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15 अगस्त पर असम की जिस तस्वीर को सबने सराहा, उसे देखकर मैं निराश हूं

ये ऊपर दिखाई गई तस्वीर घूम रही है. असम की बताई जा रही है. बाढ़ के पानी में दो बच्चे लगभग गले तक डूबे हैं. सामने एक लंबे से डंडे पर झंडा लगा है. साथ में एक अधेड़ उमर का और एक वयस्क खड़ा है. चारों झंडे को सलामी दे रहे हैं.

15 अगस्त की सुबह (पढ़ें दोपहर) आंख खुली तो मोबाइल पर सबसे पहले यही तस्वीर दिखी. जनता जनार्दन गच्च थी. धड़ल्ले से शेयर कर रही थी. शेयरिंग और लाइक जारी है.

मेरे लिए वो तस्वीर एक निराशा से भर देने वाली तस्वीर थी. इससे पहले कोई भी इतना ही पढ़ने के बाद “गद्दार मादर**” कमेंट करने के लिए पिल पड़े तो उसे बता दूं कि 26 जनवरी (साल याद नहीं. 3-4 साल पहले की बात होगी शायद) की शाम टेम्पो में आगे की सीट पर आधा पुट्ठा बाहर लटकाए हुए चलते वक़्त सड़क पर पड़े झिल्ली वाले झंडे को टेम्पो रुकवाकर उठाने जाने जैसा काम मैंने किया है. लेकिन वो इसलिए था क्यूंकि ऐसा बिना किसी को कोई भी नुकसान पहुंचाए मैं कर सकता था. मेरे ऐसा करने से न किसी को शारीरिक कष्ट हो रहा था और कम से कम मेरी जानकारी में न ही कोई मानसिक कष्ट. लेकिन बाढ़ के पानी में यूं खड़े हो जाना क्या है?


कहा जाता है कि झंडा, राष्ट्रगान वगैरह सभी एक सिम्बल हैं. प्रतीक चिन्ह हैं. इस सिम्बल को क्या से क्या बना दिया? पिच्चर शुरू होने से पहले थियेटर में राष्ट्रगान का वीडियो आता है. सभी ने देखा होगा. बर्फ़ में बर्फ़ हुए जा रहे सैनिक खड़े होकर झंडे को सलामी दे रहे हैं. उनका गुणगान वो वीडियो करता है. उन सैनिकों को स्किप कर दिया जाता है जो ‘नॉर्मल’ जगह पर खड़ा झंडे को सलामी दे रहा होता है. असल में झंडा, राष्ट्रगान और निर्दयी परिस्थितियां एक बढ़िया कॉकटेल बनाकर देते हैं. ये उन्हें भी मालूम है जिसने वीडियो बनाया. कोई तो वजह रही ही होगी जो वो वीडियो वैसा बनाया गया. एक टीम बैठी होगी और ये डिसाइड किया गया होगा कि हम यही दिखायेंगे. क्यूं? क्यूंकि ऐसे वीडियो से धमनियों में खून तेज़ दौड़ता है. अंगूठा शेयर बटन की ओर बढ़ता है.


 

2011 वर्ल्ड कप फाइनल में जब जीत अपनी लगने लगी थी तो स्टेडियम में मौजूद 55,000 लोग वंदे मातरम गा रहे थे. मैच की उस कठिन सिचुएशन में वंदे मातरम का वीडियो एड्रेनलिन रश देता है. ए.आर. रहमान वाले वंदे मातरम के वीडियो में खुद भयानक रेगिस्तान में झंडा गाड़ने को आतुर जनता दिखती है.

मैं खुद से अब भी इस बात पर लड़ रहा हूं कि कथित प्रतीक चिन्हों को लेकर ये दीवानापन सही है या नहीं. या सही और गलत के बीच कुछ है. लेकिन पानी में लगभग डूबने की स्थिति में आये बच्चों को (सिर्फ बच्चे ही नहीं, बड़े भी) झंडे को सलामी देना मुझे कचोटता है.

सभी बह जाएंगे, झंडा लहराता रहेगा. मंत्री जी हेलीकॉप्टर से निरीक्षण करेंगे. उन्हें पानी के बीच झंडा दिखेगा. देश सारे जहां से अच्छा हो जाएगा. देश की धरती सोना उगलने लगेगी. प्यारे वतन पर दिल कुर्बान हो जाएगा. जो शहीद हुए हैं उनकी कुर्बानी याद की जाएगी. जय हिंद हो जाएगा. भारत माता की भी जय हो जाएगी.


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