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CAA को लेकर हुए प्रदर्शनों पर क्या सोचते हैं पुलिसवाले?

बीते दिनों नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA के खिलाफ देशभर में प्रदर्शन हुए. कई जगहों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया, यूनिवर्सिटी कैम्पस में पुलिस क्रैकडाउन हुए. उत्तर प्रदेश से हिंसा की खबरें आईं, कई लोग मारे गए. फरवरी में दिल्ली में CAA समर्थकों और विरोधियों के बीच हिंसक झड़प हुई, 50 से ज्यादा लोग मारे गए. इन सबके बीच पुलिस की भूमिका पर सवाल उठे. उनकी कड़ी आलोचना हुई.

इन सबके बीच नेताओं के बयान आए, जनता का आक्रोश सामने आया. पुलिस का बयान भी आया लेकिन सधा हुआ. प्रेस रिलीज़ वाला. पुलिसवाले जो सरकार और नागरिकों के बीच टकराव के दौरान मोर्चा संभालते हैं उनकी अपनी राय कम ही सामने आ पाती है. इसलिए सिविक सोसायटी ने दिल्ली और मुंबई पुलिस के अलग-अलग रैंक के सात पुलिसवालों के इंटरव्यू लिये. उनसे पुलिस के एक्शन को लेकर, पुलिस फोर्स की आंतरिक दिक्कतों और क्या-क्या रिफॉर्म्स की ज़रूरत है, इसे लेकर बात की. ये इंटरव्यू इस साल फरवरी में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले लिये गये थे. इन पुलिसकर्मियों की पहचान को गुप्त रखा गया है.

सवाल- भारत में चल रहे प्रदर्शनों के बारे में आपकी क्या राय है?

इस सवाल के जवाब में एक पुलिस कर्मी ने कहा कि जब तक प्रदर्शन शांतिपूर्वक हैं, तब तक मुझे लगता है कि पुलिस का न कॉल है, न ड्यूटी है और न अधिकार है कि वह दखल दे. हालांकि, शांतिपूर्ण प्रदर्शन भी अगर लंबे वक्त तक जारी रहते हैं तो वो आम जनता के लिए परेशानी का कारण बनते हैं. और जब ये होता है तो पुलिस से लोगों की अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं. ऐसे में पुलिस लंबे प्रदर्शन को खत्म करने के रास्ते निकालने की कोशिश करती है.

Delhi Police Npr

इसी सवाल के जवाब में दिल्ली के JNU में हुए प्रदर्शन की तरफ इशारा करते हुए एक पुलिसकर्मी ने कहा कि JNU एक बड़ा धब्बा है. आप वहां पढ़ने जाते हैं या प्रोटेस्ट करने? और वहां कितनी सुविधाएं हैं. अगर उनमें से आधे मार्क्सिस्ट हैं तो रूस चले जाएं या चीन. आप यहां क्या कर रहे हैं?

उन्हें काउंटर करते हुए दूसरे पुलिसकर्मी ने कहा, “मीडिया दिखाता है कि JNU में जो पढ़ता है वो आतंकवादी है, लेफ्टिस्ट है. अरे यार तुमसे अच्छे ग्रेड्स आते होंगे. तुम जो उन्हें आतंकी बताते हो एक बार एंट्रेंस देकर दिखाओ, क्लियर कर दो.”

वहीं CAA के खिलाफ जारी प्रोटेस्ट पर एक पुलिसकर्मी ने कहा कि भारत में मुसलमानों को कोई तकलीफ नहीं है. किसी को उनसे कुछ लेना-देना नहीं है. वो यहां अच्छे से रह रहे हैं, अपनी लाइफ एन्जॉय कर रहे हैं.

सवाल- “प्रदर्शन में पुलिस की तरफ से हुई हिंसा की खासी आलोचना हुई. क्या आप इन आलोचनाओं से इत्तेफाक रखते हैं?”

इसके जवाब में एक पुलिसकर्मी ने स्वीकार किया कि पुलिस की तरफ से उत्पात हुआ. उन्होंने कहा, “अगर उन्होंने (पुलिस ने) तय कर लिया कि उन्हें प्रदर्शनकारियों को छेड़ना ही छेड़ना है तो हिंसा होती है.”

वहीं एक अन्य पुलिसकर्मी ने बताया कि जब आप ड्यूटी पर होते हैं तो ये मायने नहीं रखता कि आप क्या महसूस करते हैं. ये मायने रखता है कि आपको आदेश क्या मिले हैं. उन्होंने कहा, “मन में कुछ भी लगे, सामने तुम्हारा बाप है, तो भी तुम मारोगे. एक बार ऑर्डर दे दिया गया तो यह डिसिप्लिन्ड मशीन है. आपको अटैक करना होगा. नहीं तो आप पुलिसवाले नहीं हैं, आपको डिसमिस कर दिया जाएगा.”

Delhi Police

कई बार ऐसे प्रदर्शन जिनकी मंशा हिंसक होने की नहीं होती वो भी हिंसक हो जाते हैं, बाहरी तत्त्वों के शामिल होने की वजह से. फिर आप उंगली उठा सकते हैं कि प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व अच्छा नहीं है. यह प्रदर्शनों से डील करने का सबसे बड़ा डिसएडवांटेज है. क्योंकि इनका कोई ऐसा लीडर नहीं होता जिनसे बात की जा सके. पुलिसवालों से उम्मीद की जाती है कि वो कानून के दायरे में रहें, लेकिन वो भी इंसान ही हैं जो शायद वहां सुबह से या पिछली रात से खड़े हैं. अपने खिलाफ प्रदर्शनकारियों की नारेबाजी, उनकी गालियां सुनते हुए और उन्हें उनके नेतृत्व ने कंट्रोल में रखा हुआ है. ऐसे में जैसे ही ऑर्डर दिया जाता है कि हिंसा हो रही है, तब पहले ही गुस्से से उबल रहे पुलिसवाले एक्शन लेते हैं. ऐसा कोई प्रोटेस्ट नहीं हुआ जिसमें पुलिसवाले घायल नहीं हुए

सवाल- “पुलिस फोर्स की कुछ इंटरनल प्रॉब्लम्स के बारे में बताएं.”

जब कोई पुलिस फोर्स में आता है तो कई सारे पूर्वाग्रहों के साथ आता है. जो उसे अपने घर या कम्युनिटी से मिलते हैं. या कई बार, वो किसी राजनीतिक दल या धार्मिक संगठनों के संपर्क में आते हैं. जातीय संगठनों के संपर्क में तो सारे ही रहते हैं. इसे कोई भी अपराध या पूर्वाग्रह के तौर पर नहीं देखता.

जेंडर बायस बड़ी भयानक है. किसी भी पुलिस ट्रेनिंग में डीकंडीशनिंग की कोशिश ही नहीं होती, जबकि ये पॉसिबल है.

Delhi Police Nrc

ज्यादातर पुलिसवालों को पता होता है कि वो CRPC का इस्तेमाल कर आपको गिरफ्तार कर सकते हैं, सर्च कर सकते हैं, डिटेन कर सकते हैं. लेकिन उन्हें आर्टिकल 19 पता नहीं, आर्टिकल 21 पता नहीं. वो ये नहीं समझते कि जब वो किसी को गिरफ्तार करते हैं तो उन्हें आर्टिकल 19 के संदर्भ में सोचना चाहिए.

सवाल- “किस तरह के पुलिस रिफॉर्म्स की जरूरत है?”

एक बड़े लेवल पर पुलिस रिफॉर्म की जरूरत है. जो राजनीतिक लीडरशिप से पुलिस को आज़ादी दे. फिलहाल स्थिति वैसी नहीं है, जैसी हम चाहते हैं.

कम्युनिटी ओरिएंटेशन और डेमोक्रैटिक सेंसिटाइज़ेशन की जरूरत है. इन दोनों में इनवेस्ट करना चाहिए. जैसे ही आप इनमें इनवेस्ट करेंगे, आप एक अलग तरह की पुलिस फोर्स पाएंगे. और जहां भी इनमें इनवेस्ट हुआ है, वहीं आपको अच्छी पुलिस भी मिलेगी.

पारदर्शिता… इसका मतलब सिर्फ आदेश देना नहीं होता. इसमें लोगों के सामने अपने एक्शंस की जिम्मेदारी लेना भी होता है. किसने ऑर्डर दिये, इसे लेकर लिखित इंस्ट्रक्शन क्या थे. ये सब जरूरी है.

इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2019 के मुताबिक, एक औसत पुलिसकर्मी दिन में 14 घंटे ड्यूटी करता है, इसका असर उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है. करीब 50 प्रतिशत पुलिसकर्मी मानते हैं कि मुस्लिमों के अपराध करने की संभावना अधिक है. बीते पांच साल में, औसतन सिर्फ 6.4 प्रतिशत फोर्स को सर्विस के दौरान ट्रेनिंग मिली है.

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