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1232km: कोरोना काल में एक असम्भव सफ़र की कहानी

पत्रकार फ़िल्मकार और लेखक विनोद कापड़ी की हाल में किताब आई है. किताब का नाम है 1232 किमी. कोरोना महामारी के चलते 2020 में लगाए गए लॉकडाउन के दौरान घर लौटने के लिए 1232 किमी का सफ़र सात मजदूरों ने साइकिल से तय किया. इसी सफ़र का हाल बयां करती है विनोद कापड़ी की यह नई किताब. पेश हैं इस किताब के कुछ अंश.


स्कूल का हैंडपंप काम कर रहा था. सबने पानी पिया और अपनी-अपनी बोतलों में भर भी लिया. पता नहीं आगे फिर कहाँ पानी मिले! जब सबने भर पेट पानी पीकर प्यास बुझा ली तब आशीष ने खिचड़ी वाला झोला खोल लिया.

“अरे, ये अभी क्यों खोल रहा है? अभी तो पानी पिया है.” हमेशा चुप रहने वाला मुकेश पहली बार बोला.

“पानी पिया है, इसीलिए तो खोल रहा हूँ. अभी पेट पानी से भरा है. कम खाया जाएगा. बच गई तो रात को खा लेंगे.”

आशीष के विचार पर किसी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. वह समझ गया था कि सबको उसका आइडिया पसन्द आया है. सभी खेत किनारे ही बैठ गए. प्लास्टिक की पॉलिथिन में रखी खिचड़ी खोल दी गई. रितेश ने अपने बैग से कुछ पुराने अख़बार निकालकर बिछा दिए. खिचड़ी उसी में बाँटी जा रही थी.

“आइए, सर…आप लोग भी खा लीजिए.” आशीष हमारी तरफ़ देख रहा था.

“अरे नहीं यार…अभी भूख नहीं है.” मैंने साफ़ झूठ बोला. वजह बस इतनी थी कि उन्हें यही खिचड़ी रात के लिए भी बचानी थी. हम दो भी खा लेते तो बचता क्या?

“आप भी तो सुबह से कुछ नहीं खाए होंगे न, सर?” आशीष ने दोबारा पूछा.

“हम लोग खा लिए थे यार…अभी मन नहीं है…आगे चलकर कुछ खा लेंगे.”

“सब कुछ तो बन्द है, सर! आगे क्या मिलेगा?” इस बार रितेश ने कोशिश की.

“अरे, तुम लोग खाओ ना. हम अभी ये केले खा लेते हैं.”

मानव ने मुझे और ख़ुद को धर्मसंकट से बचा लिया. हमने तो सुना था कि भूख और संकट इनसान को सबसे पहले स्वार्थी बना देता है. लेकिन यहाँ एकदम उलटा हो रहा था. अपनी समस्या भूलकर ये मज़दूर अपनी खिचड़ी हमारे साथ साझा करना चाह रहे थे.

खिचड़ी को सात हिस्सों में बाँट दिया गया और कुछ हिस्सा बचा लिया गया. उसकी मात्रा देखकर लग नहीं रहा था कि बचा हुआ हिस्सा भी बच पाएगा.

“अरे रुको…खिचड़ी में से बास आ रहा है.” रितेश की आवाज़ से सब चौंक गए और खिचड़ी सूँघने लगे.

“नहीं! कोई बास नहीं आ रहा है.” रामबाबू ने खिचड़ी सूँघकर फ़ैसला सुना दिया.

“हाँ…बास तो नहीं आ रहा है.” रामबाबू को सोनू का समर्थन मिला.

“अरे, बास आ रहा है यार…नाक खराब है क्या तुम लोगों का?” रितेश ने फिर समझाया.

“बास खिचड़ी का नहीं, तुम्हारा अपना शरीर का आ रहा होगा.” रामबाबू की बात पर सब हँसने लगे. रामबाबू ने खाना शुरू कर दिया तो बाक़ी लोग भी खाने लगे. रितेश ने मेरी तरफ़ देखा.

“सर, आप एक बार इसको चैक करेंगे?”

“यार, मुझे ये सब पता नहीं चलता है…मेरे घरवाले भी मुझसे इस बात को लेकर परेशान रहते हैं.”

रितेश के पास अब कोई रास्ता नहीं बचा था. उसने एक बार खाते हुए अपने साथियों को देखा और फिर वह भी खिचड़ी पर टूट पड़ा. कुछ ही देर बाद आशीष ने खिचड़ी का बचा हुआ हिस्सा भी बाँटना शुरू कर दिया. भूख को कब तक क़ैद करके रखा जा सकता था.

इन मज़दूरों के साथ शूटिंग का नियम हमने तय कर रखा था. हम दस-पन्द्रह मिनट शूट करते तो हमारी कार साइकिलों के साथ चलती थी. शूटिंग के बाद हम दस किलोमीटर आगे बढ़ जाते और कहीं किनारे कार रोककर सबका इन्तज़ार करते. यही सिलसिला लगातार चल रहा था.

इससे हमारा काम भी हो जा रहा था और मज़दूरों की यात्रा में भी कोई ख़लल नहीं पड़ रही थी. खिचड़ी के कार्यक्रम के बाद भी हमने कुछ देर शूटिंग की और आगे पहुँचकर इन्तज़ार करने लगे. शाम के सात बजने वाले थे. सामने मील का पत्थर दिखा रहा था–चन्दौसी तीन किलोमीटर. हम शहर से बाहर के छोटे से क़स्बे, भीमनगर में थे. यह चन्दौसी का भीमनगर था.

हमने अन्दाज़ा लगाया कि अगर मज़दूर अगले पाँच मिनट में आ जाते हैं तो कहा जा सकता है कि तीन घंटे में तक़रीबन 27 किलोमीटर की दूरी तय की गई, वह भी खिचड़ी ब्रेक के साथ. यह अच्छी मानी जाएगी. हम मज़दूरों के आने का इन्तज़ार करने लगे. दस मिनट बाद भी जब वे नहीं आए तो यू टर्न लेकर पीछे जाने के सिवा हमारे पास और कोई विकल्प नहीं रहा.

हम कुछ दूर ही चले थे कि देखा सब पैदल चले आ रहे हैं.

“क्या हुआ?” पास पहुँचते ही मैंने सवाल किया.

“आशीष का टायर में हवा नहीं है और सोनू का चेन फँस रहा है.” निराश रामबाबू ने जवाब दिया.

“तुम लोग तो बता रहे थे कि पंप लेकर चल रहे हो?”

“हाँ, पंप तो था पर वो दूसरा बैच वालों के पास है.”

रितेश के झुके हुए कंधे भी हताशा की कहानी कह रहे थे.

“चलो, कोई नहीं…आगे एक क़स्बा है. देखते हैं शायद वहाँ कोई साइकिल वाला मिल जाए.”

मैंने सभी को सांत्वना देने की कोशिश की, यह जानते हुए और अपनी आँखों से थोड़ी देर पहले देखे हुए भी कि उस क़स्बे में तो एकदम मरघट जैसा सन्नाटा था. रूपा क़स्बे की बिजली भी ग़ायब थी. बस एकाध जगह से कुछ मोमबत्ती और मोबाइल की टॉर्च की रौशनी आ रही थी.

ऐसे में कोई साइकिल वाला? भूसे के ढेर में सुई ढूँढ़ने से भी ज़्यादा मुश्किल था. मैं अन्दाज़ा लगाने लगा कि साइकिल वाले को ढूँढ़ने में कम-से-कम एक घंटा तो अब गया और नहीं मिला तब तो बिसौली पहुँचने का मतलब ही नहीं होगा. तब रात यहीं आसपास कहीं गुज़ारनी पड़ेगी. हम जब भीमनगर पहुँचे तब तक अँधेरा और गहरा चुका था.

“भाई साहब…यहाँ कोई पंक्चर वाला है क्या?” भीमनगर पहुँचते ही रितेश ने थोड़ा जोश दिखाया. वह जानता था कि समय गँवाया तो यहीं रुकना पड़ेगा. तीस किलोमीटर का नुक़सान हो जाएगा.

“एक है तो सही. लेकिन लॉकडाउन है न…उसकी दुकान बन्द है. चन्दौसी में शायद कोई खुली हो.” अधेड़ उम्र के उस आदमी ने रितेश को बताया.

“चन्दौसी यहाँ से कितना किलोमीटर है?” रितेश अब बेचैन हो रहा था.

“यही होगा चारेक किलोमीटर…पर लॉकडाउन तो वहाँ भी है न भैया.”

“तो यहाँ का जो साइकिल वाला है, वो किधर रहता है?”

“यहीं रहता है…मस्जिद वाली गली में.” उस अनजान आदमी से यह सुनते ही रितेश की आँखें उस अँधेरे में भी चमकने लगीं.

“अरे वाह भाईसाहब…ये तो आपने बहुत अच्छी बात बताई. अब जरा उनका नाम-पता भी पता दो.”

“नाम-पता कुछ नहीं है भैया…आगे दो सौ मीटर से दाएँ हाथ मुड़ जाना…मस्जिद वाली गली आ जाएगी…वहाँ किसी से भी पूछ लेना अशरफ़ पंचर वाले का मकान किधर है?”

रितेश और बाक़ी लोगों के पैरों में जैसे नई जान आ गई. सब तक़रीबन भाग रहे थे मस्जिद वाली गली की तरफ़ और दुआ कर रहे थे कि अशरफ़ मिल जाए और उनकी तकलीफ़ दूर कर दे. एक मोहल्ले की तंग गलियों से होते हुए वे मस्जिद तक पहुँचे. वह एक छोटी-सी मस्जिद थी. दूर-दूर तक कोई नज़र नहीं आ रहा था.

एक तरफ़ रात का अँधेरा, दूसरी तरफ़ लॉकडाउन. रामबाबू घबरा भी रहा था कि मोहल्ले वाले अनजान सात लोगों को देखकर न जाने क्या सोच लें. पिछले कुछ सालों से समाज में एक-दूसरे को लेकर जिस तरह का अविश्वास पैदा हुआ है और भीड़ के जमा होकर हत्या करने तक की ख़बरें देखने में आई हैं, उनसे ये मज़दूर भी वाकिफ़ थे.

“मेरे विचार से हमें यहाँ से निकलना चाहिए. पता नहीं लोग क्या समझें?”

कृष्णा ने अपना डर ज़ाहिर कर दिया. कृष्णा के व्यक्तित्व की यही ख़ासियत थी. वह हमेशा सभी को आने वाले ख़तरे से आगाह कर देता था. गंगा नदी पार करने से पहले भी कृष्णा ने ही रितेश को रोका था. सभी लोगों को कृष्णा की बात समझ आ गई. सारे मज़दूर मुड़ने ही वाले थे कि उन्हें गली में एक सब्ज़ी का ठेला दिखाई दिया, वह बहुत धीमी रफ़्तार से उनकी तरफ़ आ रहा था. सब्ज़ी वाले की रफ़्तार सबको काटने को दौड़ रही थी,

“भाईसाहब…ये अशरफ़ पंक्चर वाले का घर कौन सा है?”

सब्ज़ी वाला अँधेरे में भी देखते ही समझ गया था कि ये लोग कौन हैं और अशरफ़ का घर क्यों पूछ रहे हैं, इसलिए उसने कोई सवाल नहीं पूछा.

“दाएँ हाथ पर चार मकान छोड़कर पाँचवाँ मकान, दरवाज़े पर टायर- ट्यूब लटके होंगे.”

सातों साइकिलें कुछ ही देर में अशरफ़ के मकान के बाहर थीं. सभी असमंजस में थे कि दरवाज़ा कौन खटखटाएगा? सब एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे. इस बार आगे आया सोनू यादव. उसकी भी चेन ठीक से काम नहीं कर रही थी.

सोनू, रितेश से उम्र में पाँच महीने ही बड़ा था. क़रीब 23 साल. रितेश की तरह वह भी घबराता नहीं था. उसे गाँव पहुँचने की सबसे ज़्यादा जल्दी थी क्योंकि अभी एक महीने पहले ही वो एक बच्ची का पिता बना था और अब तक अपनी बच्ची को नहीं देख पाया था.

“पता है सर, मेरी घरवाली उषा बोलती है कि हमारी बच्ची हीरोइन सोनाक्षी सिन्हा जैसी दिखती है, इसलिए वो उसका नाम सोनाक्षी रख दी है.”

सोनू ने जब पहली बार अपने परिवार के बारे में बताया तब बहुत देर तक सोनाक्षी के बारे में ही बात करता रहा. जब मैंने पूछा कि वह सोनाक्षी से पहली बार मिलने जा रहा है तो उसके लिए उसने क्या लिया? इसका जवाब देने से पहले सोनू मुस्कुरा दिया और फिर बोला :

“लिया तो कुछ नहीं, सर, बस जाऊँगा, उससे मिलूँगा. उसे बहुत प्यार करूँगा. अपनी गोदी में रखूँगा.”

यह सब कहते हुए सोनू की आँखों में कमाल की चमक थी. ऐसी चमक उसके चेहरे पर तब भी आ जाती थी जब वह अपनी 17 वर्षीय छोटी बहन कोमल के बारे में बात करता था.

“वैसे तो वो मुझसे 6 साल छोटी है लेकिन हुक्म पूरा चलाती है. अभी उषा और सोनाक्षी का खयाल भी वही रख रही है. हम सब भाई कोमल के लिए पैसा जमा कर रहे हैं. जिस दिन दो लाख रुपया हो जाएगा, उसकी शादी कर देंगे.”


पुस्तक – 1232km : कोरोना काल में एक असम्भव सफ़र

लेखक- विनोद कापड़ी

प्रकाशक – सार्थक ,राजकमल प्रकाशन उपक्रम

आईएसबीएन – 978-93-90971-27-5

भाषा – हिंदी

बाईंडिंग – पेपरबैक

मूल्य – 199/-

पृष्ठ – 184

केटेगरी –नॉन फिक्शन


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