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विद्या बालन : जो फूहड़ भी बड़े सलीके के साथ होती हैं

लंबे समय तक हिंदी सिनेमा में हीरोइन होने का मतलब गैर-शादीशुदा होना रहा. अधेड़ नायक के हाथ में गिटार पकड़ा कर उसे कॉलेज गोइंग बना दिया जाता और हीरोइन बेडरूम में पिंक टेडी बियर रख कर ‘बबली’ बनी रहती. अशोक कुमार जैसे नायक तो 4 पीढ़ी की लड़कियों के हीरो बने रहे. बाद में जब उनकी हीरोइन रह चुकी लीला चिटनिस को उनकी मां की भूमिका ऑफर हुई तब अशोक कुमार का नायकत्व कैरेक्टर रोल्स की तरफ मुड़ा. फिल्म इंड्स्ट्री की इस रवायत को उस हीरोइन ने तोड़ दिया जिसके पहनावे और स्टाइल की एक समय पर बहुत आलोचना हुई. बात 1 जनवरी को पैदा हुई विद्या बालन की.


विद्या बालन की शुरुआत टीवी सीरियल ‘हम पांच’ से हुई मगर विद्या की जिस पहचान से हम आज वाकिफ हैं वो उनके मॉडलिंग के दिनों की है. शैम्पू  और साबुन के विज्ञापनों में दिखने वाला चेहरा जिसके अंदर एक अलग तरह की परिपक्वता थी. अंग्रेज़ी की कहावत से उधार लें तो लेडी नॉट गर्ल (फेमिनिस्ट बहनें माफ करें). इस परिपक्वता ने कई स्थापित प्रतिमानों को तोड़ा.

परिणिता, शरदचंद्र की कहानी पर बनी एक खूबसूरत फिल्म. 60 के दशक का रूमानी कोलकाता, मीष्टी दोई सा संगीत. मगर 2 स्थापित नायकों (सैफ और संजय दत्त) वाली इस फिल्म में पहली बार ऐक्टिंग कर रही विद्या सारा श्रेय ले गईं. साथ ही पहली बार एहसास हुआ कि जिस तय खांचे में हम हीरोइन को देखते हैं उससे बाहर भी कोई नायिका हो सकती है जो ग्लैमरस भी हो और बोल्ड भी रहे.

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परिणिता की ललिता

इसके बाद अगले साल  तमाम ऐसी फिल्में आईं जिनमें विद्या को मेन स्ट्रीम की नायिका बनाकर पेश किया गया. ज़्यादातर प्रयोग ऐसे थे कि उनको याद न ही करें तो अच्छा है. हालांकि बीच-बीच में ‘गुरू’ और ‘नो वन किल्ड जेसिका’ जैसी फिल्मों में सशक्त किरदार आते रहे मगर दुविधा वही थी. क्या सिर्फ कैरेक्टर रोल में ही काम किया जाए. या मेकओवर जैसी कसरतें करके ज़ीरो फिगर टाइप री-पैकेजिंग की जाए.

फिर एक फिल्म आती है ‘इश्किया’. कृष्णा वर्मा की कहानी. कृष्णा को अपना बदला लेना है. और इसके लिए वो दो मर्दों को चुनती है. नसीरुद्दीन शाह को नफासत और बौद्धिकता के मिश्रण के साथ रिझाना और बब्बन बने अरशद वारसी को जिस्मानी करीबी के लिए पास बुलाना. एक शादीशुदा औरत के किरदार में विद्या फिल्म में एक साथ दो मर्दों को साथ रखती हैं मगर क्षण भर को भी ये मौका नहीं देतीं कि आप उस किरदार की नैतिकता पर सवाल सकें. इसके बाद डर्टी पिक्चर के बारे में सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि तब कोई और हीरोइन इस रोल को निभाने की सोच नहीं सकती थी. बात सिर्फ कम कपड़ों और वजन बढ़ाने की नहीं थी बात एक सी ग्रेड अभिनेत्री का किरदार निभाने की थी, सिल्क के किरदार को निभाने में विद्या जिस सलीके के साथ फूहड़ होती हैं वो देखने लायक है. इश्किया का ये सीन देखिए, पूरे कपड़े पहन कर बोल्ड होने के लिए कहीं ज़्यादा हिम्मत और टैलेंट चाहिए.

मुझे निजी तौर पर बात करते समय विद्या की जो फिल्म सबसे खास लगती है वो ‘कहानी’ है. इसलिए नहीं कि उसमें वो एक जैसी पोशाकों में कोलकाता की सड़कों पर मिलन दामजी की रट लगाए घूमती हैं, इसलिए भी नहीं कि आखिरी सीन में पेट पकड़कर गिरने तक अहसास नहीं होता कि ‘बीद्दा मैडम’ प्रेगनेंट नहीं है. बल्कि इसलिए कि इन सबके बाद भी वो अपने दम पर फिल्म को सुपरहिट करवा ले जाती हैं. आप आज के सबसे बेहतरीन ऐक्टर्स (स्टार्स नहीं) की फिल्मोग्राफी लिस्ट उठा लीजिए, कितनी बार वो फिल्म को सिर्फ-सिर्फ अपनी ऐक्टिंग के दम पर निकाल पाए हैं?

आज सोनम कपूर ‘नीरजा’, राधिका आप्टे ‘बदलापुर’ और ‘पार्चड’, आलिया भट्ट ‘डियर ज़िंदगी’ और ‘उड़ता पंजाब’ जैसी फिल्मों को मेन स्ट्रीम हीरोइन की तरह से निभा पा रही हैं तो इसकी शुरुआत का श्रेय विद्या बालन को अकारण ही नहीं दे रही हैं. आप भी डर्टी फिल्म का ये खास सीन देखिए.


दी लल्लनटॉप के लिए ये स्टोरी अनिमेष ने लिखी थी. 


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