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क्या कोरोना वायरस वुहान की लैब से ही लीक हुआ था?

दोस्त ग़मख्वारी में मेरी सई फ़रमायेंगे क्या? ज़ख़्म के भरने तलक नाख़ुन न बढ़ आयेंगे क्या? कोविड का ज़ख़्म है. जब भी लगता है कुछ भरेगा, कोविड के नाखून और तेज हुए जा रहे हैं. पिछले दो सालों से दुनिया कोविड के नासूर को सह रही है. पहली वेव अल्फ़ा वेरिएंट. लगा उससे छुटकारा मिल गया है तो दूसरी और तीसरी लहर में डेल्टा वेरिएंट. और अब ऑमिक्रान. टर्मिनेटर की तरह हर नई फ़िल्म में नई शक्तियां. और नष्ट करना और भी मुश्किल.

पिछले दिनों रिलीज़ हुए एक सर्वे में जब पूछा गया कि लोग नए वेरिएंट से कितने चिंतित हैं. तो अधिकतर लोगों ने जवाब दिया, चिंतित नहीं है. पहली नज़र में  ओवरकॉन्फ़िडेन्स की तरह दिखाई देने वाला ये जवाब दरअसल इतना सिम्पल नहीं है. शुरुआती जांच से तो यही लगता है कि ऑमिक्रान डेल्टा जितना मारक नहीं है. अधिकतर शुरुआती स्टडीज़ ने इसकी पुष्टि की है. लोगों के चिंतित ना होने वाले जवाब का एक कारण तो यही है. लेकिन एक दूसरा कारण भी है.

अंग्रेज़ी में इसके लिए दो शब्द हैं, पैंडेमिक फटीग. हिंदी में इसका तर्जुमा बात को उतना क्लियर नहीं करता. फिर भी कहेंगे तो कहेंगे- महामारी से होने वाली थकान.

यूं तो कोविड के बाद लम्बे समय तक रहने वाली थकान बनी रहती है. लेकिन पैंडेमिक फटीग से आशय अलग है. लोग थक चुके हैं बीमारी से डरते डरते. वो किसी फ़िल्म का डायलॉग है, इतना भी मत डराओ कि डर ख़त्म हो जाए.

2 साल तक वैक्सीन, मास्क लगाना, हाथ धोना. लोग थक चुके हैं ये सब करते करते. इसलिए जब लोग कहते हैं कि वो आमिक्रॉन से चिंतित नहीं है तो इसका एक आशय यह भी है कि भाई कब तक चिंता करते रहेंगे.

लेकिन ऑमिक्रान के चलते चिंता ना सही ‘एक्स्ट्रीम सावधानी’ आवश्यक हो चुकी है. शुरुआती जांच में डेल्टा से कम मारक दिखाई देने वाला ऑमिक्रान कहीं बड़ी तबाही ला सकता है. क्यों?

साथ ही बात आमिक्रॉन को लेकर दुनियाभर से आ रही खबरों की. जिसमें भारत के लिए ख़तरे की घंटी है. आस-पड़ोस बीमार हो तो अपना घर कब तक बीमारी से सुरक्षित रह सकता है

कोविड से अब तक लाखों लोग मर चुके हैं. अर्थव्यवस्था के बड़े-बड़े विश्लेषण छोड़ भी दें तो भी लोगों को पेट्रोल और तेल के दामों में इसका असर अपने घर में दिख रहा है. ब्रिटेन, अमेरिका और भारत में मुद्रास्फीति में रिकॉर्ड बढ़त हुई है.

इस सब के बावजूद हम ये नहीं जान पाए हैं कि इस सबकी शुरुआत कैसे हुई. कहां से आया कोरोना. सिर्फ़ मोटामोटी एक जवाब मिल पाया है कि वुहान से इसकी शुरुआत हुई. लेकिन कैसे? ये सवाल ज्यों का त्यों बना हुआ है. आधिकारिक रूप से अभी तक कोविड के स्त्रोत की पुष्टि नहीं हुई है.

इसी साल अक्टूबर में अमेरिकी ख़ूफ़िया एज़ंसी ने एक रिपोर्ट जारी की थी. जिसके एक हिस्से में कहा गया, एज़ंसी को सीमित कॉन्फ़िडेन्स कि कोविड-19 लैब से लीक हुआ हो सकता है. इसके अलावा अमेरिकी इंटेलीजेंस ने हाथ खड़े कर दिए. उन्होंने कहा कि शायद हम कभी पता ना लगा पाएं कि कोविड की शुरुआत कैसे हुई.

दुनियाभर के वैज्ञानिक अभी भी इस खोज़ में लगे हुए हैं. इस मामले में कनाडा की एक molecular biologist बुधवार को ब्रिटिश संसद, हाउस ऑफ़ commons में पेश हुई. डॉक्टर अलीना चैन ने क्रॉस पार्टी पेनल के सामने बताया कि वाइरस के ओरिजिन के लिए लैब से लीक होने की सम्भावना सबसे ज़्यादा  है. जब उनसे पूछा गया कि वो इस मामले में कितनी आश्वस्त हैं तो उन्होंने जवाब दिया,

ये समय का मसला है. जो लोग इस महामारी के ओरिजिन के बारे में जानते हैं, उनके लिए सामने आना अभी सुरक्षित नहीं है. हो सकता है 5 साल बाद या शायद 50 साल बाद इसके बारे में पता चले. हम ऐसे दौर में रह रहे हैं जहां हर चीज़ का बहुत सारा डेटा उपलब्ध है. बस इस देता की सिलसिलेवार ढंग जाने की जांच किए जाने की ज़रूरत है. और हम कोविड के स्त्रोत तक पहुंच जाएंगे.

यह पूछे जाने पर कि क्या वाइरस को लैब में मॉडिफ़ाई किया गया था. डॉक्टर चैन ने जवाब दिया,

अधिकतर टॉप वायरॉलॉजिस्ट ने इस बात की सम्भावना से इनकार नहीं किया है. और इसमें वो भी शामिल हैं,जिन्होंने खुद ऐसा करने का प्रयास किया था.

उन्होंने आगे कहा,

हमें पता है कि इस वाइरस में एक यूनीक फ़ीचर हैं.furin cleavage site,जिसके कारण ये माहमारी के रूप में फैला है. अगर ये नहीं होता तो महामारी इतनी बड़ी ना होती.

इसी साल सितम्बर में इकोहेल्थ अलायंस नाम की एक कम्पनी wuhan इन्स्टिटूट ऑफ़ वायरोलॉजी के सम्पर्क में थी. दोनों के बीच प्रस्ताव बना था था कि वाइरस में नोवेल furin cleavage sites जोड़ी जाएं. इसलिए इस बात की आशंका और बड़ी हो जाती है कि वाइरस लैब से लीक हुआ हो.

वाइरस के नेचुरल ओरिजिन के बारे में उन्होंने कहा,  इस बात के अभी तक कोई सबूत नहीं मिले है कि वाइरस जानवरों से फैला है. furin cleavage sites की मौजूदगी के चलते अगर कोई दावा करता है कि वाइरस लैब से लीक नहीं हुआ, तो उसे ये प्रूव करना होगा कि नेचुरल वाइरस में ये साइट्स कहां से आई.

कोविड के स्त्रोत का पता लगाने के लिए जहां दुनियाभर के वैज्ञानिक लगे हुए हैं. वहीं चीन, जिसके पास इसका सारा डेटा है. वो चुप्पी साधे हुए है.

चीन ने ना कभी शुरुआती केसों का डेटा रिलीज़ किया. और साथ ही वुहान वायरोलॉजी लैब तक पहुंच को भी सीमित रखा. लॉजिक का सिद्धांत है कि अगर किसी चीज़ का कारण या मनोभाव समझ ना आए तो देखा जाना चाहिए कि इससे फ़ायदा किसे हो रहा है. साफ़ दिखता है कि फ़ायदा चीन को है.

अब चलतें हैं कोविड से आ रही दुनियभर की खबरों पर. ख़ासकर लेटस्ट वेरिएंट ऑमिक्रान की खबरों पर.

इसी हफ़्ते साउथ अफ़्रीका में ऑमिक्रान पर वैक्सीन के असर को लेकर परीक्षण किया गया. पता चला कि जॉनसन एंड जॉनसन वैक्सीन का ऑमिक्रान पर लगभग ना के बराबर असर हो रहा है. वैज्ञानिकों के अनुसार एंटीबॉडी बन रही हैं, लेकिन इतनी नहीं कि ऑमिक्रान को न्यूट्रीलाइज़ कर सकें. कोविड के ख़िलाफ़ एक मात्र हथियार है वैक्सीन. इसलिए दुनिया भर के वैज्ञानिक वैक्सीन के असर को जांचने में जुटे हुए हैं.

हांग-कांग यूनिवर्सिटी से वैक्सीन को लेकर एक और चिंताजनक खबर आ रही है. 25 लोगों पर हुए परीक्षण में सामने आया कि इनमें से साइनोवैक और बायोएनटेक वैक्सीन भी आमिक्रॉन पर प्रभावी असर नहीं डाल पा रही रही हैं. जिसके चलते वैक्सीन के दो डोज़ का असर सिर्फ़ 20-25 % रह गया है. टेक्निकल भाषा में इसे वैक्सीन efficiency कहा जाता है. जो डेल्टा वेरिएंट पर लगभग 70% थी.

चिंता की बात ये है कि साइनोवैक चाइना की वैक्सीन है. जिसे अधिकतर अफ्रीकी देशों को दिया गया है.

अमेरिका में भी स्वास्थ्य विभाग से लगातार चेतावनी जारी की जा रही हैं.  व्हाइट हाउस के चीफ़ मेडिकल एड़वाजर डॉक्टर ऐन्थनी फ़ाउची का कहना है कि फ़ाइज़र और बायोएनटेक वैक्सीन की दो डोज़ का असर कम हो गया है. आमिक्रान से पहले दो डोज़ से 80% सुरक्षा मिल रही थी. जो अब 33 % रह गई है. इसलिए बूस्टर डोज़ की सख़्त आवश्यकता है.

अमेरिका में 61% लोगों को वैक्सीन की दो डोज़ और 27% को बूस्टर डोज़ लग चुकी है.

इसके बावजूद पिछले एक हफ़्ते में 68000 लोगों को हॉस्पिटल में भर्ती करना पड़ा है. पिछले दो हफ़्तों में ये 21% बढ़त है. शुरुआती जाँच में पता लगा है कि ऑमिक्रान की फैलने की रफ़्तार डेल्टा से बहुत तेज है. ऑमिक्रान के केसों की संख्या हर दो दिन में दोगुनी हो रही है. डेल्टा में ये रेट 7-10 दिन के बीच था.

दूसरी दुनिया यानी यूरोप भी आमिक्रॉन की आहट से घबराया हुआ है. बुधवार को UK में कोविड के 78 हज़ार मामले रिकॉर्ड किए गए. और फ़्रांस में ये संख्या लगभग 63 हज़ार है.  कोविड की शुरुआत से ये अब तक ये एक दिन में रिकॉर्ड किए सबसे ज़्यादा मामले हैं. पिछले साल जनवरी में जब ब्रिटेन में कोविड पीक पर था. तब ये संख्या 60 हज़ार थी. ब्रिटेन में अभी तक 1 करोड़ दस लाख लोग कोविड पॉज़िटिव टेस्ट हो चुके हैं. कुल जनसंख्या का लगभग 20 %.

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने आगाह किया है कि कोविड की जल्द ही एक नई लहर आ सकती है. जिसके सामने पुरानी लहरें बौनी साबित होंगी. हालांकि उनकी अपनी संसद से उन्हें प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है. मंगलवार को 100 से ज़्यादा सांसदों ने महामारी के और सख़्त उपायों के विरोध में वोट दिया था.

UK हेल्थ एजेन्सी के चीफ़ एक्जक्यूटिव जेनी हेरिज ने बयान दिया है कि आमिक्रॉन कोविड की सबसे बड़ी चुनौती के रूप में सामने आ सकता है.

ब्रिटेन में अभी तक आमिक्रॉन के 10 हज़ार मामले सामने आ चुके हैं. जिसमें से 10 लोगों को हॉस्पिटल में भर्ती होना पड़ा और 1 की मृत्यु हुई. लंदन शहर में जल्द ही आमिक्रॉन डेल्टा को पिछाड़ते हुए मुख्य स्ट्रेन बन सकता है.

अब सवाल ये कि अगर आमिक्रॉन डेल्टा से कम मारक है, तो फिर दुनिया में इतनी चिंता क्यों ज़ाहिर की जा रही है. इसका जवाब दिया है इंग्लैंड के डेप्युटी चीफ़ मेडिकल ऑफ़िसर वैन टैम ने. वो भी एक फ़ुटबाल एनालॉजी से. उन्होंने कहा,

हमने 11 लोगों की टीम से इस गेम की शुरुआत की. फिर अल्फ़ा और डेल्टा वेरिएंट आए. जो शुरुआती वाइरस से थोड़ा अलग थे. इन वेरिएंट ने हमारे एक दो खिलाड़ियों को घायल किया. जिस कारण हमें सबस्टिट्यूट प्लेयर्स का उपयोग करना पड़ा.

ताकि हम खेल में बने रह सकें. हमारे पास वैक्सीन हैं, और इसके चलते हम अभी भी खेल में बने हुए हैं. आमिक्रॉन का आना ऐसा है मानो हमारे एक-दो मज़बूत खिलाड़ियों को येलो कार्ड दिखाया जाए. सम्भव है कि इससे ज़्यादा दिक़्क़त ना हो. लेकिन अगर इनमें से एक भी कार्ड रेड में तब्दील तो गया तो.

हमें दस खिलाड़ियों के साथ खेलना पड़ेगा. और जैसा कि फ़ुटबॉल में होता है  तब 10 खिलाड़ियों को अपना 120 % देना होगा. इसका मतलब है सावधानी और बूस्टर डोज़. हम लाल कार्ड मिलने का इंतज़ार नहीं कर सकते. इसलिए हम सभी से अभी से अपना पूरा योगदान देना होगा. इनके सीनियर चीफ़ मेडिकल ऑफ़िसर क्रिस व्हिटी ने कहा है,  हम अभी आमिक्रॉन के बारे में सब कुछ नहीं जानते. लेकिन जितना भी जानते हैं वो डरावना है.

ये बहुत सीरियस ख़तरा है और इसलिए हम सभी डरे हुए हैं. जिसकी मुख्य वजह है इसके फैलने की स्पीड. सारे अस्पताल अभी से भरे हुए हैं और स्टाफ़ थक चुका है.

वैक्सीन अभी भी कुछ हद तक कारगर हैं. ख़ासकर बूस्टर डोज़. इस चलते हम अभी भी इस नए स्ट्रेन से लड़ सकते हैं. लेकिन हमें वैक्सीन की रफ़्तार बढ़ानी होगी.

रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार रिसर्चर्स ने बताया है कि ऑमिक्रान डेल्टा के मुक़ाबले फेफड़ों में कम रफ़्तार से मल्टिप्लाई होता है. लेकिन इसके फैलने की रफ़्तार डेल्टा से 70 गुना ज़्यादा है.

अब थोड़ा गणित से समझते हैं. आमिक्रॉन चाहे कम मारक हो लेकिन इसके फैलने की रफ़्तार बहुत तेज़ है. अभी तक पूरी दुनिया के 77 देशों में ऑमिक्रान के केस मिल चुके हैं. आधी से ज़्यादा दुनिया अभी भी अनवैक्सिनेटेड है. वैक्सीन की दो डोज़ भी ऑमिक्रान पर कम असर कर पा रही हैं. और वो भी कम ही लोगों को लग पाई हैं.

ऐसे में जिन्हें वैक्सीन नहीं लगी है अन पर आमिक्रॉन का ख़तरा बहुत ज़्यादा है. साथ ही वाइरस जितना ज़्यादा फैलेगा, उसके उतने नए स्ट्रेन डिवेलप होंगे. और कौन सा स्ट्रेन कमर तोड़ के रख दे कहा नहीं जा सकता. डेल्टा की तबाही के बाद हॉस्पिटल कमोबेश बेहतर तैयार हैं. लेकिन स्टाफ़ के लिए बार-बार इतनी बड़ी लहरों को सम्भालना मुश्किल होता जाएगा. और 70 गुना रफ़्तार से फैलने वाले वाइरस में अगर 1% लोगों को भी हॉस्पिटल में भर्ती करना पड़ा तो ये संख्या करोड़ों में होगी.

दूसरी समस्या वैक्सीन असमानता को लेकर है.

WHO के अनुसार 41 देश अभी भी अपनी आबादी के 10% का टीकाकरण नहीं कर पाए हैं. वहीं 98 देश 40% तक नहीं पहुंचे हैं. कहीं तीसरी डोज़ लग रही है तो कहीं पहली भी नहीं लग पाई है. ऑमिक्रान से एक बड़ा ख़तरा ये भी है कि इससे वैक्सीन की जमाख़ोरी शुरू हो सकती है. जो देश अब तक वैक्सीन बांट रहे थे. वो थर्ड डोज़ के चक्कर में जमाख़ोरी शुरू कर देंगे. इसीलिए चाहे ऑमिक्रान डेल्टा से कम मारक हो. ये उससे कहीं ज़्यादा ख़तरनाक है.


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