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चारधाम प्रोजेक्ट क्या है, जिसके एक नियम को 'हिमालयन ब्लंडर' कहा जा रहा है

नदी
को आज देखा नंगा.
पानी उसका
कोई पी गया है,
नदी अपनी रेत में
अपने को खोजती.
एक बुल्डोज़र
उस रेक को ट्रक में भर कर,
नदी को शहर में
पहुंचा रहा है.

प्रकृति के दोहन से जुड़ी यह कविता कुमार मंगलम की है. आज यह कविता इसलिए, क्योंकि बात पर्यावरण से जुड़े मसले पर.

उत्तराखंड में एक हाइवे तैयार हो रहा है. इसके जरिए राज्य के चार बड़े तीर्थस्थलों से सालभर की कनेक्टिविटी हो जाएगी. इसका नाम ‘चारधाम प्रोजेक्ट’ है. लेकिन प्रोजेक्ट पहाड़ों से होकर गुजरता है, तो इस पर कई सवाल उठे. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने प्रोजेक्ट को लेकर सलाह देने के लिए एक कमिटी बनाई थी. इसका मुखिया बनाया गया रवि चोपड़ा को. चोपड़ा पर्यावरण मामलों के जानकार हैं और देहरादून स्थित पीपल्स साइंस इंस्टीट्यूट के निदेशक रह चुके हैं. इस कमिटी ने पिछले सप्ताह कोर्ट में रिपोर्ट सबमिट कर दी.

लेकिन कमिटी में प्रोजेक्ट की सिफारिशों को लेकर दो धड़े हो गए. एक गुट में रवि चोपड़ा समेत चार लोग हैं, जबकि दूसरे में 21 लोग हैं. चोपड़ा और उनके चार साथियों ने प्रोजेक्ट में सड़क की चौड़ाई 12 मीटर रखे जाने पर आपत्ति जताई है. ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की खबर के अनुसार, चोपड़ा और उनके साथियों ने 12 मीटर के नियम को ‘हिमालयन ब्लंडर’ यानी भयानक गलती बताया है. वहीं कमिटी के 21 लोगों ने प्रोजेक्ट को सही बताया है. उन्होंने सड़क की चौड़ाई को हरी झंडी दी है.

चार धाम प्रोजेक्ट का दूसरा नाम ऑल वेदर रोड प्रोजेक्ट भी है.
चार धाम प्रोजेक्ट का दूसरा नाम ‘ऑल वेदर रोड प्रोजेक्ट’ भी है.

अब इस प्रोजेक्ट को आसान भाषा में समझ लेते हैं

क्या है चारधाम प्रोजेक्ट

यह एक हाइवे प्रोजेक्ट है. इसके तहत केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री जैसे उत्तराखंड के चार धाम को आपस में हाइवे के जरिए जोड़ने की योजना है. प्रोजेक्ट के तहत 889 किलोमीटर लंबी सड़कों को चौड़ा किया जा रहा है और इन्हें हाइवे में बदला जा रहा है. साथ ही सड़कों की मरम्मत भी हो रही है. साल 2017 के विधानसभा चुनावों से पहले दिसंबर 2016 में पीएम नरेंद्र मोदी ने इसका ऐलान किया था. पीएम मोदी ने इस प्रोजेक्ट को 2013 की केदारनाथ त्रासदी में मरने वाले लोगों के लिए श्रद्धांजलि बताया था. पहले इस प्रोजेक्ट का नाम ‘ऑल वेदर रोड प्रोजेक्ट’ था. लेकिन बाद में नाम बदलकर ‘चारधाम प्रोजेक्ट’ किया गया.


क्या-क्या होगा इस प्रोजेक्ट में?

जैसा कि बताया कि यह चारधाम को सड़क से जोड़ने की योजना है. इसमें आने और जाने, दोनों तरफ डबल लेन सड़कें बनाई जाएंगी. इसके तहत पुरानी सड़कों को ठीक किया जाएगा. जहां पर सड़कों की चौड़ाई कम है, वहां पर चौड़ाई बढ़ाई जाएगी. सड़क की चौड़ाई 12 मीटर करने की योजना है. कई जगहों पर बाइपास सड़कें, नए पुल और सुरंगें भी बनाई जाएंगी.

कहां-कहां से गुजरेगा यह प्रोजेक्ट

चार धाम प्रोजेक्ट में एक मुख्य सड़क है, जिस पर आगे बढ़ने के साथ चार अलग-अलग रास्ते निकलते हैं, जो चारों धाम को जाते हैं. यह सड़क ऋषिकेश से शुरू होकर उत्तर दिशा में माना नाम के गांव तक जाती है. इससे पहला रास्ता, ऋषिकेश से निकलेगा, जो धारासु नाम की जगह तक जाएगा.

दूसरा, धारासु से एक रास्ता यमुनोत्री और दूसरा गंगोत्री जाएगा.

तीसरा, यह रास्ता भी ऋषिकेश से शुरू होगा और रुद्रप्रयाग तक जाएगा. रुद्रप्रयाग से एक रास्ता केदारनाथ के लिए गौरीकुंड तक निकल जाएगा.

चौथा, रुद्रप्रयाग से एक रास्ता आगे बद्रीनाथ के लिए माना गांव तक जाएगा.

साथ ही टनकपुर से पिथौरागढ़ के रास्ते को हाइवे में बदला जा रहा है.

चार धाम प्रोजेक्ट के तहत तैयार होने वाली सड़कें.
चार धाम प्रोजेक्ट के तहत तैयार होने वाली सड़कें.

कितना पैसा लगेगा और कब तक पूरा होगा?

जिस समय प्रोजेक्ट का ऐलान हुआ था, उस समय इस पर करीब 12 हजार करोड़ रुपये का खर्चा बताया गया था. वैसे तो इस प्रोजेक्ट को अभी तक पूरा हो जाना था. लेकिन अब कहा जा रहा है कि यह साल 2021 के आखिर तक पूरा हो सकता है. हालांकि जानकार कहते हैं कि यह प्रोजेक्ट लंबा खींचेगा. इस प्रोजेक्ट के तहत कई जगहों पर काम पूरा हो चुका है, जबकि कई जगहों पर अभी काम शुरू भी नहीं हुआ है. राज्य सरकार के अनुसार, इस प्रोजेक्ट के तहत 250 किलोमीटर सड़क चौड़ी हो चुकी है. 400 किलोमीटर सड़क पर काम हो रहा है, जबकि 239 किलोमीटर सड़क पर अभी काम शुरू होना है, क्योंकि पर्यावरण से जुड़ी मंजूरी नहीं दी गई है.

कितना जरूरी है यह प्रोजेक्ट

इस बारे में हमने बात की उत्तराखंड के पत्रकार रोहित जोशी से. उन्होंने बताया-

कहने को तो यह प्रोजेक्ट चारधाम है. इसे सुनकर यह धार्मिक रूट लगता है. लेकिन यह प्रोजेक्ट रणनीतिक रूप से भी अहम है. इसे ऑल वेदर रोड कहना ज्यादा सही होगा. इसके जरिए भारत अपनी सीमा के नजदीक तक पहुंच रहा है. पिछले दिनों भारत ने लिपुलेख में जो सड़क बनाई थी, वह भी एक तरह से इसी प्रोजेक्ट का हिस्सा है. वह रास्ता कैलाश मानसरोवर जाने के लिए है. लिपुलेख की रोड रणनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है. इसके जरिए अब भारतीय सेना आसानी से चीन-नेपाल सीमा तक पहुंच जाती है.

अच्छा वो जो कमिटी बताई थी, वह क्या है?

चारधाम प्रोजेक्ट पर साल 2017 में काम शुरू हुआा था. लेकिन इसको लेकर कई शिकायतें आईं. आरोप लगे कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया जा रहा है. नियमों का पालन नहीं हो रहा. मनमानी से पेड़ कट रहे हैं. मलबा नदियों में गिराया जा रहा है. कई सामाजिक संस्थाओं ने  पर्यावरण मामलों की सुप्रीम कोर्ट यानी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में अर्जियां दाखिल कीं. बहुत सी अर्जियां होने पर एनजीटी ने मामले को सुप्रीम कोर्ट में भेज दिया. कोर्ट ने मुद्दे की गंभीरता के चलते एक हाई पावर कमिटी बनाई. कमिटी में 25 लोग शामिल किए गए. कुछ निष्पक्ष सदस्य और बाकी सरकारी महकमों से जुड़े हुए.

इसका मुखिया रवि चोपड़ा को बनाया गया. चोपड़ा इससे पहले 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद भी इसी तरह की कमिटी का नेतृत्व कर चुके थे. उस कमिटी को उत्तराखंड में निर्माणाधीन पानी से बिजली बनाने की योजनाओं के आकलन का जिम्मा दिया गया था. बाद में चोपड़ा कमिटी की सिफारिश पर सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड की आधा दर्जन निर्माणाधीन परियोजनाओं का काम रोक दिया था.

अभी चारधाम प्रोजेक्ट के तहत 13 हिस्सों में काम को सड़क मंत्रालय से मंजूरी मिलनी बाकी है. इनमें से आठ हिस्सों में सुप्रीम कोर्ट की ओर से बनाई कमिटी की सिफारिशों के बाद ही काम शुरू किया जा सकता है. इसी संबंध में चोपड़ा कमिटी ने रिपोर्ट जमा कराई है.

केदारनाथ में पीएम मोदी. वे कई बार यहां की यात्रा कर चुके हैं. अपने भाषणों में उन्होंने केदारनाथ को दोबारा से विकसित करने के ऐलान किए हैं.
केदारनाथ में पीएम मोदी. वे कई बार यहां की यात्रा कर चुके हैं. अपने भाषणों में उन्होंने केदारनाथ को दोबारा से विकसित करने के ऐलान किए हैं.

अब कमिटी में ऐसा क्या हुआ कि विवाद हो गया?

जैसा कि सबसे ऊपर बताया था कि सड़क की चौड़ाई के मसले पर कमिटी दो गुटों में बंट गई. कमिटी के मुखिया चोपड़ा और उनके तीन साथियों ने चारधाम प्रोजेक्ट में सड़क की 12 मीटर चौड़ाई करने पर सवाल उठाया है. वहीं 21 लोगों ने इसे सही बताया. ऐसे में दोनों गुटों की ओर से दो अलग-अलग रिपोर्ट पर्यावरण मंत्रालय और सुप्रीम कोर्ट दोनों जगह सबमिट की गई.

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ को रवि चोपड़ा ने बताया कि कमिटी के दो सदस्यों- हेमंत ध्यानी और नवीन जुयाल ने प्रोजेक्ट को 53 छोटे-छोटे प्रोजेक्ट में बदलने पर भी सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि एनवायरमेंट इंपैक्ट एसेसमेंट यानी पर्यावरण पर पड़ने वाले असर के आकलन से बचने के लिए प्रोजेक्ट को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटा गया है.

एनवायरमेंट इंपैक्ट एसेसमेंट क्या होता है?

दरअसल, किसी भी प्रोजेक्ट, प्लान या नीति से पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन किया जाता है. जैसे- अगर कहीं रो़ड बननी है, तो यह बताना होता है कि उससे पर्यावरण पर क्या असर पड़ेगा. जैसे- रास्ते में कितने पेड़ कटेंगे? उससे जानवरों पर क्या असर पड़ेगा? आदि. पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार, 100 किलोमीटर से बड़े किसी भी रोड प्रोजेक्ट पर एनवायरमेंट इंपैक्ट एसेसमेंट कराना होता है. लेकिन प्रोजेक्ट के 100 किलोमीटर से कम होने पर ऐसा नहीं होता है. अभी उत्तराखंड में यही हुआ है. वहां पर करीब 900 किलोमीटर के प्रोजेक्ट को 53 हिस्सों में बांट दिया. और प्रत्येक हिस्सा 100 किलोमीटर से कम का है.

प्रकाश जावडेकर अभी देश के पर्यावरण मंत्री हैं. लेकिन आलोचक उनके मंत्रालय को 'क्लीयरेंस मिनिस्ट्री' कहने लगे हैं.
प्रकाश जावडेकर अभी देश के पर्यावरण मंत्री हैं. लेकिन आलोचक उनके मंत्रालय को ‘क्लीयरेंस मिनिस्ट्री’ कहने लगे हैं.

प्रोजेक्ट के बारे में और कहा गया है?

प्रोजेक्ट पर सवाल उठाने वाले हेमंत जुयाल ने ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ से कहा कि उन्होंने ऐतिहासिक डेटा के आधार पर आपत्ति जताई है. जिन जगहों से सड़क गुजर रही है, वह काफी संवेदनशील हैं. यहां पर हिमालय पहाड़ काफी कमजोर है. ऐसे में सड़क चौड़ी करना घातक हो सकता है. जुयाल ने कहा,

हमने कहा है कि पीपलकोटी और पातालगंगा तक के रास्ते को तो छेड़ा भी न जाए. हमारे पास इमारतें बनाने और सड़कें चौड़ी करने का पैसा तो है, लेकिन भू स्खलन यानी चट्टानों को गिरने से रोकने  का पैसा नहीं है. उत्तराखंड जैसे इलाकों में यही काम सबसे अहम होता है.

जुयाल और उनके साथियों ने कहा है कि जहां पर सड़क चौड़ी करने के लिए पहाड़ों को काटा जा चुका है, वहां पर भी केवल 5.5 मीटर में ही सड़क बनाई जाए. बाकी जगह हरियाली और पैदल चलने के लिए छोड़ दी जाए. पूरे प्रोजेक्ट में 12 मीटर चौड़ी सड़क बनाना नुकसानदेह है.

कमिटी के मुखिया रवि चोपड़ा बोले- पहाड़ों की चिंता नहीं हो रही

कमिटी के मुखिया रवि चोपड़ा ने कहा कि हिमालय के पहाड़ों की चिंता नहीं की जा रही है. प्रोजेक्ट के दौरान इनकी अनदेखी की गई. सड़क की चौड़ाई पर्यावरण को होने वाले नुकसान में बड़ा फैक्टर है. लेकिन कमिटी के बाकी लोग इस बात को समझ ही नहीं रहे. उन्होंने रिपोर्ट में सुझाव दिया है कि सड़क की चौड़ाई आठ मीटर से ज्यादा न हो. वहीं कमिटी के बाकी सदस्य 12 मीटर चौड़ाई पर ही अड़े रहे.

उन्होंने ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ से कहा,

सुप्रीम कोर्ट की हाई पावर कमिटी बनाने के बाद प्रोजेक्ट के लिए पहाड़ों और पेड़ों की कटाई रोक देनी चाहिए थी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. हमने देखा कि कुंड नाम की जगह पर ओक के घने पेड़ों को पूरी तरह उखाड़ दिया गया, जबकि हमने उनसे हमारी सिफारिशें आने तक का इंतजार करने को कहा था. कमिटी के बाकी के 21 लोगों को लगता है कि वे जो फैसला लेंगे, वही आखिरी होगा, क्योंकि उनके पास बहुमत है. फिर भले ही वह फैसला नियमों के खिलाफ क्यों न हो.

और कमिटी के दूसरे गुट का क्या कहना है?

उनका आरोप है कि रवि चोपड़ा ने कमिटी के फैसलों में तब्दीली की है. इन फैसलों पर सर्वसम्मति से फैसला हुआ था. साथ ही उन्होंने बहुमत वाले पक्ष को कमजोर करने के लिए कई सिफारिशों को फिर से तैयार किया है. इससे मामला फिर से सुप्रीम कोर्ट में अटक जाएगा और कमिटी के इतने काम का कोई मतलब नहीं रहेगा.

2013 की केदारनाथ आपदा में 6,000 से ज्यादा लोग मारे गए. सैकड़ों लोग लापता हो गए. गांव के गांव साफ हो गए. दर्जनों दूर-दराज के गांवों को जाने वाली सड़कें, पुल कुछ नहीं बचा. ये बहुत बड़े स्तर पर हुई तबाही थी (फोटो: AP)
2013 की केदारनाथ आपदा में 6,000 से ज्यादा लोग मारे गए. सैकड़ों लोग लापता हो गए. गांव के गांव साफ हो गए. दर्जनों दूर-दराज के गांवों को जाने वाली सड़कें, पुल कुछ नहीं बचे. ये बहुत बड़े स्तर पर हुई तबाही थी (फोटो: AP)

चारधाम प्रोजेक्ट पर एक्सपर्ट क्या कहते हैं?

एसपी सत्ती, जियोलॉजिस्ट

वे इस प्रोजेक्ट में हो रही लापरवाही को केदारनाथ जैसी आपदा के बुलावे के रूप में देखते हैं. उन्होंने कहा कि हिमालय में 12 मीटर चौड़ी रोड की जरूरत नहीं है. लेकिन फिर भी सरकार इस पर अड़ी हुई है. इतनी चौड़ी रोड तो यूरोप में आल्प्स पर्वतों में भी नहीं है. बकौल सत्ती-

पहाड़ों में अच्छी रोड होनी चाहिए. लेकिन अच्छी रोड का मतलब चौड़ी रोड नहीं होता. इस प्रोजेक्ट के तहत कई जगह पर्वतों को काट दिया गया है. इसके साइड इफेक्ट भी दिखने लगे हैं. जगह-जगह लैंड स्लाइड यानी चट्टानें खिसक रही हैं. आज तक इस रोड पर कोई सरकार या एजेंसी लैंड स्लाइड को रोक नहीं पाई है. हम केदारनाथ त्रासदी से भी सबक नहीं ले रहे हैं.

उनका कहना है कि इंडियन रोड कांग्रेस ने साल 2018 में पहाड़ों में रोड की चौड़ाई 7-8 मीटर करने की सिफारिश कर दी थी. लेकिन फिर भी सरकार मान नहीं रही है. सरकार कह रही है कि यह सड़कें रणनीतिक रूप से भी अहम है. लेकिन चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ बिपिन रावत ने खुद कहा है कि उन्हें चौड़ी नहीं, अच्छी रोड चाहिए.

सुशील बहुगुणा, वरिष्ठ पत्रकार और पर्यावरण मामलों के जानकार

उनका कहना है कि पहाड़ों को काट-काटकर मलबा नदियों में डाला जा रहा है. इससे नदियां मर रही हैं. 12 मीटर चौड़ी रोड की जिद में 100-200 साल पुराने देवदार के पेड़ों को मनमर्जी से काटा जा रहा है. हालात बहुत खराब हैं. न केवल हरियाली, बल्कि पानी के रास्ते भी खत्म कर दिए गए हैं. उनका कहना है-

हिमालय नया पहाड़ है. बहुत कमजोर है. एक बार कहीं से इसे अगर काटा जाएगा, तो आगे का बड़ा हिस्सा अस्थिर हो जाएगा. ऐसे में लैंड स्लाइड होगी. लैंड स्लाइड से सड़क पर हादसे भी बढ़ेंगे. इस पूरे प्रोजेक्ट में पर्यावरण की अनदेखी की गई है. चोपड़ा और उनके साथियों ने वाज़िब बात कही है. वे पहाड़ को जानते हैं, समझते हैं, उन्हें इसकी चिंता है. लेकिन सरकार पहाड़ की चिंता नहीं कर रही.


Video: प्लास्टिक वेस्ट से कैसे बनती है सड़क, कितनी टिकाऊ होती है?

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