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सोलोमन आईलैंड्स में दंगे भड़कने की वजह क्या है?

सोलोमन आईलैंड्स. वो देश, जहां सोने को लेकर अफ़वाह उड़ी और यूरोप के साम्राज्यवादी देशों ने लाइन लगा दी. झगड़ा हुआ तो उन्होंने आपस में बंटवारा कर लिया. इतना हिस्सा तुम्हारा, इतना हमारा. सेकंड वर्ल्ड वॉर की सबसे ख़तरनाक लड़ाईयां भी यहीं लड़ीं गई. जब मुल्क़ आज़ाद हुआ तो जाति के नाम पर दंगे होने लगे. तब पड़ोसी देशों ने आकर मामला शांत कराया. मतलब ये कि बाहरी हस्तक्षेप बरकरार रहा.

यहां पिछले कुछ सालों से मामला शांत चल रहा था. लेकिन अब फिर से बखेड़ा शुरू हो गया है. लोग चीन के बढ़ते दखल का विरोध कर रहे हैं. 24 नवंबर को प्रदर्शनकारियों ने संसद में आग लगा दी. वे प्रधानमंत्री के इस्तीफ़े की मांग कर रहे हैं.

आज जानेंगे, सोलोमन आईलैंड्स का इतिहास क्या है? सेकंड वर्ल्ड वॉर में इसकी क्या भूमिका रही? हालिया झगड़े में चीन का नाम क्यों आ रहा है? सब विस्तार से बताएंगे.

पहले बैकग्राउंड जान लीजिए.

साल 1568. अल्वारो डि मेन्डाना डे नेरा नाम का एक स्पेनिश खोजी दक्षिण प्रशांत महासागर तक पहुंचने में कामयाब हुआ. उसके आने के बाद एक अफ़वाह उड़ी. अफ़वाह ये कि मेन्डाना ने एक द्वीप पर सोने की खदान खोज ली है. चर्चा ये भी चली कि उसने वो जगह तलाशी है, जहां से किंग सोलोमन जेरूसलम में मंदिर बनाने के लिए सोना ले गए थे.

मान्यता के अनुसार, सोलोमन एक हज़ार शताब्दी ईसा पूर्व में हुए थे. वो यूनाइटेड किंगडम ऑफ़ इज़रायल के तीसरे और अंतिम राजा थे. उनके शासन-काल को इज़रायल के इतिहास का ‘स्वर्णिम-युग’ कहा जाता है. उन्हीं के नाम पर मेन्डाना के द्वारा खोजे गए द्वीप को सोलोमन आईलैंड कहा गया.

सोना मिलने की ख़बर सुनकर और भी लोग आए. स्पेन ने दो बार तलाशी अभियान चलाया. लेकिन उन्हें सोना नहीं मिला. उसके बाद इस द्वीप को लगभग भुला दिया गया.

फिर आया साल 1788. ब्रिटेन ने सिडनी में अपनी कॉलोनी बनाई. उसके बाद ब्रिटेन के जहाज सोलोमन होकर गुज़रने लगे. उसी दौर में जर्मनी भी आस-पास के द्वीपों पर अपनी कॉलोनियां बसा रहा था. उन्हें मज़दूरों की दरकार थी. सोलोमन आईलैंड उनके लिए मुफ़ीद जगह थी. वहां के मूल निवासियों को ज़बरदस्ती जहाजों में भरकर बाहर भेजा जाने लगा.

मुफ़्त की मज़दूरी पर नियंत्रण के लिए ब्रिटेन और जर्मनी में टकराव हुआ. फिर दोनों ने तय किया कि लड़ने की बजाय बंटवारा कर लेते हैं. उत्तरी हिस्से को जर्मनी ने अपने पास रखा, दक्षिण पर ब्रिटेन का नियंत्रण बना रहा.

1890 का दशक आते-आते जर्मनी को लगने लगा कि सोलोमन पर रहने में बहुत खर्चा आ रहा है. उसने ब्रिटेन के साथ एक्सचेंज़ ऑफ़र चलाया. जर्मनी ने उत्तरी सोलोमन ब्रिटेन के हवाले कर दिया. बदले में ब्रिटेन ने समोआ और अफ़्रीका की कुछ कॉलोनियों पर से अपना दावा छोड़ दिया.

1893 में ब्रिटेन ने सोलोमन पर अपना रूमाल रख दिया. उस कालखंड में फ़्रांस इंडो-चाइना में पांव पसार रहा था. ब्रिटेन को आशंका हुई कि फ़्रांस इधर भी आ सकता है. उसने सोलोमन आईलैंड को अपना उपनिवेश घोषित कर दिया.

ब्रिटेन का पूरा ध्यान अपने हितों पर था. उसे मूल निवासियों की कोई चिंता नहीं थी. मूल निवासियों से उसका नाता टैक्स वसूलने और विरोध करने पर सज़ा देने तक सीमित था. ये परंपरा 1927 तक कायम रही.

फिर क्या हुआ?

5 अक्टूबर 1927 की बात है. सोलोमन आईलैंड्स का मलैटा द्वीप. ब्रिटिश सैनिकों की एक टुकड़ी टैक्स वसूलने के लिए आई. इस टुकड़ी का नेतृत्व विलियम रॉबर्ट बेल नाम का एक अफ़सर कर रहा था. वसूली के दौरान ही मूल निवासियों ने हमला कर दिया. इस हमले में बेल समेत 15 लोग मारे गए.

ब्रिटेन ने इसका बदला लिया. दो हफ़्ते बाद उसने अपनी सेना भेजी. इसमें ऑस्ट्रेलियन सैनिक, मलैटा की लोकल पुलिस और ब्रिटिश नागरिक भी थे. इन लोगों ने मलैटा में कई दिनों तक तबाही मचाई. महिलाओं का बलात्कार किया गया.

बेगुनाह लोगों की हत्या की गई. पवित्र स्थलों में तोड़-फोड़ की गई. लोगों ने अपने बच्चों को जंगल में छिपा दिया था. वे मौसम की मार नहीं झेल सके. इतने से भी मन नहीं भरा तो दो सौ लोगों को गिरफ़्तार कर तुलागी ले जाया गया.

कई बीमारी से मर गए. कुछ को फांसी पर चढ़ा दिया गया. बच्चों को फांसी देखने के लिए मजबूर किया गया. जो मौत की सज़ा पाने से बच गए, उन्हें लंबे समय तक जेल में बंद रखा गया. इस घटना को ‘सोलोमन नरसंहार’ के नाम से जाना जाता है. इसके एवज में मुआवज़े की मांग आज भी चलती रहती है.

1939 में दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ. दिसंबर 1941 में पर्ल हार्बर पर जापान ने हमला किया. इसके बाद अमेरिका भी लड़ाई में कूद गया. अमेरिका ब्रिटेन के साथ था. जुलाई 1942 में जापान ने सोलोमन पर क़ब्ज़ा कर लिया. जापान इंडो-पैसिफ़िक में आगे बढ़ता जा रहा था. जापान को रोकने के लिए अमेरिका ने अपनी सेना भेजी. सोलोमन आईलैंड की लड़ाई 15 महीने तक चली. अंतत: जापान को हारकर बाहर जाना पड़ा.

सेकंड वर्ल्ड वॉर के दो बड़े परिणाम निकले. पहला, फासीवादी राष्ट्रों की हार हुई. और, दूसरा, यूरोप का औपनिवेशिक मकड़जाल टूटने लगा. इसकी प्रेरणा से सोलोमन आईलैंड्स में भी आज़ादी की मांग तेज़ हुई. आखिरकार, 7 जुलाई 1978 को सोलोमन आईलैंड्स आज़ाद हो गया.

1971 में यूनाइटेड नेशंस ने ताइवान को हटाकर चीन को मान्यता दे दी. इसकी देखा-देखी बाकी देशों ने भी चीन के साथ कूटनीतिक संबंध स्थापित करना शुरू कर दिया. लेकिन प्रशांत महासागर के कई द्वीपीय देश इससे बचे रहे. सोलोमन आईलैंड्स ने 1983 में ताइवान को मान्यता दी. ये रिश्ता अगले 36 बरस तक चला.

अप्रैल 2019 में मनासी सोगावारी प्रधानमंत्री बने. अक्टूबर में उन्होंने ताइवान से डिप्लोमैटिक रिश्ता तोड़कर चीन को मान्यता दे दी. इस मौके पर सोगावारी ने कहा कि हम अपनी बड़ी ग़लती को सुधार रहे हैं.

सोलोमन आईलैंड्स के सबसे बड़े द्वीपों में से एक है, मलैटा. यहां की आबादी लगभग दो लाख है. पूरे देश की आबादी सात लाख के आस-पास है.

मलैटा ने इस कथित सुधार को मानने से मना कर दिया. चीन में वन पार्टी सिस्टम चलता है. लोकतंत्र में उनकी आस्था नहीं है. चीन पर अल्पसंख्यकों को डिटेंशन सेंटर में बंद रखने के आरोप भी लगते हैं. मलैटा की आशंका है कि चीन अपने यहां की तानाशाही उनके देश पर भी थोप देगा. इसको लेकर उनका विरोध चलता रहता है.

मलैटा ने ताइवान के साथ रिश्ते बरकरार रखे हैं. कोरोना महामारी के दौरान उसने चीन की बजाय ताइवान से मदद ली थी. केंद्र सरकार का कहना है कि वो ताइवानी जहाजों को सोलोमन आईलैंड्स में घुसने नहीं देगी. इसको लेकर केंद्र और मलैटा में रार चलती रहती है.

इस वाकये में एक और घटना का ज़िक्र ज़रूरी हो जाता है.

मलैटा के प्रीमियर हैं, डेनियल स्यूडानी. प्रीमियर मतलब समझ लीजिए, भारत के किसी राज्य का चीफ़ मिनिस्टर. स्यूडानी चीन-विरोधी अभियान के केंद्र में थे.

मई 2021 की बात है. स्यूडानी बीमार पड़ गए. ऑस्ट्रेलिया में उनके इलाज की बात तय हुई. पता चला कि 65 लाख का खर्चा आएगा. स्यूडानी ने केंद्र सरकार से मदद मांगी. केंद्र ने कहा, पैसे चाहिए तो एक समारोह में हिस्सा लेना होगा. उसमें क्या होगा? शर्त रखी गई कि स्यूडानी को सोगावारी के साथ हाथ मिलाना होगा.

स्यूडानी ने इस शर्त को मानने से मना कर दिया. उन्होंने कहा कि सोगावारी के साथ हाथ मिलाने का मतलब है चीन के साथ हाथ मिलाना. ये काम तो मैं हरगिज नहीं करूंगा.

इसके बाद उन्होंने ताइवान से संपर्क किया. और, वहां इलाज के लिए चले गए. चीन इससे नाराज़ हो गया. सोलोमन आईलैंड्स में चीन के दूतावास ने बाकायदा बयान जारी कर इसका विरोध किया.

आज हम सोलोमन आईलैंड्स की कहानी क्यों सुना रहे हैं?

वजह है, सोलोमन आईलैंड्स में हो रहे दंगे. 24 नवंबर को प्रदर्शनकारियों ने संसद भवन की एक इमारत और पुलिस स्टेशन में आग लगा दी. रात होते-होते प्रधानमंत्री ने 36 घंटों का लॉकडाउन लगाने का ऐलान किया. लेकिन हिंसा नहीं रूकी. 25 नवंबर को राजधानी होनियारा स्थित चाइनाटाउन में आगजनी की गई.

कई दुकानों में लूटपाट की ख़बर भी आ रही है. केंद्र सरकार ने ऑस्ट्रेलिया से मदद मांगी है. ऑस्ट्रेलिया, पुलिस और सेना के लगभग सौ जवानों को भेजने के लिए तैयार हो गया है.

प्रधानमंत्री सोगावारी ने कहा है कि देश में अंधकार-युग लौट आया है. उनका इशारा 1998 से 2003 तक चले जातीय दंगों की तरफ़ था. उस समय मलैटा और ग्वादल कैनाल के स्थानीय लोगों के बीच झगड़ा शुरू हो गया. दोनों एक-दूसरे पर नौकरी और ज़मीन लूटने का आरोप लगा रहे थे. 2003 में ऑस्ट्रेलिया के नेतृत्व में पीसकीपिंग फ़ोर्स सोलोमन आईलैंड्स में दाखिल हुई. तब जाकर हिंसा रूकी. पीसकीपिंग फ़ोर्स जून 2017 तक देश में रही. उनके जाने के बाद लंबे समय तक हालात सामान्य बने रहे. फिर केंद्र सरकार ने ताइवान से रिश्ता तोड़ लिया और शांति बिखर गई.

अब आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि प्रदर्शनकारी कौन हैं और उनकी मांग क्या है?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अधिकतर प्रदर्शनकारी मलैटा से सफ़र करके राजधानी होनियारा तक आए हैं. मलैटा सोलोमन आईलैंड्स का चीन-विरोधी प्रांत है. होनियारा, ग्वादल कैनाल द्वीप पर बसा है. दोनों द्वीपों के बीच दशकों से तनाव का माहौल है. मलैटा का आरोप है कि सरकार ने ग्वादल कैनाल में गंगा बहाई, जबकि मलैटा को अकेला छोड़ दिया. सोगावारी साल 2000 से अब तक चार बार सोलोमन आईलैंड्स के प्रधानमंत्री बने. लेकिन मंज़र नहीं बदला.

प्रदर्शनकारी क्या मांग रहे हैं?

वे प्रधानमंत्री का इस्तीफ़ा मांग रहे हैं. उनका कहना है कि इस हिंसा और लोगों की शिकायतों को दूर करने का एक ही उपाय है, सोगावारी का कुर्सी से पलायन.

सोगावारी क्या कह रहे हैं? उन्होंने कहा कि मैं किसी से डर के इस्तीफ़ा नहीं दूंगा. जो कोई भी हिंसा के पीछे है, उस पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी. किसी को बख़्शा नहीं जाएगा.

क्या ऑस्ट्रेलियन फ़ोर्स के आने से हालात ठीक हो जाएंगे?

ये कहना मुश्किल है. जानकारों का मानना है कि इससे हिंसा और बढ़ेगी. अगर पीसकीपिंग फ़ोर्स ने सरकार का साथ दिया तो और लोग हिंसा पर उतारू होंगे. जनता पहले से ही बाहरी दखल से परेशान चल रही है. इन सबको रोकने का एक ही तरीका है, सरकार सभी पक्षों से बैठकर बात करे. अगर हिंसा का जवाब हिंसा से दिया गया तो और ख़ून बहेगा.

सोलोमन आईलैंड्स के हालात पर हमारी नज़र बनी रहेगी. आप बने रहिए लल्लनटॉप के साथ.


अगर ये आदमी इंटरपोल का प्रेसिडेंट बना तो अनर्थ हो जाएगा!

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