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FinCEN Files: मनी लॉन्ड्रिंग के शक में भारत से कौन-कौन अमेरिकी रडार पर है?

दुनियाभर में तमाम धन्नासेठ बोरा भर-भरके पैसा कमाते हैं. कमाई ज़्यादा, तो टैक्स भी ज़्यादा देना होता है. कमाई ‘कैसी’ है, इस पर भी चीजें बहुत निर्भर करती हैं. इसीलिए बड़े स्तर पर टैक्स चोरी भी होती है. अगर ‘काला धन’ है, तो उसे सफेद करने के लिए ये लोग तरह-तरह के तरीके अपनाते हैं. इसे ‘मनी लॉन्ड्रिंग’ कहा जाता है. विदेशों में शेल कंपनियां यानी फर्ज़ी कंपनियां बनाकर उनमें निवेश किया जाता है. स्विस बैंकों में पैसा जमा कराया जाता है. इस काम के लिए जो जगहें मुफीद होती हैं, उन्हें ‘टैक्स हैवेन’ कहा जाता है.

हमने कुछ पेपर्स के नाम सुन रखे हैं. परीक्षा वाले पेपर और अख़बार नहीं. पनामा पेपर्स, पैराडाइज पेपर्स वगैरह. ये वैश्विक स्तर पर मनी लॉन्ड्रिंग, टैक्स चोरी और आर्थिक गड़बड़ियों से जुड़ी जानकारियों के लीक हुए दस्तावेज हैं. इन्हीं में एक नाम और जुड़ा है- FinCEN Files.

पहले तीन क्विक सवाल-

ये क्या है?

2,100 से ज़्यादा लीक हुए गोपनीय दस्तावेज.

इन दस्तावेजों में क्या है?

साल 1999 से 2017 के बीच दुनिया के बैंकों की तरफ से अमेरिकी अधिकारियों को मनी लॉन्ड्रिंग, ड्रग डीलिंग, आर्थिक घोटालों केशक में  होने वाले संदिग्ध लेन-देन की जानकारी.

लेन-देन में कितना अनुमानित पैसा?

इस अवधि के दौरान संदिग्ध लेन-देन की राशि करीब 2.099 ट्रिलियन डॉलर यानी लगभग 150 अरब रुपए है.

अब विस्तार से

FinCEN Files नाम क्यों पड़ा? इसका भारतीय कनेक्शन क्या है? देश के कौन से बड़े नाम सामने आए हैं? 

ये धुआं कहां से निकला? 

संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) से लीक हुए इन दस्तावेजों पर इंडियन एक्सप्रेस  अख़बार ने एक सीरीज छापी है. 21 सितंबर को पहला भाग और 23 सितंबर को तीसरा भाग छपा. अख़बार ने अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों के समूह- इंटरनेशनल कंसॉर्टियम ऑफ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स (ICIJ) और बज़फीड न्यूज के साथ मिलकर FinCEN Files की छानबीन की है. ‘एक्सप्रेस’ की तरफ से रितु सरीन, श्यामलाल यादव, जय मजूमदार, संदीप सिंह और खुशबू नारायण ने इस पर काम किया है. पनामा पेपर्स और पैराडाइज पेपर्स के पीछे भी ICIJ था. इसके अलावा 88 देशों के 109 मीडिया संस्थानों ने भी FinCEN Files की इस छानबीन में भाग लिया. इनमें Le Monde (फ्रांस), NBC (यूएस), Suddeutsche Zeitung (जर्मनी), Asahi Shimbun (जापान), BBC जैसे नाम हैं.

FinCEN और SAR

अमेरिका में आर्थिक मामलों पर नज़र रखने और इन्हें रेगुलेट करने वाली सबसे बड़ी एजेंसी है- फाइनेंशियल क्राइम्स एनफोर्समेंट नेटवर्क. शॉर्ट में कहें तो FinCEN. इसका हेडक्वार्टर वर्जीनिया में है और ये कोष विभाग के तहत काम करती है. एजेंसी मनी लॉन्ड्रिंग, ड्रग डीलिंग और फाइनेंशियल फ्रॉड के मामले देखती है. इसे दुनिया की सबसे मजबूत आर्थिक रेगुलेटर भी कहते हैं.

FinCEN का लोगो. इस एजेंसी को दुनिया की सबसे मजबूत आर्थिक रेगुलेटर एजेंसी कहते हैं. फोटो: विकीमीडिया
FinCEN का लोगो. इस एजेंसी को दुनिया की सबसे मजबूत आर्थिक रेगुलेटर एजेंसी कहते हैं. फोटो: विकीमीडिया

इस एजेंसी को दुनियाभर के बैंक और वित्तीय संस्थाएं एक रिपोर्ट सौंपते हैं. इन्हें SAR या बहुवचन में SARs कहा जाता है. इसका फुलफॉर्म Suspicious Activity Report है. हिंदी में कहें, तो संदिग्ध गतिविधि रपट. ये रिपोर्ट एजेंसी में फाइल न करने पर ज़ुर्माना तक देना पड़ सकता है. इस गोपनीय रिपोर्ट में बैंकों की तरफ से उन खातों का ब्योरा दिया जाता है, जिनमें आपराधिक फंडिंग या डर्टी मनी शामिल होने का शक हो, संभावित मनी लॉन्ड्रिंग, आतंकी फंडिंग या ऐसे किसी ट्रांजेक्शन से जुड़ी जानकारी होती है, जिस पर शक हो.

1999 से 2017 के बीच बैंकों की तरफ से FinCEN को दिए गए 2,100 से ज़्यादा SARs को मिलाकर FinCEN Files नाम दिया गया है. 

रिपोर्ट का मतलब अपराध या आरोप नहीं

लेन-देन को लेकर बैंकों की तरफ से खातों पर नज़र रखी जाती है. अगर कोई ‘संदिग्ध गतिविधि’ हो रही है, तो इसे तय करने के कई तरीके हैं. जैसे- एक जैसा बड़ा अमाउंट कई किस्तों में भेजा जा रहा हो, पैसों का ऐसा ट्रांसफर, जिसमें शामिल लोगों के बीच स्पष्ट आर्थिक संबंध न दिखे, राजनीतिक व्यक्तियों के बीच का ट्रांजेक्शन, ऐसे लोगों के बीच ट्रांजेक्शन, जिनके बारे में मीडिया में नकारात्मक ख़बरें हों.

SAR का मतलब किसी पर आरोप लगाना या उसके ख़िलाफ़ अपराध की पुष्टि होना नहीं है. ये बस एक जरिया है कि आर्थिक गड़बड़ियों और अपराध को लेकर कानून से जुड़ी एजेंसियां सचेत रहें. FinCEN इन रिपोर्ट्स को फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (FBI), यूएस इमीग्रेशन और कस्टम्स को भी भेजा जाता है. रिपोर्ट की जानकारी खाताधारकों को नहीं होती.

मनी लॉन्ड्रिंग जैसी संदिग्ध गतिविधियों पर नज़र रखना बैंकों का काम है. FinCEN Files के बाद कई बैंकों पर भी सवाल उठ रहे हैं हालांकि बैंक का कहना है कि हमने ख़ुद ये जानकारी दी है. फोटो: India Today
संदिग्ध ट्रांजैक्शन पर नज़र रखना बैंकों का काम है. FinCEN Files के बाद कई बैंकों पर भी सवाल उठ रहे हैं. हालांकि बैंकों का कहना है कि हमने ख़ुद ये जानकारी दी है. फोटो: India Today

अमेरिका में जो काम FinCEN का है, वही भारत में फाइनेंशियल इंटेलीजेंस यूनिट (FIU-IND) का है. वित्त मंत्रालय के तहत इसे 2004 में बनाया गया था. इसका काम भी संदिग्ध आर्थिक लेन-देन की जानकारी रखना है. भारत में इसके लिए बैंकों की तरफ से कैश ट्रांजेक्शन रिपोर्ट्स (CTRs), सस्पीशियस ट्रांजेक्शन रिपोर्ट्स (STRs) और क्रॉस बॉर्डर वायर ट्रांसफर रिपोर्ट्स हर महीने भेजी जाती हैं.

भारत से FinCEN Files का कनेक्शन

बैंकों की तरफ से दिए गए SARs में भारत की कई बड़ी कंपनियों, इंडियन प्रीमयर लीग (IPL) स्पॉन्सर, हीरा कारोबारी और व्यक्तियों के नाम हैं. कुछ बड़े नामों के बारे में बताते हैं-

1. IPL का एक स्पॉन्सर

इस समय IPL संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में चल रहा है. लेकिन ये मशहूर क्रिकेट लीग भी FinCEN के रडार पर है. SAR में IPL को लेकर अमेरिका के एक बैंक, यूके की एक कम मशहूर कंपनी, एक IPL टीम के कोलकाता स्थित स्पॉन्सर का ज़िक्र है. सैंन फ्रांसिस्को स्थित वेल्स फार्गो बैंक ने अपनी रिपोर्ट में किंग्स इलेवन पंजाब चलाने वाली कंपनी केपीएच ड्रीम क्रिकेट का ज़िक्र किया है.

किंग्स इलेवन पंजाब की पैरेंट कंपनी केपीएच ड्रीम टीम के ट्रांजैक्शन का ज़िक्र SAR में किया गया है. फोटो: Wikimedia
किंग्स इलेवन पंजाब की पैरेंट कंपनी केपीएच ड्रीम टीम के ट्रांजैक्शन का ज़िक्र SAR में किया गया है. फोटो: Wikimedia

2. दाऊद का फाइनेंसर अल्ताफ खनानी

स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक, न्यूयॉर्क की तरफ से दाखिल रिपोर्ट में पाकिस्तान के एक नागरिक अल्ताफ खनानी का नाम है, जो कथित तौर पर दाऊद इब्राहिम का फाइनेंसर है. खनानी के मनी लॉन्ड्रिंग संगठन और अल ज़रूनी एक्सचेंज के बीच दशकों तक ड्रग्स और अल कायदा, हिजबुल्ला, तालिबान जैसे संगठनों के लिए 14 बिलियन डॉलर से 16 बिलियन डॉलर का लेन-देन हुआ.

दाऊद इब्राहिम के फाइनेंसर का नाम SAR में शामिल है. दाऊद की फाइल फोटो: India Today
दाऊद इब्राहिम के फाइनेंसर का नाम SAR में शामिल है. दाऊद की फाइल फोटो: India Today

3. जिंदल स्टील

डायचे बैंक ट्रस्ट कंपनी अमेरिकास (DBTCA) की तरफ से फाइल की गईं तीन रिपोर्ट में जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड (JSPL) के लेन-देन का ज़िक्र है. इस कंपनी की तरफ से 24 नवंबर, 2014 से 28 जनवरी, 2015 के बीच मॉरीशस, जर्मनी, यूके में पैसा भेजा गया और दुबई, स्विट्ज़रलैंड में इसी अवधि में पैसा लिया गया.

SAR में कहा गया है कि जिंदल स्टील एंड पॉवर लिमिटेड की तरफ से कई संदिग्ध लेन-देन किए गए. फोटो:
SAR में कहा गया है कि जिंदल स्टील एंड पॉवर लिमिटेड की तरफ से कई संदिग्ध लेन-देन किए गए.

4. अडानी ग्रुप की कंपनी

‘इंडियन एक्सप्रेस’ के मुताबिक, बैंक ऑफ न्यूयॉर्क मेलन (BNYM) की तरफ से दाखिल की गई रिपोर्ट में अडानी ग्रुप की सिंगापुर स्थित अडानी ग्लोबल पीटीई का नाम है. बैंक ने 2005 से 2014 के बीच सेशेल्स में कई शेल कंपनियों यानी फर्जी कंपनियों के ट्रांजेक्शन की बात भी की है. कहा गया कि अडानी ग्लोबल पीटीई को भी सेशेल्स से पैसा भेजा गया. ‘इंडियन एक्सप्रेस’ से बातचीत में अडानी ग्रुप के प्रवक्ता ने इस लेन-देन को वैध बताया है.

अडानी ग्रुप के मुखिया गौतम अडानी. फोटो: India Today
अडानी ग्रुप के मुखिया गौतम अडानी. फोटो: India Today

5. मैक्स ग्रुप

22 सितंबर को इस इन्वेस्टिगेशन के तीसरे भाग में ‘एक्सप्रेस’ ने छापा है कि मैक्स ग्रुप के फाउंडर और चेयरमैन अनलजीत सिंह से जुड़ी कंपनियों से 100 से ज़्यादा ट्रांजेक्शन किए गए, जिनकी वैल्यू 104.4 मिलियन डॉलर है. स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक, न्यूयॉर्क की तरफ से इसकी जानकारी FinCEN को दी गई. ये लेन-देन जुलाई, 2014 से नवंबर, 2016 के बीच के हैं, जो भारत के अलावा साइप्रस, संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर, साउथ अफ्रीका जैसे देशों में स्थित कंपनियों के बीच हुए. इनमें से कुछ कंपनियों में अनलजीत सिंह डायरेक्टर हैं.

मैक्स ग्रुप के कर्ता-धर्ता अनलजीत सिंह. फोटो: विकीमीडिया
मैक्स ग्रुप के कर्ता-धर्ता अनलजीत सिंह. फोटो: विकीमीडिया

6. स्मगलर सुभाष कपूर से लिंक

कुछ ऐसी कंपनियों और लोगों के नाम भी हैं, जिनके तार एंटीक सामानों की स्मगलिंग करने वाले सुभाष कपूर से जुड़े हैं. चोरी की गई आर्ट की कीमती चीजों की डीलिंग सुभाष कपूर की गिरफ्तारी के बाद भी जारी रही. 20 मार्च, 2017 को स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक, न्यूयॉर्क की तरफ से सौंपे गए SAR में स्मगलिंग और बहुमूल्य चीजों की खरीद-फरोख्त करने वालों में सुभाष कपूर समेत 17 लोगों का नाम था.

FinSEN Files में कई संदिग्ध लेन-देन सामने आने के बाद प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की तरफ से जांच करने की बात कही गई है.


पैराडाइज़ पेपर्स लीक करने वाला ये अखबार दीवालिया होने जा रहा था

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