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तो क्या तीसरे विश्वयुद्ध की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है!

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himanshu singh

हिमांशु सिंह दी लल्लनटॉप के दोस्त हैं. हमें पढ़ते रहते हैं और हमारे लिए लिखते भी रहते हैं. हमारे लिए लिखा है इसका मतलब आपके लिए लिखा है. आज लिखा है वेनेज़ुएला संकट पर. कैसे वेनेज़ुएला अपने समय का ‘क्यूबा’ बनता जा रहा है. पेश है हिमांशु का लिखा.


 

 

मुझे नहीं पता कि दो विश्वयुद्धों के बाद तीसरा विश्वयुद्ध कौन-कौन से देशों के बीच लड़ा जाएगा. मैं ये भी नहीं जानता कि तीसरे विश्वयुद्ध में कितने परमाणु बम दागे जाएंगें या कितने लोग मरेंगे. लेकिन मैं इस बात को लेकर एकदम श्योर हूं कि चौथा विश्वयुद्ध पत्थर, डंडों और कुल्हाड़ियों से लड़ा जाएगा. श्योर मैं इस बात को लेकर भी हूं कि तीसरे विश्वयुद्ध की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है. दरअसल हुआ ये है कि अप्रैल 1961 का ‘क्यूबा मिसाइल संकट’ 58 साल बाद ‘वेनेज़ुएला संकट’ के नये अवतार में वापस आ गया है और पूरी दुनिया के माथे पर बल पड़ने लगा है.

क्या था क्यूबा मिसाइल संकट?

दूसरे विश्वयुद्ध में साथी रहे अमेरिका और सोवियत संघ ने लड़ाई खत्म होते ही एक दूसरे के खिलाफ दुनिया भर में गोलबंदी शुरू कर दी थी. अमेरिका पर आरोप लगा कि उसने जापान पर परमाणु बम दुनिया को अपनी ताकत का डेमो देने के लिये गिरया. लोगों ने इस गोलबंदी को दूसरे विश्वयुद्ध का ही विस्तार बताया. लेकिन असल बात ये थी कि अब कोई भी लड़ने की हालत में नहीं था. जापान का हश्र सभी देख चुके थे.
इसी बीच अमेरिका का पड़ोसी देश क्यूबा अमेरिका और सोवियत संघ के लिये लड़ाई का मैदान बनने लगा. दरअसल क्यूबा अमेरिका की दबंगई से नाराज था. सोवियत संघ ने क्यूबा की अमेरिका से नाराजगी का फायदा उठाकर क्यूबा को अपना सैनिक अड्डा बना लिया और क्यूबा में ही अमेरिका के खिलाफ अपनी परमाणु मिसाइलें तैनात कर दीं.अमेरिका को सोवियत संघ की इस हरकत का पता तीन हफ्ते बाद चला. अमेरिका किसी भी तरह की लड़ाई नहीं चाहता था, लेकिन पड़ोसी देश क्यूबा में ही अपने खिलाफ तैनात सोवियत परमाणु मिसाइलें उसे बर्दाश्त नहीं थी. अमेरिका ने क्यूबा की घेराबंदी शुरू कर दी. माहौल इतना गरमा गया कि लगा तीसरा विश्वयुद्ध अब शुरू ही होने वाला है. पूरी दुनिया की धड़कनें तेज हो गईं थीं. लेकिन परमाणु हथियार दोनों देशों के पास थे तो दोनों पक्षों ने मामला संभाल लिया. सोवियत संघ ने क्यूबा से अपनी मिसाइलें हटा लीं और अमेरिका ने क्यूबा की घेराबंदी खत्म कर दी. लड़ाई कैन्सिल हो गई. इस पूरे घटनाक्रम को ‘क्यूबा मिसाइल संकट’ कहा गया.

मिसाइलें एक-दूसरे पर राजनीतिक दबाव बढ़ाने के लिए तैनात की गई थीं.
मिसाइलें एक-दूसरे पर राजनीतिक दबाव बढ़ाने के लिए तैनात की गई थीं.

उस वक़्त अमेरिका और सोवियत संघ के पास ही अकेले पूरी दुनिया के कुल 90% परमाणु हथियार थे जिनकी संख्या हजारों में थी. समझने की बात है कि जापान पर सिर्फ दो परमाणु बम गिरे थे जिन्होंने जापान के दो शहर पूरी तरह खत्म कर दिए थे. क्यूबा मिसाइल संकट के 58 साल बाद आया ये ‘वेनेजुएला संकट’ क्यूबा संकट की झेरॉक्स कॉपी बन कर आया है।

क्या है वेनेज़ुएला संकट?

क्यूबा की तरह ही वेनेज़ुएला भी अमेरिका का पड़ोसी देश है और उसके पास तेल के बड़े भंडार हैं. अब अमेरिका के पड़ोस में मौजूद तेल के बड़े भंडार वाले देश के साथ क्या-क्या दिक्कतें हो सकती हैं, ये समझना कोई बड़ी बात नहीं है. तो वेनेजुएला अमेरिका के पैदा किए हुए गंभीर आर्थिक और राजनीतिक संकटों से जूझ रहा है. आर्थिक संकट ऐसा है कि लोग झोला भर-भर के नोट ले जा रहे हैं लेकिन झोला भर के सामान नहीं खरीद पा रहे हैं. यानि खतरनाक टाइप की मुद्रास्फीति है. तिरासी हज़ार गुना तक. और राजनीतिक संकट उससे भी बदतर है. ऐसा कि वेनेज़ुएला के निर्वाचित राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के सत्तासीन होते हुए भी विपक्षी नेता जुआन गुएडो ने अमेरिका की शह पर खुद को वेनेज़ुएला का नया राष्ट्रपति घोषित कर दिया है. हालात ये हैं कि वेनेज़ुएला खुद गृहयुद्ध के मुहाने पर खड़ा है.

निकोलस मादुरो वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति थे.
निकोलस मादुरो वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति थे.

अमेरिका की मंशा वेनेज़ुएला में तख्तापलट करवा कर वहां अपने मन की सरकार बनवाना है और वेनेज़ुएला की तेल संपदा को अपने नियंत्रण में लेना है. और अब उस वक़्त के क्यूबा की तरह ही आज का वेनेजुएला भी अमेरिकी दादागिरी का विरोध कर रहा है. मजे की बात तो ये है कि तब क्यूबा अमेरिका का विरोध सोवियत संघ की मदद से कर रहा था और अब वेनेजुएला सोवियत संघ के उत्तराधिकारी रूस के समर्थन से अपने यहां अमेरिकी दखलंदाजी का विरोध कर रहा है. मामले की गंभीरता इस बात से और ज्यादा बढ़ गयी है कि इस बार वेनेजुएला को अमेरिका के खिलाफ रूस के साथ-साथ चीन का समर्थन भी मिल रहा है.
और नई बात ये हुई है कि वेनेजुएला मुद्दे पर रूस और चीन ने अमेरिका के प्रस्ताव के खिलाफ़ संयुक्त राष्ट्र में वीटो पॉवर का इस्तेमाल किया है. और अभी-अभी अमेरिका ने वेनेजुएला के अपने दूतावास से बाकी राजनयिक कर्मचारियों को वापस बुलाने का फैसला किया है. जाहिर है ‘वेनेजुएला संकट’ वर्तमान विश्व का सबसे तनावपूर्ण मसला है. वेनेज़ुएला में अमेरिका के इस हस्तक्षेप ने दुनिया के तमाम देशों को दो खेमों में बांट दिया है. एक तरफ अमेरिका और उसके समर्थक कनाडा, ब्रिटेन, अर्जेंटीना, ब्राज़ील और यूरोपीय संघ के देश हैं, तो दूसरी ओर रूस, चीन, मेक्सिको, तुर्की और क्यूबा समेत तमाम दक्षिण अमेरिकी देश.

असल मामला क्या है?

अभी कुछ दिन पहले तक अमेरिका और भारत वेनेज़ुएला के सबसे बड़े तेल खरीदार थे. लेकिन अब अमेरिका को वेनेज़ुएला का तेल चाहिए तो, लेकिन खरीदकर नहीं. असल में अमेरिका वेनेज़ुएला की पूरी तेल संपदा पर अपना नियंत्रण चाहता है. अमेरिका ने भारत समेत दुनिया के तमाम देशों को वेनेज़ुएला से तेल न खरीदने की सख्त हिदायत दी है. तेल-निर्यात वेनेज़ुएला की आय का सबसे बड़ा साधन है. अमेरिका की दादागिरी के चलते तेल निर्यात न कर पाने के कारण वेनेज़ुएला गम्भीर आर्थिक तंगी झेल रहा है. बढ़ती राजनीतिक अस्थिरता और गरीबी एक दूसरे के लिये कोढ़ में खाज का काम कर रही हैं.

 वेनेज़ुएला के तेल भंडार ही मसले की जड़ हैं.
वेनेज़ुएला के तेल भंडार ही मसले की जड़ हैं.

हालत ये है कि लोगों के पास खाने की कमी हो गयी है. कामगार खाने के बदले मजदूरी करने को तैयार हैं. लाखों लोग पड़ोसी देशों में शरणार्थी बने हुए हैं. आसान भाषा में कहें तो वेनेज़ुएला पश्चिम दुनिया का इराक़ बनने की राह पर है. और सबसे ज्यादा चिंताजनक बात तो ये है कि दुनिया के सबसे ज्यादा ताकतवर देश हजारों परमाणु हथियारों के साथ इस मामले में भरपूर रुचि ले रहे हैं. तेल संपदा वाले देशों पर कब्जा करना अमेरिका की पुरानी रणनीति रही है. कभी तानाशाही खत्म करके लोकतंत्र की बहाली तो कभी आतंकवाद खत्म करने के लिए, और कभी जैव और परमाणु हथियारों के खात्मे के नाम पर अमेरिका अपनी पसंद के देशों के अंदरूनी मामलों में दखल देता रहा है. शुक्र है भारत के पास तेल के बड़े भंडार नहीं हैं, वरना अब तक अमेरिका भारत-पकिस्तान का कश्मीर विवाद सुलझाने भारत आ चुका होता, और अपने जंगी जहाजों से तेल वाले इलाकों में डेमोक्रेसी, सेकुलरिज़्म, और टॉलरेन्स बरसाने की योजना बना रहा होता.


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Venezuela crisis is the new tesnion for the world after Cuba missile crisis

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