-पिता की निगरानी में.

#2. U/A 13+ – 13 साल से ऊपर के ही बच्चे इस सर्टिफिकेट की फ़िल्मों को देखें, वो भी माता-पिता की निगरानी में.

#3. U/A 16+ – 16 साल से ऊपर के ही बच्चे इस सर्टिफिकेट की फ़िल्मों को देखें, वो भी माता-पिता की निगरानी में.

अब तक CBFC द्वारा दिए जाने वाला सर्टिफिकेशन सिर्फ़ 10 साल के लिए वैलिड होता था. लेकिन इस नए बिल के लागू होने के बाद फ़िल्म का सिर्फ एक बार ही सर्टिफिकेशन होगा और वो आजीवन वैलिड रहेगा.


# हम करें तो करें क्या, बोलें तो बोलें क्या?

एक सिनारियो इमेजिन करते हैं. किसी फिल्ममेकर ने अपनी फिल्म बनाई. सर्टिफिकेशन के लिए सेंसर बोर्ड के पास भेजी. अब CBFC की कमेटी फिल्म देखेगी और चार कैटेगरीज़ के आधार पर फिल्म को सर्टिफिकेट देगी.

मान लीजिए कि किसी वजह से CBFC को फिल्म से आपत्ति होती है. या वो फिल्ममेकर को कुछ कांट-छांट करने को कहती है. जो मेकर को लगता है कि सरासर बेतुकी बात है. अब वो सेंसर बोर्ड के फैसले को चैलेंज करने के लिए क्या करे. पहले तो FCAT जा सकता था. FCAT यानी Film Certification Appellate Tribunal. जिसे सरकार ने 04 अप्रैल, 2021 को एक ऑर्डिनेंस जारी कर बंद कर दिया. FCAT करता क्या था, ये समझने के लिए पीछे वाली कहानी पर फिर लौटना पड़ेगा. जहां सेंसर बोर्ड ने फिल्ममेकर को उसकी फिल्म में कट्स सुझाए. लेकिन वो ये कट्स करने को तैयार नहीं. बोर्ड भी अपनी ज़िद पर अड़ा हुआ है. बिना कट्स के फिल्म को सर्टिफिकेट नहीं देगा. और बिना सर्टिफिकेट के फिल्म रिलीज़ नहीं हो सकती. अब ऐसे केस में पहले होता था कि मेकर्स सीधा जाते थे FCAT के पास.

Fcat
सरकार ने इसी अप्रैल में FCAT को भंग कर दिया था.

FCAT उन से मामूली सी फीस चार्ज करती. उसके सदस्य फिल्म देखते. और नॉर्मली, छह हफ्तों में अपना फैसला सुना देते. अगर उन्हें फिल्ममेकर की बात सही लगती तो CBFC को अपना फैसला बदलने को कहते. फिल्म को नया सर्टिफिकेट जारी करने को कहते. लेकिन चूंकि अब FCAT हिस्ट्री हो चुका है, इसलिए मेकर्स ने पास अपनी शिकायत लेकर कोर्ट जाने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचेगा. अनगिनत सुनवाइयों के बाद कोर्ट में नंबर भी आ जाए, लेकिन क्या गारंटी है कि तब तक वकील की फीस फिल्म के बजट को पार न कर चुकी होगी.


# हंगामा क्यों है बरपा?

18 जून को केंद्र सरकार ने बताया कि वो नए अमेंडमेंट्स लाने जा रहे हैं. 02 जुलाई तक का वक्त दिया, ताकि जनता अपने सुझाव भेज सके. ऐसे शॉर्ट नोटिस पर इतने बड़े बदलाव लाने जा रही है सरकार. हंगामा होना लाज़मी था. हुआ भी. फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों ने इस नए ड्राफ्ट को अभिव्यक्ति की आज़ादी के खिलाफ बताया. लोकतंत्र के बेसिक आइडिया के साथ किया एक खिलवाड़ बताया. सरकार ने सुझाव मांगे थे. जिनका काम इन नए अमेंडमेंट्स की वजह से सीधा अफेक्ट होगा, उन्होंने भी अपने सुझाव भेजे. ‘ईब आले ऊ’ के डायरेक्टर प्रतीक वत्स ने डाक्यूमेंट्री फिल्ममेकर शिल्पी गुलाटी और एक वकील के साथ मिलकर ऑनलाइन पिटिशन लेटर ड्राफ्ट किया. जिसे इंडस्ट्री से जुड़े करीब 3100 लोगों ने साइन किया. 25 जून की शाम को ये लेटर पब्लिक के सामने आया. लेटर में फिल्ममेकर्स ने अपनी ओर से सुझाव दिए. साथ ही बताया कि उन्हें नए अमेंडमेंट्स में क्या कमी नज़र आ रही है.

Pratik Vats
प्रतीक वत्स और बाकी फिल्ममेकर्स की पिटिशन पर अब तक 3100 सिग्नेचर आ चुके हैं. फोटो – प्रतीक वत्स

हमनें फिल्ममेकर प्रतीक वत्स से बात की. फिल्म फ्रेटर्निटी द्वारा दिए गए सुझाव जानने के लिए. फ्रेटर्निटी ने अपने सुझाव पांच पॉइंट्स में एक्सप्लेन किए हैं. प्रतीक ने उन पॉइंट्स के बारे में बताया,

#1. फ्रेटर्निटी की पहली मांग है कि सेंसर बोर्ड का अधिकार क्षेत्र निर्धारित किया जाए. इसे सेंसर करने वाली किसी बॉडी की तरह नहीं देखा जाए. बल्कि एक सर्टीफिकेशन बॉडी के रूप में देखा जाना चाहिए. सेंसर बोर्ड को किसी भी फिल्म को काटने या बदलने का अधिकार नहीं होना चाहिए.

#2. नए अमेंडमेंट्स के ज़रिए केंद्र सरकार को रिविज़नरी पावर दी जाएगी. कि वो किसी भी फिल्म का सर्टिफिकेशन रद्द कर सकती है. अगर उन्हें फिल्म में सिनेमैटोग्राफ एक्ट, 1952 के सेक्शन 5B (1) का उल्लंघन होता हुआ दिखाई देता है तो. सरकारी ड्राफ्ट के अनुसार एक्ट के सेक्शन 5B (1) का प्रोविजन संविधान के आर्टिकल 19(2) से डिराइव किया गया है. जो कहता है कि देश की अखंडता को ध्यान में रखते हुए अभिव्यक्ति की आज़ादी पर बंदिश लगाई जा सकती है. मतलब ये कि दादासाहेब फाल्के की ‘राजा हरिश्चंद्र’ हो या चेतन आनंद की ‘नीचा नगर’, सरकार किसी भी फिल्म के सर्टिफिकेशन पर एक्शन ले सकती है. फिल्ममेकर्स चाहते हैं कि सरकार अपने इस नए अमेंडमेंट को पूरी तरह ड्रॉप कर दे.

#3. सरकार ने अप्रैल, 2021 में ऑर्डिनेंस पास कर FCAT को रद्द कर दिया था. अब फिल्ममेकर्स चाहते हैं कि FCAT को बहाल किया जाए.

#4. पायरेसी के मसले पर सिर्फ सज़ा बढ़ाने से कुछ नहीं होगा. नई पॉलिसी की जरुरत है. ऑफेंस को कैटेगराइज़ करने की जरुरत है. जैसे मान लीजिए कि कोई फिल्म थिएटर में फिल्म की क्लिप रिकॉर्ड कर अपने दोस्तों के साथ शेयर कर रहा है, या उसपर मीम बना रहा है. तो ऐसे केस को पायरेसी घोषित कर उस इंसान के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं की जा सकती.

#5. जो शॉर्ट फिल्म्स, डाक्यूमेंट्रीज़ फिल्म क्लब्स या स्कूलों में शिक्षा के तौर पर दिखाई जा रही हों, उन्हें पब्लिक एग्जीबिशन के पैमाने से बाहर रखा जाए.

फरहान अख्तर, विशाल भारद्वाज और अनुराज कश्यप जैसे फिल्ममेकर्स पुरजोर कोशिश कर रहे हैं कि सरकार फिल्म इंडस्ट्री के दिए सुझावों को इम्प्लिमेंट करे. जिस शाम फिल्म फ्रेटर्निटी से जुड़े लोगों ने ऑनलाइन लेटर भेजा, उसी शाम विशाल भारद्वाज ने भी ट्वीट किया. लिखा,

मैं इंडियन फिल्म फ्रेटर्निटी और सिनेमा प्रेमियों से दरख्वास्त करता हूं कि इस अन्यायपूर्ण प्रोविजन का विरोध करते हुए dhanpreet.kaur@ips.gov.in पर अपने सुझाव मेल करें.

02 जुलाई तक सरकार को सुझाव भेजे जा सकते हैं.


 

# सेंसरशिप को लेकर पहले क्या सुझाव मिले?

ये पहला मौका नहीं है जब फिल्म सर्टिफिकेशन को लेकर सरकार ने सुझाव मांगे हों. 2013 में कांग्रेस सरकार के इन्फॉर्मेशन एंड ब्राडकास्टिंग मिनिस्ट्री के हेड मनीष तिवारी ने जस्टिस मुकुल मुद्गल की अध्यक्षता में एक्सपर्ट कमेटी बनाई थी. इस कमेटी की रिपोर्ट में कुछ मुख्य पाइंट्स थे जैसे-

# फ़िल्म के सीन्स ना काटे जाएं.

# बोर्ड सिर्फ फ़िल्म का सर्टिफिकेशन करे.

# U/A12+ और U/A15+ जैसी कैटेगरीज़ को जोड़ा जाए.

# FCAT का अधिकार क्षेत्र बढ़ाए जाए. ताकि फिल्म सर्टिफिकेशन से जुड़े तमाम विवादों से FCAT ही डील कर सके.

2014 में कांग्रेस की सरकार चली गई और बीजेपी की सरकार आई. जिस कारण ये रिपोर्ट गट्ठरों में दब गई. बीजेपी सरकार भी सिनेमैटोग्राफ एक्ट के नियमों को लेकर काम करना चाहती थी. इसलिए 01 जनवरी, 2016 को इन्फॉर्मेशन एंड ब्राडकास्टिंग मिनिस्ट्री हेड अरुण जेटली ने डायरेक्टर श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में अपनी एक्सपर्ट कमेटी बनाई. 29 अप्रैल, 2016 को इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सौंपी. इस कमेटी के मुख्य पॉइंट्स थे.

# CBFC का काम सिर्फ फिल्मों को सर्टिफिकेट देना होना चाहिए. फिल्मों को पब्लिक की एज ग्रुप के हिसाब से कैटेगराइज़ करना चाहिए.

# फिल्मों को सर्टिफिकेट देते वक्त उनकी कलात्मक रचनात्मकता और रचनात्मक स्वतंत्रता पर रोक न लगाई जाए.

# निम्नलिखित परिस्थितियों में फिल्म को सर्टिफिकेट देने से मना किया जा सकता है-

(i) जब कोई फिल्म सिनेमेटोग्राफ एक्ट 1952 के सेक्शन 5 B (1) के प्रोविजन का उल्लंघन करती हो.

(ii) जब कोई फिल्म सर्टिफिकेशन की सर्वोच्च श्रेणी में निर्धारित सीमा का उल्लंघन करती हो.

# 12+ और 15+ दो तरह के U/A सर्टिफिकेट जारी किए जाएं.

# 18+ फ़िल्मों यानी एडल्ट फ़िल्मों को भी A तथा AC (एडल्ट विद कॉशन) दो तरह के सर्टिफिकेट दिए जाएं.

Shyam Benegal Committee
सरकार ने श्याम बेनेगल कमेटी को अनसुना कर दिया.

बताने की जरुरत नहीं पर सरकार ने बेनेगल कमेटी की रिपोर्ट को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया. सरकार ने भले ही बेनेगल कमेटी के सुझावों को अनसुना कर दिया. लेकिन श्याम बेनेगल को सरकार के सिनेमैटोग्राफ एक्ट में किए जा रहे नए प्रोविजन पर कोई आपत्ति नहीं. हिंदुस्तान टाइम्स से बात करते हुए उन्होंने कहा कि ये नए प्रोविजन बिल्कुल ठीक हैं. उन्हें ये भी लगता है कि फिल्म इंडस्ट्री अपनी तरफ से सहयोग देगी. किसी फिल्म को फिर से सर्टिफिकेशन दिए जाने के प्रावधान पर उन्होंने कहा,

अगर किसी फिल्म को सर्टिफिकेट दिया जाता है तो इसका ये मतलब नहीं कि वो हमेशा के लिए है. ये सर्टिफिकेट एक बोर्ड देता है. दुनिया लगातार बदलती रहती है. इसलिए कुछ चीज़ें पहले वैध रही होंगी जो अब नहीं हैं. इसलिए ऐसी फिल्मों को फिर से रिव्यू करना गलत नहीं है.

केंद्र सरकार इसी साल फ़रवरी में नई आईटी गाइडलाइंस लाने की बात कर चुकी है. उसके ठीक एक महीने बाद ऑर्डिनेंस पास कर FCAT को भंग कर दिया. और अब सिनेमैटोग्राफ एक्ट में नए अमेंडमेंट्स लाने की कोशिश में है. वो भी आनन-फानन में. इस पूरी प्रक्रिया को सेंसरशिप को मज़बूती देने वाले किसी कदम की तरह देखना चाहिए या नहीं, इसका फैसला जनता खुद कर सकती है. क्योंकि ये पब्लिक है, ये सब जानती है.

इंडिया से कई कोस दूर है इटली. जिसने इसी साल अप्रैल में अपना 108 साल पुराना कानून खत्म कर दिया. वो कानून जो इटली की सरकार को ताकत देता था फिल्मों को सेंसर करने की. उन्हें बैन करने की. किसी ज़माने में फासीवाद के चलते गैर जरूरी कानून लागू करने वाले इटली ने भी अब स्टेट से ऊपर पब्लिक को रखा. इटली के ही महान डायरेक्टर थे फेडेरिको फेलिनी. सेंसरशिप पर उन्होंने जो कहा वो पढ़ने लायक है. उन्होंने कहा,

सेंसरशिप वो एडवरटाइज़मेंट है जिसका खर्च सरकार उठाती है.

इसपर मनन कीजिए.


वीडियो: महेश बाबू, विजय के एक्शन सीन रीक्रिएट कर वायरल हुए ये बच्चे कौन हैं?

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

कौन हो तुम

राज कुंद्रा की पूरी कहानी, 18 की उम्र में शॉल बेचने से शुरुआत करने वाले राज यहां तक कैसे पहुंचे?

राज कुंद्रा की पूरी कहानी, 18 की उम्र में शॉल बेचने से शुरुआत करने वाले राज यहां तक कैसे पहुंचे?

IPL स्कैंडल, मॉडल्स के आरोप, अंडरवर्ल्ड कनेक्शंस के आरोप, एक्स वाइफ के इल्ज़ाम सब हैं इस कहानी में.

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रेन्सन की कहानी, जहां भी गए तहलका मचा दिया.

'सिंघम' IPS से तमिलनाडु BJP के सबसे युवा अध्यक्ष बने अन्नामलाई की कहानी

'सिंघम' IPS से तमिलनाडु BJP के सबसे युवा अध्यक्ष बने अन्नामलाई की कहानी

पहला चुनाव हार गए थे, बीजेपी ने राज्य की जिम्मेदारी सौंपी है.

'तड़प-तड़प के' जैसा प्रेमियों का ब्रेकअप एंथम देने वाले सिंगर के के आजकल कहां हैं?

'तड़प-तड़प के' जैसा प्रेमियों का ब्रेकअप एंथम देने वाले सिंगर के के आजकल कहां हैं?

उनके गाए 'पल' गाने के बगैर आज भी किसी कॉलेज का फेयरवेल पूरा नहीं होता.

कर लिया योगा? अब क्विज खेलने से होगा

कर लिया योगा? अब क्विज खेलने से होगा

आन्हां, ऐसे नहीं कि योग बस किए, दिखाना पड़ेगा कि बुद्धिबल कित्ता बढ़ा.

तमिल जनता आखिर क्यों कर रही है 'फैमिली मैन-2' का विरोध, क्या है LTTE की पूरी कहानी?

तमिल जनता आखिर क्यों कर रही है 'फैमिली मैन-2' का विरोध, क्या है LTTE की पूरी कहानी?

जब ट्रेलर आया था, तबसे लगातार विरोध जारी है.

माधुरी से डायरेक्ट बोलो 'हम आपके हैं फैन'

माधुरी से डायरेक्ट बोलो 'हम आपके हैं फैन'

आज जानते हो किसका हैप्पी बड्डे है? माधुरी दीक्षित का. अपन आपका फैन मीटर जांचेंगे. ये क्विज खेलो.

जिन मीम्स को सोशल मीडिया पर शेयर कर चौड़े होते हैं, उनका इतिहास तो जान लीजिए

जिन मीम्स को सोशल मीडिया पर शेयर कर चौड़े होते हैं, उनका इतिहास तो जान लीजिए

कौन सा था वो पहला मीम जो इत्तेफाक से दुनिया में आया?

पार्टियों को चुनाव निशान के आधार पर पहचानते हैं आप?

पार्टियों को चुनाव निशान के आधार पर पहचानते हैं आप?

चुनावी माहौल में क्विज़ खेलिए और बताइए कितना स्कोर हुआ.

लगातार दो फिफ्टी मारने वाले कोहली ने अब कहां झंडे गाड़ दिए?

लगातार दो फिफ्टी मारने वाले कोहली ने अब कहां झंडे गाड़ दिए?

राहुल के साथ यहां भी गड़बड़ हो गई.