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अधिकारी नहीं, सरकारी लापरवाही से हुई है 18 लोगों की मौत

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वो साल था 2009. उत्तर प्रदेश में मायावती के नेतृत्व में बीएसपी की सरकार थी. वाराणसी में जीटी रोड पर गाड़ियों की भीड़ बढ़ती जा रही थी. हर रोज सड़क पर नई बड़ी गाड़ियों का उतरना जारी था. शहर के लोगों को जाम से बचाने के लिए अधिकारियों ने प्रस्ताव दिया कि लकड़ी टाल से लहरतारा कैंसर अस्पताल तक करीब 2.5 किमी का फ्लाईओवर बनाया जाए.

फ्लाईओवर 2.5 किमी का बनना था, लेकिन इसे रोडवेज के पास ही बंद कर दिया गया.

सरकार ने प्रस्ताव मान लिया. इसके बाद 2009 में ही फ्लाईओवर का शिलान्यास कर दिया गया. पुल बनना शुरू हुआ, लेकिन वो चौकाघाट से लेकर रोडवेज के सामने तक ही बन सका. अधिकारियों ने कहा कि कैंट स्टेशन और रोडवेज के पास फ्लाईओवर बनाने के लिए पिलर नहीं खड़े किए जा सकते. लिहाजा कोई चारा नहीं था और 2013 में फ्लाईओवर का काम खत्म हो गया. काम के खत्म होने तक यूपी में सपा की सरकार आ गई थी. दिक्कत बरकरार रही. इसके बाद तय हुआ कि रोडवेज से लेकर लहरतारा कैंसर अस्पताल तक फ्लाईओवर बनाया जाए. उस वक्त केंद्र में बीजेपी की सरकार आ गई थी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बनारस से ही सांसद बन चुके थे. इसके बाद से काशी को क्योटो बनाने की बात शुरू हो गई थी, जो बीजेपी की ओर से की गई थी. वहीं सपा सरकार ने काशी को सेंटियागो बनाने का जुमला हवा में उछाला था. इसे पूरा करने के लिए राज्य सरकार ने फ्लाईओवर की मंजूरी दे दी. फिर आया सितंबर 2015. राज्य सेतु निगम का काम देख रहे थे मंत्री शिवपाल सिंह यादव. उन्होंने इस पुल का शिलान्यास कर दिया.

सपा सरकार में एक और फ्लाईओवर बनना तय हुआ, जिसका शिलान्यास शिवपाल यादव ने किया था. ये वही फ्लाईओवर है, जिसकी बीम गिरने से 18 लोगों की मौत हो गई है.

पुल की लागत करीब 129 करोड़ रुपये थी और इसकी लंबाई करीब 1629 मीटर तय की गई. काम शुरू हुआ. मार्च 2018 की डेड लाइन दी गई. इस बीच 2017 में सपा की सरकार चली गई और प्रदेश की कमान योगी आदित्यनाथ के हाथ में आ गई. जो मंत्रालय शिवपाल यादव के हाथ में था, वो अब केशव प्रसाद मौर्य के पास आ गया. बीजेपी सरकार आई. एक साल बीत गए. मार्च 2018 भी बीत गया, लेकिन पुल का काम पूरा नहीं हो सका. इस बीच तीन बार खुद मुख्यमंत्री योगी, दो बार केशव प्रसाद मौर्य और सुरेश खन्ना, छह बार राज्य मंत्री नीलकंठ तिवारी और विधायक अनिल राजभर पुल का जायजा ले चुके हैं. लेकिन काम महज 56 फीसदी यानी की आधा ही पूरा हो पाया था. वहीं 2019 का चुनाव भी पास आ गया और पीएम का संसदीय क्षेत्र होने की वजह से सबका ध्यान भी इस ओर जाने लगा. फिर शुरू हुई जल्दबाजी. मार्च 2018 की डेड लाइन बढ़ाकर मार्च 2019 की बात कही गई. लेकिन सरकार का दबाव बढ़ा तो डेडलाइन और घटाकर नवंबर 2018 कर दी गई. इसके बाद भी अधिकारियों को साफ तौर पर निर्देश दिए गए कि फ्लाईओवर का काम जून 2018 तक हर हाल में पूरा कर लिया जाए.

फ्लाईओवर के मलबे में 50 से ज्यादा लोग दब गए थे, जिन्हें अब निकाल लिया गया है.

सरकारी आदेश और पीएम का संसदीय क्षेत्र. फिर क्या था. अधूरे काम को पूरा करने के लिए काम की रफ्तार बढ़ा दी गई. जिस राज्य सेतु निगम के अधिकारी एक शिफ्ट में भी पूरा काम नहीं करवा पा रहे थे, वो तीन-तीन शिफ्ट में काम करने लगे. कोशिश ये थी कि जून 2018 में जब सरकार की ओर से काम के बारे में पूछा जाए, तो उनके पास दिखाने के लिए फ्लाईओवर का कम से कम ढांचा तो रहे. और इसी तेजी ने 18 लोगों की जान ले ली.

फ्लाईओवर बनाने के लिए फरवरी में ही 63 में से 45 पिलर खड़े किए जा चुके थे. इन पर बीम रखी जा रही थी, लेकिन उन्हें कसा नहीं जा रहा था. गिरी हुई बीम भी फरवरी में ही रखी गई थी, जिसे दोनों पिलरों पर कसा नहीं गया था. इस बीच काम चल रहा था और नीचे ट्रैफिक भी चल रहा था. इस ट्रैफिक में बड़े-बड़े ट्रक भी शामिल थे, जिनके चलने की वजह से कंपन हो रहा था. इसी बीच तेज आंधी भी आई, हल्के भूकंप के भी झटके महसूस किए गए और फिर ट्रैफिक का चलना जारी रहा. जानकारों की मानें, तो इन्हीं वजहों से बीम का बैलेंस बिगड़ गया और वो पिलर से फिसलकर लोगों और गाड़ियों पर गिर गई, जिसमें 18 लोगों की मौत हो गई.

देर रात तक एनडीआरएफ मलबे में दबे लोगों को निकालने की कोशिश में जुटी थीं.

फिर तो जांच, मुआवजा, सस्पेंशन और वो सारी कवायदें होने लगीं, जो किसी भी हादसे के बाद स्वाभाविक तौर पर होती हैं. लेकिन हादसे से पहले क्या हुआ.

1. बनारस में एक फ्लाई ओवर बनना था, जिसे तीन सरकारें मिलकर 9 साल में भी नहीं बना पाईं.

2. फ्लाईओवर बनाने का काम चलता रहा. जल्दबाजी इतनी की गई कि बीम रख दी गई और उसे दोनों किनारों पर जोड़ा नहीं गया.

3. काम चलता रहा और साथ में उसके नीचे ट्रैफिक भी. लोगों के साथ भारी गाड़ियों का आना-जाना जारी रहा. हादसा हुआ, उस वक्त भी गाड़ियां आ-जा रही थीं और इसी वजह से मौतों का आंकड़ा बढ़ गया.

4. वाराणसी के कमिश्नर दीपक कुमार लगातार ट्रैफिक पुलिस से कहते रहे कि ट्रैफिक रोका जाए, उसे डायवर्ट किया जाए, लेकिन ट्रैफिक पुलिस ने वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की. यूपी सेतु निगम भी बार-बार ट्रैफिक डायवर्जन की मांग करता रहा.

varanasi

5. जिस जगह पर काम चल रहा था, उसकी बैरिकेडिंग नहीं की गई. नियमों के मुताबिक इस तरह के काम के दौरान पूरी जगह को सील कर दिया जाता है. चार फीट दाएं और चार फीट बाएं बैरीकेडिंग की जाती है. लाल झंडे और लाइट लगाई जाती है. जैसे जब मेट्रो का काम चल रहा होता है, तो काम वाली जगह पर अस्थाई तौर पर लोहे की बैरिकेडिंग कर दी जाती है. वाराणसी में ऐसा नहीं हुआ.

6. नियमों के मुताबिक किसी जगह पर दिन के वक्त भारी काम उसी स्थिति में हो सकता है, जब वहां पर लोग न हों. अगर लोग मौजूद हैं, तो काम रात में ही होना चाहिए. वाराणसी में ऐसा नहीं हुआ. डेडलाइन पूरी करने की जल्दबाजी में तीन शिफ्टों में काम होता रहा.

7. हादसे के बाद के लिए प्रशासन के पास कोई प्लान नहीं था. हादसे के बाद बीम के नीचे दबे लोगों को निकालने के लिए न तो वक्त पर सीबी पहुंची, न अधिकारी और न ही स्वास्थ्य विभाग की टीम. पुलिस भी करीब आधे घंटे के बाद पहुंची. इस दौरान आम लोग ही बचाव की कोशिश करते रहे, लेकिन बीम को हिलाना उनके बस की बात नहीं थी. एनडीआरएफ के आने के बाद ही लोग निकाले जा सके.

और बात अब उत्तर प्रदेश राज्य सेतु निगम की

setu nigam

उत्तर प्रदेश का राज्य सेतु निगम यूपी ही नहीं देश के और भी राज्यों में पुल बनाने का काम करता है. लेकिन राज्य सेतु निगम के पास आधुनिक तकनीक का अभाव है. सेतु निगम अब भी 20 साल पुरानी मशीनों और तकनीक का ही इस्तेमाल करता आ रहा है. यही वजह है कि जब हादसा हुआ और राज्य सेतु निगम की क्रेन मौके पर पहुंची, तो वो गिरे हुए बीम को हिला भी नहीं पाई. इसके अलावा सेतु निगम अपनी लापरवाही के लिए भी पहले से कुख्यात है. हालिया मामला तो 19 फरवरी का ही है, जब लापरवाही की वजह से सेतु निगम के परियोजना निदेश के खिलाफ 19 फरवरी को सिगरा थाने में केस दर्ज करवाया गया. आरोप लगाया गया कि परियोजना निदेशक काम के दौरान लोगों की सुरक्षा के लिए गंभीर नहीं हैं, ट्रैफिक चल रहा है और ट्रैफिक वालंटियर्स तैनात नहीं हैं. लेकिन पुलिस की लापरवाही सेतु निगम के प्रोजेक्ट मैनेजर से भी ज्यादा थी और उसने कोई ऐक्शन नहीं लिया.

हादसे के बाद देर रात मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मौके पर पहुंचे और जांच के आदेश दिए.

यानी हर जगह पर लापरवाही. हर जगह पर उदासीनता. वो चाहे सरकार हो या फिर सरकार के अधिकारी. किसी ने भी हादसे से पहले ध्यान नहीं दिया. ध्यान सिर्फ इस बात पर था कि किसी भी तरह से 2018 के अंत तक पुल बन ही जाए. और जब तक ध्यान जाता, 18 लोगों की मौत हो चुकी थी. इसके बाद तो चीफ प्रोजेक्ट मैनेजर और दो और प्रोजेक्ट मैनेजर को सस्पेंड कर दिया गया. कृषि उत्पादन आयुक्त आरपी सिंह के नेतृत्व में जल निगम और सिंचाई विभाग के चीफ इंजीनियर को जांच सौंप दी गई. वाराणसी के मैजिस्ट्रेट मनोज कुमार राय को मैजिस्ट्रेटी जांच सौंप दी गई और सिगरा थाने में सेतु निगम के अधिकारियों और फ्लाईओवर बना रहे लोगों पर गैर इरादतन हत्या का केस दर्ज कर लिया गया. लेकिन एक बात साफ है और वो ये कि इन सारी कवायदों से भी वो 18 लोग वापस नहीं आ पाएंगे, जिनकी इस हादसे ने जान ली है. हो ये सकता है कि हादसे से सबक लिया जाए, लापरवाहों पर सख्ती की जाए और ऐसी व्यवस्था की जाए कि भविष्य में ऐसे हादसों को रोका जा सके.


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