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इंडिया ने रतनजोत के बीज से उड़ाया हवाई जहाज, अर्थात हवाई यात्राएं सस्ती और इको-फ्रेंडली होंगी

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10 अगस्त, 2018. हर साल की तरह इस साल भी विश्व बायोफ्यूल दिवस मनाया गया. ये बायो फ्यूल दिवस सदियों तक याद रखा जाएगा. क्यूंकि इसी मुबारक मौके पर हमारे देश के प्रधानमंत्री ने बायोफ्यूल की हिमायत करते हुए नाले से निकलने वाली गैस से चाय बनाने का मज़ेदार लेकिन सर-रियल किस्सा सुनाया था.

27 अगस्त, 2018. आज फिर देश में बायोफ्यूल की बात हो रही है. कारण ये है कि भारत उन चार देशों में शामिल हो गया है जिन्होंने बायोफ्यूल का इस्तेमाल करके हवाई जहाज उड़ाया है. बाकी तीन हैं – अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया. इसमें से भी केवल अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में ही बायोफ्यूल का इस्तेमाल कॉमर्शियल फ्लाइट्स में हो रहा है.

जट्रोफा के बीज से बने बायोफ्यूल से उड़ने वाली देश की पहली एयरलाइन्स बनी है ‘स्पाइस जेट’. अपनी दाईं टंकी में बायोफ्यूल और एटीएफ (एविएशन टर्बाइन फ्यूल) का मिश्रण और बाईं टंकी में प्लान बी यानी 100% एटीएफ भरे हुए इस विमान ने देहरादून से दिल्ली के लिए लिए सफल उड़ान भरी.

स्पाइसजेट से पहले ये काम करने का प्रयास दिवालिया हो चुकी किंगफ़िशर से लेकर राष्ट्रीय एयरलाइन्स एयर इंडिया तक कर चुकी थीं, लेकिन अंततः सौभाग्य मिला स्पाइस जेट को.


# बायो फ्यूल क्या है?

कहते हैं कि मरा हुआ हाथी भी लाख का होता है. लेकिन हाथी ही नहीं दरअसल लाखों साल पहले मरा हुआ हर कोई जानवर आज लाखों का है. ज़मीन के अंदर दबकर वो फॉसिल फ्यूल (यानी जीवाश्म से बनने वाला इंधन) बन गया है. पेट्रोल डीज़ल, ये सब फॉसिल फ्यूल ही हैं. फॉसिल फ्यूल बनने में बहुत समय लगता है. सालों या सदियों नहीं, युगों.

अब अगर इस लाखों साल की नेचुरल प्रोसेस को कुछ दिनों या घंटों की साइंटिफिक प्रोसेस में बदल दें तो जो फ्यूल मिलेगा उसका नाम होगा बायोफ्यूल.

और पढ़ें: क्यूं भारत में असफल हुई गोबर गैस, जो सफल होती तो भारत की आधी मुश्किलें हल हो जातीं

चिंता मत कीजिए इसके लिए किसी जानवर को मारने की ज़रूरत नहीं. जिस तरह एग्रीकल्चर की क्रांति से मानव मांसाहारी से शाकाहारी बना (वेल, काफी हद तक) वैसे ही इसी एग्रीकल्चर वाली क्रांति से बायोफ्यूल भी शाकाहारी बन चुका है. कबका. तिल और मूंगफली से निकलने वाले तेल ‘शाकाहारी बायोफ्यूल’ ही हैं. और वेजिटेबल ऑइल का तो नाम ही ‘वेजिटेबल ऑइल’ है. इसके अलावा गोबर गैस भी एक बायोफ्यूल है.

दुनिया भर में मौजूद ‘फॉसिल फ्यूल’ की मात्रा सीमित है. जो बेचारे जानवर लाखों साल पहले मरे थे आज काम आ रहे हैं. यूं सारा ‘फॉसिल फ्यूल’ खत्म हो जाने के बाद हमें लाखों साल और इंतज़ार करना पड़ सकता है.

लेकिन जैव ईंधन ने हमारे सीमित स्त्रोत को असीमित तो बेशक नहीं बनाया लेकिन उसका विस्तार अवश्य कर दिया है.

लेकिन तेल में ‘तेलियता’ होना ही काफी नहीं. अलग अलग गुणों के चलते अलग-अलग तरह के तेल मार्केट में हैं. किसी के घर में घी के दिए जलते हैं किसी के घर में मोमबत्तियां.

ज्वलनशीलता से लेकर उपलब्धता, शुद्धता और मूल्य तक ढेरों ऐसी बातें हैं जो निर्धारित करते हैं कि कौन सा बायोफ्यूल या फ्यूल किस काम के लिए प्रयोग में आएगा. इसके अलावा टॉक्सिकनेस (जहरीलापन) भी बहुत महत्वपूर्ण कारक है यह निर्धारित करने के लिए कि अमुक तेल खाद्य है या अखाद्य.

तो इन्हीं सब चीज़ों को ध्यान में रखकर जट्रोफा यानी रतनजोत से जो तेल निकाला गया है उसे हवाई जहाज के इंधन के रूप में उपयोग किया गया है.


# जट्रोफा के बीज से बना फ्यूल –

जट्रोफा गर्म मौसम और बंजर मिट्टी में उग सकता है. इसके बीज में पाए गए तेल को उच्च गुणवत्ता वाले डीजल ईंधन में परिवर्तित किया जा सकता है. चूंकि जेट्रोफा अखाद्य है इसलिए इसका ईंधन में ही मुख्यतः उपयोग हो सकता है. इसके अलावा सूखे का सामना करने की क्षमता होना, स्वाभाविक रूप से कीट-खरपतवार से लड़ने की क्षमता और एवरेज क्वालिटी की मिट्टी में उग जाना इसे बायो फ्यूल की दुनिया का गेम-चेंजर बनाता है. भारत में खेती के लिए उपलब्ध ज़मीन में से 20% से अधिक ज़मीन को उपर्युक्त मानकों के हिसाब से ‘जट्रोफा आरक्षित’ ज़मीन कहा जा सकता है.

जट्रोफा बीजों से निकलने वाले कच्चे तेल को डीजल में बदलने के लिए प्रोसेसिंग की आवश्यकता होती है. इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ पेट्रोलियम ने अबकी बार इसे अपनी लैब में तैयार किया है. इससे पहले आईआईपी ने कनाडा में उनकी मदद से ये कारनामा किया था.

जट्रोफा का पौधा
जट्रोफा का पौधा (www.jatropha.org, तस्वीर: आर के हैनिंग)

# इससे क्या फायदा होगा?

सबसे पहला फायदा तो हमने पहले ही जान लिया कि ऊर्जा का ये स्रोत पेट्रोल, डीज़ल की मोनोपॉली को खत्म करेगा. साथ ही समाज ‘ऊर्जा का स्रोत खत्म हो जाने’ वाली बात से डरना बंद कर देगा. दूसरी और तीसरी सबसे महत्वपूर्ण बात कि इसे पारंपरिक ईंधन से क्रमशः सस्ता और कम प्रदूषण करने वाला भी पाया गया है.

आईएटीए (इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट असोसिएशन) ने लक्ष्य रखा है कि 2050 तक विमानों से होने वाले प्रदूषण को आधा कर दिया जाएगा. बायोफ्यूल के बिना यह लक्ष्य असंभव लगता है. तब जबकि दुनिया भर के कार्बन फुटप्रिंट्स में ढाई प्रतिशत से ज़्यादा पैरों के निशान एयरलाइन इंडस्ट्री के हैं.

देहरादून के इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ पेट्रोलियम संस्थान में जट्रोफा को छत्तीसगढ़ से लाया गया. छत्तीसगढ़ के 500 से ज़्यादा परिवारों ने इसकी खेती की थी. ये छत्तीसगढ़ वाली बात इसलिए बताई जिससे कि हम जान सकें कि भविष्य में ‘कैश क्रॉप’ उगाने वालों को भी इस बायो फ्यूल का फायदा होगा. ‘कैश क्रॉप’ वो फसलें होती हैं जो खाने में तो उपयोग में नहीं आती लेकिन फिर भी बहुत महंगे में बिकती हैं. कपास इस ‘कैश क्रॉप’ का एक और उदाहरण है.


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