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क्या है नितिन गडकरी का 'फ़्लेक्स इंजन' जो पेट्रोल डीज़ल के बढ़ते दामों से हमें बचाएगा?

वो फ़िल्मी डायलॉग तो सुना होगा आपने, अमिताभ बच्चन पूछते हैं, “मेरे पास गाड़ी है, बंगला है, बैंक-बैलेंस है. तुम्हारे पास क्या है?” जवाब आता है- “मेरे पास मां है.” आज की ख़बर से रिलेट करें तो डायलॉग बनेगा, “पेट्रोल-डीज़ल महंगा है, कोई बात नहीं. लेकिन हमारे पास एथेनॉल है.” जी हां, हम वैकल्पिक ईंधन की बात कर रहे हैं. केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने गुरुवार, 21 अक्टूबर को कहा कि केंद्र छह महीने में सभी प्रकार के वाहनों के लिए फ्लेक्स फ्यूल इंजन अनिवार्य कर देगा. ये इंजन एक से अधिक ईंधन पर चल सकते हैं.

क्या है पूरा मामला? और कैसे एथेनॉल गाड़ियों के फ्यूल के लिए एक अच्छा सबस्टीट्यूट हो सकता है. इंजन कैसे काम करेंगे. रेट क्या रहेगा. कुल-मिलाके कितना फर्क पड़ेगा हमारे ट्रांसपोर्टेशन पर. सबकुछ विस्तार से समझेंगे.

शुरू से शुरू करते हैं. एक दिन हम कुछ दोस्त चाय की टपरी पर मज़े से चाय की चुस्कियां ले रहे थे. वो कहते है न हाथ में चाय की प्याली हो तो उस वक़्त जो बातें होती है बड़ी अद्भुत होती हैं. मेरे मन में भी एक बात आई. एक दोस्त से मैंने कहा, “महंगाई बढ़ रही है, अंग्रेजी में कहें तो इन्फ्लेशन. पेट्रोल-डीज़ल की कीमतों का अभी ये हाल है. दुनिया में तेल ख़त्म हो रहा है. आगे क्या होगा.”

सवाल भविष्य से जुड़ा था. ऐसे सवाल मनोरंजन के बीच में आ जाएं तो सुनने वालों के चेहरों के भाव गंभीर हो जाते हैं. फिर भी तमाम सवाल-जवाब हुए. और बात आके टिकी नितिन गडकरी के उस बयान पे, जो हमने आपको शुरू में बताया.

#नेताजी का बयान

द टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने अपने बयान में कहा कि केंद्र सरकार अगले छह महीने में सभी तरह के व्हीकल्स के लिए फ्लेक्स फ्यूल इंजन(Flex Fuel Engine) अनिवार्य कर देगी. ये इंजन एक से ज्यादा टाइप के ईंधन पर चल सकते हैं. दिल्ली में एक कार्यक्रम में बोलते हुए, गडकरी ने आगे कहा,

“पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों को देखते हुए, वैकल्पिक ईंधन की जरूरत है. एथेनॉल, सीएनजी, बायो-एलएनजी और इलेक्ट्रिक कुछ उपलब्ध विकल्प हैं. उनमें से, एथेनॉल सबसे सस्ता है.”

गडकरी ने ये भी बताया कि टोयोटा-किर्लोस्कर मोटर्स के विक्रम किर्लोस्कर से उनकी बात हुई है. विक्रम ने उन्हें बताया है कि वे यूरो-VI-उत्सर्जन के पैरामीटर्स का पालन वाले फ्लेक्स फ्यूल इंजन लॉन्च करने के लिए तैयार हैं जो 100% पेट्रोल या 100% एथेनॉल पर चल सकते हैं.
गडकरी के मुताबिक़ उन्होंने टीवीएस और बजाज ग्रुप के एमडी से दोपहिया वाहन बनाने के लिए कहा है जो एथेनॉल पर चल सकें और वे, यानी टीवीएस और बजाज इसके लिए तैयार हैं.

एथनॉल पेट्रोल व डीजल का विकल्प (पिक्चर क्रेडिट - बिज़नेस टुडे)
एथनॉल पेट्रोल व डीजल का विकल्प (पिक्चर क्रेडिट – बिज़नेस टुडे)

अब ये ख़बर सुनके दिमाग की घंटी बजती है और एक सवाल आता है कि आखिर ये फ्लेक्स फ्यूल इंजन है क्या? तो आइए समझते हैं.

# क्या है फ्लेक्स फ्यूल इंजन

फ्लेक्स फ्यूल इंजन समझने से पहले ज़रा ये समझ लें कि अनकन्वेंशनल फ्यूल यानी वैकल्पिक ईंधन और और फॉसिल फ्यूल यानी जीवाश्मीय ईंधन क्या है. अनकन्वेंशनल फ्यूल. वो जिनका पारंपरिक रूप से इस्तेमाल नहीं होता है. ऐसे समझिये कि जो गाय और भैंस का दूध हम पीते हैं उसे अगर कन्वेंशनल मिल्क कहें तो सोया मिल्क और मिल्क पाउडर अनकन्वेंशनल मिल्क यानी गैरपारंपरिक कहे जायेंगे. इसी तरह गोबर गैस प्लांट से निकलने वाली मीथेन गैस जिसका इस्तेमाल रसोई घर में खाना पकाने के लिए होता है. इसे अनकन्वेंशनल फ्यूल कह सकते हैं. सोलर एनर्जी भी इसी तरह का एक फ्यूल कही जा सकती है. माने ये जीवाश्मीय ईंधन यानी फॉसिल फ्यूल जोकि कन्वेंशनल हैं उनसे अलग हैं. फॉसिल फ्यूल भी ज़रा ढंग से समझ लें.

साइंस की किताबों में पढ़ा होगा आपने. करोड़ों सालों तक मृत पौधे और जीव-जंतुओं के समुद्र की तलछट में जमा रहने के बाद इनकी एक मोटी परत सी बन जाती है. और जब इसपर करोड़ों सालों तक समुद्र के पानी का दबाव पड़ता है तो इस स्लिट के अन्दर गर्मी बढ़ती है. इसी गर्मी से कच्चा तेल बनता है. ये प्रक्रिया बड़ी लम्बी है. और आज भी चल रही है. कैसे? फिर कभी बताएंगे. फ़िलहाल ये समझ लीजिये कि इसी प्रक्रिया में बने कच्चे तेल को फॉसिल फ्यूल कहते हैं. बाद में रिफाइनरीज समुद्र से निकालके इस तेल का शोधन करती हैं. और हमें मिलता है शुद्ध पेट्रोल और डीज़ल वगैरह. अब बात फ्लेक्स फ्यूल इंजन की.

Oil Rig Work
तेल के कुओं पर काम करने वाले वर्कर्स. (फोटो-ओएनजीसी)

अब आते हैं फ्लेक्स फ्यूल इंजन पे. ये दरअसल वैकल्पिक ईंधन यानी अनकन्वेंशनल फ्यूल पे चलने वाला इंजन है. जिसे एक से ज्यादा तरह के फ्यूल्स पर चलने के लिए डिज़ाइन किया गया है. फ्लेक्स फ्यूल क्या? ये कोई नया टर्म नहीं है, उन्हीं अनकन्वेंशनल फ्यूल को फ्लेक्स फ्यूल कह दिया जाता है जिन्हें हम अभी बता चुके हैं. हां, इसे ये नया नाम – फ्लेक्स फ्यूल, इसकी फ्लेक्सिबिलिटी यानी उपयोग में आसानी और कीमत में कमी की वजह से दिया गया है. हां एक ख़ास बात फ्लेक्स फ्यूल की ये है कि ये असल में दो अलग-अलग फ्यूल्स का मिक्सचर होता है. परसेंटेज वगैरह की बात आगे करेंगे लेकिन मोटा-माटी इसके कॉम्पोनेन्ट की बात करें तो एथेनॉल या मेथेनॉल को गैसोलीन के साथ मिक्स करके जो फ्यूल बनता है वो है फ्लेक्स फ्यूल.

फ्लेक्स इंजन मैकेनिज्म
फ्लेक्स इंजन मैकेनिज्म

फ्लेक्स फ्यूल इन्जंस की टेक्नोलॉजी ऐसी होती है कि इनको चलाने के लिए इस्तेमाल होने वाले कई तरह के फ्यूल्स को एक ही टैंक में स्टोर किया जा सकता है. फ्लेक्स-फ्यूल इंजन और बाई-फ्यूल इंजन में कंफ्यूज़ न होइएगा. बाई-फ्यूल इंजन अलग हैं. बाई मतलब होता है दो. इनमें दो फ्यूल, दो अलग-अलग टंकियों में स्टोर होते हैं. और इंजन एक वक़्त में एक फ्यूल पर चलता है, अब ये अलग-अलग फ्यूल कौन से हो सकते हैं? कोई भी दो, जैसे कंप्रेस्ड नेचुरल गैस (सीएनजी), लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस(एलपीजी), या फिर पेट्रोल.

मान लीजिये कि मेरी गाड़ी पेट्रोल प्लस सीएनजी पे चलती है. इसका मतलब है, गाडी का इंजन, बाई-फ्यूल इंजन है. बाई फ्यूल इंजन है तो फ्यूल की टंकियां भी दो होंगीं. जिनमें अलग-अलग दो फ्यूल्स भरे होंगे. एक टंकी में सीएनजी है. उसपर गाड़ी चलाइए और दूसरे में पेट्रोल. जब गाड़ी गैस पे न चलानी हो तो इंजन का फ्यूल मोड चेंज करके गाड़ी पेट्रोल पे चलेगी. फ्लेक्स फ्यूल इंजन, बाई-फ्यूल इंजन से इसलिए भी अलग है क्योंकि इसमें इंटर्नल कंबशन प्रॉसेस होता है. इंटर्नल कंबशन माने ईंधन के जलने की क्रिया इंजन में ही. जिसके चलते गैसोलीन और एथेनॉल के किसी मिक्सचर से बने फ्लेक्स फ्यूल का 83% तक कंबशन होता है. इसके अलावा फ्लेक्स फ्यूल व्हीकल में एक ही फ्यूल सिस्टम होता है और इस फ्यूल सिस्टम के ज्यादातर कंपोनेंट्स, यानी पार्ट्स पुरानी ‘गैसोलीन ऑनली कार’ की तरह ही लगभग एक ही टाइप के होते हैं.

बाई फ्यूल मैकेनिज्म पर चलने वाली गाड़िया ( पिक्चर क्रेडिट - इंडिया टुडे)
बाई फ्यूल मैकेनिज्म पर चलने वाली गाड़िया ( पिक्चर क्रेडिट – इंडिया टुडे)

ये तो था फ्लेक्स फ्यूल इंजन का बेसिक आईडिया. अब आते हैं एथेनॉल और पेट्रोल की कीमतों पर. पेट्रोल प्राइस तो नंबर 100 पे मस्त अपना डेरा जमा कर बैठी है, लेकिन एथेनॉल की कीमत 55 रुपए प्रति लीटर है. माने पेट्रोल से लगभग आधी कीमत. इस हिसाब से ये एक अच्छा विकल्प मालूम होता है.

अब अगर आपके घर में गाड़ी है तो वो पेट्रोल या फिर डीजल पे चलती होगी. सीएनजी गैस वाली सुविधा है तो अलग बात है. लेकिन बाज़ार में कीमत की बात करें तो पेट्रोल और डीजल दोनों ने अपने भाव बढ़ा रखे हैं. जैसे कि व्हीकल मालिकों से रूठे हुए हों. ऐसी सिचुएशन में हमारे पास दो विकल्प हैं, या तो हम रूठे हुओं को मनाएं और इंतज़ार करें कि कब इनका कीमत वाला मीटर डाउन हो या फिर, दूसरा ऑप्शन देखें, माने रूठे को क्या मनाएं चलो इसके बदले किसी और को लाएं.

# किस विकल्प को चुने

किसी और को लाएं. मगर किसको ? जवाब है एथेनॉल. एथेनॉल, पेट्रोल-डीजल के मुकाबले सस्ता है. तभी तो इसका नाम फ्लेक्स फ्यूल है. फ्लेक्स यानी ‘फ्लेक्सिबिलिटी’ का एब्रीवियेटेड फॉर्म. जिसके मायने हैं लचीलापन. फ्लेक्स फ्यूल का एक फायदा और है. वापस नितिन गडकरी वाली ख़बर पर चलें तो ‘फ़्लेक्स इंजन’ के बारे में नितिन गडकरी ने एक बात ये भी कही कि अमेरिका, ब्राज़ील और कनाडा में BMW, मर्सिडीज़ और टोयोटा की गाड़ियों में फ्लेक्स इंजन लगा होता है. जिससे किसानों को भी बैकअप मिलता है.

BMW, मर्सिडीज़ और टोयोटा की गाड़ियों में फ्लेक्स इंजन मैकेनिज्म पे चलते हुई
BMW, मर्सिडीज़ और टोयोटा की गाड़ियों में फ्लेक्स इंजन मैकेनिज्म पे चलते हुई

अब सोचने वाली बात ये है कि आख़िर खेती- किसानी से फ्लेक्सिबल इंजन का क्या लेना-देना है. दरअसल सीधा लेना-देना है. क्यूंकि एथेनॉल, मक्का, गन्ना, चावल और जौ वगैरह से निकाला जाता है. खास कर मक्के से. अब मान लीजिये इन-फ्यूचर एथेनॉल बेस्ट फ्यूल चलन में आ जाए तो क्या होगा? एथेनॉल प्रोडूस करने वाली फ़सलें उगाने वाले किसानों की कमाई बढ़ेगी.

# पेट्रोल की जगह फ्लेक्स फ्यूल को यूज़ करने के फ़ायदे और भी हैं.

1. टेक्नोलॉजी

फ्लेक्स फ्यूल इंजन की टेक्नोलॉजी बढ़िया है. इंजन में फ्यूल ब्लेंडर सेंसर का इस्तेमाल होता है. जिसके चलते इंजन फ्यूल मिक्सचर में फ्यूल की क्वांटिटी को खुद एड्जस्ट कर लेता है. माने फ्यूल मिक्सचर में कौन सा फ्यूल कितना रहेगा. इंजन तय कर लेता है. जब गाड़ी चलना शुरू होती है तो ये सेंसर एथेनॉल/मेथेनॉल और गैसोलीन के रेशियो और. इन दोनों को मिलाके बने फ्लेक्स फ्यूल में अल्कोहल की कंसंट्रेशन को रीड कर लेता है. इसके बाद काम करता है इंजन का इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल मॉड्यूल. फ्यूल सेंसर इस मॉड्यूल को एक सिग्नल भेजता है. कंट्रोल मॉड्यूल का काम ये कंट्रोल करना है कि किस फ्यूल को टैंक से कितनी क्वांटिटी में इंजन तक पहुंचाना है. अब इस टेक्नोलॉजी की मदद से फायदा ये है कि फ्यूल वेस्टेज तो नहीं ही होगा. इंजन की एफ़ीशियेंसी यानी कार्यक्षमता भी बढ़ेगी.

2. सस्टेनेबिलिटी

दूसरा फायदा है फ्यूल की ‘सस्टेनेबिलिटी.’ यानी टिकाऊपन. फ्लेक्स फ्यूल में अमूमन लगभग 15 से 85 फ़ीसद एथेनॉल होता है. अब चूंकि एथेनॉल गन्ने और मक्के से बनता है तो इसकी सस्टेनेबिलिटी पे शक नहीं कर सकते. कम-अज़-कम फॉसिल फ्यूल की तरह इसकी माइनिंग या रिफाईनिंग तो नहीं करनी. जबतक फॉसिल फ्यूल के भंडार हैं. काम चल रहा है, बाद में क्या होगा. इस टाइप की दिक्कत फ्लेक्स फ्यूल के साथ नहीं है. क्यूंकि जबतक खेती होती रहेगी. फ्लेक्स फ्यूल प्रोड्यूस होता रहेगा. इस प्रोडक्शन को बढ़ाया भी जा सकता है और जितना चाहे उतना. फॉसिल फ्यूल की तरह लिमिट नहीं है.

3. परफॉरमेंस

परफॉरमेंस कैसी रहेगी? पहली बात तो ये है कि आज कल के जमाने मे टेक्नोलॉजी के बिना क्या ही होता है. एक मॉडर्न व्हीकल में 80 तक ECU हो सकते हैं. ECU यानी इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल यूनिट . इन इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल यूनिट्स के काम-काज की रेंज बहुत लंबी-चौड़ी है. फ्यूल इंजेक्शन यानी इंजन तक फ्यूल पहुंचाने से लेके चैम्बर के टेम्परेचर को कंट्रोल करने तक. फ्लेक्स फ्यूल पर चलने वाले इंजन में फ्यूल की जो रनिंग मैकेनिज्म होती है वो गाड़ी के ECU यानी इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल यूनिट के साथ मिलजुलकर काम करती है. माने बढ़िया को-ऑपरेशन के साथ. जिसकी वजह से बेस्ट पॉसिबल माइलेज मिलना आसान हो जाता है. इस लिहाज से भी फ्लेक्स फ्यूल्स बढ़िया साबित होते हैं.

4. पॉल्यूशन

एक बड़ा मुद्दा और भी है पॉल्यूशन का. इतना तो तय है कि फ्लेक्स फ्यूल कंबशन के मामले में पेट्रोल और डीज़ल से बेहतर है. हालांकि पूरी तरह एनवायरमेंट फ्रेंडली तो नहीं कह सकते, लेकिन प्योर फॉसिल फ्यूल्स के मुकाबले कहीं बेहतर.

सवाल एक ये भी हो सकता है कि क्या किसी गाड़ी का इंजन जोकि पेट्रोल ड्राइवेन है, फ्लेक्स फ्यूल पर भी चलेगा? जवाब है, कि हां, ऐसा संभव है. स्पार्क्स इग्निशन इंजन वाली कोई भी कार फ्लेक्स फ्यूल पर भी चल सकती है. बस इसमें वही तकनीकी बदलाव करने पड़ेंगे. मसलन सेंसर्स लगाना, कंट्रोल मॉड्यूल सेट करना वगैरह.

और अब, जब मंत्री जी ने ऐलान कर ही दिया है कि आने वाले 6 महीनों में सभी गाड़ियों में फ्लेक्स इंजन लगाना मैंडेटरी होगा. ऐसे में इस नयी चीज़ के साथ, आपके मन में तमाम सवाल और भी आयेंगे. जैसे एथेनॉल बेस्ड फ्लेक्स फ्यूल की कीमत, इसकी अवेलेबिलिटी, फ्लेक्स फ्यूल, कन्वेंशनल फ्यूल्स से कितना बेहतर हैं वगैरह वगैरह. तो चलिए इन सवालों के भी जवाब देने की कोशिश करते हैं.

#पहला सवाल: पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने का कितना फायदा है?

देखिए पेट्रोल का दाम है 100 रुपए/लीटर. एथेनॉल का दाम है 60 रुपए/लीटर. दाम के हिसाब से एथेनॉल सस्ता है. लेकिन इसमें मिलेगा तो पेट्रोल भी न. और फिर पेट्रोल की परफ़ॉर्मेन्स भी एथेनॉल से बेहतर ठहरी (वही कैलोरिफ़िक वैल्यू वाली बात). अब ये कैलोरीफ़िक वैल्यू क्या होती है? पहले इसे समझ लेते हैं. दाम और काम पे आगे आयेंगे.

# कैलोरिफ़िक वैल्यू क्या होता है

होने को तो कैलोरिफ़िक वैल्यू किसी भी नियतांक में नापी जा सकती है, जैसे, ‘किलोजूल प्रति किलो’, ‘किलोवाट प्रति घन मीटर’. लेकिन चलिए हम सुविधा के लिए ‘मेगाजूल प्रति किलो’ यूज़ कर लेते हैं. ‘MJ/Kg’ मतलब किसी ईंधन की एक किलो मात्रा कितने मेगाजूल ऊर्जा उत्पन्न कर रही है. यूं जितनी ज़्यादा किसी ईंधन की कैलोरिफ़िक वैल्यू, वो उतना अच्छा ईंधन. मतलब ऊर्जा प्रदान करने के संदर्भ में.

अच्छा, आपने कैलोरी और किलो कैलोरी तो हेल्थ और सेहत वाले सेक्शन में भी सुना होगा, तो समझ लीजिए वहां पर भी इसी कैलोरिफ़िक वैल्यू की बात हो रही होती है. या फिर ये समझ लीजिए कि इसी संदर्भ में बात होती है. दोनों के मूल में ‘ऊर्जा’ ही है.एथेनॉल की कैलोरिफ़िक वैल्यू के बारे में सुजीत सौरभ बताते हैं-

“आप एथेनॉल को सिंगल फ़्यूल के रूप में यूज़ नहीं कर पाएंगे. क्योंकि एथेनॉल की कैलोरिफ़िक वैल्यू बहुत कम है.”

कितनी कम है? जहां डीज़ल की कैलोरिफ़िक वैल्यू 40 से 45 MJ/Kg तक है, वहीं एथेनॉल की कैलोरिफ़िक वैल्यू 26 से 27 MJ/Kg ही है. यूं साफ़ है कि इसे अगर डीज़ल, पेट्रोल वग़ैरह के साथ मिक्स किया जाए तो ही फ़ायदा है या बचत है.

मतलब ये तो क्लियर हो गया कि बेस ईंधन तो पेट्रोल-डीज़ल ही रहेगा, लेकिन सवाल ये है कि इस पिज़्ज़ा बेस में टॉपिंग कितनी रखी जाए, मतलब पेट्रोल में कितना एथेनॉल मिलाया जाना चाहिए?

तो दोनों की तुलना को ऐसे समझें: आपको मार्केट में सेम क्वालिटी के चावल अलग-अलग रेट पर मिल रहे हैं, एक में कंकड़ हैं, दूसरे में नहीं हैं. जिसमें कंकड़ हैं, उसका रेट 60 रुपए/किलो है. और जिसमें नहीं हैं, उसका रेट 100 रुपए/किलो. तो अगर कोई पूछता है कि “दोनों में से किस चावल से फ़ायदा होगा?’” तो आपके लिए कई चीज़ें जानना ज़रूरी होगा:

पहली चीज़ ये कि 60 रूपये वाले चावल में कितने कंकड़ हैं? यानी उससे कितना यील्ड (चावल) निकलेगा. अब इन चावलों की एथेनॉल-पेट्रोल से एनालॉजी बिठाइए. तो सवाल यही होता है कि चलिए ठीक है एथेनॉल, पेट्रोल से सस्ता है लेकिन क्या एक लीटर पेट्रोल से जितनी ऊर्जा निकलती है, उतनी ऊर्जा के लिए सवा लीटर या डेढ़ लीटर एथेनॉल तो नहीं जलाना पड़ रहा?

# अब अगर माना कि पहले उत्तर के हिसाब से भी कंकड़ वाले चावल सस्ते पड़ रहे हैं तो भी क्या ऐसा सिर्फ़ ‘प्रथमदृष्टया’ तो नहीं? मतलब कंकड़ वाले चावल को बीनने में समय भी तो लगेगा. रिसोर्स लगेंगे. और टाइम इज़ मनी कहने वाले तो पहले ही इस चावल को नकार देंगे. ऐसे ही पेट्रोल की तुलना में एथेनॉल पहली नजर में तो सस्ता विकल्प लग रहा है, लेकिन सवाल ये कि इसका आपके इंजन पर क्या प्रभाव पड़ेगा? सवाल ये भी कि क्या कहीं इंजन में कुछ मॉडिफ़िकेशन तो नहीं कराना पड़ेगा? जोकि हम जान चुके हैं कि कराना पड़ेगा. और क्या इस सबके बावज़ूद भी एथेनॉल या एथेनॉल मिक्स्ड पेट्रोल सस्ता विकल्प है?

देखिए पहले और दूसरे सवाल को तो हम आगे लेंगे. लेकिन तीसरे सवाल का उत्तर मुश्किल है. क्योंकि इतने ढेर सारे वैरिएबल्स हैं. एथेनॉल को पेट्रोल के विकल्प के रूप में नहीं बल्कि एथेनॉल-पेट्रोल के मिक्सचर को विकल्प के रूप में यूज़ किया जाएगा. तो ये तुलना बिना कंकड़ वाले चावल और कंकड़ वाले चावल के बीच की नहीं, बल्कि ये तुलना ‘कंकड़ वाले चावल’ और ‘बिना कंकड़ वाले चावल प्लस कंकड़ वाले चावल’ के मिक्सचर के बीच है.

हालांकि एक ‘फ़ेयर आइडिया’ हमें मिलता है एक स्टेटिस्टिक्स से कि-

जब E20, उन वाहनों में डाला जाता है, जो E0 के लिए बनाए और E10 के लिए कैलिब्रेट किए गए हैं तो ईंधन की एफ़िशिएंशी 6-7% तक कम हो जाती है. यहां पर E20 मतलब ऐसा पेट्रोल जिसमें 20% एथेनॉल हो. और इसी तरह E0 और E10 ऐसे पेट्रोल जिनमें 0% और 10% एथेनॉल हो.

यूं अगर कोई वाहन सिर्फ़ पेट्रोल से चलने के लिए बनाया गया है लेकिन उसे 10% एथेनॉल मिक्स पेट्रोल के लिए कैलिब्रेट/मॉडिफ़ाई कर दिया जाए, और उसमें 20% एथनॉल मिक्स पेट्रोल डाला जाए तो जो गाड़ी एक लीटर में 15 किलोमीटर चलती थी, वो (मोटा-मोटी) 14 किलोमीटर चलेगी.

ये भी कि जब एथेनॉल की मांग बढ़ेगी तो क्या गारंटी है कि वो भी धीरे-धीरे महंगा न होता जाएगा? और इससे उपजता है दूसरा सवाल.

# दूसरा सवाल: एथेनॉल की उपलब्धता कितनी है?

देखिए एथेनॉल की भारत में उपलब्धता का क्या स्टेटस है, ये जानने के लिए हमें नीति आयोग का एक PDF पढ़ना पड़ा. जिससे मोटा-मोटी जो समझ में आता है वो ये कि:

वर्तमान में भारत की एथेनॉल उत्पादन क्षमता 426 करोड़ लीटर (शीरा-आधारित) और 258 करोड़ लीटर (अनाज-आधारित) है. इसे बढ़ाकर क्रमशः 760 करोड़ लीटर और 740 करोड़ लीटर करने का प्रस्ताव है. इतने एथेनॉल से न केवल 1016 करोड़ लीटर EBP (एथेनॉल बेस्ड पेट्रोल) का उत्पादन हो पाएगा बल्कि बचे हुए 334 करोड़ लीटर एथेनॉल का अन्य कार्यों के उपयोग किया जा सकेगा.

अब सवाल है कि क्या ये पर्याप्त है? चलिए फ़िगर्स में नहीं पड़ते हैं तो भी ये साफ़ है कि अभी हमारा उत्पादन ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ वाली कैटिगरी में न आए तो भी ‘दिल्ली दूर है’ वाली कैटिगरी में तो आता ही है. इसलिए ही ये सवाल जायज़ हो जाता है कि मांग के बढ़ने पर कहीं एथेनॉल या EBP भी तो महंगा नहीं होता जाएगा. और इसका उत्तर छिपा है भविष्य में. हालांकि इस सवाल के उत्तर में ऑटो एक्सपर्ट टूटू धवन कहते हैं:

“एथेनॉल खेती का ‘बाई प्रोडक्ट’ है तो ये काफ़ी आसानी से और सस्ते में प्रोड्यूस किया जा सकता है. मतलब एथनॉल का उत्पादन कोई ‘बिग डील’ नहीं है. गांव-गांव में इसका उत्पादन होता है. बेशक लोकल स्तर पर यूज़ करने के लिए ही सही. और जैसे-जैसे मांग बढ़ेगी, उत्पादन भी बढ़ता जाएगा.”

वैसे टूटू धवन की बात को एक ख़बर भी कंफ़र्म करती है. 14 जुलाई, 2021 की. जिसके मुताबिक BPCL तेलंगाना में एक एथेनॉल प्लांट लगाने जा रहा है. और इसमें वो एक हज़ार करोड़ का निवेश करेगा.

# तीसरा सवाल: क्या इंजन की परफॉरमेंस पर फर्क पड़ेगा?

ये सवाल हमने टूटू धवन के सामने रखा, तो उन्होंने बताया-

“गाड़ियों में ECM लगा होता है. इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल मॉडयूल. जो EBP के मिक्सचर के हिसाब से टॉलरेंस सेट कर लेगा. लेकिन अगर रेश्यो बहुत ज़्यादा ख़राब हो जाए, तब इंजन में ख़राबी आने की आशंका रहती है. वो ओवरहीट होता है.”

फ़्लेक्स इंजन के बारे में भी मिस्टर धवन बताते हैं-

“आजकल तो फ़्लेक्स इंजन का नाम इतना सुनने में नहीं आता. लेकिन आज से 50-60 साल पहले पेट्रोल में केरोसिन मिक्स करके इंजन में डाला जाता था. इसमें पेट्रोल की मात्रा बहुत कम और केरोसिन की मात्रा बहुत ज़्यादा होती थी. तब केरोसिन मिलता भी सस्ता था. तो केरोसिन-पेट्रोल का ये मिक्सचर बड़ी मात्रा में यूज़ होता था. ऐसे ही फ़्लेक्स इंजन में सिर्फ़ एथेनॉल से (या ऐसे EBP से जिसमें एथेनॉल की मात्रा पेट्रोल से कहीं ज़्यादा होगी) से गाड़ी चलेगी. ये इंजन भी फैक्ट्री से फ़िट होकर आएगा.

# चौथा सवाल: क्या पेट्रोल पंपों पर इसका इंतजाम हो गया है?

इस बारे में ऑटो एक्सपर्ट टूटू धवन बताते हैं-

“EBP के लिए पेट्रोल पंप में कोई तब्दीली नहीं होती. ये पीछे से मिक्स होकर आता है. मतलब ब्लेंडिंग रिफ़ाइनरीज़ में होती है. पेट्रोल पंप को किसी भी तैयारी, मॉडिफ़िकेशन या कैलिब्रेशन की ज़रूरत नहीं है. इसी तरह गाड़ियों के इंजन की बात करें तो उससे जुड़ी चीजें भी फैक्ट्री लेवल पर ही सेट होती हैं, कंज़्यूमर लेवल पर कुछ नहीं करना होता.”

आसान भाषा में आज के लिए इतना ही. फिर कभी, जटिल सवालों के साथ हमारे जीवन में शामिल होने वाली कोई नयी शय आई तो उसका एक्सप्लेनर लेके हम फिर आयेंगे. तबतक के लिए शुक्रिया.

(ये स्टोरी हमारे यहाँ इंटर्नशिप कर रहे शुभ आर्यन ने लिखी है.)


 वीडियो देखें – क्या पेट्रोल-डीजल के दामों में लगी आग को एथनॉल कम कर सकेगा?

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