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दिल्ली में हिंसा के बीच 20 साल पुराने छत्तीसिंहपुरा नरसंहार की चर्चा क्यों हो रही है?

दिल्ली तीन दिनों से नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA के मसले पर भड़की आग में जल रही है. शहर के उत्तर-पूर्वी इलाके में जाफराबाद, मौजपुर, चांद बाग, भजनपुरा में हिंसा ने 17 जिंदगियों को लील लिया. कई घरों, दुकानों, गाड़ियों को राख कर दिया. 150 से ज्यादा लोग घायल हैं. इनमें से कई अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे हैं. अभी स्थिति काबू में बताई जा रही है, लेकिन तनाव पसरा है. हिंसा में दिल्ली पुलिस के हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल की भी मौत हो गई. बीजेपी सांसद मीनाक्षी लेखी ने दिल्ली में हिंसा के पीछे साजिश की आशंका जताई. उन्होंने रतन लाल की मौत की घटना की तुलना साल 2000 में बिल क्लिंटन के दौरे के समय जम्मू-कश्मीर के छत्तीसिंहपुरा में सिखों के नरसंहार से की.

पहले ये देखिए कि लेखी ने क्या कहा-

हेड कॉन्स्टेबल रतनलाल की निर्दय और बर्बरतापूर्ण मौत के बारे में सुनकर स्तब्ध हूं. यह मुझे क्लिंटन के दौरे के वक्त छत्तीसिंहपुरा में सिखों के नरसंहार की याद दिलाता है. घटनाएं बदल जाती हैं, लेकिन भारत विरोधी ताकतें बनी रहती हैं. यह भारत को शर्मिंदा करने की चाल है. सबसे शांति और निश्चिंत रहने की विनती है.

क्या है छत्तीसिंहपुरा नरसंहार मामला

साल 2000 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन भारत दौरे पर आए थे. उस समय 22 साल बाद कोई अमेरिकी राष्ट्रपति भारत आ रहा था. अटल बिहारी वाजपेयी उस समय भारत के प्रधानमंत्री थे. क्लिंटन के भारत आने से एक दिन पहले 20 मार्च, 2000 को सेना की वर्दी पहने आतंकियों ने 35 सिखों की गोली मारकर हत्या कर दी. यह घटना जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर से 70 किलोमीटर दूर छत्तीसिंहपुरा गांव में हुई. कश्मीर में पहली बार सिखों को आतंकियों ने निशाना बनाया. इस नरसंहार का आरोप आतंकी संगठन लश्कर ए तैयबा पर लगा. पुलिस ने बताया कि लश्कर को हिजबुल मुजाहिदीन से मदद मिली.

छत्तीसिंहपुरा में 35 सिखों की हत्या की घटना का असर बिल क्लिंटन की भारत यात्रा पर पड़ा था. (Photo: Getty)
छत्तीसिंहपुरा में 35 सिखों की हत्या की घटना का असर बिल क्लिंटन की भारत यात्रा पर पड़ा था. (Photo: Getty)

सेना की वर्दी में आए आतंकी

पुलिस के मुताबिक, 40 से 50 आतंकी शाम को सात बजकर 20 मिनट पर गांव में दाखिल हुए. उन्होंने गांव वालों को दो लाइनों में खड़ा कर दिया. यह इलाका आतंकियों के प्रभाव वाला माना जाता है. इस इलाके में सुरक्षाबल अक्सर सर्च ऑपरेशन चलाते थे. इस वजह से जब छत्तीसिंहपुरा गांव के पुरुषों से दो लाइनों में खड़ा होने को कहा गया, तो उन्होंने ज्यादा दिमाग नहीं लगाया. उन्होंने सोचा कि फौजी ही आए हैं और जांच के बाद चले जाएंगे.

गांववालों ने बताया था कि आतंकी हिंदी और उर्दू बोल रहे थे. लाइनों में खड़ा करने के बाद उन्होंने गांव वालों को गोलियों से भून दिया. आतंकियों ने गोलीबारी करने के दौरान ‘भारत की माता की जय’ और ‘जय बजरंग बली’ के नारे लगाए. पुलिस ने बताया कि आतंकियों ने गांव वालों को गुमराह करने के लिए इस तरह के पैंतरे आजमाए.

बिल क्लिंटन साल 2000 में भारत दौरे पर आए थे. (File Photo)
बिल क्लिंटन साल 2000 में भारत दौरे पर आए थे. (File Photo)

तत्कालीन पीएम वाजपेयी ने इस नरसंहार को ‘एथनिक क्लींजिंग’ यानी जातीय नरसंहार बताया था. वहीं क्लिंटन ने हमले को बर्बर बताया था. भारत के तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) बृजेश मिश्रा ने नरसंहार का दोषी लश्कर ए तैयबा और हिज्बुल मुजाहिदीन को बताया. हालांकि आतंकी संगठनों ने नरसंहार में हाथ होने से इनकार किया.

जिंदाल और हेडली ने कहा था, लश्कर की थी भूमिका

इस नरसंहार को लेकर बाद में कई सवाल उठे. कई लोगों ने इसमें सेना के लिप्त होने के आरोप लगाए. लेकिन इसको लेकर किसी तरह की जांच नहीं कराई गई. हालांकि साल 2006 में मुंबई हमलों के मामले में गिरफ्तार अबू जिंदाल ने पुलिस को बताया था कि छत्तीसिंहपुरा नरसंहार लश्कर ने ही कराया था. उसने बताया था कि लश्कर से जुड़े मुजम्मिल भट्ट की इस नरसहांर में बड़ी भूमिका थी. चार साल बाद साल 2010 में मुंबई हमलों के मामले में गिरफ्तार डेविड हेडली ने नेशनल इंवेस्टिगेशन एजेंसी यानी एनआईए को भी ऐसी ही जानकारी दी.

छत्तीसिंहपुरा गांव में आतंकियों ने लाइन में खड़ा कर सिख पुरुषों को गोलियों से भून दिया था. (Video: Getty)
छत्तीसिंहपुरा गांव में आतंकियों ने लाइन में खड़ा कर सिख पुरुषों को गोलियों से भून दिया था. (Video: Getty)

नरसंहार के 5 दिन बाद पाथरीबल मुठभेड़

छत्तीसिंहपुरा नरसंहार के पांच दिन बाद 25 मार्च, 2000 को सेना और पुलिस ने दावा किया कि उसने मुठभेड़ में इस नरसंहार में शामिल पांच आतंकियों को मार दिया है. उनकी ओर से कहा गया कि नरसंहार के दोषी पांच विदेशी आतंकियों को मार गिराया गया है. यह कथित मुठभेड़ अनंतनाग जिले के पाथरीबल गांव में हुई. इसमें राष्ट्रीय राइफल्स में तैनात तत्कालीन कर्नल अजय सक्सेना, लेफ्टिनेंट कर्नल ब्रजेंद्र प्रताप सिंह, लेफ्टिनेंट सौरभ शर्मा, लेफ्टिनेंट अमित शर्मा और नायब सूबेदार इदरीस खान का नाम शामिल था. इस मुठभेड़ पर काफी सवाल उठे थे. मारे गए लोगों के परिवारों का आरोप था कि ये मुठभेड़ फर्जी थी और इसमें मारे गए लोग विदेशी नहीं, कश्मीरी थे.

इस पर सरकार ने सीबीआई को जांच सौंपी. जांच के बाद सीबीआई ने 19 मार्च, 2012 को सुप्रीम कोर्ट से कहा कि मुठभेड़ फर्जी थी. लेकिन सेना ने 23 जनवरी, 2014 को मामले को बंद कर दिया गया. उसकी ओर से कहा गया कि आरोपी अफसरों व जवानों के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिले. इसके बाद भी मारे गए लोगों के परिवारों ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन कुछ नहीं हुआ.

दिल्ली हिंसा के चलते 20 साल बाद एक बार फिर छत्तीसिंहपुरा नरसंहार चर्चा में आया. इसके साथ ही वे अनसुलझे सवाल भी फिर से जिंदा हो गए, जो दो दशकों से कहीं दबे पड़े थे.


Video: दिल्ली के मौजपुर, भजनपुरा, जाफराबाद और सीलमपुर में हुई हिंसा

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