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तालिबान संग दोस्ती करके चीन, अफगानिस्तान से क्या हासिल करना चाहता है?

तालिबान अब अफगानिस्तान की सच्चाई बन गया है. जो जान बचाकर भागना चाहते हैं, काबुल के हवाई अड्डे के बाहर सीवेज में खड़े हैं. कह रहे हैं कि तालिबान उन्हें जाने नहीं दे रहा. उधर तालिबान अमेरिका को याद दिला रहा है कि वापसी के लिए जो समयसीमा आपने बनाई थी, उसका पालन कीजिए. ये सब करने का दम तालिबान में आ रहा है उसके पुराने दोस्त पाकिस्तान और नए दोस्त रूस और चीन की शह पर.

भारत की नज़र से देखें तो ये बड़ी समस्या है. तालिबान और चीन के बीच नज़दीकी हमारे हित में नहीं है. ज़िनजियांग में मुसलमानों पर अकल्पनीय अत्याचार कर रहे चीन और इस्लामिक अमीरात बनाने का दावा करने वाले तालिबान के बीच दोस्ती के कारण क्या हैं. और भारत इससे कैसे निपटेगा?

अफगानिस्तान में तालिबान का कब्जा हुए 10 दिन पूरे हो गए हैं. औऱ इन 10 दिनों में वहां ज़्यादा कुछ बदला नहीं है. अब भी काबुल के एयरपोर्ट से वो वीडियो-तस्वीरें आ रही हैं, जिनमें लोग परिवार वतन छोड़कर भागने की जद्दोजेहद में दिखते हैं. रोज़ विमान भर भरकर अमेरिका अपने लोगों को निकाल रहा है. 31 अगस्त तक अमेरिका अपने सभी सैनिकों को अफगानिस्तान से निकाल लेगा.

यानी 6 दिन बाद अमेरिका पूरी तरह से अफगानिस्तान छोड़ देगा. दुनिया को ये चिंता खाए जा रही है कि जब अमेरिका और नैटो फोर्सेज़ भी अफगानिस्तान से निकल जाएंगी, तो फिर तालिबान वहां क्या करेगा. तालिबान की सरकार कैसी होगी, क्या सारे गुटों को तालिबान साथ ले पाएगा या हालात गृह युद्ध जैसे हो सकते हैं. ऐसे कई सवाल हैं, जिनके जवाब में अभी हमारे पास सिर्फ इतंजार है.

Afghanistan Taliban
तालिबान ने कुछ ही दिनों के अंदर पूरे अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया है. (फ़ोटो- आजतक)

दुनिया इस बात का हिसाब लगा रही है कि तालिबान के आने से अफगानिस्तान में महिलाओं के साथ क्या होगा, या मानवाधिकारों का कितना उल्लंघन होगा. इन सबके बीच वो देश भी हैं जो तालिबान की सत्ता में अपना फायदा ही फायदा देख रहे हैं. हम चीन की बात कर रहे हैं. पिछली बार जब तालिबान की सत्ता आई तो चीन ने अफगानिस्तान से कोई वास्ता नहीं रखा.

अमेरिका के हमले और उसके बाद भी अफगानिस्तान को लेकर चीन खामोश रहा. किसी तरह का रणनीतिक दखल नहीं किया. लेकिन जब अमेरिका ने अफगानिस्तान से जाने का ऐलान किया तो चीन ने अपने लिए मौके देखना शुरू कर दिया. चीन ने अफगानिस्तान में निवेश बढ़ाना शुरू कर दिया. चीन, अफगानिस्तान और पाकिस्तान इन तीनों ने मिलाकर एक सहयोग संगठन भी बनाया.

कहने का मतलब चीन ने अफगानिस्तान में अपनी ज़मीन तैयार करना शुरू कर दिया था. जब अफगानिस्तान के फ्यूचर पर तालिबान और बाकी स्टेकहोल्डर्स से बात हो रही थी, तब भी चीन मुख्य भूमिका में था. अब माना जा रहा है कि अगर तालिबान का सबसे ज्यादा फायदा कोई उठाएगा तो वो चीन होगा. इसके उल्ट कई एक्सपर्ट्स ये भी कह रहे हैं कि तालिबान पर दांव लगाना चीन के लिए खतरनाक साबित हो सकता है.

चीन की सेना में 2020 तक अधिकारी रहे झोउ बो का पिछले हफ्ते न्यूयॉर्क टाइम्स में लेख छपा था. इसमें उन्होंने लिखा है कि अमेरिका के जाने के बाद चीन, अफगानिस्तान को वो दे सकता है जो उसके लिए सबसे ज़रूरी है- आर्थिक निवेश और राजनैतिक निष्पक्षता. बदले में चीन को अफगानिस्तान में इंफ्रास्ट्रक्चर में अवसर और उद्योग शुरू करने का काम मिल सकता है. अफगानिस्तान के 1 ट्रिलियन डॉलर के खनिज भंडार तक पहुंच मिल सकती है, जिसमें लिथियम, आयरन, कॉपर और कोबाल्ट भी शामिल हैं.

बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव

चीन और तालिबान के रिश्ते का सार ये ही है. कारोबार में चीन को 2 बड़े फायदे हो सकते हैं. पहला- चीन को अफगानिस्तान से होकर वेस्ट एशिया का रूट मिल जाएगा और दूसरा अफगानिस्तान के खनिज भंडार पर चीन की नज़र है.

चीन अपना सामान कम खर्चे में दुनिया के बाज़ारों तक पहुंचाने के लिए बेल्ट एंड रोड इंशिएटिव यानी बीआरआई चला रहा है. इसके तहत चीन सड़क, रेलमार्ग और बंदरगाह बना रहा है ताकि यूरोप और अफ्रीका तक सामान की आवाजाही आसानी से हो सके.

बीआरआई के सदस्य देशों में अफगानिस्तान भी है. लेकिन अस्थिरता के चलते चीन ने अब तक अफगानिस्तान में ज्यादा निवेश नहीं किया. जैसा वो पाकिस्तान या बीआरआई के और सदस्य देशों में कर रहा है. पाकिस्तान में CPEC यानी चीन-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर पर काम चल रहा है.

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बेल्ट एंड रोड चीन की महत्वकांक्षी परियोजना है. फोटो- AP

रिपोर्ट्स के मुताबिक अब चीन CPEC को काबुल से जोड़ने वाला मोटरवे बना सकता है. अफगानिस्तान के साथ चीन का 90 किलोमीटर का बॉर्डर लगता है. तो चीन से सीधे काबुल तक भी सड़क बना रहा है. अब यहां से चीन के लिए कई संभावनाओं का रास्ता खुलता है. अफगानिस्तान से होकर चीन, खाड़ी देशों तक पहुंच सकता है. तेल और गैस जो अभी समंदर के रास्ते लाई जाती है, तो अफगानिस्तान का रूट मिलने से ट्रांसपोर्टेशन का खर्चा घट जाएगा.

अफगानिस्तान के खनिज पर नजर

अब दूसरे फायदे की बात करते हैं. अफगानिस्तान के खनिज. चीन का असली फायदा यहीं है. अफगानिस्तान में लिथियम मिलता है. लिथियम की उतनी ही अहमियत होगी जितनी पिछले कई दशकों में तेल की रही है. हमारे फोन्स, लैपटॉप या इलेक्ट्रिक वाहनों में लिथियम आयन की बैटरी इस्तेमाल होती है. और आने वाले सालों में लिथियम का इस्तेमाल और बढ़ेगा. फोर्ब्स मैगजीन की रिपोर्ट के मुताबिक 2040 तक दुनिया की सड़कों पर आधे वाहन लिथियम बैटरी से चलने वाले होंगे.

लिथियम आयन बैटरी की खोज तो अमेरिका में हुई थी, लेकिन अब बैटरी बनाने के धंधे में चीन ने बाज़ी मार ली. थिंकटैंक ब्लूमबर्ग NEF ने लिथियम बैटरी पर कुछ आंकड़े जारी किए थे. इनके मुताबिक 2019 में लिथियम बैटरी बनाने की पूरी दुनिया में जितनी क्षमता थी, उसमें 73 फीसदी की हिस्सेदारी अकेले चीन के पास थी. अमेरिका की क्षमता कुल 12 फीसदी की. यानी अमेरिका चीन के आसपास भी नहीं है. और अगर अफगानिस्तान के लिथियम खनिज तक चीन पहुंचता है, ये चीन का धंधा और बढ़ेगा.

लिथियम के अलावा चीन में कॉपर, गोल्ड और कई दुर्लभ खनिज मिलते हैं. अफगानिस्तान 4 दशक से युद्ध के दौर से गुज़र रहा है. अस्थिरता रही है. इसलिए खनिजों का ठीक से दोहन नहीं हुआ. 2010 में अमेरिका ने एक रिपोर्ट में कहा था कि अफगानिस्तान में 1 ट्रिलियन डॉलर की खनिज संपदा है. यानी जितनी भारत की जीडीपी है, उसका लगभग एक तिहाई. ये खजाना चीन को मिल सकता है.

इसलिए चीन ने काफी पहले से ही तालिबान के साथ दोस्ती पर निवेश करना शुरू कर दिया था. इस महीने के शुरू में तालिबान के डिप्टी चीफ मुल्ला बरादर चीन जाकर विदेश मंत्री वांग यी से मिले थे. तालिबान का काबुल पर कब्जा होने के बाद भी चीन ने दोस्ती और सहयोग बढ़ाने की बात कही थी. हालांकि चीन ने ये भी कहा है कि तालिबान को मान्यता सरकार बनाने पर देंगे.

तालिबान को चीन से फायदा

दूसरी तरफ तालिबान को भी चीन से फायदा है. अमेरिका ने तालिबान पर प्रतिबंध लगा रखे हैं. अगर तालिबान हिंसा के रास्ते जाता है तो हो सकता है कि तालिबान को दुनिया से मान्यता ना मिले. ऐसे में चीन का सहयोग तालिबान के काम आएगा. अर्थव्यवस्था में निवेश हो, इसके लिए भी चीन की तालिबान को ज़रूरत है.

हालांकि कुछ एक्सपर्ट्स ये भी मान रहे हैं कि तालिबान पर चीन को भरोसा नुकसानदेह साबित हो सकता है. अफगानिस्तान में कई सारे गुट हैं और अगर आगे अस्थिरता रहती है तो चीन के प्रोजेक्ट्स खतरे में पड़ सकते हैं. इसके पक्ष में ये भी तर्क दिया जा रहा है कि चीन ने अफगानिस्तान में अपनी पीस कीपिंग फोर्स तैनात कर सकता है. कुल मिलाकर इस तरह के इक्वेशन्स पर अभी बात चल रही है. हालांकि अभी ये पूरा खेल कयासों वाला ही है. सबसे पहले तो ये देखना होगा कि अफगानिस्तान में तालिबान सरकार कैसे बनाता है.


 

वीडियो- दी लल्लनटॉप शो: तालिबान से दोस्ती कर अफगानिस्तान में चीन क्या बड़ा फायदा उठाने की फिराक में है?

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