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जानबूझकर ग्वालियर से चुनाव हारे थे अटल बिहारी!

चर्चित टीवी पत्रकार विजय त्रिवेदी की किताब हार नहीं मानूंगा- एक अटल जीवन गाथा का हिस्सा है, ये किताब हार्पर कॉलिन्स इंडिया ने छापी है. इसमें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जिंदगी के ढेर से किस्से हैं. उनमें से एक ये रहा.


1984 के आम चुनाव में बीजेपी ने वाजपेयी को ग्वालियर से उम्मीदवार बनाया था. पर्चा भरने से एक रात पहले वाजपेयी ग्वालियर पहुंच गए थे. वे वहां नारायण कृष्ण शेजवलकर के घर पर रुके थे. सवेरे वहां लालकृष्ण आडवाणी भी पहुंचे. वाजपेयी ने ऐलान किया,“मैं कोटा से चुनाव नहीं लड़ूंगा.” आडवाणी की ओर देखते हुए कहा, “लालजी मैं दो सीटों से चुनाव नहीं लड़ूंगा और चुनाव लड़ूंगा तो सिर्फ़ ग्वालियर से.” सब तरफ़ सन्नाटा छा गया.

Source-livemint
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आडवाणी ने ली थी शेखावत से सलाह

आडवाणी ने उस खामोशी को तोड़ते हुए कहा, “आपके दिल्ली से ग्वालियर रवाना होने के बाद मुझे जानकारी मिली कि कांग्रेस माधवराव सिंधिया को ग्वालियर से उम्मीदवार बना रही है. रात को मैंने भैंरोसिंह शेखावत और साथियों से सलाह मशविरा किया तो भैंरोसिंह ने कहा कि वाजपेयी को कोटा सीट से मैदान में उतारा जा सकता है. इससे आप आराम से देश भर में चुनाव प्रचार कर सकेंगे और हमारी इच्छा है कि आप कोटा से चुनाव लड़ें.”

अटल बिहारी वाजपेयी पर विजय त्रिवेदी की किताब: हार नहीं मानूंगा - एक अटल गाथा
अटल बिहारी वाजपेयी पर विजय त्रिवेदी की किताब: हार नहीं मानूंगा – एक अटल गाथा

मां-बेटे की फूट को सड़क पर नहीं लाना चाहता

वाजपेयी ने कहा,“मैंने माधवराव जी को बता दिया है कि मैं ग्वालियर से चुनाव लड़ूंगा. उन्होंने मुझे शुभकामनाएं भी दी हैं और वे गुना से चुनाव लड़ेंगे.” आडवाणी ने कहा, “हो सकता है, लेकिन यदि राजीव गांधी कहेंगे तो फिर सिंधिया को ग्वालियर से ही लड़ना पड़ेगा.” वाजपेयी ने तुरन्त कहा, “तब तो मैं सिर्फ़ ग्वालियर से ही चुनाव लड़ूंगा और आपकी सलाह के मुताबिक मैंने कोटा से चुनाव लड़ा तो फिर माधवराव के मैदान में आने पर राजमाता ग्वालियर से चुनाव लड़ने के लिए कहेंगी और दो सीटों पर पर्चा भरने से उन्हें मना नहीं किया जा सकेगा और मैं किसी भी कीमत पर मां-बेटे के मनमुटाव को सड़क पर नहीं लाना चाहता.”

Source-skvgwalior
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विदिशा पर्चा भरने नहीं पहुंचे वाजपेयी

1984 में वाजपेयी ग्वालियर से और माधवराव सिंधिया कांग्रेस के टिकट पर गुना से चुनाव लड़ना चाहते थे. उस वक्त अर्जुन सिंह मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे. उन्होंने राजीव गांधी को सलाह दी कि सिंधिया को गुना के बजाय ग्वालियर से मैदान में उतारा जाये और अपनी ख़ास रणनीति के तहत पर्चा भरने के आख़िरी दिन सिंधिया ने ग्वालियर से पर्चा भर दिया. वाजपेयी तब विदिशा से चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन पर्चा भरने का आख़िरी दिन था और वाजपेयी वहां से विदिशा नहीं पहुंच सकते थे इसलिए फिर उन्होंने केवल ग्वालियर से ही चुनाव लड़ा . चुनाव माधवराव और वाजपेयी के बीच ही हुआ जिसमें वाजपेयी चुनाव हार गये. उस वक्त प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद तो पूरे देश में ही एक लहर थी, इसलिए यह नतीजा तो आना ही था.


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