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देश के अलग अलग हिस्सों में हुए उपचुनाव के परिणाम क्या इशारा कर रहे हैं?

कोरोना महामारी के चलते लंबे समय से देश के अलग अलग हिस्सों में विधानसभा और लोकसभा सीटों पर उपचुनाव लंबित थे. महामारी में हमने अपने कई जनप्रतिनिधियों को खो भी दिया. बीमारी का प्रकोप ऐसा, कि चुनाव का माहौल था, और नतीजों से पहले प्रत्याशियों का निधन हो रहा था. इस तरह कई सीटें खाली हुईं. लेकिन सारा दोष महामारी का ही नहीं था. कुछ जगह जीते हुए प्रत्याशियों ने ज़्यादा मलाइदार मौके के लिए विधायकी छोड़ी. तो कुछ जगह हुआ दलबदल. और इस तरह देश भर में तीन लोकसभा सीटें और 29 विधानसभा सीटें खाली हो गईं. इनके नतीजे राजनीति के लिहाज़ से बहुत ज़्यादा अंतर पैदा करने वाले भले न हों, लेकिन इनके नतीजे आपको ये ज़रूर बता देते हैं कि देश के किस हिस्से में कौनसी पार्टी की सेहत पतली हो रही है, और कौन अंगद की तरह दिन दुगना, रात चौगुना मज़बूत होता जा रहा है.

30 अक्टूबर को वोटिंग हुई और आज इनके नतीजे आए हैं. आइए क्रमवार नतीजों और उनके पीछे राजनीति को समझा जाए –

1.दादरा और नगर हवेली (लोकसभा)

इस सीट से मोहन देलकर सांसद होते थे. कुछ वक्त निर्दलीय रहे और फिर बाद में अपनी अलग पार्टी भी बनाई. 22 फरवरी 2021 को देलकर ने मुंबई के एक होटल में आत्महत्या कर ली थी. उन्होंने अपने सूसाइड नोट में आरोप लगाया था कि दादरा और नगर हवेली के तत्कालीन एडमिनिस्ट्रेटर और गुजरात कैबिनेट में मंत्री रहे प्रफुल खोड़ा पटेल समेत 9 लोग उन्हें प्रताड़ित कर रहे हैं.

अक्टूबर में देलकर की पत्नी कलाबेन देलकर शिवसेना में शामिल हो गई थीं और पार्टी ने उन्हें उपचुनाव में उम्मीदवार भी बनाया था. भाजपा ने इस सीट से महेशभाई गावित को टिकट दिया था. इस उपचुनाव में एक दिलचस्प चीज़ और हुई. मुंबई में साथ साथ सरकार चला रहीं शिवसेना-कांग्रेस ने मुंबई के ठीक बगल में पड़ने वाले दादरा नगर हवेली में गठबंधन नहीं किया. यहां कांग्रेस ने महेशभाई धोड़ी को टिकट दिया.

नतीजे आए तो कलाबेन दलेकर 50 हज़ार की लीड से जीत गईं. भाजपा से महेशभाई गावित दूसरे नंबर पर रहे. कांग्रेस प्रत्याशी की गिनती 6 हज़ार के कुछ ऊपर जाकर रुक गई.

दलेकर लंबे समय से सांसद रहे थे. और उनकी अकाल मृत्यु हुई थी. इस लिहाज़ से कलाबेन दलेकर का जीतना लाज़मी सा था. लेकिन शिवसेना के लिए ये जीत बहुत मायने रखती है. मुंबई से बाहर शिवसेना की जड़ें कभी गहरी नहीं रहीं. महाराष्ट्र के ही कुछ इलाकों – जैसे विदर्भ में उसकी उपस्थिति न के बराबर है. लेकिन कलाबेन की जीत के साथ शिवसेना को महाराष्ट्र से बाहर अपना पहला सांसद मिल गया है. रिमोट कंट्रोल की जगह पहली बार ड्राइविंग सीट पर आई शिवसेना के लिए ये इस जीत का प्रतीक महत्व ज़्यादा है. लेकिन ये कहना कि पार्टी महाराष्ट्र के बाहर पैर पसार रही है, जल्दबाज़ी होगी. क्योंकि उसके लिए आत्मविश्वास और चतुरता के साथ और बहुत कुछ चाहिए.

2. पश्चिम बंगाल (विधानसभा)
पश्चिम बंगाल में चार विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए थे – दिनहाटा, शांतिपुर, खारदाह और गोसाबा. इस साल मार्च और अप्रैल महीने में पश्चिम बंगाल में 8 चरणों का चुनाव हुआ, जिसमें ममता बैनर्जी की तृणमूल कांग्रेस फिर जीत गई. इसे देखते हुए दिनहाटा और शांतिपुर से जीते भाजपा प्रत्याशियों – निशिथ प्रमाणिक और जगन्नाथ सरकार ने विधानसभा में शपथ नहीं ली. क्योंकि इन दोनों के पास लोकसभा में सदस्यता थी.
फिर सूबे में चुनाव कोरोना काल में हुआ था. खारदाह सीट पर तृणमूल कांग्रेस के काजल सिन्हा संक्रमण की चपेट में आए और नतीजे आने से पहले उनका देहांत हो गया. नतीजे आए, तो सिन्हा ही जीते थे. इसीलिए खारदाह में उपचुनाव की ज़रूरत पड़ी.

और जून महीने में गोसाबा में तृणमूल विधायक जयंत नासकर की मौत भी कोरोना से ही हो गई.

आज आए नतीजों में इन चारों सीटों से तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी जीत गए हैं. इनके नाम हैं –
दिनहाटा – उदयन गुहा
शांतिपुर – बृजकिशोर गोस्वामी
खारदाह – शोभनदेव चट्टोपाध्याय
गोसाबा – सुब्रत मोंडल

तृणमूल कांग्रेस दिनहाटा और शांतिपुर की जीत से बहुत खुश होगी. लेकिन हम ये जानते हैं कि एक भारी जीत के लगभग तुरंत बाद हुए उपचुनावों में सरकार चला रही पार्टी की जीत की संभावना ज़्यादा होती है. वही हम पश्चिम बंगाल में होता भी देख रहे हैं. फिर खारदाह और गोसाबा में सिंपथी फैक्टर ने भी काम किया. ये बात भी है कि जीता हुआ प्रत्याशी जब सांसदी बचाने के लिए इस्तीफा देता है, तो वोटर्स के बीच मैसेज भी खराब ही जाता है. दिनहाटा और शांतिपुर पर ये बात लागू होती है.

तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी 60 हज़ार से लेकर 1 लाख 60 हज़ार की लीड से जीते हैं. विधानसभा के अंदर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ेगा. ये लीड और ये नतीजे बस इस तरफ इशारा करते हैं कि पश्चिम बंगाल में राजनीति और तंत्र, दोनों पर ममता बैनर्जी और उनकी पार्टी का कितना काबू है. जब ”मोमेंटम” नहीं होता, तब भाजपा जैसी साधन संपन्न पार्टी भी अपनी सीटें नहीं बचा पातीं.

3 हिमाचल प्रदेश (विधानसभा + लोकसभा)
हिमाचल में 3 विधानसभा सीटों और एक लोकसभा सीट पर चुनाव हुआ. इन चारों सीटों पर कांग्रेस को जीत मिली है. पहले बात करते हैं लोकसभा की. मंडी लोकसभा सीट पर कांग्रेस की प्रत्याशी और पूर्व सांसद प्रतिभा सिंह ने भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी ब्रिगेडियर खुशहाल ठाकुर को हराया है. प्रतिभा सिंह पहले भी 2 बार मंडी संसदीय क्षेत्र से चुनी जा चुकी हैं. प्रतिभा प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की पत्नी हैं, जिनकी मौत जुलाई 2021 में हुई थी. इस चुनाव से पहले मंडी लोकसभा सीट भाजपा के पास थी. सांसद राम स्वरूप शर्मा की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत होने के बाद ये सीट खाली हुई थी. गौरतलब है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर इसी मंडी लोकसभा सीट से आते हैं और भाजपा ने यही सीट दो साल पहले 4 लाख के बड़े अंतर के साथ जीती थी.

जिन तीन विधानसभा सीटों पर चुनाव हुए हैं, उनमें से 2 फतेहपुर और अर्की विधानसभा सीट कांग्रेस के पास थी और एक- जुब्बल-नावर-कोटखाई भाजपा के पास. आज के नतीजों के बाद तीनों सीटें अब कांग्रेस के खाते में हैं.

तीनों सीटों में से जुब्बल-नावर-कोटखाई सीट ऐसी थी, जहां सबसे ज्यादा सियासी तमाशा हुआ. ये सीट भाजपा विधायक नरेंद्र बरागटा की मौत के बाद खाली हुई थी. नरेंद्र बरागटा पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल और उनके बेटे अनुराग ठाकुर के खेमे के माने जाते थे. वरिष्ठ विधायक होने के बावजूद उन्हें मंत्रिमंडल में जगह नहीं दी गई थी. बरागटा की मौत के बाद उनके बेटे चेतन बरागटा चुनाव लड़ने की तैयारी कर चुके थे. लेकिन पार्टी ने ऐन मौके पर टिकट महिला प्रत्याशी नीलम सैराइक को दे दिया.

चेतन ने पैरवी की कोशिश की, पर CM जयराम के आगे उनकी नहीं चली. विरोधस्वरूप चेतन ने निर्दलीय चुनाव लड़ा. चेतन क़रीब 15 सालों से पार्टी के काम कर रहे थे और इस चुनाव में सस्पेंड होने से पहले लंबे समय से प्रदेश भाजपा के सोशल मीडिया और IT इंचार्ज थे.

चेतन का मुकाबला था पूर्व विधायक और कांग्रेस नेता रोहित ठाकुर से, जो पूर्व मुख्यमंत्री ठाकुर रामलाल के पोते हैं. इस चुनाव में रोहित ठाकुर को क़रीब 53 प्रतिशत मत मिले. निर्दलीय उम्मीदवार चेतन बरागटा को क़रीब 42 फीसदी. वहीं भाजपा की प्रत्याशी नीलम सैराइक अपनी ज़मानत भी नहीं बचा सकीं. उन्हें क़रीब 5 प्रतिशत वोट मिले. इस हार ने मुख्यमंत्री जयराम के फैसलों और नीतियों पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं.

जुब्बल के अलावा अर्की विधानसभा सीट पर भी कांग्रेस की जीत हुई. ये सीट पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की मौत के बाद खाली हुई थी. यहां से कांग्रेस उम्मीदवार संजय अवस्थी विधायक बने हैं. वहीं फ़तेहपुर सीट पर कांग्रेस के भवानी सिंह पठानिया चुनकर विधानसभा पहुंचे हैं. ये सीट उनके पिता सुजान सिंह पठानिया की मौत के बाद खाली हुई थी.

चारों सीटें गंवाने के बाद मीडिया से बात करते हुए मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने कहा- कांग्रेस ने महंगाई को बड़े हथियार के रूम में इस्तेमाल किया. महंगाई मुद्दा थी और ये मुद्दा इनके हाथ लग गया. जयराम चाहे जो कहें, पर ये किंतु-परंतु भी उन्हें आलोचना से परे नहीं ले जाती. बीते दिनों जब सीएम साहब दिल्ली के चक्कर लग रहे थे, तो कहा जा रहा था कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व उन्हें बदलने पर विचार कर रहा है. कुछ-कुछ उत्तराखंड की तर्ज पर. हालांकि तब जयराम ने अपनी कुर्सी बचा ली थी. हिमाचल में एक अनकहा नियम है कि हर पांच साल बाद विपक्षी पार्टी सरकार बनाती है. हिमाचल और गुजरात में दिसंबर 2022 में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं. यानी आखिरी 12 महीने बचे हैं. गुजरात में मुख्यमंत्री समेत पूरा मंत्रिमंडल मोदी एंड टीम ने बदल डाला था, क्या हिमाचल में भी कुछ ऐसा होगा? सियासी जानकार और खुद भाजपाई इस पर कयासबाज़ी में जुटे हैं. सटीक उत्तर किसी के पास नहीं है.

कांग्रेस के लिए नतीजे सुखद हैं, पर पार्टी इत्मीनान से नहीं बैठ सकती. जुब्बल-नावर-कोटखाई में भाजपा की अंदरूनी लड़ाई को छोड़ दें तो दो विधानसभा सीटें और लोकसभा की सीट पर कांग्रेस की जीत में बड़ा योगदान सिंपथी वोट का भी है. अर्की और मंडी सीट पर वीरभद्र सिंह की वजह से और फ़तेहपुर में सुजान सिंह पठानिया की वजह से. प्रदेश कांग्रेस में आज भी तीन धुर हैं. पहले वीरभद्र का सर्वमान्य नेतृत्व होता था, अब वो नहीं है. इस जीत के बाद प्रदेश के कई वरिष्ठ कांग्रेसी खुद में CM देख रहे होंगे, अच्छा है, देखना चाहिए, बस पहले अंदरूनी कलह निपटा लें. ऐसा ना हो कि पड़ोसी राज्य पंजाब जैसे हाल हो जाएं जहां पार्टी प्रधान और सरकार नदी के दो किनारे बने बैठे हैं.

4.मेघालय (विधानसभा)
यहां तीन सीटों पर उपचुनाव हुए थे – मौरिनकेंग, मौफलांग और राजाबाला. मौरिनकेंग और राजाबाला में मुख्यमंत्री कोनराड संगमा की नेशनल पीपल्स पार्टी NPP के प्रत्याशी जीते हैं – पिनिएद सिंह सिएम और मोहम्मद अब्दुस सालेह. मौफलांग से यूनाइटेड डेमोक्रैटिक पार्टी UDP के यूजीनसन लिंगदोह जीते हैं.

एनपीपी और यूडीपी मेघालय में सत्ताधारी गठबंधन का हिस्सा हैं. भाजपा भी इसी गठबंधन में है. भाजपा का ज़िक्र हमने क्यों किया, आपको कुछ देर में समझ आ जाएगा.

दरअसल मौरिनकेंग और राजाबाला सीटें कांग्रेस विधायकों के देहांत के चलते खाली हुई थीं. इन दोनों सीटों पर पार्टी अपने प्रत्याशी नहीं जिता पाई, जबकि अमूमन ऐसे में वोटर्स की सहानुभूति पार्टी कैंडिडेट को मिल जाती है. मौफलांग सीट एक निर्दलीय विधायक के देहांत से खाली हुई थी. इन तीनों सीटों पर कांग्रेस दूसरे नंबर पर रही.

पूर्वोत्तर की राजनीति हिंदी पट्टी से बहुत अलग है. कांग्रेस का पाला अब तक पूर्वोत्तर में अपने कद की किसी पार्टी से पड़ा नहीं था. लेकिन मोदी-शाह युग में पूर्वोत्तर को सरकार और पार्टी दोनों से बहुत अटेंशन मिला है. नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रैटिक अलायंस के बैनर तले भाजपा पूरे पूर्वोत्तर में सत्ताधारी गठबंधनों का हिस्सा है. जैसे जैसे कांग्रेस मेघालय जैसे राज्यों में अपनी ज़मीन खोती जा रही है, वो भाजपा के लिए मौके पैदा करती जा रही है. राष्ट्रीय राजनीति के संदर्भ इन नतीजों को ऐसे ही पढ़ा जाएगा कि कोनराड संगमा का गठबंधन तीन सीटें जीत गया है. वो गठबंधन, जिसका हिस्सा भाजपा भी है.

5.असम (विधानसभा)
असम में पांच विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए थे. इनमें से तीन पर भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी जीते हैं, और दो पर हिमंत बिस्वा सरमा सरकार में शामिल यूनाइटेड पीपल्स पार्टी (लिबरल) के प्रत्याशी. गोसाईगांव और तुमालपुर में कोविड के चलते विधायकों का निधन हुआ था. इस साल मार्च में हुए विधानसभा चुनाव के बाद थोवरा और मनियानी से जीते कांग्रेस विधायक सुशांत बोरगोहाइन और रूपज्योति कुर्मी भाजपा में आ गए थे. भबानीपुर से बदरुद्दीन अजमल की पार्टी AIUDF के विधायक फणीधर तालुकदार ने भी यही काम किया था. इन तीनों को भाजपा ने उपचुनाव में टिकट दिया और ये 25 हज़ार से 40 हज़ार की मार्जिन से जीत गए. आप पूछेंगे कि तीनों विधायक भाजपा में क्यों आए, तो उसका एक ही जवाब है – वो चुंबक जिसका नाम हिमंत बिस्वा सरमा है.

तुमालपुर और गोसाइगांव बोडो इलाके की सीटें हैं. तुमालपुर सीट पहले भी UPPL के पास थी. लेह राम बोडो जीते, लेकिन कोविड के चलते निधन हुआ. इस बार भी सीट UPPL के जोलेन दाइमारी को ही मिली है. खेल हुआ है गोसाइगांव सीट पर. विधानसभा चुनाव जीते थे बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट के मजेंद्र नरज़री. BPF कांग्रेस गठबंधन का हिस्सा थी. लेकिन उपचुनाव में जीते हैं जिरोन बासुमतारी, जो कि सत्ताधारी गठबंधन की हिस्सेदार UPPL से हैं. UPPL के बारे में कहा जाता है कि वो भाजपा की छांव में पनपी है, ताकि BPF को किनारे लगाया जा सके.

तो उपचुनाव के नतीजे बताते हैं कि हिमंत बिस्व सरमा और भाजपा, दोनों असम में मज़बूत हो रहे हैं. अपने तमाम विवादित फैसलों और बयानों के बावजूद हिमंत बिस्व सरमा की छवि एक लोकप्रिय टास्कमास्टर की बनी हुई है. और ये नतीजे इसका सबूत दे रहे हैं.

6.मध्यप्रदेश (विधानसभा, लोकसभा)
मध्यप्रदेश में एक लोकसभा सीट और तीन विधानसभा सीटों पर उपचुनाव की ज़रूरत पड़ी क्योंकि जनप्रतिनिधियों का निधन हुआ. खंडवा लोकसभा सीट भाजपा के पास थी. उपचुनाव में भी भाजपा के ज्ञानेश्वर पाटिल ही जीते हैं. कांग्रेस के राजनारायण सिंह पुरनी दूसरे नंबर पर रहे. दोनों के बीच जीत का अंतर ज़्यादा नहीं रहा – महज़ 8 हज़ार वोट.

जोबट और पृथ्वीपुर विधानसभा सीट कांग्रेस के पास थीं. लेकिन इस बार दोनों सीटें भाजपा को मिल गई हैं. जोबट से जीती हैं सुलोचना रावत और पृथ्वीपुर से जीते हैं डॉ शिशुपाल यादव. रायगांव सीट पहले भाजपा के पास थी. उपचुनाव में यहां से कांग्रेस की कल्पना वर्मा जीती हैं. जोबट कांग्रेस का गढ़ माना जाता है और यहां 14 में से 11 चुनाव कांग्रेस प्रत्याशियों ने ही जीते हैं. तो यहां की हार पार्टी को ज़्यादा खलेगी.

230 सीटों वाली मध्यप्रदेश विधानसभा में भाजपा के पास पहले से 126 सीटें हैं. ये नतीजे बस ये बताते हैं कि कांग्रेस सूबे में वो ज़मीन अब फिर खोती जा रही है, जो उसने 2018 के चुनावों में हासिल की थी. पार्टी संगठन और संसाधन दोनों के लिहाज़ से कमज़ोर होती जा रही है. और नैरिटिव उसके हाथ से फिसल रहा है. कमलनाथ, दिग्विजय सिंह जैसे नेता अब वैसा ज़ोर नहीं लगा पाते. पार्टी की समस्या ये है कि इन नेताओं की जगह लेने कोई दूसरा नेता नहीं आया. दूसरी तरफ भाजपा के पास दिल्ली से लेकर भोपाल तक पार्टी मशीनरी और सत्ता दोनों हैं.

7. बिहार (विधानसभा)
बिहार में दो विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए थे – तारापुर और कुशेश्वर स्थान. दोनों पर जनता दल यूनाइटेड के प्रत्याशी जीत गए हैं. दर्शक जानते ही हैं कि 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में जनता दल यूनाइटेड सिमटकर 45 सीटों पर आ गई थी. नीतिश का कद पहले से कुछ कम सा हो गया था. इस साल अप्रैल में नीतीश कैबिनेट में शिक्षा मंत्री रहे मेवालाल चौधरी का का कोविड से निधन हो गया. और जुलाई में जदयू विधायक शशि भूषण हज़ारी का हेपेटाइटिस से देहांत हुआ.

आज आए नतीजों में तारापुर से जदयू के राजीव कुमार सिंह ने राजद के अरुण कुमार को, और कुशेश्वर स्थान से जदयू के अमन भूषण हज़ारी ने राजद के गणेश भारती को हरा दिया है. कुशेश्वर स्थान की सीट पर दो बार से जदयू प्रत्याशी ही जीत रहे थे और फिर अमन भूषण को उनके पिता की विरासत का लाभ भी मिला ही.

तारापुर में मामला करीबी रहा. राजद प्रत्याशी अरुण कुमार कुछ वक्त आगे भी चले, लेकिन अंततः 38 सौ की लीड से हार ही गए.

बिहार के नतीजे नीतीश के खुश करने वाले कहे जा सकते हैं. लेकिन उन्हें इस खुशी को काबू में रखना होगा. क्योंकि ये तथ्य है कि उनके हाथ नया कुछ नहीं लगा है. और न ही इस बात का जवाब खोजा गया है कि नीतीश अपनी विरासत जदयू में देंगे किसे. रही बात लालू प्रसाद यादव की, तो वो बिलकुल अभी सूबे में लौटे हैं. तेजस्वी ज़रूर इन नतीजों से कुछ मायूस होंगे. खासकर तारापुर में मिली करीबी हार से.

ये वो सारे उपचुनाव थे, जिनके नतीजों की लोगों को प्रतीक्षा थी और जिनके सियासी मायने बाकियों से कुछ अधिक थे. चलते चलते हम कुछ और उपचुनावों का ज़िक्र भी कर देते हैं.
1. हरियाणा – यहां ऐलानाबाद से लोकदल के अभय सिंह चौटाला ने भाजपा के गोबिंद कंडा को हराया.

2. कर्नाटक – यहां दो सीटों पर मुकाबला बराबरी में छूटा. भाजपा-कांग्रेस एक एक सीट से जीते हैं. सिंदगी सीट से भाजपा के भुसनुर रमेश बालप्पा जीते और हंगल से माने श्रीनिवास की जीत हुई है.

3. महाराष्ट्र – देगलुर सीट से कांग्रेस जीतेश अंतापुरकर ने भाजपा के सुभाष साबने को हराया.

4. मिज़ोरम – तुइरियल से मिज़ो नेशनल फ्रंट के. लालदौंगलियाना जीते हैं. हारे ज़ोरम पीपल्स मूवमेंट के लाल ट्लान माविया.

5. राजस्थान – यहां दो सीटों पर उपचुनाव हुए – वल्लभनगर और धारियावद. दोनों सीटों पर कांग्रेस जीत गई है. वल्लभनगर से प्रीती शक्तावत और धारियावद से नागराज मीणा. वल्लभनगर से पहले भी प्रीती शक्तावत के पति गजेंद्र सिंह शख्तावत ही जीते थे. तो ये सीट कांग्रेस ने बचाई है. भाजपा आहत हुई होगी धारियावद की हार से. विधानसभा चुनाव में यहां से भाजपा गौतम लाल मीणा 23 हज़ार मतों से जीते थे. इस पार पार्टी तीसरे स्थान पर रही है. एक कारण ये बताया जा रहा है कि पार्टी ने गौतम लाल मीणा के बेटे कन्हैया लाल मीणा को टिकट नहीं दिया. फिर इस सीट पर बीटीपी ने कैंडिडेट खड़ा कर दिया था, जिसने वोटों का और बंटवारा कर दिया. लेकिन बीटीपी ने भी इलाके में अपने नेता थावरचंद गहलोत को टिकट नहीं दिया. सो उन्होंने भी निर्दलीय होकर पर्चा भर दिया. नतीजे आए तो भाजपा इस सीट पर तीसरे स्थान पर रही.

6. तेलंगाना – हुज़ूराबाद से भाजपा के एटाला राजेंदर ने तेलंगाना राष्ट्र समिति के गेलू श्रीनिवास यादव को हरा दिया. ये हार टीआरएस को बहुत चुभेगी. दरअसल एटाला राजेंदर के चंद्रशेखर कैबिनेट में थे. इस साल जून में उनपर ज़मीन हथियाने का आरोप लगा तो कैबिनेट से बाहर कर दिए गए. नाराजड एटाला राजेंदर ने इस्तीफा दिया. और अब उपचुनाव में टीआएस को फूटी आंख न सुहाने वाली भाजपा से जीत गए हैं.


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