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क्या होता है गाड़ियों का थर्ड पार्टी इंश्योरेंस, जिसके नियमों में बड़ा बदलाव हुआ है?

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# क्या होता है इंश्योरेंस –

राजू अपने नौ दोस्तों के साथ अमेरिका घूमने जाने वाला था. अमेरिका घूमने जाने से पहले उसे उसके पंडित ने बताया कि किसी एक दोस्त का एक लाख रुपया चोरी हो सकता है. पंडित ने ये नहीं बताया कि वो दस में से कौन होगा. राजू का आई क्यू बहुत तेज़ था. उसने पंडित की बात बाकी नौ दोस्तों को बताई और सब से दस-दस हज़ार रुपए इकट्ठा कर लिए. यूं अब किसी का भी एक लाख रुपए का नुकसान नहीं होना था. चोरी किसी की भी हो हर एक का सिर्फ़ दस-दस हज़ार रुपए का नुकसान होना था.

हाई आई-क्यू वाले राजू ने इस पूरी प्रक्रिया में एक बेवकूफी भरा काम किया. पंडित की बातों में विश्वास किया. क्यूंकि जब वो वापस आए तो सबका सामन सही सलामत था. लेकिन उसने एक अक्लमंदी का भी काम किया. सबसे दस-दस हज़ार रुपए इकट्ठे करवाकर. यूं वो जो कर रहा था, उसी को पंडित (अर्थशास्त्र वाले) इंश्योरेंस कहते हैं. मतलब ढेर सारे लोगों का थोड़ा सा घाटा, न कि थोड़े से लोग का ढेर सारा घाटा.

राजू ने जो किया उसे आम बोलचाल में ट्रेवल इंश्योरेंस कहा जा सकता है. इसी तरह हेल्थ इंश्योरेंस, मोटर इंश्योरेंस आदि भी होता है.

इंश्योरेंस की पूरी क, ख, ग हमने अपने इस लेख में तसल्लीबख्श बताई है: ड्रिंक-ड्राइव को मिक्स नहीं करते तो इंश्योरेंस-इन्वेस्टमेंट को क्यों मिक्स करते हो यार?

# अब आइए जानते हैं थर्ड पार्टी इंश्योरेंस क्या होता है? –

ग्रामर में जैसे फर्स्ट पर्सन, सेकेंड पर्सन और थर्ड पर्सन का मतलब क्रमशः ‘मैं’, ‘आप’ और ‘वो’ होता है ठीक वैसा ही इंश्योरेंस के केस में है. फर्स्ट पार्टी, और थर्ड पार्टी इंश्योरेंस का कांसेप्ट सबसे ज़्यादा ‘मोटर इंश्योरेंस’ में सुनने को मिलेगा. फर्स्ट पार्टी मतलब नॉर्मल इंश्योरेंस जैसा हमने ऊपर जाना. जिसमें नुकसान होने की दशा में आपको भरपाई की जाएगी (ग्रामर के फर्स्ट पर्सन का ‘मैं’). नुकसान, जैसे ‘मोटर इंश्योरेंस’ के केस में आपकी कार किसी पेड़ से टकरा जाए तो उसे सही करवाने में जो खर्चा हुआ.

वहीं यदि आपने थर्ड पार्टी इंश्योरेंस कराया है तो आपकी गाड़ी से ‘जिसको’ या ‘जिसका’ नुकसान होगा उसकी भरपाई, जो सामान्य स्थितियों में आप करते, अब इंश्योरेंस कंपनी करेगी. (ग्रामर के थर्ड पर्सन का ‘वो’)

जिसको’ नुकसान होगा से मतलब, कोई राह चलता आदमी आपकी गाड़ी से ठुक गया तो उसके इलाज का खर्च आपकी इंश्योरेंस कंपनी उठाएगी.

जिसका’ नुकसान होने से मतलब, अगर कोई राह चलता आदमी अपने कंधे में एलसीडी ढो कर ला रहा है और आपकी गाड़ी से टक्कर लगने पर उसे तो कोई चोट नहीं लगी लेकिन उसका एलसीडी टूट गया तो इस दशा में उसके एलसीडी का भुगतान, जो थर्ड पार्टी इंश्योरेंस न होने की दशा में आप कर रहे होते, अब वो आपके बिहाफ पे आपकी इंश्योरेंस कंपनी करेगी.

अगर आपकी गाड़ी से किसी व्यक्ति या उसकी प्रॉपर्टी का नुकसान हुआ है तो ये आपका दायित्व (लायबेलिटी) है कि आप उसके नुकसान की भरपाई करें. इसलिए ही तो थर्ड पार्टी इंश्योरेंस को ‘लायबेलिटी इंश्योरेंस’ भी कहा जाता है.

भारत में जितनी गाड़ियां रोड में है उसमें से 1/3 का ही थर्ड पार्टी इश्योरेंस है.
भारत में जितनी गाड़ियां रोड में है उसमें से 1/3 का ही थर्ड पार्टी इश्योरेंस है.

मोटर व्हीकल एक्ट के अनुसार भारत के हर वाहन का थर्ड पार्टी इंश्योरेंस होना ज़रूरी है. लेकिन अधिकतर वाहन मालिक फर्स्ट और थर्ड पार्टी इंश्योरेंस का कॉम्बो ही लेते हैं. जिसमें वाहन, वाहन मालिक, उसमें बैठे हुए लोग, वाहन चलाने वाला, कोई तीसरा जो उस वाहन से हताहत हुआ है और उस तीसरे की प्रोपर्टी जिसका वाहन के टकराने से नुकसान हुआ है सबका इंश्योरेंस होता है.

आम बोलचाल की भाषा में इसी कॉम्बो को ‘फर्स्ट पार्टी इंश्योंरेस’ कह लिया जाता है.

अगर आप भी ऐसा कहते आए हैं तो केवल इस स्टोरी भर के लिए ‘फर्स्ट पार्टी इंश्योंरेस’ को उसकी ऑफिशियल परिभाषा के अनुसार समझें न कि इस कॉम्बो को. क्यूंकि ये कन्फ्यूज़न इस हद तक है कि जब मैंने पॉलिसी बाज़ार कॉल किया तो उन्होंने बताया कि फर्स्ट पार्टी इंश्योरेंस में गाड़ी, थर्ड पार्टी का अनलिमिटेड कवर (जो कि कोर्ट द्वारा डिसाइड किया जाएगा), थर्ड पार्टी की प्रॉपर्टी (साढ़े सात लाख तक) और ड्राईवर या गाड़ी के मालिक का 2 लाख तक का कवर किया जाएगा.

लेकिन थर्ड पार्टी इंश्योरेंस में केवल मेंडेटरी इंश्योरेंस किया जाएगा. मेंडेटरी मने, जो मोटर व्हीकल एक्ट के अनुसार आपने करवाना ही करवाना है. तो यूं थर्ड पार्टी इंश्योरेंस की जो आधिकारिक परिभाषा है वही उसे आम बोलचाल की भाषा में भी समझा जाता है. ऐसा फर्स्ट पार्टी इंश्योरेंस के केस में नहीं है.


# IRDAI –

पॉलिसी बनाने वालों को आम बोलचाल की भाषा में कहते हैं – इंश्योरेंस कंपनीज़. जैसे बजाज-एलायंज़, ICICI-लोम्बार्ड, टाटा-AIG, भारती-AXA, LIC आदि.

अब एक पॉलिसी बनाने में बनाने वाला गड़बड़ी कर सकता है, जैसे कि प्रीमियम ज़्यादा ले सकता है, क्लेम के वक्त पैसे कम या नहीं दे सकता है, और सबसे बुरा – आपके प्रीमियम के पैसे लेकर भाग सकता है.

IRDA.L

तो इन सब, और बाकी कई तरह के, फ्रॉड से आपको बचाने के लिए भारत सरकार ने गठित की है – IRDAI. यानी इंश्योरेंस रेग्युलेटरी डेवलपमेंट अथॉरिटी यानी भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण. जैसे बैंको के लिए RBI और शेयर मार्किट के लिए SEBI वैसे ही इंश्योरेंस के लिए IRDAI.

IRDAI एक स्वायत्त, वैधानिक एजेंसी है जो भारत में बीमा उद्योगों को कंट्रोल करती है और बढ़ावा भी देती है.


# आज क्यूं बात कर रहे हैं –

मोटर इंश्योरेंस एक टर्म इंश्योरेंस है. मतलब ऐसा नहीं कि एक बार आपने अपनी गाड़ी का इंश्योरेंस करवा लिया तो छुट्टी. बल्कि आपको हर साल इसे रिन्यू करवाना पड़ता है. ये एक साल ही इंश्योरेंस का ‘टर्म’ है. अभी तक तो आपको न्यूनतम एक साल का इंश्योरेंस लेना ज़रूरी था. लेकिन अब ये टर्म दुपहिया वाहन के लिए न्यूनतम पांच साल कर दिया है. चार पहिये वाले वाहनों के लिए न्यूनतम तीन साल कर दिया है. किया किसने है? और कौन आईआरडीए.


# ये नियम आया क्यूं –

ये नियम सुप्रीम कोर्ट के उस ऑर्डर के अनुसार है, जिसमें उसने 20 जुलाई, 2018 को कहा था कि लॉन्ग-टर्म थर्ड पार्टी इंश्योरेंस लाए जाएं. सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा ऑर्डर तब दिया जब उसने ये जाना कि रोड में चलने वाले 18 करोड़ वाहनों में से केवल 6 करोड़ वाहनों का ही थर्ड पार्टी इंश्योरेंस है और ऐसा इसलिए है क्यूंकि लोग वाहन खरीदते वक्त तो इंश्योरेंस लेते हैं लेकिन उसे रिन्यू नहीं करवाते.

सुप्रीम कोर्ट (सांकेतिक इमेज)
सुप्रीम कोर्ट (सांकेतिक इमेज)

# फायदा/नुकसान –

जैसा हमारे देश में आईआरडीए पॉलिसी को रेग्यूलेट करती है वैसे ही हर देश की अपनी एक इंश्योरेंस रेग्यूलेटरी बॉडी होती है. लेकिन ज़्यादातर देशों में वाहनों का थर्ड पार्टी इंश्योरेंस अनिवार्य है. बस अंतर इतना है कि अधिकतर देशों में पॉलिसी का न्यूनतम टर्म एक वर्ष हो सकता है. भारत में भी ऐसा ही था. अब नहीं.

पॉलिसी लेने वालों को एक-मुश्त तीन या पांच साल का पैसा देने में दिक्कत होगी. खासतौर पर तब जबकि थर्ड पार्टी इंश्योरेंस का पेमेंट आप किश्तों में नहीं कर सकते.

और अगर आपने 5 साल का इंश्योरेंस ले लिया तो कोई दूसरी इंश्योरेंस कंपनी अगर अच्छा ऑफर दे रही है तो उसके लिए अब आपको एक नहीं पांच साल इंतज़ार करना पड़ेगा.

इसलिए वाहन मालिकों का इस नए नियम को लेकर गुस्सा एकबारगी जायज़ लगता है. लेकिन दरअसल इसका नुकसान कम और फायदा ज़्यादा है. कम से कम विशेषज्ञों की नज़र में.

जैसे कि पहले अगर आप अपनी डेट भूलते थे तो पॉलिसी लेप्स हो जाती थी. इसके आर्थिक नुकसान तो थे ही साथ ही ये ग़ैर क़ानूनी भी होता. अब तार्किक रूप से देखें तो ऐसे मामलों में 1/3 और 1/5 गुना कमी आएगी (क्रमशः चार पहिया वाहनों और दोपहिया वाहनों के केस में).

साथ ही साथ अगर ज़्यादा लोग इंश्योरेंस करवाएंगे तो इंश्योरेंस के दामों में भी धीरे-धीरे गिरावट होनी तय है. क्यूंकि इंश्योरेंस है तो एक पूल सिस्टम ही और पूल में जितने ज़्यादा लोग पैसे लगाएंगे रिस्क उतना कम होता चला जाएगा.

अच्छा आपको एक बात और बता दें कि पुराने वाहनों के लिए वही ‘न्यूनतम एक साल के टर्म’ वाला इंश्योरेंस काफी है.


# दिक्कतें –

अब इसे कार्यरूप में लाने में कुछ दिक्कते हैं. पहली तो ये कि फर्स्ट पार्टी इंश्योरेंस और थर्ड पार्टी इंश्योरेंस का कॉम्बो कैसे बनाया जाए. कुछ लोग दोनों ही तरीके के इंश्योरेंस एक साथ पांच सालों के लिए ले लेना चाहेंगे, जबकि कुछ लोग चाहेंगे कि नियम के अनुसार थर्ड पार्टी इंश्योरेंस तो पांच साल का ले लिया जाए लेकिन फर्स्ट पार्टी इंश्योरेंस हर साल रिन्यू करवाया जाए. (ये टू-व्हीलर के हिसाब से बताया है, फोर-व्हीलर में पांच साल को तीन साल से बदल दें.) और इस तरह से प्रीमियम निर्धारित करने में दिक्कतें होंगी सो अलग.

थर्ड पार्टी के प्रीमियम तो आईआरडीए द्वारा निर्धारित किए जाते हैं लेकिन फर्स्ट पार्टी इंश्योरेंस के प्रीमियम का निर्धारण इंश्योरेंस कंपनी द्वारा किया जाता है. तो केवल समय के जोड़-तोड़ में ही नहीं रुपए के जोड़ तोड़ में भी खासी मशक्कत करी पड़ेगी.

और दिक्कतों का तो ऐसा है कि धीरे-धीरे ही पता चलती हैं. पता चलेंगी, सुधार होगा. फिर कुछ और दिक्कतें पता चलेंगी, फिर कुछ और सुधार किए जाएंगे…


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