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5G टेस्टिंग की वजह से कोरोना ज्यादा फ़ैल रहा है?

“यह कोरोना नहीं, बल्कि 5जी टावर की टेस्टिंग की वजह से है. टावर से जो रेडिएशन हवा में मिलकर हवा को ज़हरीला बना रहा है. इसलिए लोगों को सांस लेने में दिक्कत हो रही है और लोग मर रहे हैं. इसलिए 5जी टावर की टेस्टिंग को बंद करके देखिए. सब सही हो जाएगा.” ये विचार मेरे नहीं है, सोशल मीडिया पर वायरल एक मैसेज की कुछ लाइन्स हैं. अखबार की कटिंग की शक्ल में ये मैसेज वायरल है. 5जी टेस्टिंग पर इसी तरह के और भी मैसेज खूब भेजे जा रहे हैं. एक मैसेज में लिखा है कि 5जी की टेस्टिंग बंद करो, इंसानों को बचाओ. 5जी से लोगों के मरने को लेकर सोशल मीडिया पर तरह-तरह के दावे वायरल हैं.

हमने यूट्यूब पर अपने दर्शकों से पूछा से कि 5जी पर टेस्टिंग को लेकर कौनसी अफवाह सुन रखी है. कई लोगों के जवाब आए. गिरिजानंद जोशी नाम के एक दर्शक ने लिखा कि- मैंने 5G टेस्टिंग के बारे में सुना जिसके रेडिएशन के कारण सांस लेने में दिक्कत, गला सूखना, व सर दर्द जैसी समस्याओं के बारे में उल्लेख था. और मुझे ये विचारणीय भी लगा शायद सरकार कुछ छुपा रही हैं.” आकाश रावत से एक दर्शक ने लिखा कि – जितने भी लोग मर रहे है, वो 5जी की वजह से मर रहे है बल्कि कोरोना तो एक अफवाह है.” लल्लनटॉप के एक और वीडियो के कमेंट में सौरभ डांगल नाम के व्यूअर लिखते हैं कि 5जी से होने वाले रेडिएशन के बारे में कोई सोच नहीं रहा है, सब अपना पैक महंगा करने में लगे हैं. कहीं ये टेक्नोलॉजी हमें अंत की और ना ले जाए. ऐसे मैसेज फैमिलि वाले वाट्सऐप ग्रुप में चाचा, मामा भी खूब भेज रहे हैं.

5G की वजह से ही देश में इतनी मौतें हो रही हैं?

एक बड़ा तबका है जो ये मान बैठा है कि कोरोना 5जी की टेस्टिंग की वजह से ही हो रहा है, और मांग हो रही है कि देश में 5जी की टेस्टिंग रुकेगी तो ही लोग बच पाएंगे.

तो ये बातें कितनी सही हैं. क्या 5जी और कोरोना का कोई संबंध है या ये सिर्फ अफवाहें ही हैं. आज के शो में इस पर विस्तार से बात करेंगे. लेकिन पहले कुछ बुनियादी बातें समझते हैं. जैसे 5जी क्या होता है. कैसे इसकी टेस्टिंग होती है वगैरह वगैरह.

5जी में जी का मतलब है जनरेशन. 5जी यानी 5वीं पीढ़ी. तकनीक में वक्त के साथ बड़े बदलाव होते हैं. मोबाइल टेलिकम्यूनिकेशन में भी ऐसा ही होता आया है. और इन बदलावों से तकनीक की नई पीढ़ी की शुरुआत होती है. इसलिए इसे 2जी, 3जी या 5जी जैसे नाम दिए गए. 1980 के दशक में वायरलेस सेल्यूलर टेक्नोलॉजी की शुरुआत हुई. इसमें दो लोग मोबाइल डिवाइस के ज़रिए आपस में दूर से ही बात कर सकते थे. ये मोबाइल टेलिकम्यूनिकेशन की पहली पीढ़ी थी. फर्स्ट जनरेशन यानी 1जी. नब्बे के दशक में 2जी की एंट्री होती है. अब मोबाइल से मैसेज भी भेजे जा सकते थे. इसके बाद 21वीं सदी में दाखिल होते ही 3जी की शुरुआत हुई. इसमें फोन में इंटरनेट इस्तेमाल करने की क्षमता जुड़ गई. इसके कुछ सालों बाद ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क और हाई स्पीड प्रोसेसिंग चिप का विकास हुआ था. तकनीक बेहतर हुई. इसे इंटरनेट की स्पीड बढ़ी. इसे 4जी कहा गया. अभी हम 4जी ही इस्तेमाल कर रहे हैं. और इसके बाद आता है 5जी. 4जी के मुकाबले 5जी में इंटरनेट स्पीड 100 गुना तक बेहतर मानी जा रही है. हम उस दौर में हैं जहां सब कुछ इंटरनेट के भरोसे है. नेविगेशन, वर्चुअल रियलिटी, अपने आप चलने वाले वाहन सब कुछ इंटरनेट की स्पीड पर टिके हैं. और ज्यादा स्पीड की वजह से 5जी को गेमचेंजर माना जा रहा है. इसलिए हमें भी ये चिंता है कि हम कहीं 5जी में पीछे ना छूट जाएं. चीन के शंघाई में 2019 में ही 5जी शुरू हो गया था. दुनिया के कई और भी देशों में इसका ट्रायल चल रहा है. इसलिए भारत में अब टेलीकम्यूनिकेशन विभाग ने पिछले मंगलवार को 5जी ट्रायल की अनुमति दे दी. 5जी के ट्रायल के लिए भारती एयरटेल, रिलायंस जियो, वोडाफोन आइडिया और एमटीएनएल को परमिशन मिली है. इन कंपनियों ने 5जी उपकरण के लिए एरिक्सन, नोकिया, सैमसंग और सी-डॉट जैसी कंपनियों के साथ टाई-अप किया है. ट्रायल के लिए 6 महीने का टाइम दिया गया है.

5G ट्रायल में होगा क्या? ट्रायल कहां होगा और कैसे होगा?

ट्रायल आबादी के घनत्व के हर स्तर पर होगा. शहरों में भी होगा, छोटे कस्बों में भी होगा और गांवों में भी होगा. 5जी में पांच तकनीकों का इस्तेमाल होगा. मिलीमीटर वेव, मैसिव माइमो, बीमफॉर्मिंग, स्मॉल सेल और फुल डप्लेक्स. सारी तकनीकी बारीकियों में घुसने के बजाय सिर्फ मिलीमीटर वेव्ज़ समझते हैं. मिलिमीटर वेब्स की ही 5जी की तेज़ स्पीड में बड़ी भूमिका है. इसे हाई फ्रीक्वेंसी वेव्स भी कहते हैं. यानी वो इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक वेव्ज़ जिनकी फ्रीक्वेंसी या आवृत्ति ज़्यादा होती है. अभी हमारे स्मार्टफोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेज जैसे टीवी या वाई फाई 6 गीगाहर्ट्ज से नीचे की फ्रीक्वेंसी पर चलते हैं. लेकिन इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले उपकरणों की बढ़ती संख्या के कारण यह फ्रीक्वेंसी जाम हो रही है और धीमी पड़ रही है. इसीलिए अब 5जी में मिलीमीटर वेव्स के जरिए 30 से 300 गीगाहर्ट्ज के खाली फ्रीक्वेंसी बैंड को इस्तेमाल करने की तैयारी है. हाई फ्रिक्वेंसी वेव्स के साथ दिक्कत ये होती है कि ये ज़्यादा दूरी तक नहीं जा पाती. ऊंची इमारतों या पेड़ों की बाधा भी ये तरंगें पार नहीं कर पाती. तो इसका क्या उपाय है – स्मॉल सेल. यानी स्मॉल सेल्यूलर टावर्स. 3जी या 4जी के बजाय 5जी का नेटवर्क पहुंचाने के लिए ज्यादा टावर्स लगाने पड़ेंगे.

5जी हमारे सेहत को ख़तरा?

तो ये तो बात हुई 5जी के ट्रायल की. अब जो ये टावर्स हमारे आसपास पहले से लगे हैं या 5जी के और लगेंगे, इनसे क्या हमारी सेहत को कोई खतरा है? क्या कोई रेडिएशन निकलता है? रेडिएशन और इसके खतरे वाली बातें लगातार आती रहती हैं. ऐसे कई खबरें आती हैं कि बीमारी होने के डर से लोगों ने मोबाइल टावर लगाने का विरोध किया. कई बार कोर्ट के आदेशों पर टावर्स को हटाया भी जाता है. हालांकि सेलुलर ऑपरेटर्स एसोसिशन ऑफ इंडिया की तरफ से कहा जाता रहा है कि मोबाइल टावर्स के रेडिएशन से कैंसर जैसी बीमारियां होने का कोई सबूत नहीं है. पर दुनियाभर में इस पर कई रिसर्च हुई हैं जिनमें माना गया है कि टेलिकॉम टावर्स से कैंसर का खतरा बढ़ता है. फिनलैंड के वैज्ञानिक दारिउश लसिंस्की ने अपनी रिसर्च में बताया था कि मोबाइल फोन का लंबे समय तक इस्तेमाल करने और टावर के आस-पास के इलाकों में लगातार 10 साल औसतन 30 मिनट रहने से ब्रेन कैंसर का रिस्क बढ़ जाता है. लसिंस्की उस एक्सपर्ट कमिटी के हिस्सा थे, जिसे वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन की कैंसर रिसर्च एजेंसी ने बनाया था. WHO ने मोबाइल फोन टावर से निकलने वाले इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन को 2(B) कैटेगरी में रखा है. इस कैटेगरी में वो चीजें आती हैं, जो कैंसर की वजह बनती हैं.

इन्हीं सब बातों को लेकर सरकार ने टावर्स लगाने के कुछ नियम बना रखे हैं. 2014 में डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकॉम ने गाइडलाइन जारी की थी कि, अगर कोई मोबाइल टॉवर जमीन पर या किसी छत पर लगाया गया है तो टॉवर के पहले एंटीना की ऊंचाई की बराबरी पर कोई घर नहीं होना चाहिए. अगर किसी पोल पर एंटीना लगाया जा रहा है तो उसकी ऊंचाई जमीन से कम से कम 5 मीटर होनी चाहिए. अगर एक टॉवर में एक ही दिशा में 6 एंटीना लगाए गए हैं तो उसके सामने 55 मीटर के दायरे में कोई भी इमारत नहीं होनी चाहिए. ऐसे कई नियम हैं. जाहिर है ये नियम भी लोगों के स्वास्थ्य के लिहाज से ही बनाए गए होंगे.

5जी और कोरोना को क्यों जोड़ा जा रहा?

रेडिएशन से पक्षियों की मौत होने की भी दुनियाभर से खबरें आती हैं. कई अखबारों में भी आपको ऐसी पुरानी खबरें मिल जाएंगी. और अब 5जी को लेकर जो मैसेज वायरल हो रहे हैं, उनमें भी 5जी टेस्टिंग से पक्षियों के मरने वाले दावे हैं. तो पक्षियों की मौत की वजह क्या रेडिएशन है?

पक्षियों की बात हो या इंसानों पर असर की, जब तकनीक किसी नए स्तर पर जाती है तो ऐसी आशंकाएं उसके जुड़ जाती है. भारत में अब 5जी और कोरोना को जोड़ दिया गया है. हालांकि 5जी और कोरोना फैलने की थ्योरी का उद्गम भारत में नहीं हुआ. ये आयातित अफवाह है. पिछले साल मार्च-अप्रैल में ब्रिटेन में ऐसे ही मैसेज वायरल हो रहे थे. लोग लिख रहे थे कि 5जी के टावर्स से कोरोना निकल रहा है. बीबीसी की खबर के मुताबिक सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो शेयर किए गए हैं जिनमें बर्मिंघम और मेर्सेसाइड में इन दावों के चलते मोबाइल टॉवर को जलाया गया. 5जी टावर्स के खिलाफ ब्रिटेन में दो तरह के दावे थे. एक दावा ये था कि 5जी से इंसानों की प्रतिरोधक क्षमता कम होती है, जिसके चलते लोगों में कोरोना वायरस संक्रमण बढ़ रहा है. और दूसरे दावे में लोग कह रहे थे कि 5जी तकनीक से कोरोना वायरस ही ट्रांसमिट किया जा रहा है.

हालांकि ये सारी थ्योरी फर्ज़ी निकली. कोरोना ब्रिटेन के उन शहरों में भी फैल रहा था जहां 5जी शुरू नहीं हुआ था. तो कुल मिलाकर हर एक्सपर्ट 5जी तकनीक और कोरोना के संबंध को खारिज करता है. इंटरनेशनल कमीशन ऑन नान-आयोनाइजिंग रेडिएशन प्रोटेक्शन नाम की संस्था ने अपने लंबे अध्ययन के बाद 5जी इस्तेमाल से स्वास्थ्य का खतरा होने वाले दावों का खारिज किया. कनक्लूज़न ये है कि आपको 5जी टेस्टिंग से कोरोना होने के जो मैसेज आ रहे हैं, वो निराधार हैं. अफवाहें हैं. 5जी से कोरोना नहीं होता है. लेकिन अगर 5जी शुरू हो जाए तो हमारे लिए बहुत कुछ अच्छा हो सकता है.

तो तकनीक और कोरोना को मिक्स मत कीजिए. सोशल मीडिया के निराधार वायरल मैसेज के बजाय भरोसेमंद स्रोतों से अपने ज्ञान का पोषण कीजिए. अपनी वैज्ञानिक चेतना कमज़ोर मत पड़ने दीजिए.


विडियो- ऑक्सीजन कन्संट्रेटर के नाम पर लोगों को ठगने वाली ये कौन सी कंपनी है?

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