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डेंगू में प्लेटलेट्स कैसे कम होने लगते हैं और ये क्यों खतरनाक है?

दिल्ली में डेंगू एक बार फिर तेजी से फैल रहा है. बीते सालों में दिल्ली में डेंगू पर काफी नियंत्रण किया गया था. लेकिन अब इसके मरीजों में फिर इजाफा देखने को मिला है. जानकार इसके लिए कोरोना संकट से प्रभावित हुई स्वास्थ्य व्यवस्था को भी जिम्मेदार बता रहे हैं. वजह जो भी हो, ये साफ है कि राजधानी में डेंगू संकट अब जानलेवा हो चुका है. इसी हफ्ते खबर आई थी कि दिल्ली में इस साल डेंगू से पहले मरीज की मौत हुई है. पीड़ित 35 साल की एक महिला थी.

हर साल जब बारिश का मौसम जाने को होता है और सर्दियों के आने का समय होता है उस समय एक बीमारी खूब तेजी से फैलती है. डेंगू. मच्छर के काटने से होने वाली ये बीमारी हर साल अगस्त से अक्टूबर के महीने में पीक पर होती है. और इस दौरान जिस एक चीज की खूब डिमांड बढ़ जाती है वो है प्लेटलेट्स. डेंगू सीजन के दौरान हम अक्सर देखते हैं कि कैसे लोग किसी डेंगू मरीज को प्लेटलेट्स दिलवाने के लिए जद्दोजहद कर रहे होते हैं. आइए समझने की कोशिश करते हैं कि ये प्लेटलेट्स होते क्या हैं और डेंगू होने पर शरीर में इनकी कमी क्यों हो जाती है?

प्लेटलेट्स. (सांकेतिक तस्वीर- इंडियाटुडे)
प्लेटलेट्स. (सांकेतिक तस्वीर- इंडियाटुडे)

क्या होते हैं प्लेटलेट्स?

हमारा खून तीन प्रमुख चीजों से मिलकर बना होता है. एक, लाल रक्त कोशिकाएं (RBC), जिनका काम होता है ऑक्सीजन को एक जगह से दूसरे जगह तक ले जाना. दूसरी, सफेद रक्त कोशिकाएं (WBC), जिनका काम होता है इन्फेक्शन से लड़ने की ताकत देना. और तीसरे होते हैं प्लेटलेट्स. इनका काम होता है चोट लगने पर खून बहने से रोकना. ये बहुत छोटे-छोटे कण होते हैं. स्वस्थ्य व्यक्ति के शरीर में इनकी संख्या एक लाख से साढ़े चार लाख तक की होती है. खून जमने की प्रक्रिया के बारे में बताते हुए चंदन इंस्टीट्यूट ऑफ हेमटोलॉजी, लखनऊ के डायरेक्टर डॉ. भूपेंद्र कहते हैं,

प्लेटलेट्स बहुत छोटे-छोटे कण होते हैं. इनके अंदर सैकड़ों तरह के केमिकल्स पाए जाते हैं. इनका प्रमुख काम होता है खून को जमाना. जब नसें डैमेज हो जाती हैं तो तुरंत वहां प्लेटलेट्स पहुंच जाते हैं और ग्लू की तरह चिपक जाते हैं. प्लेटलेट्स खून के रिसाव को बंद करने की प्रक्रिया में लग जाते हैं. ये खून का थक्का जमाकर रक्त को बहने से रोकता है. इसके लिए ये फाइब्रिनोजेन (नाम के ग्लाइकोप्रोटीन) की मदद लेता है, जो फाइब्रिन में कन्वर्ट होकर जाली की तरह एक ढांचा बना देता है. इस ढांचे में प्लेटलेट्स जाकर चिपक जाते हैं. यानी कि पहले एक जाली बनी और फिर उस जाली में जाकर प्लेटलेट्स चिपक गए और एक कवर तैयार हो गया. इस तरह से रक्त के जमाव की जो प्रक्रिया है वो पूरी हो जाती है.

डेंगू का वायरस कई तरह से प्लेटलेट्स को प्रभावित करता है. (डेंगू वार्ड का एक दृश्य- PTI)
डेंगू का वायरस कई तरह से प्लेटलेट्स को प्रभावित करता है. (डेंगू वार्ड का एक दृश्य- PTI)

डेंगू की प्लेटलेट्स से क्या दुश्मनी है?

हम सब जानते हैं कि डेंगू बीमारी एडीज इजिप्टी (इजिप्टाई भी कहते हैं) नाम के मच्छर के काटने से फैलती है. इस मच्छर के काटे का असर होता है रक्त वाहिकाओं पर, जिनके जरिए पूरे शरीर में खून का प्रवाह होता है. डॉ. भूपेंद्र बताते हैं,

डेंगू का वायरस कई तरह से प्लेटलेट्स को प्रभावित करता है. एक तो ये पूरे शरीर में सीधे प्लेटलेट्स को खत्म करना शुरू करता है. दूसरा ये बोन मैरो पर अटैक करता है. RBC, WBC और प्लेटलेट्स, तीनों हमारे बोन मैरो में बनते हैं. जिसकी वजह से भी प्लेटलेट्स कम होने लगती हैं. इसके अलावा ये हमारी रक्त वाहिकाओं में पाई जाने वाली इंडोथीलियम सेल्स को भी जगह-जगह डैमेज करता है.

डॉक्टर ने आगे बताया,

जब इंडोथीलियम डैमेज होती हैं तो प्लेटलेट्स उन्हें ठीक करने में लग जाते हैं. जिसकी वजह से प्लेटलेट्स का इस्तेमाल बढ़ जाता है. अब समस्या ये होती है कि प्लेटलेट्स के बनने की अपनी एक रफ्तार है. बोन मैरो के भी प्रभावित होने की वजह से इसके बनने की रफ्तार धीमी हो चुकी होती है. इधर यूज ज्यादा तेजी से होने लगा है.

एक समय ऐसा आता है जब प्लेटलेट्स की इतनी कमी हो जाती है कि डैमेज इंडोथीलियल सेल्स को भरने के लिए वे बचती ही नहीं. तो फिर होता क्या है कि जगह-जगह से ब्लड निकलना शुरू हो जाता है. एक तरह से ये समझिए कि पाइप में ब्लड है. तभी तो प्रेशर है. पाइप में छेद कर दिया तो प्रेशर कम होने लगता है.

प्लेटलेट्स की कमी के लक्षण

प्लेटलेट्स की कमी होने पर इस तरह के लक्षण आते हैं-

#शरीर पर लाल या नीले रंग के चकत्तों का आना. इसे परप्यूरा कहते हैं.

#शरीर पर लाल रंग के छोटे-छोटे दानों का आना.

# नाक से खून आना

#मसूड़ों से खून आना

#लंबे समय तक घावों से खून बहना. रक्तस्राव का न रुकना.

#महिलाओं को पीरियड्स के दौरान हैवी ब्लीडिंग होना.

प्लेटलेट्स को खून की तरह सुरक्षित नहीं जा सकता है. ये 7-8 दिन में नष्ट हो जाते हैं. (रक्त दान की सांकेतिक तस्वीर- PTI)
प्लेटलेट्स को खून की तरह सुरक्षित नहीं जा सकता है. ये 7-8 दिन में नष्ट हो जाते हैं. (रक्तदान की सांकेतिक तस्वीर- PTI)

प्लेटलेट का जीवनकाल करीब 7-8 दिन का होता है. इसके बाद ये नष्ट हो जाता है. इनके नष्ट होने और निर्माण की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है. लेकिन जब नए बनने वाले प्लेटलेट्स की अपेक्षा नष्ट होने वाले प्लेटलेट्स की संख्या अधिक हो जाती है तो फिर प्लेटलेट्स की कमी होने लगती है. इस कमी से होने वाली बीमारी को थ्रॉम्बोसाइटोपेनिया कहते हैं.

प्लेटलेट की कमी से होने वाली दिक्कतों के बारे में बताते हुए डॉ. भूपेंद्र कहते हैं,

शरीर में प्लेटलेट की कमी की वजह से ब्रेन हैमरेज हो जाता है. कहने का मतलब ये कि पाइप तो हमेशा फटता रहता है और प्लेटलेट ग्लू की तरह उसे चिपकाता रहता है. लेकिन जब वो नहीं है शरीर में तब शरीर में हैवी ब्लीडिंग हो सकती है. और ये कहीं से भी हो सकती है. चाहे वो ब्रेन हैमरेज के फॉर्म में या फिर चाहे हैवी ब्लीडिंग पीरियड्स के फॉर्म में. नाक से भी तेजी से ब्लड आता है और बंद नहीं होता है. इसके अलावा अगर कहीं चोट लग गई तो खून बहता ही रहता है. थक्का जमता ही नहीं है.

प्लेटलेट्स बढ़ाने के उपाय

शरीर में प्लेटलेट्स की कमी होने पर पपीता खाने की सलाह दी जाती है. डेंगू से पीड़ित मरीज को पपीते के पत्ते का रस भी पीने के लिए दिया जाता है. इसके अलावा प्लेटलेट्स की कमी को दूर करने के लिए विटामिन B12, विटामिन C और विटामिन K युक्त चीजों का सेवन करने की सलाह भी दी जाती है. लेकिन सबसे जरूरी बात ये है कि सबसे पहले डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए. फिर वो जो बताएं वही करना चाहिए.


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