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विकास दुबे और उसके गैंग का एनकाउंटर करने वाली पुलिस पर होगी FIR!

विकास दुबे. सात दिन पहले यह नाम अचानक से सुर्खियों में आया. कैसे? 2 और 3 जुलाई की दरमियानी रात कानपुर के बिकरू गांव में उसे पकड़ने के लिए पुलिस टीम गई. आरोप है कि दुबे ने अपने साथियों के साथ मिलकर पुलिस पर हमला कर दिया. गोलीबारी में आठ पुलिसवाले मारे गए. इसके बाद विकास दुबे फरार हो गया. तब से ही पुलिस उसकी तलाश में थी. उसे खोजने के लिए 50 टीमें बनाई गई थीं. 9 जुलाई की सुबह मध्य प्रदेश के उज्जैन में वो पकड़ा गया. लेकिन 10 जुलाई को खबर आई कि रास्ते में भागने की कोशिश करते हुए विकास दुबे मारा गया.

पुलिस का कहना है कि रास्ते में पुलिस की एक गाड़ी पलट गई थी. इसी दौरान विकास दुबे हथियार लेकर भाग निकला. पुलिस ने उसका पीछा किया और घेर लिया. बाद में सरेंडर करने को कहा. लेकिन दुबे ने गोली चलाई. बचाव में पुलिस ने भी गोली चलाई, जिसमें दुबे मारा गया. इसके साथ ही 2 जुलाई को हमले के बाद से पुलिस ने विकास दुबे और उसके पांच साथियों को मार दिया है. इन सभी के एनकाउंटर में मारे जाने का दावा है.

विकास दुबे, अमर दुबे, रणबीर और प्रभात. इसके साथ ही दो और हैं, प्रेमप्रकाश और अतुल. उनकी तस्वीरें तो नहीं हैं, लेकिन इन सारों की मारे जाने की कहानी नीचे है.
विकास दुबे, अमर दुबे, रणबीर और प्रभात. इसके साथ ही दो और हैं, प्रेमप्रकाश और अतुल. उनकी तस्वीरें तो नहीं हैं, लेकिन इन सारों की मारे जाने की कहानी नीचे है.

कौन कब मरा

प्रेम प्रकाश पांडे और अतुल दुबे- पुलिस ने बताया कि ये दोनों 3 जुलाई को बिकरू गांव के पास ही जंगल में मारे गए. प्रेम प्रकाश पांडे, अतुल दुबे का मामा था.

अमर दुबे- पुलिस के अनुसार, वह अतुल दुबे का गनर था. 8 जुलाई को हमीरपुर के मदौहा के पास एसटीएफ से एनकाउंटर में मारा गया.

प्रभात मिश्रा- उसे 8 जुलाई को फरीदाबाद से गिरफ्तार किया गया. पुलिस ने बताया, 9 जुलाई को कानपुर के पास पुलिस गाड़ी पंक्चर हो गई. इसका फायदा उठाकर प्रभात भागा. एनकाउंटर में वह मारा गया.

रणबीर उर्फ़ बउवा शुक्ला- पुलिस टीम पर हमले का आरोप. सीओ देवेंद्र मिश्रा का पैर काटने का आरोप. पुलिस ने बताया कि एनकाउंटर में 9 जुलाई को मारा गया.

विकास दुबे- उज्जैन से कानपुर लाते समय रास्ते में विकास दुबे मारा गया. उसकी मौत 10 जुलाई को हुई.

लेकिन इन एनकाउंटरों पर सवाल भी उठ रहे हैं. और पुलिस की भूमिका पर संदेह जताया जा रहा है. सबसे ज्यादा सवाल प्रभात मिश्रा और विकीस दुबे के मारे जाने पर है. दोनों के कथित एनकाउंटर की कहानी एक जैसी ही है. पुलिस सवालों के घेरे में है. सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या एनकाउंटर में शामिल पुलिसवालों पर केस दर्ज होगा? क्या एनकाउंटर की जांच होगी?

Vikas Dubey
विकास दुबे (फोटो: पीटीआई)

पुलिस टीम पर होगी छह एफआईआर?

वैसे सुप्रीम कोर्ट का निर्देश है कि पुलिस मुठभेड़ में किसी के मारे जाने पर पुलिस टीम पर FIR होनी चाहिए. साल 2014 में जस्टिस आरएस लोढ़ा और रोहिंटन नरीमन की बेंच ने यह निर्णय दिया था. दरअसल, 1999 में सामाजिक संस्था ‘पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़’ (PUCL) ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. इस याचिका में साल 1995-97 के दौरान मुंबई पुलिस द्वारा अंजाम दिए गए 99 मुठभेड़ों पर सवाल उठाए गए थे. इन कथित मुठभेड़ों में 135 लोगों की मौत हुई थी.

इसी पर साल 2014 में जस्टिस RM लोढ़ा और जस्टिस रोहिंटन नरीमन ने 16 बिंदुओं का दिशानिर्देश जारी किया. कहा कि अगर पुलिस मुठभेड़ में मौत होती है, तो FIR दर्ज की जानी चाहिए. इसके बाद मजिस्ट्रेट जांच, मेडिकल जांच, केस की एक अलग CID टीम से जांच करवाए जाने के साथ-साथ मृत व्यक्ति के वारिस को उचित मुआवज़ा दिया जाना चाहिए.

विकास दुबे के मामले में कुल छह लोगों का एनकाउंटर हुआ है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के हिसाब से इन छहों एनकाउंटर पर एफआईआर दर्ज होनी चाहिए.

मानवाधिकार आयोग भी कह चुका है FIR की बात

सुप्रीम कोर्ट के अलावा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने भी मुठभेड़ में पुलिस पर केस दर्ज करने का निर्देश दिया था. मार्च 1997 में NHRC के तत्कालीन चेयरमैन थे जस्टिस MN वेंकटचलैया. उन्होंने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को खत लिखा. कहा कि बहुत सारे राज्यों से झूठी मुठभेड़ों की शिकायतें मिल रही हैं. जस्टिस वेंकटचलैया ने लिखा कि अगर पुलिसकर्मी की गोली से कोई मारा जाता है, तो पुलिस वाले पर सजायोग्य हत्या यानी Culpable Homicide का केस दर्ज किया जाना चाहिए.

ऐसा इसलिए कि पुलिस के पास किसी की भी व्यक्ति की जान लेने का कोई अधिकार नहीं है. जान ली, तो पुलिसवाले पर केस दर्ज़ करके मामले की तहकीकात की जाएगी. इस बात की जांच होगी कि पुलिसकर्मी द्वारा की गई कार्रवाई क़ानून के दायरे में है कि नहीं.

Kanpur Adg
बाएं से दाएं: कानपुर ADG घटना की पूरी जानकारी देते हुए. कानपुर के भौंती के पास पलटी हुई गाड़ी. विकास दुबे को अस्पताल लाते पुलिसकर्मी, ये तस्वीर तब कि है जब तक विकास के मारे जाने की खबर को आधिकारिक तौर पर साफ नहीं किया गया था. (फोटो- इंडिया टुडे)

क्या है एनकाउंटर से जुड़ा बुनियादी नियम

इसका जवाब पुलिस मैनुअल में मिलता है. एनकाउंटर के लिए ज़्यादातर एक टर्म यूज़ होता है- जवाबी फायरिंग. तरीका तो ये है कि सामने से गोली चले बिना पुलिस फायरिंग नहीं कर सकती है. मतलब कोई आरोपी या दोषी भाग रहा है, तो पुलिसकर्मी उसे पकड़ने के लिए भाग सकते हैं. गाड़ी, बाइक या जहाज, जो मुनासिब हो, उसका इस्तेमाल कर सकते हैं. लेकिन जब तक सामने से गोली नहीं चलती है, या जानलेवा हमला नहीं किया जाता है, तब तक पुलिस गोली नहीं चला सकती है.

लेकिन गोली चलाकर घायल करना और गोली चलाकर मार देना, ये दो अलग-अलग बातें हैं. पुलिस द्वारा गोली घायल करने, निहत्था करने, हथियार छीनने या रफ़्तार धीमी करने की नीयत से चलाई जाती है. लेकिन अगर पुलिस की गोली से आरोपी या दोषी की मौत होती है, तो वो केवल आत्मरक्षा के लिए ही किया सकता है. UP पुलिस के एक अधिकारी, जिनके नाम मुठभेड़ों का तमगा भी है, ने नाम न छापने की शर्त पर बताया,

अगर पुलिस की गोली किसी की जान लेती है, तो ये केवल उसी हाल में मुमकिन है, जब पुलिस को लग रहा हो कि गोली नहीं चलाई तो पुलिसकर्मियों की जान जा सकती है.


Video: एनकाउंटर में मारा गया गैंगस्टर विकास दुबे

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