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कैंपस किस्सा: इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के छात्र एक मशहूर दुकान का खाना नहीं खाते

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कैंपस. इलाहाबाद शहर में इसे यूनिवर्सिटी के नाम से जाना जाता है. दूसरे विश्वविद्यालयों की तरह इस कैंपस की भी अपनी सीमा है, लेकिन मानता कोई नहीं है. बाउंड्री है, लेकिन कोई मानने को तैयार नहीं होता है. शहर में यूनिवर्सिटी है या यूनिवर्सिटी में शहर बसा है, कह नहीं सकते. लेकिन यूनिवर्सिटी के हॉस्टलों की अपनी एक सीमा है और इसे हर कोई मानता है. हर हॉस्टल का अपना एक कायदा-कानून है. इसे कभी लिखा नहीं गया, लेकिन पीढ़ी दर पीढ़ी ट्रांसफर होता रहता है. ऐसा ही एक कायदा है चंद्रशेखर आजाद से जुड़ा हुआ. इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हॉस्टल में आने वाले हर छात्र को इंट्रो के समय ही इसे कायदे से समझा दिया जाता है. या आसान शब्दों में कहें तो शपथ दिलाई जाती है.

हॉस्टल की ट्रेनिंग यानी इंट्रो

कैंपस तो कैंपस, शहर में भी हॉस्टलों का अलग ही भौकाल होता है. कटरा के किसी दुकानदार से बता दो कि हॉलैंड हॉल हॉस्टल से हैं तो जूते के दाम में अचानक से 50-60 फीसद की गिरावट आ जाती है. कोचिंग वाले फीस के 20वें हिस्से पर पढ़ाने को तैयार हो जाते हैं. और पुलिस. इसमें तो तैनात हर दूसरा एसपी और सीओ यूनिवर्सिटी के किसी हॉस्टल का पुराना छात्र रहा होता है.

हॉस्टल पर नए छात्रों के कब्जे के लिए बाकायदा फोर्स बुलाई जाती है.
हॉस्टल पर नए छात्रों के कब्जे के लिए बाकायदा फोर्स बुलाई जाती है.

खैर इस भौकाल की शुरुआत होती है इंट्रो से. जब नया लड़का हॉस्टल में आता है तो बाकायदा उनका इंट्रो होता है. पूरे एक महीने तक. इस इंट्रो में ‘हर तरह’ की ट्रेनिंग दी जाती है. नियम-कायदे समझाए जाते हैं. इस ट्रेनिंग का जिम्मा सीनियर्स पर होता है. और ये सीनियरटी हॉस्टल में एनरोलमेंट की तारीख से तय होती है न कि यूनिवर्सिटी की क्लास से. मतलब ये कि बीए फाइनल में पढ़ने वाला लड़का अगर हॉस्टल में पहले एनरोल हुआ है तो वो बाद में एनरोल होने वाले एमए वाले छात्र का सीनियर कहा जाएगा. हर हॉस्टल का अपना एक अलग ही इंट्रो सिस्टम होता है. लेकिन कुछ नियम ऐसे हैं जो लगभग सारे हॉस्टलों में कॉमन होते हैं.
जैसे-
1 सीनियर को देखते ही सर प्रणाम कहना है.
2 सीनियर से बात करते हुए शर्ट की तीसरी बटन को देखते रहना है (यानी सिर झुका के रखना है)
3 अगर साथ में सीनियर है, तो जूनियर को कभी किसी चीज का पैसा नहीं देना है. चाहे वो चाय की दुकान हो या कपड़े की. पैसा सीनियर ही देगा.
4 कटरा में स्थित इलाहाबाद की सबसे नामचीन कचौड़ी की दुकान पर कभी खाना नहीं खाना है. क्योंकि वो देशद्रोही है.

चौथा वाला थोड़ा अटपटा लग रहा होगा. लेकिन ये ऐसा नियम है जिसे हॉस्टल में रहने वाले सभी छात्र फॉलो करते हैं. इसका कारण छात्रों का चंद्रशेखर आजाद से भावनात्मक जुड़ाव है. कहा जाता है कि 1931 में उस दुकान के मालिक ने चंद्रशेखर आजाद के इलाहाबाद में होने की खबर पुलिस को दी थी. हालांकि ये बात कहीं रिकॉर्ड में नहीं है. लेकिन किस्सों, कहानियों और किंवदंतियों में हर कोई इस बात को स्वीकार करता है. और छात्र इसी किस्से के बहाने अपने हिस्से का सम्मान अपने नायक को देना चाहते हैं. वो नायक जो इलाहाबाद के छात्रों की तरफ से उठने वाले हर आंदोलन, हर प्रतिरोध में सर्वप्रथम गुंजायमान होता है.

आजाद पार्क (पहले अल्फ्रेड पार्क) आज भी तमाम आंदोलनों का गवाह बनता है. शहादत स्थल पर मूंछों पर ताव देते आजाद की प्रतिमा आज भी युवाओं के अंदर लड़ने का जज्बा का पैदा कर देती है. ऐसे में छात्र हर उस चीज से दूर ही रहना चाहते हैं, जिसकी भूमिका संदिग्ध रही हो.

शहीद चंद्रशेखर आजाद को घेरकर खड़े अंग्रेज अफसर और सिपाही. (फोटो सोर्स-ट्विटर)
शहीद चंद्रशेखर आजाद को घेरकर खड़े अंग्रेज अफसर और सिपाही. पीछे पेड़ से उनकी साईकिल टिकी हुई है.   (फोटो सोर्स-ट्विटर)

क्या हुआ था उस दिन?

फरवरी 1931. हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन के अधिकतर क्रांतिकारी जेल में थे. चंद्रशेखर आजाद उनकी रिहाई की कोशिश कर रहे थे. पुलिस की लिस्ट में मोस्ट वांटेड आजाद इलाहाबाद में थे. 27 फरवरी, अल्फ्रेड पार्क में एक जामुन के पेड़ के नीचेअपने साथी सुखदेव राज से बात कर रहे थे. तभी पुलिस की एक जीप आकर रुकी. एसपी जॉन नॉट बावर और डिप्टी एसपी विश्वेश्वर सिंह गाड़ी से उतरे. आजाद सतर्क हो गए थे. लेकिन जब तक वे अपनी पिस्टल निकाल पाते नॉट बावर ने उन पर गोली दाग दी थी. गोली आजाद की जांघ चीरते हुए निकल गई. घायल आजाद ने सुखदेव को तुरंत वहां से निकल जाने को कहा. और अकेले मोर्चा संभाल लिया. उन्होंने विश्वेश्वर सिंह का जबड़ा गोली मारकर तोड़ दिया. और जब आखिरी गोली बची तो अपने उपनाम के अनुसार खुद को आजाद कर लिया.

जब काफी देर तक आजाद की तरफ से फायरिंग नहीं हुई तो सिपाही आगे बढ़े. लेकिन उनके पास जाने की हिम्मत किसी की नहीं थी. पहले उनके शरीर पर एक और गोली मारी गई फिर बांस से छूकर सत्यापित किया गया. इसके बाद आजाद के पास लोग आए. अल्फ्रेड पार्क में हुए इस एनकाउंटर में मुखबिरी तो हुई थी. क्योंकि जिस आजाद को कैद कर पाने में पुलिस नाकाम रही थी, उनके आजाद पार्क में होने की बात बस 30 मिनट में पता चल गई थी. आजाद की शहादत की खबर सुनकर पूरा शहर उमड़ पड़ा था. हजारों की भीड़ ने रसूलाबाद घाट पर गंगा किनारे चंद्रशेखर आजाद को अंतिम विदाई दी.


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