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पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी चीन क्या करने गए?

बीजिंग में कुहनी मिलाते पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी और चीन के विदेश मंत्री वांग यी. कोरोना काल चल रहा है तो शायद हाथ मिलाने के बजाय कुहनी मिला ली क्योंकि नमस्ते तो करेंगे नहीं. ये तस्वीर दो-तीन दिन से पाकिस्तानी मीडिया और सोशल मीडिया पर खूब घूम रही है. मीम भी बन रहे हैं. लेकिन इस तस्वीर को लेकर हमारी दिलचस्पी कुहनी मिलाने में नहीं है, इसके डिप्लोमैटिक मायनों में है जिसमें पाकिस्तान की हार और जीत दोनों छिपी हैं.

कुरैशी को अभी चीन क्यों जाना पड़ा?

पहले पाकिस्तान की डिप्लोमैटिक डिफीट वाली वो कहानी सुन लीजिए जिसे जीत में बदलने के लिए विदेश मंत्री चीन की तरफ भागे. कश्मीर के मुद्दे को लेकर पाकिस्तान इस्लामिक देशों से जैसा सहयोग चाहता था वो मिला नहीं. तो इस बात की पाकिस्तान को झल्लाहट थी. और सबसे ज्यादा झल्लाहट सऊदी अरब को लेकर. क्योंकि इस्लामिक देशों के संगठन OIC यानी ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक को-अपरेशन में सऊदी अरब का ही दबदबा है और इस सगंठन ने पाकिस्तान के मनमुताबिक दिलचस्पी कश्मीर से धारा 370 हटाए जाने के बाद दिखाई नहीं. पाकिस्तान को साथ मिला तुर्की का. और तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोगन भी लगातार ये कोशिश कर रहे हैं सऊदी अरब के बजाय मुस्लिम देशों की नेतागीरी तुर्की को मिले.

Turkey President Erdogan
तुर्की के राष्ट्रपति रिसेप तैयप एर्दोगान. (फोटो: एपी)

सऊदी अरब ने कहा- दोस्ती बनी रहे!

बरसों से पाकिस्तान और सऊदी अरब की अच्छी दोस्ती रही है. सऊदी अरब को पाकिस्तान का आर्थिक और सैन्य सहयोग भी मिलता रहा है. लेकिन अब कश्मीर मुद्दे को लेकर मनमर्जी नहीं चली तो पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने कह दिया कि हमें OIC के विकल्प में कोई दूसरा सगंठन भी खड़ा करना चाहिए. यानी सीधे सीधे तुर्की की तरफदारी. ये बात सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस को चुभ गई. सऊदी ने पाकिस्तान को दो बरस पहले जो लोन दिया था वो वापस मांग लिया. नवंबर 2018 में सऊदी ने पाकिस्तान के लिए 6.2 अरब डॉलर के पैकेज का ऐलान किया था. जिसमें 3 अरब डॉलर का लोन और 3.2 अरब डॉलर का तेल उधार देने की बात थी. लेकिन अब सऊदी अरब दोनों ही बातों से पलट गया. तो क्राऊन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को मनाने के लिए पाकिस्तान के सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा और आईएसआई के डीजी लेफ्टिनेंट जनरल फ़ैज़ हमीद सऊदी अरब गए लेकिन मोहम्मद बिन सलमान ने मिलने का वक्त ही नहीं दिया. यानी सऊदी अरब की अब पाकिस्तान का पास बैठाने में कोई दिलचस्पी नहीं है. और यहां पाकिस्तान की हार हुई, अमीर दोस्त ने मुंह फेर लिया तो अब पाकिस्तान को एक जीत चाहिए थी. और वो जीत मिलती चीन के पास.

Saudi Crown Prince
सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस सलमान. (फोटो: एपी)

फायदे में पाकिस्तान या चीन?

इसलिए गुरुवार को पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी बीजिंग के लिए रवाना हो गए और फिर वो कुहनी मिलानी वाली तस्वीर आई जिसे सऊदी वाली झड़की का जवाब बताया गया. लेकिन कूटनीतिक रिश्तों में बारगेनिंग पावर की अहमियत होती है. अमेरिका और सऊदी अरब के हाथ खींचने लेने के बाद पाकिस्तान के पास अब ज्यादा विकल्प नहीं रहे और वो चीन से कभी भी बार्गेन करने की हैसियत में नहीं रहेगा.

तो दुनिया पाकिस्तान की इस हार और जीत का हिसाब ही लगा रही थी कि चीन ने अपनी अगली चाल चल दी. और इसे गेंम चेंजर बताया जा रहा है. इसका नाम है बेइडो. चीन का नेविगेशन सिस्टम. खबरें हैं अब पाकिस्तान पूरी तरह से चीन के नेविगेशन सिस्टम को अपनाएगा. पूरी तरह का मतलब ये है कि ना सिर्फ मिलिट्री यूज के लिए बल्कि सिविल यूज के लिए भी पाकिस्तान का नेविगेशन सिस्टम बेइडो ही होगा. और नेविगेशन सिस्टम क्या होता है- जो हमें लोकेशन पता करने में मदद करता है. जैसे कहीं का रास्ता देखने के लिए या किसी कार पर निगरानी रखने के लिए हम जीपीएस लगाते हैं. सिविल यूज के लिए मोबाइल में, बस, ट्रक, कारों में नेविगेशन सिस्टम लगाया जाता है.

China Navigation System Beidou 2
चीन का नेविगेशन सिस्टम बेइडो. (फोटो: एपी)

तो अभी तक पाकिस्तान में क्या यूज होता है?

जवाब है जीपीएस. भारत में भी नेविगेशन के लिए जीपीएस ही इस्तेमाल होता है और यहां तो नेविगेशन सिस्टम का पर्यायवाची ही जीपीएस बन गया है. लेकिन असल में जीपीएस अमेरिका के नेविगेशन सिस्टम का नाम है जिसे अमेरिकी वायुसेना ऑपरेट करती है. यानी जैसे चीन का बेइडो है वैसे ही अमेरिका का जीपीएस है. अभी तक भारत-पाकिस्तान समेत दुनिया के ज्यादातर देशों में अमेरिका वाला जीपीएस ही नेविगेशन के लिए काम में लिया जाता है. लेकिन अब चीन ने जीपीएस का बाज़ार समेटने की तरफ पहला कदम बढ़ा दिया है.

तो पहले तो ये समझ लेते हैं कि चीन का बेइडो सिस्टम असल में है क्या?

बेइडो बनाने का काम चीन ने 1994 में ही शुरू कर दिया था. पहली बेइडो सैटेलाइट 2000 में लॉन्च की गई थी. बेइडो सटीक नेविगेशन, टाइमिंग और शॉर्ट मैसेज कम्यूनिकेशन की सुविधा देता है. ये नेविगेशन सिस्टम कई सारे सैटेलाइट के नेटवर्क के हिसाब से काम करता है और 10 मीटर तक की सटीकता के साथ लोकेशन बता सकता है. जबकि अमेरिका का जीपीसी सिस्टम 2.2 मीटर की सटीकता के साथ काम करता है. हालांकि एशिया पेसिफिक में बेइडो की एक्यूरेसी जीपीसी से भी ज्यादा बताई जा रही है. बेइडो की रेंज 10 सेंटीमीटर तक है जबकि जीपीएस की 30 सेंटीमीटर तक एक्यूरेसी रेंज है. और मॉडर्न वॉरफेयर में एक्यूरेसी की सबसे बड़ी अहमियत होती है.

Beidou
बेइडो बनाने का काम चीन ने 1994 में ही शुरू कर दिया था. (फोटो: एपी)

और बात सिर्फ एक्यूरेसी की ही नहीं है. अपने खुद के नेविगेशन सिस्टम से चीन को साइबर जासूसी और मिलिट्री इंटेलिजेंस में अपर हैंड मिलता है. यानी जीपीएस इस्तेमाल करने वाले देशों का डेटा जुटाने की सहूलियत अमेरिका के पास है उसी के समानांतर चीन अब अपना सिस्टम खड़ा कर रहा है. बेइडो चीनी सेना तो काफी वक्त से इस्तेमाल कर रही है अब सिविल यूज भी चल रहा है. चीन में 70 फीसदी से ज्यादा स्मार्टफोन्स पर बेइडो नेविगेशन यूज होता है. चीन की 62 लाख टैक्सी, बस और ट्रक में अब बेइडो नेविगेशन इस्तेमाल होता है. पूरे चीन में 40 हजार मछली पकड़ने वाली नावों में भी ये ही बेइडो ही इस्तेमाल होता है.

और अब अपना ये सिस्टम चीन अपने देश के बाहर भी तैनात करना चाहता है. इसे बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव यानी BRI के पैरेलल देखा जा रहा है. यानी जिस तरह से चीन जमीन पर अपना नियंत्रण और दबदबा बढ़ा रहा है वैसे ही स्पेस कंट्रोल में भी बेइडो चीन के लिए बड़ा हथियार साबित होगा. और चीन से बाहर निकलते ही इसमें पहला नंबर आता है पाकिस्तान का. 2018 में न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा था कि पाकिस्तान पहला ऐसा देश है जो बेइडो का वो ही वर्जन इस्तेमाल कर रहा है जो चीनी सेना PLA इस्तेमाल कर रही है. बहुत पहले ही चीन ने पाकिस्तान को बेइडो से चलने वाले वेपन सिस्टम निर्यात करना शुरू कर दिया था. पाकिस्तानी एयरफोर्स के फाइटर जेट जेएफ 17 में बेइडो नेविगेशन सिस्टम लगा है. इसके अलावा पाकिस्तान की रा’अद – II क्रूज मिसाइल में भी बेइडो नेविगेशन सिस्टम लगा है. और अब दूसरे चरण में पाकिस्तान पूरी तरह से नेविगेशन की सुविधा चीन से लेगा.

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पाकिस्तानी एयरफोर्स के फाइटर जेट जेएफ 17 में बेइडो नेविगेशन सिस्टम लगा है. (फोटो: एएफपी)

भारत कि परेशानी बढ़ने वाली है?

चाइनीज सेटेलाइट नेविगेशन ऑफिस यानी CSNO पाकिस्तान में बेइडो वाला कंटीन्यूसली ऑपरेटिंग राडार स्टेशन (CORS) लगाएगा. और इसी से पाकिस्तान के मोबाइल फोनों और वाहनों में नेविगेशन वाले ऐप चलेंगे. इसके अलावा सर्वे और मैपिंग, कंस्ट्रक्शन और साइंटिफिक अध्ययन में भी ये मददगार होगा.

चीन ने पाकिस्तान के हालात का फायदा उठाते हुए बेइडो-मय करने के राजी कर लिया और उसके बाद बेइडो उन देशों भी बेचेगा जो बीआरआई का हिस्सा हैं. बीआरआई के सदस्य कुछ देशों में तो ये इस्तेमाल होने भी लगा है. जाहिर चीन अमेरिका के पैरेलल एक सिस्टम तैयार कर रहा है. ऐसा माना जाता है कि जीपीएस सिस्टम के जरिए अमेरिका साइबर जासूसी करता है, दूसरे देशों से जानकारियां हासिल करता है. इसलिए कई देशों ने अपना जीपीएस सिस्टम पहले से तैयार कर रखा है. जैसे रूस का अलग नेविगेशन सिस्टम है जिसका नाम है ग्लोनास (GLONASS). यूरोपीयन यूनियन के नेविगेशन सिस्टम का नाम ह गेलीलिओ. और भारत के पास भी अपना नेविगेशन है. इसका नाम है – Navigation with Indian Constellation यानी NavIC. लेकिन ये सिर्फ मिलिट्री या साइंटिफिक यूज के लिए इस्तेमाल होता है. आम इस्तेमाल के लिए भारत में जीपीएस ही चलता है.

अब पाकिस्तान में चीन के नेविगेशन बेइडो के आने से भारत के लिए दोहरी चिंताएं हैं. एक तो पाकिस्तान के हथियारों का नेविगेशन सिस्टम बेहतर होगा यानी एक तरह से चीन का प्रॉक्सी फ्रंट ही पाकिस्तान होगा जो बड़ी चुनौती लेकर आता है. इसके अलावा पाकिस्तान और चीन के बाहर बाकी देशों में बेइडो के इस्तेमाल से चीन का मिलिट्री इंटेलिजेंस बेहतर होगा. यानी भारत और बाहर के सहयोगी अमेरिका के लिए चीन और बड़ी चुनौती पेश करेगा. इन सब में पाकिस्तान कैसे धीरे धीरे चीन की कॉलोनी बनता जाएगा इस पर अभी हमें कुछ नहीं कहना.


विडियो- चीन के पाले में जा रहे बांग्लादेश को भारत ने कैसे रोका?

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