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लॉकडाउन-3 में छोटे दुकानदारों के लिए कैसे कन्फ्यूज़न की स्थिति हो गई है?

लॉकडाउन-3 शुरू हो चुका है. पहले दो लॉकडाउन में लोगों के बीच एक ये मैसेज था कि चलो सब कुछ ही बंद है. लेकिन अब तीसरी लॉकडाउन में एक कन्फ्यूज़न है. कि मेरा काम चालू हो सकता है या नहीं. ये कन्फ्यूज़न गली-मोहल्लों के छोटे दुकानदारों के लिए और भी ज़्यादा है, क्योंकि उनके पास जानकारी के लिए ज़्यादा सोर्स भी नहीं हैं. कुछ सवाल सबसे अहम हैं.

# सामान लाने-ले जाने का काम किस तरह से मैनेज हो रहा है?

# ट्रांसपोर्टेशन की क्या व्यवस्था है?

# सैनिटाइज़ेशऩ और सोशल डिस्टेंसिंग कैसे फॉलो कराएंगे?

# पुलिस-प्रशासन की तरफ से कोई समस्या होती है?

‘दी लल्लनटॉप’ ने उन्हीं से बात करके इनके जवाब जानने की कोशिश की.

“हमारा नंबर तो सबसे आखिर में ही आना है”

नाम – दिलीप गुप्ता

काम – कपड़े की दुकान

पता – कानपुर

कपड़े-लत्ते की दुकानें Essentials में तो शामिल नहीं हैं. सबसे पहले बंद होने वाली दुकानों में थीं. अब कब खुलेंगी, नहीं पता. दिलीप गुप्ता की कपड़े की ही दुकान है. हमने उनसे बात की. दिलीप बताते हैं कि जहां उनकी दुकान है, वो तो पूरा इलाका ही कपड़ा बाज़ार है. यहां जो समस्या एक की है, वो सबकी है. अब इसमें पॉज़िटिव ये है कि मिल-जुलकर समाधान देख सकते हैं. निगेटिव ये है कि कोई किसी की मदद करने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि सब ही परेशान हैं.

सामान लाने और ट्रांसपोर्ट की दिक्कतों पर वे कहते हैं –

“हमारे कपड़ा मंगाने के दो बड़े सेंटर हैं- सूरत और मुंबई. दोनों जगहों का हाल आप देख रहे हैं. अब लोग मई अंत या शुरुआती जून के नाम पर दिलासा दे रहे हैं कि तब तक कुछ शुरू होगा. लेकिन हमारे लिए तो दिक्कत ये भी है कि कानपुर में शुरू हो भी जाए, हमारी दुकान खुल भी जाए, तो सूरत और मुंबई में सब नॉर्मल हुए बिना हम यहां क्या ही कर पाएंगे?”

अब तीसरी बार लॉकडाउन बढ़ने के बाद लोगों के मन में एक ये बात भी है कि – क्या पता फिर बढ़ जाए. इन आशंकाओं पर दिलीप कहते हैं –

“अब कानपुर में हटिया में इतना बड़ा बर्तन बाज़ार है. पूरा बंद. चना-चबेना का बाजार है. पूरा बंद. अब जब वो सब बंद है, तो हमें तो लग रहा कपड़े की दुकानें तो सबसे आखिरी में ही खुलेंगी. अभी घर चलाने की दिक्कत नहीं आई है. लेकिन अगर महीने भर ये और खिंच गया, तो सोचना पड़ेगा. दुकान हम अकेले ही संभालते थे. कोई वर्कर नहीं रखा था, इसलिए अभी अपना ही गल्ला-पानी देखना है.”

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दुकानदारों के लिए सोशल डिस्टेंसिंग मेंटेन कराना भी बड़ी चुनौती है. वे कहते हैं कि ग्राहक से दूर-दूर खड़े होने के लिए आप चिरौरी ही कर सकते हैं. मज़बूती से नहीं बोल सकते. (फोटो- PTI)

“जब फूलों की खेती हो रही, तो इत्र की दुकान क्यों बंद है”

नाम – विन्नू दुबे

काम – इत्र व्यापारी

पता – कन्नौज

“कन्नौज में एक ही तो चीज़ है- इत्र. उसकी दुकानें बंद, तो माने पूरा कस्बा ही बंद. लेकिन एक बात समझ में नहीं आ रही. सरकार ने फूलों की खेती करने वालों को काम चालू रखने की इजाज़त दे दी है. हम डीलर लोगों को परमिशन नहीं है अभी. तो जब बिक्री ही बंद रहेगी, तो खेती करने वालों को भी कहां से फायदा होगा? माने जब कोई खरीदने वाला ही नहीं है, तो पैदा करके क्या होगा?”

एक क्विंटल फूल से करीब 30 ग्राम इत्र निकलता है. इत्र व्यापारियों का कहना है कि इतनी मेहनत से इत्र तैयार होगा, तो क्या महीनों-महीनों रखा रहेगा. क्योंकि ऐसा भी नहीं है कि आज सरकार ने बोला, कल से दुकान खुलीं और परसों से धड़ाधड़ सेल. फिर जब भी दुकान खुलेगी, तो हर व्यापारी पहले अपने पास रखा माल निकालेगा.

मंझोले इत्र व्यापारियों को लगता है कि लॉकडाउन खुलने के बाद उनको ट्रांसपोर्टेशन को लेकर ज़्यादा दिक्कतें नहीं आएंगी. क्योंकि उनका बिज़नेस लोकल लेवल पर ही ज़्यादा है. विन्नू कहते हैं –

“हमारे साथ अच्छी बात ये है कि ट्रांसपोर्ट वाली ज़्यादा दिक्कत नहीं आएगी. क्योंकि ज़्यादातर माल उठाने का काम आस-पास के गांवों से ही है. बिज़नेस भी हमारा ख़ासतौर पर कानपुर से ही चलता है.”

विन्नू की दुकान में एक वर्कर है. उसकी तनख़्वाह लगातार दे रहे हैं. बताते हैं कि उनके साथ के कई दुकानदार हैं, जिन्होंने शुरू-शुरू में तो दुकान में काम करने वाले लड़कों को पैसा दिया. लेकिन अब एक-दो महीने बीत जाने के बाद सब लोग मदद से पीछे हट रहे हैं.

“मांगो कुछ, मिलता कुछ, दाम कुछ”

नाम – विपिन अग्रवाल

काम – किराना व्यापारी

पता – कानपुर

53 साल के विपिन अग्रवाल की किराने की दुकान है. Essentials में थी, तो लगातार खुलती रही. लेकिन माल लाने में बहुत दिक्कत हो रही है. उनके लिए राहत की बात ये है कि कानपुर की ही थोक मंडी काफी बड़ी है. तो माल उठाने शहर से बाहर नहीं जाना पड़ता. लेकिन यहां अलग किस्म की दिक्कतें हैं –

“थोक मंडी में तो मारा-मारी है. मांगो कुछ, मिलता कुछ है और दाम कुछ और ही हैं. दिक्कत ये भी है कि वहां सोशल डिस्टेंसिंग का कोई कायदा तो है नहीं. पता चलता है कि हम तो दूरी पर खड़े अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं. इतने में कोई आया और बीच में से सामान लेकर चल दिया. अब महीना भर बीत जाने के बाद तो फिर भी व्यवस्थाएं बन गई हैं. कुछ ही दुकानें खुल रही हैं, लेकिन पूरे प्रोटोकॉल के साथ.”

यहां एक समस्या कुछ सुलझती है. फिर विपिन अग्रवाल बताते हैं-

“थोक बाज़ार से सामान उठा लिया, तो ट्रांसपोर्ट की दिक्कत. लोडर वाले तो पास होने के बाद भी सामान ले जाने से कतराते हैं. बहुत सख़्ती है उन पर. आप अपनी गाड़ी से ही जितना सामान ला पाएं, उतनी ही खरीदें.”

बाकी किराना व्यापारियों का कहना है कि होम डिलिवरी ने काफी राहत पहुंचाई. उन्हें भी और लोगों को भी. सरकार ने होम डिलिवरी की सुविधा दे रखी थी. जिन दुकानों को होम डिलीवरी कराने की छूट दी गई थी, उनमें विपिन अग्रवाल की दुकान भी थी. वे कहते हैं –

“हम अपने एरिया से 20-20 किमी की रेंज में होम डिलिवरी करा रहे हैं. इन 40 दिन में किसी को भी मना नहीं किया. भले कहीं से भी फोन आया हो. मेरे दो बेटे भी अभी दुकान पर ही हाथ बंटा रहे हैं.”

किराना व्यापारियों का एक ऑब्जर्वेशन भी है. कहते हैं कि- पिछले हफ्ते भर में होम डिलिवरी के रोज़ के करीब-करीब 20-25 ऑर्डर तो कम हुए ही हैं. यानी लोग अब निकल रहे हैं घरों से. ये एक तरह से ठीक संकेत भी है.


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