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चालान पर ये 5 दलीलें, नोटबंदी और पाकिस्तान से बदला लेने वाली बहसों की याद दिलाती हैं

नया मोटर व्हीकल ऐक्ट लागू हो चुका है. भारी भरकम चालान अब ख़बरों में है. हर दिन कहीं न कहीं से कोई न कोई ऐसी ख़बर आ ही रही है कि चालान कटा और बवाल हुआ. लोग अपनी गाड़ी सड़क पर छोड़ के चले जा रहे हैं, सड़क पर ही अपनी गाड़ी फूंक डालने की भी ख़बर है.

भारी चालान से जनता दो धड़ों में बंट गई है
भारी चालान से जनता दो धड़ों में बंट गई है

कुल मिलाकर चालान की मोटी रक़म पर बवाल है. और इस बवाल के हमेशा की तरह दो पक्ष हैं. एक धड़ा मानता है कि इत्ता भारी चालान करने की क्या ज़रूरत थी? और दूसरी तरफ़ लोग ये भी कह रहे हैं कि चालान की रक़म बढ़ाने का फ़ैसला ठीक है. सबके अपने-अपने तर्क हैं.

यहां पेश हैं वो पांच लॉजिक जो भारी चालान के साथ या ख़िलाफ़ दिए जा रहे हैं.

# क्या चोरी की सज़ा फांसी हो सकती है?

लोग कह रहे हैं कि सरकार ने बहुत ही कड़े प्रावधान कर दिए हैं. इसकी जरूरत नहीं थी. कुछ लोग सवाल पूछते हुए कहते हैं कि क्या चोरी की सजा फांसी हो सकती है? इनका मानना है कि मामूली नियम तोड़ने पर इतना जुर्माना लगाना ठीक नहीं है.

लोग ट्रैफ़िक पुलिस के आगे हाथ पांव आंख नाक सब जोड़े दे रहे हैं
लोग ट्रैफ़िक पुलिस के आगे हाथ पांव आंख नाक सब जोड़े दे रहे हैं

भारी चालान के साथ खड़े लोग क्या तर्क दे रहे हैं?

मोटे चालान के साथ खड़े लोग ‘मामूली नियम तोड़ने’ वाले तर्क के ‘मामूली’ को आंकड़ों से समझा रहे हैं. उनका कहना है कि वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन हर साल ‘ग्लोबल स्टेटस रिपोर्ट ऑन रोड सेफ्टी’ रिपोर्ट छापता है. पहली चीज़ तो ये कि भारत में भारी चालान की बात WHO लगातार करता आ रहा था. 2013 में WHO ने कहा था कि भारत जैसे विकासशील देशों में सड़क दुर्घटनाओं की कमी सीधे-सीधे चालान की रक़म से जुड़ी हुई है. रक़म भारी होनी चाहिए यही कहना था. 2013 में सड़क दुर्घटनाओं में सिर्फ़ भारत में 2 लाख 31 हज़ार लोग मारे गए थे. ये किसी भी बीमारी, आतंकवाद या किसी भी और वजह से मारे गए लोगों से बहुत ज़्यादा संख्या थी.

आंकड़े डरावने हैं लेकिन नियम लागू करने से ही बात बनेगी
आंकड़े डरावने हैं लेकिन नियम लागू करने से ही बात बनेगी

दूसरी बात 2018 की WHO रिपोर्ट में ये बताया गया है कि चीन वो देश है जहां पूरी दुनिया में सड़क दुर्घटना में मरने वालों की संख्या सबसे तेज़ी से घटी है. वजह. भारी जुर्माना. तो कुल मिलाकर तर्क ये है कि जुर्माना बड़ा है या इंसानी ज़िंदगी? Whats the cost of human blood in your country? विदेश में इस तरह के कैम्पेन चलते हैं.

# सड़क पहले ठीक कर लो फिर वसूलो जुर्माना

दूसरा तर्क मोटे चालान के ख़िलाफ़ ये दिया जा रहा है कि सरकार जब सड़क बनाने पर ध्यान नहीं दे रही तो जुर्माना कैसे वसूल करेगी. लोगों का कहना है कि पहले सरकार भरवाए सड़कों के गड्ढे.

सड़कों की हालत भी खस्ता है
सड़कों की हालत भी खस्ता है

इधर वाले लोग क्या कह रहे हैं, जो चालान के साथ हैं. इनका तर्क है कि सड़क ठीक रखना और ट्रैफ़िक चालान दो अलग मुद्दे हैं. इस देश में कब ऐसा आन्दोलन हुआ जब लाखों लोग इसलिए सड़क पर उतर आए कि उन्हें सड़क सुधार करवाना था. इसी देश में आरक्षण के लिए बड़े-बड़े आन्दोलन हुए हैं. तो ये सड़क सुधरवाने की बात ठीक चालान की रक़म बढ़ाने के बाद ही क्यों? सड़क बनवाने के लिए आप सरकार को घेरिए. बिल्कुल घेरिए. लेकिन क्या तब तक हर साल लाखों लोग इसलिए मरते रहे कि सड़क नहीं सुधरी है? सड़क सुधार आन्दोलन चलाइए. लेकिन अगर चालान की रक़म बढ़ाने से लोग कम मरेंगे तो सड़क सुधारने का इंतज़ार क्यों किया जाए.

# आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैय्या

लोगों का ये तर्क है कि मिडिल क्लास लोगों की जेब पर बोझ बहुत ज़्यादा बढ़ेगा. लोग कह रहे हैं कि जिसकी आमदनी ही कम है वो इत्ता भारी चालान कैसे भरेगा?

लेकिन लोगों को ये भी तो इंतज़ाम रखना चाहिए कि जो आमदनी है उसे कमाने वाला शख्स भी जिंदा रहे
लेकिन लोगों को ये भी तो इंतज़ाम रखना चाहिए कि जो आमदनी है उसे कमाने वाला शख्स भी जिंदा रहे

चालान के साथ वाले लोग इससे उल्टा तर्क दे रहे हैं. ऊपर हमने WHO की रिपोर्ट के बारे में बताया है. इसी रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि सड़क दुर्घटना में 80 प्रतिशत मौतें इसी ‘Low & Middle income group’ की होती है.

जो मर रहा है, वही विरोध कर रहा है
जो मर रहा है, वही विरोध कर रहा है

एक तर्क ये भी दिया जा रहा है कि क़ानून हमेशा से कलेक्टिव रहा है. अगर अमीरों को किसी क़ानून से सिर्फ़ इसलिए नहीं छूट दी जा सकती कि उनके पास पैसा है, तो ग़रीबों पर भी वही लॉजिक लगता है न? भारी चालान के डर से ही सही लेकिन अगर ग़रीब आदमी भी ओवर स्पीडिंग नहीं करेगा तो अपने साथ-साथ सामने वाले की भी जान बचाएगा.

# पहले जागरूक तो करते भाई

भारी चालान के ख़िलाफ़ एक तर्क ये भी है कि पहले ट्रैफ़िक के नियम तो बता देते. अभी किसी को पता है नहीं कि नियम क़ायदे क्या हैं और चालान की रक़म बढ़ा दी. क्यों नहीं पहले टीवी, रेडियो और अखबारों के माध्यम से चालान बढ़ने के बारे में बताया गया? एकाएक चालान बढ़ा दिया?

चालान चालान चालान चालान अभी तो बस यही है जो है
चालान चालान चालान चालान अभी तो बस यही है जो है

इसके विपक्ष में ऐसा कोई मज़बूत तर्क नहीं दिया गया है. अगर चालान की रक़म बढ़ भी गई है तो भी सरकार को विज्ञापन करना ही चाहिए.

# भ्रष्टाचार बढ़ेगा

लोगबाग ये भी कह रहे हैं कि इतना भारी चालान सिर्फ़ करप्शन को बढ़ावा देगा. ट्रैफ़िक पुलिस वाले जहां पहले चौथाई और आधी रक़म लेकर छोड़ देते थे, अब वही रक़म बढ़ जाएगी. कुल मिलाकर बात ये कि अब सौ पचास में बात नहीं बनेगी.

भ्रष्टाचार रोकना तो अलग मुद्दा है ना भाई
भ्रष्टाचार रोकना तो अलग मुद्दा है ना भाई

चालान के साथ खड़े लोग तर्क दे रहे हैं कि क्या तब तक कोई क़ानून लागू न किया जाए जब तक कि भारत एक भ्रष्टाचार मुक्त राष्ट्र न बन जाए?

राशन कार्ड, बीपीएल कार्ड और तमाम कार्डों में तमाम घोटाले होते आए हैं. तो क्या ये योजनाएं लागू नहीं हुईं? इसी तरह से आप हर चौराहे पर पुलिस के पीछे पुलिस नहीं लगा सकते न?

कुल मिलाकर चालान पर जारी ये पांच दलीलें उन बहसों की याद दिलाती हैं जो नोटबंदी के दौरान होती थीं. कई लोग राष्ट्रहित में नोटबंदी को सपोर्ट कर रहे थे, वहीं कई लोग सरकार के कदम को गलत बता रहे थे.


वीडियो देखें:

पीएम मोदी के ऐलान और ओवैसी के बयान के बीच जानिए सरकारें गाय के लिए क्या कर रही हैं?|Episode 300

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