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क्या अमेरिका ने इस देश के राष्ट्रपति को किडनैप करवाने की कोशिश की?

ये बात है 1963 की. अमेरिकी ख़ुफिया एजेंसी उन दिनों कैरेबियन सागर की तलहटी खंगालने में लगी थी. CIA को तलाश थी कुछ अनोखी सीपियों की. ख़ूब चमकदार, साइज़ में काफी बड़ी सीपियां. जिनके अंदर इतनी जगह हो कि उसमें विस्फोटक छुपाया जा सके. इतना विस्फोटक, जो किसी की जान लेने के लिए काफी हो. CIA को करना ये था कि ऐसी सीपियां खोजकर उन्हें अलग-अलग रंगों में रंगवाना था. फिर विस्फोटक से भरी उन रंग-बिरंगी सीपियों को एक ख़ास लोकेशन में जाकर रख देना था.

वेनेजुएला लैटिन अमेरिका का देश है. कभी पूरे लैटिन अमेरिका का सबसे संपन्न मुल्क हुआ करता था. अब वहां आधी से ज़्यादा आबादी का पेट भी नहीं भरता (फोटो: गूगल मैप्स)
वेनेजुएला लैटिन अमेरिका का देश है. कभी पूरे लैटिन अमेरिका का सबसे संपन्न मुल्क हुआ करता था. अब वहां आधी से ज़्यादा आबादी का पेट भी नहीं भरता. ड्रग्स के कारोबार का भी बड़ा अड्डा है ये (फोटो: गूगल मैप्स)

मगर इतनी मशक्कत हो किसके लिए रही थी?
ये हो रही थी जनाब फिदेल कास्त्रो के लिए. जो कि क्यूबा की कम्यूनिस्ट सत्ता के मुखिया थे. उनको समंदर में डुबकी लगाने का बड़ा शौक था. CIA उन्हें मारना चाहती थी. ताकि क्यूबा की सोवियत-समर्थित सरकार ख़त्म हो जाए. CIA ने सोचा- कास्त्रो उस चमकदार सीपी को देखेंगे, तो शायद हैरत में पड़कर उसे उठाएं. वो ऐसा करते और सीपी में धमाका होता. कास्त्रो मर जाते.

ये प्लान अमल में लाने के बाद फेल हुआ. या CIA ने इसे ड्रॉप कर दिया. पता नहीं. हां, मगर बिल क्लिंटन प्रशासन ने कुछ पुरानी गोपनीय फाइलें सार्वजनिक की थीं. उनसे इतना तो पता लगा कि इस प्लानिंग के लिए CIA ने ढेर सारी सीपियां खरीदी तो थीं.

कास्त्रो को मरवाने के लिए एक-के-बाद एक प्लॉट बनाना, ये CIA के सबसे मशहूर क़िस्सों में है. इस मामले में उसकी नाकामयाबी का भी ख़ूब ज़िक्र होता है. ये न्यू यॉर्क टाइम्स की एक पुरानी रिपोर्ट देखिए. इसमें कास्त्रो और CIA से जुड़ी एक ख़बर दिखेगी आपको (फोटो क्रेडिट: New York Times)
कास्त्रो को मरवाने के लिए एक-के-बाद एक प्लॉट बनाना, ये CIA के सबसे मशहूर क़िस्सों में है. इस मामले में उसकी नाकामयाबी का भी ख़ूब ज़िक्र होता है. ये न्यू यॉर्क टाइम्स की एक पुरानी रिपोर्ट देखिए. इसमें कास्त्रो और CIA से जुड़ी एक ख़बर दिखेगी आपको (फोटो क्रेडिट: New York Times)

साल पर साल बीतते गए, CIA लगा रहा
पता है, कहते हैं कि 1959 से 1999 तक के 40 सालों में CIA ने कास्त्रो को मारने की करीब 600 योजनाएं बनाईं. कभी उसने कास्त्रो को विस्फोटक वाला सिगार देकर मारना चाहा. कभी कास्त्रो की आईसक्रीम में ज़हर मिलाने की कोशिश की. एक बार तो कास्त्रो के लिए गोताखोरी वाला एक ख़ास डाइविंग सूट बनाया. उसके अंदर एक ज़हरीले फंगस की परत थी. इसे पहनने वाला एक गंभीर त्वचा रोग से मारा जाता. मगर क्यूबा को ये प्लानिंग भी मालूम चल गई और कास्त्रो सलामत रहे. एक प्लानिंग ये भी हुई कि CIA ने सोचा, चलो कास्त्रो की छवि ही ख़राब कर देते हैं. कास्त्रो रेडियो पर जनता को संबोधित करने वाले थे. प्लानिंग थी कि उनके पास एक नशीली दवा छिड़क दी जाए. जिसके असर से ऑन-एयर ही कास्त्रो की ज़बान लड़खड़ाने लगे. वो नशे के असर में अनाप-शनाप कुछ बोल जाएं. क्या कहें, एक-से-एक बचकाने आइडिया बनाए CIA ने.

अभी क्यों सुना रहे हैं कास्त्रो का क़िस्सा?
आप कहेंगे, कास्त्रो तो अपनी उम्र पूरी करके चले गए. फिर आज हम कास्त्रो और CIA की कहानी क्यों सुना रहे हैं? क्योंकि इसी मिज़ाज की एक ख़बर फिर से आई है. क्यूबा से नहीं, उसके पड़ोसी वेनेजुएला से. 6 मई को वेनेजुएला के सरकारी टीवी चैनल पर एक विडियो प्रसारित हुआ. इसमें एक आदमी का क़बूलनामा था. वो आदमी, जो कह रहा था कि उसे वेनेजुएला की राजधानी कराकस के हवाईअड्डे पर कब्ज़े के लिए भेजा गया है. ताकि वो और उसके साथी वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को किडनैप करके उन्हें विमान के रास्ते अमेरिका पहुंचा सकें.

टेलिविज़न पर ये बातें कबूलता इंसान ख़ुद भी एक अमेरिकी नागरिक है.

वेनेजुएला बोला, देखो क्या लगा है हमारे हाथ?
इन ख़बरों का सिलसिला शुरू हुआ 3 मई को. इस दिन वेनेजुएला सरकार का एक बयान आया. बताया गया कि 3 मई की सुबह राजधानी कराकस के पास एक हमले की कोशिश नाकाम कर दी गई है. करीब 13 लोग पकड़े गए हैं. इनमें दो अमेरिकी नागरिक भी हैं. एक का नाम है एयरन बैरी और दूसरे का नाम है ल्यूक डेनमैन. ‘टाइम मैगज़ीन’ के मुताबिक, बैरी और डेनमैन, दोनों ही US स्पेशल फोर्सेज़ का हिस्सा रह चुके हैं.दोनों ने इराक युद्ध भी लड़ा है. रिटायरमेंट के बाद इन दोनों ने एक प्राइवेट सिक्यॉरिटी कंपनी में काम करना शुरू किया. फ्लोरिडा स्थित इस कंपनी का नाम है- सिल्वरकॉर्प. इस कंपनी को बनाया था जॉर्डन गूड्रो नाम के एक शख्स ने. जो कि ख़ुद भी अमेरिकी स्पेशल फोर्सेज़ से रिटायर हुए हैं.

वेनेजुएला के मुताबिक, हमले में शामिल लोग मरसेनरी थे. मरसेनरी माने, किराये के सैनिक. बताया गया कि ये लोग पड़ोसी देश कोलंबिया से समंदर के रास्ते वेनेजुएला पहुंचे थे. इनका मकसद था वेनेजुएला में सरकार का तख़्तापलट करना. लेकिन इस ग्रुप को राजधानी कराकस के पास ला गुआइरा बंदरगाह पर ही रोक लिया गया.

किसने ली जिम्मेदारी?
इसके बाद सोशल मीडिया पर आया एक विडियो. किसका विडियो? एक तो जॉर्डन गूड्रो, सिल्वरकॉर्प कंपनी के मालिक. दूसरे हैं वेनेजुएलन आर्मी से रिटायर हो चुके कैप्टन जेवियर नीटो. इन दोनों ने 3 मई को कराकस में हुए हमले की जिम्मेदारी ली. ये भी कहा कि उन्होंने वेनेजुएला के अलग-अलग हिस्सों में इस तरह के कई और हथियारबंद गुटों को सक्रिय कर दिया है.

मादुरो बोले. क्या बोले?
फिर 4 मई को वेनेजुएला के राष्ट्रपति देश के नाम संबोधन देने टीवी पर आए. उन्होंने सारा पिछला ब्योरा बताया. फिर सिल्वरकॉर्प कंपनी के साथ बैरी और डेनमैन के लिंक पर बात की. इल्ज़ाम लगाया कि इस हमले के पीछे अमेरिकी सरकार और उसके राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप का हाथ है. उन्होंने विपक्ष के नेता ख़ुआन ग्वाइदो का भी हाथ बताया है इस मामले में. एक ऐंगल ये भी बताया जा रहा है कि ख़ुआन ग्वाइदो और जॉर्डन गूड्रो के बीच में एक डील हुई थी. इस डीलिंग के तहत ग्वाइदो ने गूड्रो के साथ एक कॉन्ट्रैक्ट किया था. कॉन्ट्रैक्ट ये था कि गूड्रो कराएंगे मादुरो का तख़्तापलट. और इसके बदले ग्वाइदो उन्हें देंगे 212 मिलियन डॉलर, यानी करीब 1606 करोड़ रुपये की रकम.

फिर आया क़बूलनामा
इसके बाद 6 मई को डेनमैन का कथित क़बूलनामा चला टीवी पर. ये एक सवाल-जवाब की शक्ल में था. हल्के सलेटी रंग की एक टी-शर्ट पहने डेनमैन के सामने कैमरा लगा था. कैमरे के पीछे बैठा शख्स अंग्रेज़ी में उनसे सवाल कर रहा था और डेनमैन जवाब दे रहे थे. इसी सवाल-जवाब के क्रम में डेनमैन ने कहा कि उन्होंने सिल्वरकॉर्प कंपनी के साथ एक करार किया था. इसके तहत, उन्हें वेनेजुएला के बाग़ी सैनिकों को ट्रेनिंग देनी थी. फिर उनके साथ मिलकर हमले को अंजाम देना था. इसके एवज़ में उन्हें 76 लाख रुपये मिलने थे. डेनमैन ने बताया कि वो जनवरी के दूसरे पखवाड़े में कोलंबिया पहुंचे थे. यहां उन्होंने करीब 60 लोगों को हथियारबंद ट्रेनिंग दी. डेनमैन ने ये भी कहा कि सिल्वरकॉर्प कंपनी के मालिक जॉर्डन गूड्रो असल में ट्रंप के लिए काम करते हैं.

ट्रंप ने कहा: नो, नॉट अमेरिका
ट्रंप का भी बयान आ गया है इसपर. उनका कहना है कि अमेरिका का कोई लेना-देना नहीं है इस विडियो से. सिल्वरकॉर्प कंपनी के मालिक गूड्रो का भी ज़िक्र किया ट्रंप ने. बोले कि गूड्रो पर तो हथियारों की तस्करी करने से जुड़ी जांच चल रही है. अमेरिका के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट माइक पॉम्पिओ का भी ऐसा ही बयान आया है. उन्होंने कहा है कि अगर अमेरिका को हमला करना होता, तो वो अलग स्टाइल में करता. पॉम्पिओ ने ये भी कहा है कि अगर वेनेजुएला ने अमेरिकी नागरिकों को पकड़ रखा है, तो अमेरिका उन्हें वापस लाने के लिए सारे औज़ार इस्तेमाल करेगा.

सवाल हैं, कई हैं
सबसे पहला सवाल है डेनमैन के कब़ूलनामे पर. वो अभी वेनेजुएला की कैद में हैं. ऐसे में उनका बयान, उनका क़बूलनामा सच्चा है. या किसी तरह के दबाव में दिया गया है. इस बारे में अभी कुछ ठोस नहीं कहा जा सकता है.

ये मादुरो सीधे ट्रंप पर क्यों आरोप लगा रहे हैं? उनके और अमेरिकी सरकार के बीच ऐसी कौन सी महाभारत छिड़ी है कि उन्हें सीधे अमेरिका पर शक़ हो रहा है? क्या वाकई मादुरो को सत्ता से हटाने में अमेरिका की कोई दिलचस्पी है?

बड़ी गहरी दिलचस्पी है…
इसका जवाब है कि भई, अमेरिका की दिलचस्पी तो भरपूर है. क्यों है, ये बताने के लिए थोड़ा अतीत में चलना होगा. मादुरो से पहले वेनेजुअला के राष्ट्रपति हुआ करते थे हूगो चावेज़. 1999 से मार्च 2013 तक वो इस पद पर रहे. 5 मार्च, 2013 को उनकी मौत हो गई. राष्ट्रपति रहते हुए ही उन्होंने अपना उत्तराधिकारी चुन लिया था? किसे चुना था? उन्होंने चुना था निकोलस मादुरो को.

यही है, यही है, यही तो है वो…
मादुरो का सफ़र बड़ा दिलचस्प रहा है. एक ज़माने में बस ड्राइवर हुआ करते थे. फिर राजनीति में आए. ‘फ़िफ़्थ रिपब्लिक मूवमेंट’ नाम की पार्टी बनाने में हूगो चावेज़ की मदद की. 1999 में चावेज़ के सत्ता में आने के बाद वो भी संसद के लिए चुन लिए गए. पहले स्पीकर, फिर विदेश मंत्री और फिर 2012 में उपराष्ट्रपति बना दिए गए. चावेज ने कहा, ये ही है मेरा उत्तराधिकारी.

मादुरो बोले- गेट आउट हो जाओ
चावेज़ की मौत के बाद करीब एक महीने अंतरिम राष्ट्रपति रहे मादुरो. फिर अप्रैल 2013 में बमुश्किल दो पर्सेंट वोट फासले से राष्ट्रपति चुन लिए गए. मादुरो को राष्ट्रपति बने पांच महीने ही हुए थे कि एक मसला हो गया. 3 सितंबर, 2013 की बात है. वेनेजुएला के करीब 70 फीसद हिस्से की बत्ती गुल हो गई. ट्रैफिक लाइट, ट्रेन, सब बंद. बिजली वितरण का जो मेन नेटवर्क था, वही बैठ गया था. मादुरो ने कहा, पक्का कोई साज़िश हुई है. किसने की साज़िश, ये बताया उन्होंने 30 सितंबर को. अमेरिकी दूतावास के तीन राजनयिकों का नाम लेकर आए. कहा, बिजली गुल करने के पीछे इनका ही हाथ था. मादुरो ने इन तीनों का नाम लेते हुए कहा, गेट आउट फ्रॉम वेनेजुएला. माने, दफ़ा हो जाओ यहां से.

तस्वीर में लोग वेनेजुएला की करंसी थामे खड़े हैं. 2014 से ही वेनेजुएला में गंभीर आर्थिक संकट बना हुआ है (फोटो: AFP)
तस्वीर में लोग वेनेजुएला की करंसी थामे खड़े हैं. 2014 से ही वेनेजुएला में गंभीर आर्थिक संकट बना हुआ है. 2018 में मादुरो सरकार नई करंसी लेकर आई (फोटो: AFP)

गिरा, गिरा, गिरा, गिरा, धड़ाम हो गया
वेनेजुएला और अमेरिका के रिश्ते पहले से ख़राब थे. इस मामले ने और बेड़ा गर्क कर दिया. मगर आगे के दिनों में आर्थिक प्रतिबंध लगाने के सिवाय मादुरो के खिलाफ़ अमेरिका को कुछ ख़ास करना नहीं पड़ा. कच्चे तेल की गिरती क़ीमत और वेनेजुएला की ढहती इकॉनमी ही मादुरो को डुबा रही थी. 2016 में मादुरो ने आर्थिक आपातकाल लगा दिया. ख़बरें आने लगीं कि किस तरह वहां लोग ब्रेड को तरस रहे हैं. वेनेजुएला में आर्थिक संकट इतना गहरा था और वहां की मुद्रा ‘बोलिवर’ की क़ीमत इतनी गिर गई थी कि सादा कागज़ उससे क़ीमती हो गया था. लोग बोरियों में पैसा भरकर ले जाते और जेब में भरकर सामान लाते. ब्रेड के लिए दंगे होने लगे. खाने-पीने की दुकानों के बाहर पुलिस तैनात करनी पड़ी. लाखों लोग वेनेजुएला छोड़कर भागने लगे.

मादुरो ख़ुद कौन सा कम थे?
एक तरफ बर्बाद इकॉनमी थी. दूसरी तरफ थी मादुरो की तानाशाही. विपक्ष को पूरी तरह किनारे लगा दिया उन्होंने. 2017 में संसद का दोबारा चुनाव करवाया और वहां अपने समर्थकों को भर लिया. ख़ूब दंगे हुए. कई लोग मारे गए. मगर मादुरो सत्ता दबोचे बैठे रहे. 2018 में उन्होंने राष्ट्रपति पद के लिए दिखावटी चुनाव करवाया. विपक्ष से लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय, सबने इस चुनाव का बहिष्कार किया. मगर मादुरो की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा. वो दूसरी बार राष्ट्रपति बन गए. मगर दुनिया के ज़्यादातर लोकतांत्रिक देशों ने मादुरो सरकार को मान्यता नहीं दी.

ये हैं ख़ुआन ग्वाइदो. इन्होंने भी बतौर राष्ट्रपति ख़ुद के नाम का ऐलान कर दिया. अमेरिका समेत कई देशों से समर्थन मिला इन्हें. मगर ख़ुआन सत्ता से नहीं हटा पाए मादुरो को (फोटो: AFP)
ये हैं ख़ुआन ग्वाइदो. इन्होंने भी बतौर राष्ट्रपति ख़ुद के नाम का ऐलान कर दिया. अमेरिका समेत कई देशों से समर्थन मिला इन्हें. मगर ख़ुआन सत्ता से नहीं हटा पाए मादुरो को (फोटो: AFP)

अमेरिका ने कहा: वेनेजुएला में हमको ये नहीं, वो चलेगा
वेनेजुएला में लगातार आंतरिक कलह चल रहा था. सरकार विरोधी प्रदर्शन ज़ोरों पर था. ऐसे में नैशनल असेंबली ने मादुरो से ब़गावत कर दी. असेंबली के मुखिया थे ख़ुआन ग्वाइदो. मादुरो के शपथग्रहण के ठीक 13 दिन बाद, 23 जनवरी 2019 को ग्वाइदो ने ऐलान किया कि अब वो वेनेजुएला के कार्यकारी राष्ट्रपति हैं. ट्रंप प्रशासन ने भी ग्वाइदो को समर्थन दिया. कहा, अमेरिका मादुरो को नहीं, बल्कि ग्वाइदो को वेनेजुएला का वैध शासक मानता है.

नार्कोज़, फ्रॉम वेनेजुएला
वैध कौन. अवैध कौन. ये झगड़ा तो चल ही रहा था. ऊपर से अभी 26 मार्च को अमेरिका ने निकोलस मादुरो पर आपराधिक आरोप भी तय कर दिए. अमेरिका के अटॉर्नी जनरल हैं विलियम पी बार. उन्होंने इल्ज़ाम तय करते हुए कहा कि मादुरो ने अमेरिका में सैकड़ों टन कोकीन की सप्लाई करवाई. मादुरो पर नार्को टेररिज़म का आरोप है. अमेरिका के मुताबिक, मादुरो ड्रग्स की तस्करी का एक गिरोह चलाते हैं. इसका नाम है- कार्टल डे लोस सोल्स. माने, सूरज का कार्टल. इसका नाम पड़ा है, सूर्य की आकृति वाले एक ख़ास बैज पर. जिसे वेनेजुएलन आर्मी के अफसर अपनी वर्दी पर लगाते हैं.

मादुरो पर आरोप लगाने से पहले एक अमेरिकी डिप्लोमेट ने कहा था कि अगर मादुरो ख़ुद ही सत्ता छोड़ देते हैं, तो अमेरिका उनपर कोई केस नहीं चलाएगा. ये भी ख़बर आई कि अमेरिका भीतर-ही-भीतर वेनेजुएलन आर्मी के अफ़सरों के साथ सेटिंग करने में लगा है. ताकि उनकी मदद से मादुरो को सत्ता से बेदखल किया जा सके.
मादुरो पर आरोप लगाने से पहले एक अमेरिकी डिप्लोमेट ने कहा था कि अगर मादुरो ख़ुद ही सत्ता छोड़ देते हैं, तो अमेरिका उनपर कोई केस नहीं चलाएगा. ये भी ख़बर आई कि अमेरिका भीतर-ही-भीतर वेनेजुएलन आर्मी के अफ़सरों के साथ सेटिंग करने में लगा है. ताकि उनकी मदद से मादुरो को सत्ता से बेदखल किया जा सके.

कितने का इनाम है मादुरो पर?
मादुरो के अलावा उनके करीब दर्ज़नभर करीबियों पर भी इल्ज़ाम तय हुए हैं. अमेरिका ने कहा है कि केस चलाने के लिए मादुरो को अमेरिका लाने की कोशिश की जाएगी. अमेरिकी विदेश विभाग ने मादुरो पर इनाम भी रखा है. उनकी गिरफ़्तारी में मदद करने वाले को करीब 114 करोड़ रुपये का इनाम दिया जाएगा. अब ये सारी हिस्ट्री देखिए, तो अमेरिका द्वारा मादुरो के तख़्तापलट की कोशिश असंभव टाइप कतई नहीं लगती.

अमेरिका, उर्फ़ कैप्टन मानवाधिकार
इस बात में कोई दो राय नहीं कि मादुरो तानाशाह हैं. वो फ़र्ज़ी तरीकों से सत्ता में जमे हुए हैं. वो वेनेजुएला में लोगों का दमन कर रहे हैं. उनकी क्रूरता और ख़राब आर्थिक नीतियों के कारण 20 लाख से ज़्यादा लोगों को वेनेजुएला छोड़ना पड़ा है. मगर, मानवाधिकार की दुहाई देकर दूसरे देशों में टांग घुसाना, इस मामले में अमेरिका का रेकॉर्ड बड़ा कुख़्यात है. चुटकुला चलता है कि दुनिया में जहां-जहां कच्चा तेल है, वहां-वहां अमेरिका कैप्टन मानवाधिकार बन जाता है. अब संयोग देखिए कि वेनेजुएला में भी कच्चे तेल का बड़ा भंडार है.

हमने इस ख़बर की शुरुआत में CIA के कुछ क़िस्से सुनाए थे आपको. उसी CIA की वेबसाइट पर हमें मिला एक डॉक्यूमेंट. ये डॉक्यूमेंट असल में एक अख़बारी ख़बर की प्रति थी. जो छपी थी 19 अक्टूबर, 1986 को. इसमें ज़िक्र था एक क़िताब का. इसके मुताबिक, जिस फिदेल कास्त्रो को रास्ते से हटाने की कोशिश में CIA सालों लगा रहा. 1959 से पहले उसी कास्त्रो के मूवमेंट को फंडिंग दी थी CIA ने.

ये डॉक्यूमेंट हमें CIA की वेबसाइट पर मिला. इसके मुताबिक, क्यूबा की क्रांति के समय CIA ने कास्त्रो को मूवमेंट को फंडिंग भिजवाई (फोटो: cia.gov)
ये डॉक्यूमेंट हमें CIA की वेबसाइट पर मिला. इसके मुताबिक, क्यूबा की क्रांति के समय CIA ने कास्त्रो को मूवमेंट को फंडिंग भिजवाई (फोटो: cia.gov)

ये 1957 की बात है. कास्त्रो और उनके साथी तब क्यूबा के डिक्टेटर फूजेंसियो बटिस्टा को सत्ता से हटाने की कोशिश में लगे थे. मज़ेदार ये था अमेरिका दोनों तरफ से खेल रहा था. एक तरफ वो बटिस्टा को सपोर्ट कर रहा था. दूसरी तरफ CIA कास्त्रो के मूवमेंट को फंड कर रहा था. असल में CIA ने सोचा कि अगर कास्त्रो का धड़ा सत्ता में आ जाता है, तो फिर अमेरिका से उसके रिश्ते नैचुरली ख़राब होंगे. ऐसे में CIA ने दोनों खिलाड़ियों पर दांव लगाया. ताकि जो भी सत्ता में रहे, उसकी गुडबुक में हो अमेरिका. पता है, CIA ने कास्त्रो के मूवमेंट को कितनी फंडिंग दी थी? करीब 50 हज़ार डॉलर की. ये 1957 की बात है. तब के 50 हज़ार डॉलर की वैल्यू आज के हिसाब से समझिए करीब साढ़े तीन करोड़ रुपये.

अरे, CIA के तो एक-से-एक मज़ेदार क़िस्से हैं. कामयाबियों से ज़्यादा मिसालें तो उसके फेलियर की हैं.


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