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विश्वनाथन आनंद: वो चेस प्लेयर जिसके आगे टीवी वालों ने हाथ जोड़ लिए थे

दो रंग. दो खिलाड़ी. 32 गोटियां. 64 खाने. हर नई चाल में मात देने की जद्दोजहद. चेस और विश्वनाथन आनंद एक सड़क के दो किनारे की तरह हैं. एक किनारा बिछड़े तो दूसरा बेरंग हो जाए. सड़क न रह जाए. इस खेल की शुरुआत का श्रेय भारत को मिलता है. सातवीं सदी के दौरान भारत में गुप्त वंश का राज था. उसी दौरान चतुरंग नामक एक खेल अस्तित्व में आया. इसमें राजा, मंत्री, सिपाही, हाथी जैसे मोहरे होती थीं. यही खेल विकसित होकर चेस के तौर पर जाना गया.

तमिलनाडु का एक शहर है मयीलाडुतरै. यहीं 11 दिसंबर 1969 को आनंद का जन्म हुआ. इस साल वो उम्र का पचासा पूरा कर रहे हैं. आनंद की शुरुआती परवरिश चेन्नई में हुई. आनंद के पिता इंडियन रेलवे में थे. तो उनको घूमने का खूब मौका मिला. विश्वनाथन आनंद को आनंद विश्वनाथन कहलाना पसंद है. ये उनके नाम का सही ऑर्डर भी है. प्यार से उनको लोग विशी कहकर बुलाते हैं. 

गेम में 60-70 चाल आगे की सोचने वाले आनंद की कहानी कुछ ऐसी है-

मां ने सिखाया चेस

Anand Wife And Mother
मां और पत्नी के साथ आनंद.

मां की सीख आगे के जीवन की बुनियाद रखती है. उनकी मां अच्छा खेलती थीं, लेकिन उन्हें कभी अपना टैलेंट दिखाने का मौका नहीं मिला. आनंद के भाई और बहन घर में चेस खेलते थे. उन्होंने चेस सिखाने की जिद की. आनंद को उम्र का पहला ककहरा चेस के रूप में मिला. 6 साल की उम्र में पहली बार शह-मात दे रहे थे. फिर तो आनंद को इस खेल का ऐसा चस्का लगा कि छूटा ही नहीं.

फिर एक दिन देश से बाहर जाना पड़ा. पिता विश्वनाथन कृष्णमूर्ति को फिलीपींस में काम करने का ऑफ़र मिला था. आठ साल की उम्र में आनंद मनीला पहुंचे. वहां उनकी चेस की क्लास लगी. उनकी मां रोज उनको छोड़ने जाती थी. और क्लास खत्म होने तक क्लब के बाहर इंतज़ार करतीं. यही उनके स्टार बनने की नींव थी.

जब टीवी वालों ने हाथ जोड़ लिए

मनीला में टीवी पर चेस का एक प्रोग्राम आता था. घंटे भर का. चेस की बारीकियां बताई जाती थीं. और अंत में होता था एक कॉन्टेस्ट. आनंद बहुत बारीकी से वो प्रोग्राम देखते थे. कॉन्टेस्ट में अपनी एंट्री भेजते और जीत भी जाते थे. प्राइज़ में चेस की एक किताब मिलती थी. ऐसा 8-9 बार हुआ. फिर एक दिन उन्हें स्टूडियो से बुलावा आया.

Anand Son
अपने बेटे अखिल के साथ आनंद विश्वनाथन.(फोटो : ट्विटर)

वो लोग आनंद को अपनी लाइब्रेरी में ले गए. और बोले,

यहां से जितनी किताबें ले जा सकते हो, ले जाओ. लेकिन प्लीज, आज के बाद एंट्री मत भेजना. हमें पता है कि तुम्हारे अलावा कोई और ये शो नहीं देखता है.

बेटा, एक सलाह देता हूं

एक इंटरव्यू में उन्होंने एक दिलचस्प किस्सा बताया. वो एक बार ट्रेन में सफ़र कर रहे थे. गपशप चल रही थी.

पास बैठे शख्स ने उनसे पूछा,

बेटा, तुम करते क्या हो?

आनंद ने कहा,

मैं चेस खेलता हूं.

उस व्यक्ति ने सवाल दुहराया.

वो सब तो ठीक है, लेकिन तुम करते क्या हो?

आनंद ने फिर जवाब दिया,

‘मैं रेगुलर चेस खेलता हूं.’

उस आदमी ने कहा,

‘बेटा, एक सलाह देता हूं. अगर तुम विश्वनाथन आनंद नहीं हो तो तुम्हें कोई ढंग का काम करना चाहिए.’

अगर चेस न खेलते तो क्या करते आनंद?

सिमी ग्रेवाल ने ये सवाल अपने इंटरव्यू में आनंद से पूछा था.

अगर आप चेस प्लेयर नहीं होते तो क्या करते?

आनंद ठिठके. कुछ सेकेंड्स की चुप्पी के बाद वो बोले,

मैं इस बारे में सोच भी नहीं पाता.

ट्विटर पर उनके बायो में लिखा है – द किंग. वो इस बोर्ड गेम के बेताज बादशाह हैं.

Anand Twitter
टाइगर ऑफ़ मद्रास के नाम से मशहूर हैं आनंद.

इतिहास में जाएं तो चेस के खेल में सोवियत खिलाड़ियों का दबदबा होता था. बॉबी फिशर अमेरिका से आए. 60 के दशक में वर्ल्ड चेस चैंपियन बने. एशिया से ये कारनामा विश्वनाथन आनंद ने किया. पांच वर्ल्ड चेस चैंपियनशिप का खिताब उनके खाते में दर्ज है. लगातार 21 महीनों तक वर्ल्ड चेस रैंकिंग में पहले स्थान पर रह चुके हैं. आनंद के खाते में कई फर्स्ट का रिकॉर्ड भी दर्ज है. वो देश के पहले ग्रैंडमास्टर हैं. राजीव गांधी खेल रत्न अवॉर्ड. देश में खिलाड़ियों को दिया जाने वाला सबसे बड़ा पुरस्कार. शुरुआत 1991 में हुई. पहला खिताब मिला विश्वनाथन आनंद को. 2007 में उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से नवाजा गया.

अंत में यही कहेंगे कि चेस के बिना आनंद अधूरे होते और आनंद के बिना चेस अधूरा लगता है. यही इस खिलाड़ी की कमाई भी है. 


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