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करोड़ों के ड्रग्स ज़ब्त करके सरकार इनका करती क्या है?

मुंद्रा पोर्ट (Mundra Port). गुजरात (Gujarat) के कच्छ में बसा है. इस पोर्ट को जाने माने उद्योगपति गौतम अडानी (Gautam Adani) की कंपनी चलाती है. कुछ दिनों पहले यहां हजारों करोड़ रुपये की हेरोइन पकड़े जाने की खबर सुर्ख़ियों में बनी हुई है. सोशल मीडिया पर तो इसे लेकर बवाल कटा हुआ है.

लेकिन ज़ब्त हुई इस अरबों की हेरोइन के साथ होगा क्या, ये एक बड़ा सवाल है. क्या होता है जब सरकार की अलग-अलग एजेंसियां ऐसे ड्रग्स (Drugs) ज़ब्त करती हैं? क्या उनको कहीं स्टोर करके रखा जाता है, या उनको डिस्पोज़ कर दिया जाता है? हमने इन सवालों के जवाब ढूंढने की कोशिश की है.

क्या होता है जब ड्रग्स जब्त किया जाता है?

नारकोटिक ड्रग एंड साइकोट्रापिक सब्स्टन्सेज़ यानी NDPS ऐक्ट, 1985 की धारा 60, 61 और 62 के मुताबिक़, ड्रग्स की ज़ब्ती की जाती है. अगर ड्रग्स को ट्रांसपोर्ट करने में किसी गाड़ी का इस्तेमाल हुआ है, तो उसे भी ज़ब्त किया जाता है. और इससे जुड़े लोगों को गिरफ्तार किया जाता है. उसके बाद कोर्ट में मामले का ट्रायल चलता है. सुनवाई होती है.

ये तो हुई क़ानूनी प्रक्रिया. लेकिन क्या इस बारे में सरकार की कोई गाइडलाइन भी हैं? हां, केंद्र सरकार ने इस पर गाइडलाइन के अलावा अलग-अलग आदेश भी जारी किए हैं.

2015 में केंद्रीय वित्त मंत्रालय के तहत राजस्व विभाग ने सभी राज्य सरकारों को एक आदेश जारी किया था. इसमें बताया गया था कि किसी भी मामले में जब्त किए ड्रग्स का फ़ौरन डिस्पोज़ल किया जाए. आदेश के मुताबिक, ज़ब्त किए गए ड्रग्स का एविडेन्स रखना ज़रूरी है. जैसे कि ज़ब्त करने के प्रोसेस की फ़ोटो और वीडियोग्राफ़ी. इस आदेश को जारी करने के पीछे मंशा ये थी कि इन नशीले ड्रग्स का ग़लत इस्तेमाल कम से कम हो.

Marijuana
कैनेबिस यानी कि भांग के पौधे की प्रतीकात्मक तस्वीर. फ़ोटो-आजतक.

दी लल्लनटॉप ने इस बारे में दिल्ली पुलिस के क्राइम ब्रांच के नारकोटिक्स विभाग के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से बात की. नाम न बताने की शर्त पर अधिकारी ने कहा,

“हमारे पास ऐसे कई केस आ चुके हैं, जिनमें ज़ब्त किए गए ड्रग्स बहुत ही कम मात्रा में थे. वो या तो ग़ायब हो गए, या चोरी हो गए. इस वजह से ऐसे मामलों में, जिनमें ड्रग्स की मात्रा काफ़ी कम होती है, उसमें जब एक बार ड्रग्स ज़ब्त कर लिया जाता है और सैम्पल फ़ॉरेंसिक लैब भेज दिया जाता है, तो हम उसे नष्ट कर देते हैं.”

लेकिन अधिकारी आगे बताते हैं कि ज़ब्त किए गए ड्रग्स को नष्ट करने के लिए भी कोर्ट की मंज़ूरी लेने की ज़रूरत होती है. इस बात का ज़िक्र 2015 के सरकारी आदेश में भी है.

ड्रग्स का डिस्पोज़ल कैसे किया जाता है?

NDPS ऐक्ट के सेक्शन 52E के मुताबिक़ कोर्ट में ट्रायल से पहले भी ड्रग्स को डिस्पोज़ किया जा सकता है. लेकिन ऐसा तब संभव है जब ज़ब्त किए हुए ड्रग्स को रखना ख़तरनाक हो, या इसकी चोरी का ख़तरा हो. ऐसे मामलों में अधिकारी ज़ब्ती होते ही मैजिस्ट्रेट के सामने ड्रग्स को नष्ट करने की परमिशन का आवेदन दे सकता है. मंजूरी मिलने के बाद ड्रग्स को नष्ट किया जा सकता है.

केंद्र के 2015 के आदेश में सभी राज्य सरकारों को एक ड्रग डिस्पोज़ल कमेटी बनाने का निर्देश भी दिया गया था. इस डिस्पोज़ल कमेटी को आदेश था कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानदंडों का पालन करते हुए ड्रग्स डिस्पोज़ किए जाएं. हालांकि, इस आदेश के मुताबिक़ ड्रग्स को डिस्पोज़ तभी किया जा सकता है, जब कब्जे में दवाओं की कुल मात्रा एक निर्धारित मात्रा में हो. ये मात्रा तय करने का अधिकार डिस्पोज़ कमेटी के पास है.

Drugs Destruction, Kullu
पुलिस द्वारा अवैध ड्रग्स जलाए जाने की एक तस्वीर. (फाइल फोटो- पीटीआई)

भारत के गृह मंत्रालय द्वारा संचालित नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो का एक ड्रग लॉ एन्फ़ोर्समेंट फ़ील्ड ऑफ़िसर्स हैंडबुक है. इसमें ड्रग नष्ट करने की प्रक्रिया से जुड़ी सारी जानकारी दी गई है. हैंडबुक के चैप्टर 22 डिस्पोज़ल पर आधारित है. इसमें NDPS ऐक्ट के हवाले से बताया गया है कि अगर ज़ब्त हुए ड्रग्स किसी व्यक्ति से ना जुड़े हों तो एक महीने बाद अधिकारी कोर्ट को इसकी सूचना देकर इनकी बिक्री या डिस्पोज़ल के संबंध में परमिशन ले सकता है.

जल्दी ख़राब होने वाले ड्रग्स के लिए इस हैंडबुक में अलग प्रावधान है. जैसे कि गांजा-अफ़ीम के मामलों में अधिकारी कोर्ट के आदेश से इनकी नीलामी भी कर सकता है. अगर ऐसे मामलों में गिरफ़्तार किया गया व्यक्ति निर्दोष पाया जाता है तो NDPS ऐक्ट की धारा 63(2) के तहत उसे ड्रग्स वापस लौटा दिए जाते हैं. लेकिन ऐसे भी कई मामले होते हैं जिनमें ड्रग्स को तब तक स्टोर करके रखना पड़ता है, जब तक कि उन पर कोर्ट का कोई आदेश नहीं आ जाता. ऐसे में ड्रग्स स्टोरिंग की जिम्मेदारी किसी सरकारी संस्था या एजेंसी की होती है.


वीडियो- गांजा को ड्रग्स की लिस्ट से हटवाने में भारत क्यों रहा UN में आगे?

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