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चीन के साथ लोहा ले चुके फौजी जनरलों ने क्या सलाह दी है

15 जून की रात लद्दाख की गलवान घाटी में चीन और भारत के सैनिकों के बीच हिंसा हुई. इस हिंसा में भारत के 20 जवान शहीद हो गए. 1975 के बाद पहली बार इस तरह की घटना देखने को मिली है. देश गुस्से में है. बदला लेने की बातें कही जा रही हैं. चीनी सामानों के बहिष्कार की बात की जा रही है. इस घटना के बाद भारत को आगे क्या करना चाहिए? रिटायर्ड फौजी जनरलों ने जो सलाह दी है, वो जानते हैं.

मेजर जनरल (Dr) जी.जी. द्विवेदी

गलवान घाटी के आसपास की चोटियों पर 1962 में रक्तपात हुआ था, जब चीनी सैनिकों ने 22 अक्टूबर को पांच-जाट कंपनी पर फायरिंग कर दी थी. इसमें 36 सैनिक शहीद हो गए थे. कंपनी कमांडर मेजर एस. एस. हसबनीस को पकड़ लिया गया था. इससे 1962 के युद्ध की शुरुआत हुई. मेजर जनरल (Dr) जी.जी. द्विवेदी, जिन्होंने 1992 में इस क्षेत्र में एक जाट बटालियन की कमान संभाली और बाद में 1997 में चीन में रक्षा अटैची (Defence Attache) थे, उन्होंने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ से बात की.

क्या चाहता है चीन?

जी.जी. द्विवेदी ने कहा कि चीन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारत एलएसी के पास बुनियादी ढांचे का निर्माण न करे. चीन मिलिट्री के दम पर अपने राजनीतिक लक्ष्य को पूरा करना चाहता है. उन्होंने कहा कि चीन का अक्रामक व्यवहार चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग पर दबाव को दिखाता है, जो सेंट्रल मिलिट्री कमीशन के चेयरपर्सन भी हैं. वो पूरी दुनिया में कोरोना और घर में आर्थिक मंदी के कारण आलोचना झेल रहे हैं.

उन्होंने कहा कि चीन की आर्मी पीएलए का उद्देश्य दार्बुक DBO सड़क पर हावी होना, फिंगर एरिया में अपनी स्थिति को मजबूत करना, गलवान-पैंगोंग त्सो में लिंक सड़कों के निर्माण को रोकना और अपनी शर्तों पर डी-एस्केलेशन पर बातचीत करना है.

(Source: Planet Labs)
(Source: Planet Labs)

चीन ने चुपचाप और लगातार एलएसी के पास बहुत सारे बुनियादी ढांचे का निर्माण किया है और अब वे पहाड़ी पर हावी होना चाहते हैं. कोई भी मिलिट्री मैन आपको ये बताएगा कि यह क्यों मायने रखता है. क्योंकि यदि आप हिलटॉप्स पर कब्जा नहीं करते हैं, तो आप बैठे हुए दलदल की तरह हैं. उन्होंने कहा कि भारत को 30 अप्रैल से पहले की यथास्थिति बहाल करने के लिए दृढ़ होना चाहिए. उन्होंने कहा कि हमें उस पर दृढ़ रहना चाहिए, चीन को वापस जाना चाहिए.

आगे क्या?

उन्होंने कहा कि बातचीत इस बात पर निर्भर करती है कि आप जमीन पर कितने मजबूत हैं. अभी चीन के पास एक बढ़त है. हमें इसे बेअसर करना चाहिए. हमें या तो उन्हें पीछे धकेलना चाहिए या किसी अन्य जगह पर कब्जा करना चाहिए, जो उन्हें प्रभावित करता है. द्विवेदी ने कहा कि सैन्य कार्रवाई राजनीतिक, राजनयिक और आर्थिक कार्रवाई के साथ होनी चाहिए. उन्होंने कहा, ‘हमें भू-राजनीतिक क्षेत्र में चीन को अलग-थलग करना चाहिए और अपने पक्ष में सर्वसम्मति सुनिश्चित करनी चाहिए.’

(Source: Planet Labs)
(Source: Planet Labs)

लेफ्टिनेंट जनरल एचएस पनाग

रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल, उत्तरी कमान के GOC-in-C रह चुके एचएस पनाग ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में एक आर्टिकल लिखा है. उस आर्टिकल की मोटा-मोटी बातें बता देते हैं. उन्होंने लिखा है कि इस तरह की चुनौतियों से निपटने के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति को विकसित किया जाना चाहिए, ताकि वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों से निपटा जा सके. इसे औपचारिक रूप दिया जाना चाहिए और संसदीय जांच के तहत रखा जाना चाहिए.

उन्होंने अपने आर्टिकल में लिखा है कि किसी भी सरकार ने अब तक एक स्पष्ट राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति नहीं बनाई है. हालांकि डिफेंस प्लानिंग कमिटी को 2018 से एक राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति को औपचारिक रूप देने का आदेश दिया गया है. लेकिन ऐसा लगता है कि बहुत कम काम हुआ है. सरकार को विपक्ष, संसद, मीडिया और जनता को विश्वास में लेना चाहिए. ज़मीन पर वास्तविकता समझानी होगी. हमारी मिलिट्री में इतनी ताकत है कि वह पीएलए से सेटलमेंट कर सके.

जवानों की शहादत को याद किया गया. (फोटो-पीटीआई)
जवानों की शहादत को याद किया गया. (फोटो-पीटीआई)

वहीं ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ से बातचीत में एचएस पनाग ने कहा कि भारत को कोशिश करनी चाहिए कि चीनी सेना पीछे हटे और 30 अप्रैल से पहले वाली स्थिति बरकरार हो. बातचीत के जरिए मामले का हल निकाला जाना चाहिए. 1962 के बाद ऐसी स्थिति खड़ी हुई है.

पूर्व सेना प्रमुख जनरल वीपी मलिक

भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख जनरल वेद प्रकाश मलिक. 1999 के कारगिल युद्ध में पाकिस्तानी घुसपैठ के खिलाफ भारत की निर्णायक जीत का नेतृत्व किया था. उन्होंने कहा कि इस घटना ने उन्हें सितंबर 1967 की नाथूला दर्रे की घटना की याद दिला दी. उन्हें उस समय वहां भेजा गया था. सितंबर 1967 को नाथूला में भारत और चीन के सैनिकों के बीच टकराव हुआ था. उन्होंने कहा कि भारत और चीन के बीच गतिरोध के समाधान के लिए कूटनीति और सैन्य स्तर पर बातचीत का दौर जारी है. लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ग्राउंड लेवल पर तनाव व्याप्त है. चीन नहीं चाहता है कि भारत घाटी के आसपास निर्माण कार्य करे. इस तरह की घटना गलवान वैली में पहले कभी नहीं देखी गई थी.

उन्होंने ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ से बातचीत में कहा कि सैन्य बलों को तैयार रहना होगा. लगता है कि सरकार अब आगे बढ़ने के लिए अतिक्रमण हटाने से पहले राजनयिक और राजनीतिक स्तर की संभावनाओं का पता लगाएगी. उन्होंने कहा कि मेरा मानना है कि किसी भी सैन्य स्तर की बातचीत से कोई हल नहीं निकलने वाला है. इसे अब राजनयिक और राजनीतिक स्तर पर निपटना होगा. हालांकि सशस्त्र बलों को किसी भी सैन्य कार्रवाई के लिए अतिरिक्त सतर्क रहना होगा.

वहीं इंडियन एक्सप्रेस से उन्होंने कहा कि यदि बातचीत से हल नहीं निकलता है तो भारत को लद्दाख की गलवान घाटी में एक लंबे संघर्ष के लिए तैयार रहना चाहिए. इस तरह की हिंसक झड़पें और देखने को मिल सकती हैं. चीन की सेना हथियारों से लैस है. पहले भी इस तरह की झड़प होती रही है. लेकिन इस बार चीन की सेना भारी और लंबी दूरी के हथियारों के साथ है. जिसमें मिसाइल शामिल हो सकते हैं. भारत को राजनीतिक और डिप्लोमेटिक तरीके से चीन को पीछे जाने के लिए राजी करना होगा. अगर डी-एस्केलेशन तेजी से नहीं होता है, तो इस तरह के और संघर्ष देखने को मिल सकता है.

पूर्व सेना प्रमुख जनरल (रिटायर्ड) शंकर रॉय चौधरी

नवंबर, 1994 से सितंबर, 1997 तक थल सेना प्रमुख रहे शंकर रॉय चौधरी का कहना है कि भारत को चीन के साथ पूर्ण युद्ध नहीं, बल्कि संघर्ष के लिए तैयार रहना चाहिए. 1962 के बाद दोनों पक्षों की ताकत कई गुना बढ़ गई है. उस समय दोनों देशों के बीच एक संक्षिप्त युद्ध हुआ था. उन्होंने कहा,

‘भारत 1962 में नहीं है, हमें याद रखना चाहिए कि चीन भी 1962 में नहीं है. भारत को युद्ध से निचले स्तर के संघर्ष, लेकिन सीमा पर होने वाली झड़पों से ऊंचे स्तर के लिए तैयार रहना चाहिए. इसके साथ ही कूटनीतिक रूप से भी मुद्दों को संभालना चाहिए. भारत ने अपनी क्षमता कई गुना बढ़ा ली है. दुर्भाग्यवश आर्थिक रूप से इतना अधिक नहीं. सैन्य रूप से हम चीन का मुकाबला कर सकते हैं, लेकिन उसके लिए काफी धन चाहिए.’

पूर्व सेना प्रमुख जनरल बिक्रम सिंह

पूर्व सेना प्रमुख जनरल बिक्रम सिंह ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कहा कि विभिन्न स्तरों पर सैन्य-स्तर की बातचीत से किसी भी तरह का हल नहीं निकलने वाला है. समस्या का समाधान अब केवल राजनयिक और राजनीतिक के माध्यम से ही संभव है. हालांकि इस तरह की पहल शालीनता में नहीं होना चाहिए. सैन्य स्तर पर हमें घुसपैठ क्षेत्रों से पीएलए को बाहर निकालने के लिए बल का उपयोग करने के लिए तैयार रहना चाहिए. बिक्रम सिंह ने कहा पीएम के बयान से स्पष्ट है कि मोदी ने चीन को ये संदेश दिया है कि हम भाईचारे से मसले का हल चाहते हैं, लेकिन कोई देश की अखंडता पर हाथ डालेगा तो हम सेना का इस्तेमाल करने से नहीं चूकेंगे. अपनी धरती पर घुसपैठ स्वीकार नहीं करेंगे.


जहां पर भारत-चीन के बीच हिंसक झड़प हुई, वो जगह कैसी है?

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