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'कम्पनी बाग़ के मुहाने पर धर रखी गई है यह 1857 की तोप'

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आज़ादी से 10 दिन पहले आ गए दुनिया में. 5 अगस्त 1947. जगह-गढ़वाल, उत्तराखंड. नाम-वीरेन डंगवाल. पाब्लो नेरूदा, बर्टोल्ट ब्रेख्त और वास्को पोपा की लिखी कालजयी रचनाओं का अनुवाद किया. ख़ुद इनकी रचनाओं का अनुवाद भी बांग्ला, मराठी, पंजाबी, अंग्रेज़ी, मलयालम और उड़िया में छपा. ख़ूब लिखा और बड़े अख़बार के संपादक भी रहे.

ज़िंदगी को जिस बारीक नज़र से इन्होंने देखा वो इनकी रचनाओं में झलकता है. समोसे पर यूं लिखा कि मुंह में आलू का तीख़ापन आ जाए. जिस शहर से गुज़रे उसे निगाह और ज़ेहन दोनों में बसाए रखा. इनके शब्दों की रेल कानपुर, इलाहाबाद, फैज़ाबाद, अयोध्या, नैनीताल, नागपुर होते हुए न जाने कहां-कहां रुकती है. कभी प्रेम का स्टेशन आता है तो कभी 1857 की क्रांति हुंकार भरती है.

आज हैप्पी बर्थडे है वीरेन जी का. अख़बार के संपादक होने के नाते ख़बरों की भूख को बख़ूबी समझते रहे. उनकी दो कविताएं यहां मिलेंगी आपको.


तोप

कम्पनी बाग़ के मुहाने पर
धर रखी गई है यह 1857 की तोप

इसकी होती है बड़ी सम्हाल
विरासत में मिले
कम्पनी बाग की तरह
साल में चमकायी जाती है दो बार

सुबह-शाम कम्पनी बाग़ में आते हैं बहुत से सैलानी
उन्हें बताती है यह तोप
कि मैं बड़ी जबर
उड़ा दिए थे मैंने
अच्छे-अच्छे सूरमाओं के छज्जे
अपने ज़माने में

अब तो बहरहाल
छोटे लड़कों की घुड़सवारी से अगर यह फारिग हो
तो उसके ऊपर बैठकर
चिड़ियां ही अक्सर करती हैं गपशप
कभी-कभी शैतानी में वे इसके भीतर भी घुस जाती हैं
ख़ासकर गौरैयें

वे बताती हैं कि दरअसल कितनी भी बड़ी हो तोप
एक दिन तो होना ही है उनका मुंह बन्द!
————————————————————-

पत्रकार महोदय

‘इतने मरे’
यह थी सबसे आम, सबसे ख़ास ख़बर
छापी भी जाती थी
सबसे चाव से
जितना खू़न सोखता था
उतना ही भारी होता था
अख़बार.

अब सम्पादक
चूंकि था प्रकाण्ड बुद्धिजीवी
लिहाज़ा अपरिहार्य था
ज़ाहिर करे वह भी अपनी राय.
एक हाथ दोशाले से छिपाता
झबरीली गरदन के बाल
दूसरा
रक्त-भरी चिलमची में
सधी हुई छ्प्प-छ्प.

जीवन
किन्तु बाहर था
मृत्यु की महानता की उस साठ प्वाइंट काली
चीख़ के बाहर था जीवन
वेगवान नदी सा हहराता
काटता तटबंध
तटबंध जो अगर चट्टान था
तब भी रेत ही था
अगर समझ सको तो, महोदय पत्रकार.


ये कविता ‘कविता कोश’ से ली गई है.


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