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पुलिस एनकाउंटर के नियम क्या हैं, पुलिस कब-कब गोली चला सकती है?

हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे. 10 जुलाई की सुबह कानपुर नगर के भौंती के पास पुलिस एनकाउंटर में मारा गया.  9 जुलाई की सुबह उज्जैन के महाकाल मंदिर के पास से उसकी गिरफ्तारी हुई थी. कानपुर पुलिस के आधिकारिक बयान के मुताबिक, विकास को STF की टीम उज्जैन से कानपुर ला रही थी. कानपुर नगर के भौंती के पास पुलिस की गाड़ी पलट गई. उसमें बैठे अभियुक्त (विकास) और पुलिसवाले घायल हो गए. इस दौरान अभियुक्त विकास ने घायल पुलिसकर्मी की पिस्टल छीनकर भागने की कोशिश की. पुलिस टीम ने उसका पीछा किया, आत्मसमर्पण करने को कहा. वो नहीं माना. पुलिस पर फायरिंग करने लगा. जवाब में पुलिस ने भी फायरिंग की. विकास दुबे घायल हो गया. इलाज के लिए अस्पताल लाया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई.

पुलिस के इस एनकाउंटर पर सवाल उठ रहे हैं. इस स्टोरी में हम इसी पर बात करेंगे कि पुलिस एनकाउंटर के नियम क्या है? पुलिस कब-कब गोली चला सकती है?

विपक्ष ने उठाए सवाल

विकास दुबे के एनकाउंटर पर सवाल उठ रहे हैं. यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने ‘इंडिया टुडे’ को दिए एक इंटरव्यू में योगी सरकार पर आरोप लगाया. कहा कि यह एनकाउंटर सरकार को बचाने के लिए किया गया है. ये कार पलटी नहीं है, सरकार को पलटने से बचाया गया है, क्योंकि विकास दुबे के जिंदा रहने से कई राज खुल सकते थे. कई नेताओं ने इस एनकाउंटर पर सवाल उठाए हैं.

विकास दुबे के एनकाउंटर से एक दिन पहले, यानी जिस दिन विकास को उज्जैन से पकड़ा गया, उस दिन सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी. मुंबई के वकील घनश्याम उपाध्याय ने याचिका लगाई थी. इसमें कहा गया था कि पुलिस विकास दुबे का एनकाउंटर कर सकती है, इसलिए उन्हें सुरक्षा दी जानी चाहिए. याचिका पर सुनवाई से पहले ही विकास दुबे का एनकाउंटर हो गया.

एनकाउंटर से जुड़े बुनियादी नियम

इसका जवाब पुलिस मैनुअल में मिलता है. एनकाउंटर के लिए ज़्यादातर एक टर्म यूज़ होता है- जवाबी फायरिंग. तरीका तो ये है कि सामने से गोली चले बिना पुलिस फायरिंग नहीं कर सकती है. मतलब कोई आरोपी या दोषी भाग रहा है, तो पुलिसकर्मी उसे पकड़ने के लिए भाग सकते हैं. गाड़ी, बाइक या जहाज, जो मुनासिब हो, उसका इस्तेमाल कर सकते हैं. लेकिन जब तक सामने से गोली नहीं चलती है या जानलेवा हमला नहीं किया जाता है, तब तक पुलिस गोली नहीं चला सकती है. लेकिन गोली चलाकर घायल करना और गोली चलाकर मार देना, ये दो अलग-अलग बातें हैं. पुलिस द्वारा गोली से घायल करने, निहत्था करने, हथियार छीनने या रफ़्तार धीमी करने की नीयत से चलाई जाती है. लेकिन अगर पुलिस की गोली से आरोपी या दोषी की मौत होती है, तो ऐसा केवल आत्मरक्षा के लिए ही किया सकता है.

सीआरपीसी की धारा 46 कहती है कि अगर कोई अपराधी ख़ुद को गिरफ़्तार होने से बचाने की कोशिश करता है या पुलिस की गिरफ्त से भागने की कोशिश करता है या पुलिस पर हमला करता है, तो इन हालात में पुलिस उस अपराधी पर जवाबी हमला कर सकती है.

UP पुलिस के एक अधिकारी, जिनके नाम मुठभेड़ों का तमगा भी है, उन्होंने नाम न छापने की शर्त पर ‘दी लल्लनटॉप’ को बताया था,

अगर पुलिस की गोली किसी की जान लेती है, तो ये केवल उसी हाल में मुमकिन है, जब पुलिस को लग रहा हो कि गोली नहीं चलाई, तो पुलिसकर्मियों की जान जा सकती है.

क़ानून की भाषा क्या है?

एनकाउंटर में मौत को लेकर कोर्ट ने कुछ ज़रूरी बातें कही हैं. 1999 में सामाजिक संस्था ‘पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़’ (PUCL) ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. इस याचिका में साल 1995-97 के दौरान मुंबई पुलिस द्वारा अंजाम दिए गए 99 मुठभेड़ों पर सवाल उठाए गए थे. इन कथित मुठभेड़ों में 135 लोगों की मौत हुई थी. साल 2014 में आदेश आया. जस्टिस आर. एम. लोढ़ा और जस्टिस रोहिंटन नरीमन ने 16 बिंदुओं का दिशा-निर्देश जारी किया. कहा कि अगर पुलिस मुठभेड़ में मौत होती है, तो FIR दर्ज की जानी चाहिए. मजिस्ट्रेट जांच, मेडिकल जांच, केस की एक अलग CID टीम से जांच करवाए जाने के साथ-साथ मृत व्यक्ति के वारिस को उचित मुआवज़ा दिया जाना चाहिए.

16 बिंदुओं का दिशानिर्देश क्या है?

1. पुलिस को अगर किसी तरह की आपराधिक गतिविधि की सूचना मिलती है, तो उसे लिखित (केस डायरी के रूप में) या फिर किसी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम के रूप में दर्ज करना होगा.

2. किसी तरह की खुफिया जानकारी या सुराग मिलने के बाद यदि एनकाउंटर होता है और किसी की जान चली जाती है, तो केस दर्ज किया जाना चाहिए. धारा 157 के तहत केस दर्ज होना चाहिए. कोर्ट को तुरंत सूचना दी जानी चाहिए.

3. पूरी घटना की एक स्वतंत्र जांच सीआईडी से या दूसरे पुलिस स्टेशन की टीम से करवाना जरूरी है. इसकी निगरानी एक सीनियर पुलिस अधिकारी करेंगे. यह पुलिस अधिकारी एनकाउंटर में शामिल सबसे सीनियर अधिकारी से एक रैंक ऊपर का होना चाहिए.

4. धारा 176 के तहत पुलिस फायरिंग में हुई हर एक मौत की मजिस्ट्रियल जांच होनी चाहिए. इसकी एक रिपोर्ट न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास भेजना ज़रूरी है, जो सीआरपीसी की धारा 190 के तहत अधिकृत हों.

5. जब तक स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच को लेकर गंभीर संदेह न हो, तब तक राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को इन मामलों में शामिल नहीं किया जाना चाहिए. हालांकि घटना की सूचना परिस्थिति अनुसार, एनएचआरसी या राज्य मानवाधिकार आयोग को बिना किसी देरी दे दी जानी चाहिए.

6. घायल अपराधी/पीड़ित को मेडिकल हेल्प दी जाए. मजिस्ट्रेट या मेडिकल ऑफिसर के सामने उसका बयान दर्ज करवाया जाना चाहिए.

7. यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि FIR और पुलिस डायरी कोर्ट को बिना देरी के उपलब्ध कराई जाए.

8. जांच के बाद रिपोर्ट सीआरपीसी की धारा 173 के तहत कोर्ट के पास भेजी जानी चाहिए. जांच अधिकारी की ओर से पेश आरोप पत्र के मुताबिक मुकदमे का निपटारा जल्दी किया जाना चाहिए.

9. मौत की स्थिति में, कथित अपराधी/पीड़ित के परिजन को जितनी जल्दी हो सके, जानकारी दी जानी चाहिए.

10. पुलिस फायरिंग में मौतों की स्थिति में सभी मामलों का छमाही ब्योरा पुलिस महानिदेशक की ओर से एनएचआरसी को भेजा जाना चाहिए.

11. जांच में पुलिस की गलती पाए जाने पर संबंधित अधिकारी के खिलाफ एक्शन लिया जाए.

12. पुलिस मुठभेड़ में मारे गये व्यक्ति के आश्रितों को मुआवजा देने के लिए आईपीसी की धारा 357-ए पर अमल किया जाना चाहिए.

13. संविधान के अनुच्छेद 20 के तहत संबंधित अधिकारी को जांच के लिए अपने हथियार जांच एजेंसी के पास सरेंडर करने होंगे.

14. पुलिस अधिकारी के परिवार को जानकारी दी जाए. आरोपी अधिकारी को वकील मुहैया कराया जाना चाहिए.

15. घटना के तुरंत बाद संबंधित अधिकारियों को न तो बिना बारी के प्रमोशन दिया जाना चाहिए, न ही कोई वीरता पुरस्कार. हर हाल में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ये पुरस्कार तभी दिया जाए या इसकी सिफारिश तभी की जाए, जब संबंधित अधिकारियों की वीरता पर कोई संदेह न हो.

16. अगर पीड़ित के परिवार को लगता है कि इन प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया या स्वतंत्र जांच में किसी तरह की गड़बड़ी की आशंका हो, तो वह सत्र न्यायाधीश से शिकायत कर सकते हैं. शिकायत मिलने के बाद सत्र न्यायाधीश उसकी जांच करेगा.

मानवाधिकार आयोग क्या कहता है?

मार्च 1997. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC). इस बरस NHRC के तत्कालीन चेयरमैन थे जस्टिस एम.एन. वेंकटचलैया. उन्होंने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को खत लिखा. कहा कि बहुत सारे राज्यों से झूठी मुठभेड़ों की शिकायतें मिल रही हैं. जस्टिस वेंकटचलैया ने लिखा कि अगर पुलिसकर्मी की गोली से कोई मारा जाता है, तो पुलिस वाले पर सजायोग्य हत्या यानी Culpable Homicide का केस दर्ज किया जाना चाहिए. ऐसा इसलिए कि पुलिस के पास किसी भी व्यक्ति की जान लेने का कोई अधिकार नहीं है. जान ली, तो पुलिसवाले पर केस दर्ज़ करके मामले की तहकीकात की जाएगी. इस बात की जांच होगी कि पुलिसकर्मी द्वारा की गई कार्रवाई क़ानून के दायरे में है कि नहीं.

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NHRC के तत्कालीन चेयरमैन जस्टिस M N वेंकटचलैया ने कहा था कि अगर पुलिसकर्मी की गोली से कोई मारा जाता है, तो पुलिस वाले पर सजायोग्य हत्या यानी Culpable Homicide का केस दर्ज किया जाना चाहिए.

मई 2010 में भी एनएचआरसी के तत्कालीन अध्यक्ष जस्टिस जीपी माथुर ने कहा था कि पुलिस को किसी की जान लेने का अधिकार नहीं है. जब कभी पुलिस पर किसी तरह के ग़ैर-इरादतन हत्या के आरोप लगें, तो उसके ख़िलाफ़ आईपीसी के तहत मामला दर्ज होना चाहिए. घटना में मारे गए लोगों की तीन महीने के भीतर मजिस्ट्रेट जांच होनी चाहिए.


विकास दुबे के एनकाउंटर की जगह से थोड़ी ही दूर पुलिस ने मीडिया को क्यों रोका दिया?

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