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बदबूदार, लिजलिजे, चिपचिपे! गोवा के समुद्र तटों का सत्यानाश कर रहे ये टारबॉल्स बनते कैसे हैं?

अगर गोवा बीच पर छुट्टी मनाने का प्लान बना रहे हैं तो रुक जाइए. गोवा के खूबसूरत समुद्रतट आजकल एक खास तरह की परेशानी से जूझ रहे हैं. इस परेशानी का नाम है टारबॉल. ये काले, चिपचिपे और घिनौने बॉल्स गोवा के तकरीबन हर पॉपुलर समुद्र तट पर फैले हुए हैं. जो भी इन पर पैर रखता है, ये लिजलिजे टारबॉल्स (Tarballs) उसके पांव में चिपक जाते हैं जिन्हें मशक्कत से ही छुटाया जा पा रहा है. क्या हैं ये टारबॉल और कहां से आते हैं ये? क्या टारबॉल्स पहली बार भारत में नजर आए हैं? इनके बनने का प्रोसेस क्या है और क्या इन्हें खत्म किया जा सकता है? आइए जानते हैं तफ्सील से.

क्या हैं ये टारबॉल्स?

उत्तरी गोवा में खूबसूरत बीच – अंजुना, मोरिजम, कैंडोलियम, वागातोर, बारदोज़, बागा, सिंगोरियम आदि. कोरोना संकट के कारण लॉकडाउन लगा तो इन समुद्र तटों पर लोग नहीं पहुंच पाए. अब माहौल कुछ सुधरा तो लोग छुट्टी मनाने का प्लान करने लगे. लेकिन गोवा में एक नई परेशानी खड़ी हो गई है. यहां के लगभग सभी समुद्र तटों पर गोल, काले और लिजलिजे टारबॉल्स नजर आने लगे हैं. इनसे गोवा के बीच पट गए हैं. लोगों के इन बॉल्स पर पैर रखते ही ये उनसे चिपक जाते हैं. बताया गया है कि ये टारबॉल्स समुद्री लहरों के साथ किनारे पर आ रहे हैं.

मोरजिम के गांव में रहने वाले एक शख्स ने द टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार को बताया,

“समुद्र तट पर चलना बहुत मुश्किल हो गया है. बहकर आया चिपचिपा पदार्थ पैरों में चिपक जाता है. कुछ टारबॉल तो भैंस के गोबर के जितने बड़े हैं.”

एक मछुहारे संजय परेरा ने अखबार को बताया,

“चिपचिपा पदार्थ और बड़े टारबॉल बीच पर दिखाई दे रहे हैं. इससे टूरिस्ट और लोकल लोगों का बीच पर घूमना मुश्किल हो गया है. जैसे ही कोई समंदर में घुसता है, उसके पैरों में ये बदबूदार लिजलिजी चीज़ चिपक जाती है.”

tarballs
अमेरिका के लॉस एंजिलिस के समुद्र तट पर टारबॉल्स हटाते कुछ कर्मी. (तस्वीर- Twitter@MikeLoBurgio से साभार है.)

कैसे बनते हैं ये टारबॉल?

समंदर में होने वाली गतिविधियों पर नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशियनोलॉजी (NIO) नजर रखता है. इसके अनुसार, ये टारबॉल्स या तो समंदर में पहले से मौजूद कच्चे तेल या किसी प्राकृतिक रिसाव की वजह से बन रहे हैं. इंस्टीट्यूट की एक स्टडी में कहा गया है,

“हवा और लहरें पानी में मौजूद तेल को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ देती हैं. लगातार ऐसा होने से तेल का रूप बदल जाता है और ये छोटे-छोटे टुकड़े आपस में मिल कर टारबॉल बनाते हैं.”

साल 2013 में एनआईओ ने एक स्टडी पब्लिश की थी. उसमें कहा गया था,

“तेल के कुंए का फटना, दुर्घटनावश या जानबूझ कर जहाजों, छोटी नदियों, नगरपालिका सीवेज और उद्योगों से निकले कचरे को समंदर में बहाने से भी ये टारबॉल बन सकते हैं”

ज्यादातर मामलों में टारबॉल्स तेल के रिसाव की तरफ ही इशारा करते हैं. हालांकि एक खास बात और है जिसे लेकर अभी मरीन एक्सपर्ट्स भी पूरी तरह से आश्वस्त नहीं है. वो ये कि टारबॉल सिर्फ मानसून के सीज़न में ही दिखाई देते हैं. जबकि किसी भी तरह के ऑयल या दूसरी तरह का प्रदूषण साल भर बना रहता है. फिलहाल एक्सपर्ट्स इस बारे में ज्यादा जांच की बात कह रहे हैं.

टारबॉल से क्या नुकसान हो सकता है?

टारबॉल से इंसानों को होने वाले किसी खास नुकसान का पता अभी तक नहीं चला है. बस एक मुसीबत है, कि एक बार चिपकने के बाद इसे कई बार धोकर ही शरीर से साफ किया जा सकता. ये मछुहारों के जाल में फंस कर उनकी परेशानी बढ़ा सकता है. लेकिन समंदर के जीवन पर इसका असर जरूर पड़ सकता है. केकड़े और सीप जैसे समुद्री जीव इसे खा जाते हैं जिससे उनका जीवन संकट में पड़ जाता है.

वैसे टारबॉल के प्रदूषण से पूरी दुनिया के समुद्री जीवन पर असर पड़ रहा है. टारबॉल को बैक्टीरिया और फंगस से जोड़ कर भी देखा जाता है. इसमें इंसानों को बीमार करने की क्षमता भी होती है. हालांकि अभी ऐसा मामला सामने नहीं आया है कि टारबॉल की वजह से इंसान बीमार हुए हों.

गोवा की सरकार इसके लिए क्या कर रही है?

गोवा के समुद्र तटों पर पहले भी टारबॉल देखने को मिले हैं. लेकिन इस बार मामला अलग है. इस बार इसकी मात्रा काफी ज्यादा है. इसकी वजह से प्रशासन काफी परेशान है. बार-बार तटों की सफाई कराई जा रही है. लेकिन हर आती लहर अपने साथ टारबॉल ला रही है. ऐसे में ये काफी मशक्कत भरा काम साबित हो रहा है.

गोवा के पर्यावरण मंत्री नीलेश कोबराल ने इसे अब तक का सबसे बड़ा टारबॉल संकट करार दिया है. उन्होंने द टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार को बताया है,

“पिछले साल हमने टारबॉल के सैंपल लेकर इसे NIO को उपलब्ध कराया था, जिससे पता चल सके कि ये पैदा कहां से हो रहे हैं. उनके अनुसार पिछली बार ये मुंबई हाई के समुद्री तेल के कुओं से आए थे. तब हमने इस बारे में अपनी रिपोर्ट तत्कालीन केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को सौंप दी थी. अब फिर से मंत्री बदल गए हैं. हम उनको भी लिखेंगे.”

कोबराल ने आगे कहा,

“इस बार टार पिछली बार से अलग है. हमें उन्हें फिर से टेस्ट करना होगा और रिपोर्ट केंद्र को भेजनी होगी. इसमें एक राज्य के तौर पर हमारा रोल बहुत सीमित है. मेरा मानना है कि ये सिर्फ गोवा ही नहीं बाकी पश्चिमी तट पर भी जमा हो रहे होंगे.”

मंत्री ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि इस बार कोरोना संकट के चलते समुद्री गतिविधियां भी काफी कम रही हैं, फिर भी टारबॉल बढ़े हैं. उन्होंने कहा,

“ऑयल टैंकर की आवाजाही कोरोना संकट की वजह से बहुत कम हुई है. इससे पहले अंदाजा लगाया गया था कि टार ऑयल टैंकर से आ रहा है. ये हैरान करने वाला है कि समुद्र में टैंकरों की कम गतिविधियों के बावजूद इतनी ज्यादा टारबॉल देखने को मिल रही हैं.

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तस्वीर Twitter@LauraLeeActor हैंडल से साभार है.

क्या ये सिर्फ गोवा में हो रहा है?

टारबॉल समंदर में एक बार बन जाएं तो आसानी से टूटते नहीं हैं. इस वजह से वो समंदर में कई सौ किलोमीटर का सफर कर जाते हैं. टारबॉल के केसेज भारत में छुटपुट ही सही, साल 2010 से देखे जा रहे हैं. ये पहली बार ज्यादा मात्रा में गोवा में ही नजर आए थे. हालांकि गोवा के अलावा दक्षिणी गुजरात, मैंगलौर और मुंबई के तटों पर भी टारबॉल दिखे हैं. मुंबई में तो अगस्त में टारबॉल दिखे, लेकिन काफी कम मात्रा में. अमेरिका में लॉस एंजिलिस के समुद्र तटों पर भी टारबॉल कई बार देखे गए हैं. हालांकि इस बार गोवा में टारबॉल की सबसे बड़ी मौजूदगी देखी जा सकती है.

भारत में फिलहाल ऐसी नौबत नहीं आई है कि किसी समुद्री तट को टारबॉल की वजह से बंद किया गया हो. लेकिन फिलहाल गोवा से लेकर दिल्ली तक अथॉरिटी टारबॉल संकट से निपटने का कोई पुख्ता उपाय नहीं खोज पाए हैं.


वीडियो – साउथ गोवा के इस छोटे से आईलैंड पर लोगों ने नौसेना को तिरंगा फहराने से मना क्यों कर दिया?

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