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कोरोना काल में लखनऊ के 'वाहिद बिरयानी' वाले जो कर रहे हैं सुनकर दिल खुश हो जाएगा

एक बार, मनोविज्ञान पढ़ाने वाले एक प्रोफेसर ने डस्टर हाथ में लेकर छात्रों से पूछा, “इसका वजन कितना टन है?” छात्र हंसने लगे. बोले टन या किलो छोड़िए, ये तो मुश्किल से कुछ ग्राम वजनी होगा. तब टीचर बोले, “अब सोचो, अगर मैं इसे एक घंटे तक पकड़े रहूँ तो? मेरी मांसपेशियां थकने लगेंगी. फिर एक वक्त ऐसा भी आएगा जब इसे पकड़े रहने के चलते मैं इतना बेहाल हो जाऊँगा कि अपनी पीड़ा के अलावा कुछ और न सोच पाऊँगा.” कुछ देर टीचर मौन रहा. फिर क्लास से पूछा, “तो अब बताओ इस डस्टर का वजन कितने टन है?”

इससे इनकार नहीं है कि इतिहास की टाइमलाइन में आज का ये दौर एक बड़ी त्रासदी के रूप में अंकित हो रहा है. और इसलिए ही लल्लनटॉप के भी सारे रेगुलर शोज़, कई वीडियोज़, कई स्टोरीज़ हमारी-आपकी इन पीड़ाओं का रोज़नामचा बनने की कोशिश कर रही हैं. कभी डेस्क से, तो कभी फ़ील्ड से. लेकिन फिर ये भी तो सच है न कि यदि हम और आप चिंताओं का, दुखों का, पीड़ाओं का डस्टर ‘ट्वेंटी फ़ोर सेवन’ पकड़े रहेंगे तो एक दिन बाकी सारे काम करने में ख़ुद को अक्षम पाएंगे.

तो इसी नोट पर आइए बात करते हैं कुछ ऐसे लोगों और संस्थाओं की जिन्होंने अपने निजी दुखों और पीड़ाओं का डस्टर किसी शैतान स्टूडेंट को दे मारा है, और अब उनके हाथ पूरी तरह ख़ाली हैं. समाज के काम आ सकने के वास्ते. चलिए करते हैं उनकी बात, जिन्होंने अपनी पीड़ा वाले स्पेस को स्व-दुःख से रिक्त कर दिया है, ताकि उसमें भरी जा सकें, लोक-दुःख, लोक-पीड़ाएं.

# उम्मीद की बात # 1

पहली उम्मीद की बात हमें भेजी है ऑस्ट्रेलिया से लल्लनटॉप की एक दोस्त पूजा व्रत गुप्ता ने. यहां मेलबॉर्न बेस्ड एक संस्था है, उत्तर प्रदेश एसोसिएशन ऑफ ऑस्ट्रेलिया (UPAA). 2016 में गठित इस संस्था के प्रेसिडेंट डॉक्टर संतोष यादव ने संस्था के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर एक डोनेशन कैंपेन चलाई है. इस कैंपेन का उद्देश्य है भारत में कोविड -19 की दूसरी वेव से जूझ रहे लोगों को मेडिकल किट, ऑक्सिमीटर और ऑक्सीजन सिलेंडर मुहैया करवाना. इसके साथ ही संस्था जल्द ही 4 ऑक्सीजन कंसनट्रेटर भी डोनेट करने जा रही है. संस्था ये सारी मदद बनारस बेस्ड एक NGO, ‘SRM कल्याण समिति’ के माध्यम से भारत में भेज रही है.

प्रेसिडेंट डॉक्टर संतोष यादव ने संस्था के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर एक डोनेशन कैंपेन चलाई है.
प्रेसिडेंट डॉक्टर संतोष यादव ने संस्था के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर एक डोनेशन कैंपेन चलाई है.

UPAA अब तक ‘SRM कल्याण समिति’ को 4,000 ऑस्ट्रेलियन डॉलर डोनेट कर चुकी है और इनका लक्ष्य 15,000 डॉलर इकट्ठा करके डोनेट करना है. ट्रांसपेरेंसी बनाए रखने के लिए UPAA के पास जो भी डोनेशन आता है उसकी जानकारी वट्सऐप ग्रुप के माध्यम से सभी सदस्यों के साथ साझा की जाती है. UPAA अतीत में भी भारत और ऑस्ट्रेलिया में भारतीय लोगों की, भारतीय स्टूडेंट्स की हेल्प करते आई है.

# उम्मीद की बात # 2

दूसरी उम्मीद की बात बिहार के मधेपुरा से. यहां की एक संस्था, ‘प्रांगण रंगमंच’ द्वारा खुलकर जरूरतमंदों की मदद की जा रही है. गरिमा उर्विशा और सुनीत साना की ये संस्था, अपने ‘ऑक्सीजन बैंक हेल्पलाइन नंबर’ के माध्यम से अब तक मधेपुरा के विभिन्न प्रखंडों के सौ से ज़्यादा लोगों का जीवन बचा चुकी है. प्रांगण रंगमंच की मीडिया प्रभारी गरिमा उर्विशा और संस्था के कार्यक्रम पदाधिकारी सुनीत साना सिलेंडर्स लेने-देन का ये कार्य अपने घर से ही कर रहे हैं. कई बार संस्था मरीजों से फोन पर बातचीत कर उनके मनोबल को बढ़ाने की भी कोशिश कर रही है. ये मरीज़ के स्वजनों को ऑक्सीजन सिलिंडर उपयोग करने की जानकारी भी देते हैं.

पटना के ऑक्सीजन मैन कहे जाने वाले ‘गौरव राय’ ने ‘प्रांगण रंगमंच’ के कार्यों से प्रभावित होकर, उन्हें बिहार फाउंडेशन की मदद से पांच ऑक्सीजन सिलिंडर भी डोनेट किए हैं.हालांकि ‘प्रांगण रंगमंच’ की पीड़ा ये है कि सिलेंडर्स की संख्या कम होने के कारण वे सबकी मदद नहीं कर पा रहे हैं. संस्था की ये पीड़ा सुनकर ‘शिंडलर्स लिस्ट’ का क्लाइमैक्स याद आता है. सत्य घटना पर आधारित इस मूवी में शिंडलर कई यहूदियों को हिटलर के कंसनट्रेशन कैंप से ख़रीद लाता है. मतलब ये कि पैसे देकर इन यहूदियों का जीवन बचाता है. अब पूरी तरह बर्बाद हो चुके इन यहूदियों के पास ऐसा कुछ तो होता नहीं जिसे ये शिंडलर को शुक्रिया के तौर पर दे सकें. लेकिन फिर भी वो अपने दांत वग़ैरह में लगे सोने को ढालकर, शिंडलर को एक अंगूठी गिफ़्ट करते हैं. जिसमें एक हिब्रू मंत्र लिखा होता है, ‘एक जीवन बचाने वाला, पूरी मानवता को बचाता है.’ अंगूठी देखकर शिंडलर और दुखी हो जाता है. कि यदि वो अतीत में कुछ और रूपये बचा लेता, तो आज कुछ और जानें बच जातीं.

‘शिंडलर’ हो या ‘प्रांगण रंगमंच’, इनकी कुछ और जीवन न बचा सकने की असमर्थता का दुःख उस सुख की तरह ही पवित्र और निश्चल है जो उन्होंने जीवन बचाकर अर्जित किया है.

अंत में ये भी बता दें कि ‘प्रांगण रंगमंच’, मधेपुरा को चलाने वाले गरिमा उर्विशा और सुनीत साना आपस में बहन-भाई हैं. निम्नवर्गीय परिवार के गरिमा और सुनीत हमेशा से ही सामाजिक सरोकारों में अग्रणी भूमिका निभाते रहे हैं. ये दोनों अक्सर रक्तदान, वृक्षारोपण जैसे कार्यों को करते देखे जाते हैं. कोरोना की पहली वेव के दौरान भी ‘प्रांगण रंगमंच’ लोगों तक कभी खाना, कभी मास्क और क़भी सेनेटरी पैड्स पहुँचा रहा था.

# उम्मीद की बात # 3

‘वाहिद बिरयानी’ के बारे में लखनऊ के कुछ लोग बड़े शान से कहते हैं कि इन्होंने ही बिरयानी का अविष्कार किया था. हालांकि ये बात एक तथ्य नहीं एक ‘अर्बन लेजेंड’ लगती है. पर जो भी हो वाहिद बिरयानी अब ‘द रियल टेस्ट ऑफ अवध’ के नाम से तो मशहूर हो ही चुकी है. 1955 में खुला ये फ़ूड जॉईंट आज 40 से ज़्यादा तरह की बिरयानी सर्व करता है. लेकिन वाहिद बिरयानी की ये बातें तो विनोद दुआ, पुष्पेश पंत या वीर सांघवी अपने किसी शो में कवर कर ही लेंगे. हम तो ‘वाहिद बिरयानी’ को अपने शो में लेकर आए हैं इनके दूसरे कार्यों के चलते. और वो ये कि इन दिनों इनकी लखनऊ भर में रोज़ 4 से 5 वैन चल रही हैं. ‘वाहिद बिरयानी’ इन वैन्स के माध्यम से रोज़ 1,800 से 2,000 लोगों को मुफ़्त भोजन उपलब्ध करवा रहा है. सबसे कमाल की बात ये कि वाहिद बिरयानी की ये वैन्स शाकाहारी भोजन परोस रही हैं, ताकि कोविड और आंशिक कर्फ्यू के दौरान कोई भी भूखा न रहे. वाहिद बिरयानी इन वैन्स के माध्यम से निस्वार्थ भाव से शहर के अलग-अलग इलाकों में लोगों को दो वक्त का भोजन उपलब्ध करवा रही है. कभी वेज बिरयानी तो वेज पुलाव, हर दिन खाने का मेन्यू बदला जाता है. ताकि केवल लोगों की भूख ही न मिटे बल्कि वो स्वादिष्ट खाने का लुत्फ भी उठा सकें.

वाहिद बिरयानी अब ‘द रियल टेस्ट ऑफ अवध’ के नाम से तो मशहूर हो ही चुकी है.
वाहिद बिरयानी अब ‘द रियल टेस्ट ऑफ अवध’ के नाम से तो मशहूर हो ही चुकी है.

साथ ही जो लोग कोरोना संक्रमण या कर्फ़्यू के चलते कहीं आ-जा नहीं पा रहे उनके लिए वाहिद बिरयानी ने खाने की मुफ्त होम डिलीवरी भी शुरू की है.

# उम्मीद की बात # 4

अगली उम्मीद की बात दिल्ली के ग्रेटर कैलाश इलाके से. यहां दिल्ली पुलिस सभी मृतकों के घर जाकर उन्हें श्रद्धांजलि दे रही है. साथ ही उनके परिवार को आश्वासन भी. कि उन्हें किसी भी तरह की कोई जरूरत पड़े तो दिल्ली पुलिस को अपना परिवार समझें और किसी भी वक्त किसी भी मदद के लिए उन्हें फोन करें.
ग्रेटर कैलाश थाने के SHO, रितेश कुमार अपनी टीम के साथ उन सभी घरों पर दुःख व्यक्त करने के लिए जा रहे हैं जहां कोविड संक्रमण के चलते कोई मौत हुई हो. भावुक करने वाली बात ये भी है कि दिल्ली पुलिस की टीम जहां भी जा रही है, सभी लोग उनका आभार व्यक्त कर रहे हैं. इनमें से कई घर तो ऐसे हैं जिनमें रहने वालों के अपनों का अंतिम संस्कार दिल्ली पुलिस ने ही किया था. उम्मीद की बात के एक एपिसोड में हमने आपको एक ऐसी ही स्टोरी बताई थी जिसमें यहां की एक बुजुर्ग महिला के दो बेटों का अंतिम संस्कार दिल्ली पुलिस ने किया था. और साथ ही उस महिला का भी इलाज करवाया था. क्यूंकि वो भी अपने दो मृत बेटों की तरह ही कोविड पॉज़िटिव थी.

देखिए ये सच्चाई है कि कोविड की सेकंड वेव बहुत ही घातक है. ये भी सच्चाई है कि कई लोगों ने अपने खोए हैं. कई घर टूटे हैं कई बच्चे अनाथ हुए हैं. ऐसे लोगों के पास जाकर उम्मीद की बात करने से, लाज़मी है कि उन्हें कई बार कोफ़्त भी होती होगी. लेकिन फिर सबसे ज़रूरी भी आज के दौर में यही है कि सभी ग़मज़दा लोगों से बतियाया जाए, उनको बताया जाए, जीवन की अशेष सुंदरता के विषय में. कम से कम कोशिश तो की ही जाए. कुछ सुनने-सुनाने वाले मिल जाएं तो दुःख छोटे तो लगने ही लगते हैं न. कई बार लोगों को नसीहतों की नहीं, सहारे की, चारासाज़ की, ग़मगुसार की ज़रूरत होती है. वरना ग़ालिब क्यूं कह गए होते कि-

ये कहां की दोस्ती है, कि बने हैं दोस्त नासेह,
कोई चारसाज़ होता, कोई ग़मगुसार होता.

ऐसी ही ग़मगुसारी के लिए ग्रेटर कैलाश की पुलिस भी बधाई की पात्र है.

# उम्मीद की बात # 5

आज पांचवी उम्मीद की बात बंगलुरु से. यहां दो बहनें अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर मृत देहों को सम्मानपूर्वक अंतिम विदाई दे रही हैं. निकोल फर्टाडो और उसकी चचेरी बहन टीना चेरियन को आप सिमेंट्री में रोज़ सुबह डेढ़ से शाम पाँच-सात बजे तक अपने काम में लगे हुए देख सकते हैं. ये दोनों कोविड संक्रमण के चलते मारे गए लोगों के शवों को दफनाने में उनके परिवार वालों और सिमेंट्री में काम करने वालों की मदद करती हैं. निकोल सेंट जोसेफ कॉलेज में पढ़ाई कर रही हैं और उन्हें इस काम को करने की प्रेरणा अपने पिता से मिली है. वहीं टीना एक मेडिकल स्टूडेंट हैं.

# उम्मीद की बात # 6

अगली स्टोरी बिहार से. यहां के वाजिदपुर रोड में एक प्राइवेट स्कूल के संचालक हैं, रामजी शर्मा. रामजी शर्मा के स्कूल में नर्सरी से लेकर आठवीं तक के 200 से अधिक बच्चे पढते थे. लेकिन कोरोना के चलते बीते 14 महीनों से बाकी स्कूल्स की तरह इनके स्कूल में भी ताला लगा हुआ है. जिससे इनका आय का एकमात्र स्रोत बंद था.
इसी बीच, आज से करीब तीन महीने पहले रामजी शर्मा ने अखबार में मशरूम उत्पादन और उससे होनेवाली आय को लेकर एक खबर पढ़ी. इसे पढ़कर उन्होंने अपने स्कूल परिसर में मशरूम उगाने के फ़ैसला कर लिया. इसके लिए उन्होंने कृषि विज्ञान केन्द्र में जाकर एक महीने का मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण भी लिया. और फिर विद्यालय के दो कमरों को मशरूम की खेती करने के लिए उपयोग करने लगे. अब रामजी के स्कूल में रोजाना दो-ढाई किलो मशरूम का उत्पादन हो रहा है. यानी रोज़ क़रीब उन्हें ढाई से तीन सौ रूपये की आमदनी हो रही है.

ख़ुद के नुक़सान और अपनी ख़ुद की शॉर्टकमिंग से पार पाकर कोई निर्माण कर लेना, एक उम्मीद की बात है.
ख़ुद के नुक़सान और अपनी ख़ुद की शॉर्टकमिंग से पार पाकर कोई निर्माण कर लेना, एक उम्मीद की बात है.

इस वक़्त ‘आपदा में अवसर’ की बात तक करना भी बहुत असंवेदनशील है. हर कोई, जो किसी और के नुक़सान को अपने हित के लिए यूज़ कर रहा है वो किसी न किसी रूप में पूरी मानवता का दोषी है. लेकिन इसके उलट अपने ख़ुद के नुक़सान और अपनी ख़ुद की शॉर्टकमिंग से पार पाकर कोई निर्माण कर लेना, एक उम्मीद की बात है. और ऐसी ही उम्मीद की बात की है बाढ़ के इन शिक्षक रामजी शर्मा ने.

# उम्मीद की बात # 7

अंतिम उम्मीद की बात राजस्थान के सात दोस्तों की एक टीम की. ये टीम जयपुर, बीकानेर, हिसार के ऑक्सीजन प्लांट्स से सिलेंडर भर-भर कर उन्हें मरीजों तक निशुल्क पहुंचा रही है. ये टीम हर दिन 15 से 20 सिलेंडर्स की सप्लाई कर रही है. इस निशुल्क सेवा में अब तक इनके करीब 50 हजार रुपए खर्च हो चुके हैं.
सिलेंडर लाने-ले जाने के वास्ते इन युवाओं ने अपनी तीन फॉर्च्यूनर गाड़ियों को लगा रखा है. तीनों ऑक्सीजन प्लांट्स पर दो-दो युवक रहते हैं जो रातभर लाइन में लगकर सिलेंडर्स भरवाने की व्यवस्था करते हैं. इसके बाद गाड़ी के जरिए भरे हुए सिलेंडर रोलसाहबसर लाए जाते हैं. ये टीम राजस्थान के बाकी इलाक़ों, जैसे नुंआ, पिलानी, फतेहपुर, रामगढ़ शेखावाटी, लक्ष्मणगढ़, सुजानगढ़ वग़ैरह में भी सिलेंडर भेज रही है.

युवाओं की इस टीम ने आठ खाली सिलेंडर्स सिक्योरिटी चार्ज़ देकर जुटाए हैं और पंद्रह के क़रीब खाली सिलेंडर्स फतेहपुर और रामगढ़ शेखावाटी के डेंटर-पेंटर की दुकानों से उधार मांगे गए हैं. सिलेंडर ब्लैक न हों, इसके लिए युवाओं ने एक ट्रैकर सिस्टम भी बना रखा है.

# उम्मीद का संदेश-

उम्मीद का संदेश में आज सुनते हैं अमित क़ीमती को. अमित और उनकी संस्था अमिति सोशल वेलफ़ेयर इस महामरी में उम्मीद की बात बन रही है. अमित ने बाताया कि उनकी संस्था पिछले तीन सालों से कैंसर पेशेंट की निशुल्क सेवा कर रहे है. परिवार वालों की सहायता करते हैं भोजन वितरण करते हैं. कोरोना का समय हो या कोई भी और मुश्किल का समय वो ज़रूरतमंदों की मदद करते हैं. ज़रूरत पड़ने पर वो ऑक्सीजन सिलेंडर और दवाएं भी उपलब्ध करवाते हैं.

# अंत:

एक आशावादी व्यक्ति था. जब वो सुबह सवेरे अपने काम के लिए घर से निकलता तो उसे रोज़ पीपल के पेड़ के नीचे कुछ लोग बातें करते दिखते. ये लोग रोज़ एक ही चीज़ में बार-बार शिकायत कर रहे होते थे. आशावादी व्यक्ति आजिज़ आ गया. वो इन लोगों के पास गया और इन्हें एक चुटकुला सुनाने लगा. चुटकुला ख़त्म होने के बाद सभी लोग ठहाके मारकर हँस पड़े. फिर हमारे इस आशावादी व्यक्ति ने चुटकुला दोहराया, अबकी कोई न हंसा. बस कुछ लोग रहे होंगे जो मुस्कुराए भर. अंत में, उसने चुटकुला तीसरी बार दोहराया. अबकी तो किसी ने भी कोई प्रतिक्रिया न दी. अब प्रतिक्रिया की बारी आशावादी की थी. बोला, “जब चुटकुला भी एक बार से ज़्यादा सुन लेने पर रुचिकर नहीं लग रहा फिर तुम एक ही समस्या के बारे में लगातार बात करने से क्या ही आनंद पा रहे होगे. बेहतर है कि हल के बारे में बात करो. बात ही करनी है तो नई बात करो. यक़ीन करो बातें करने से भी चीज़ें हल होती हैं, लेकिन जब भी करो नई बात करो. उम्मीद की बात करो.”
तो हम भी नई बातें लेकर उम्मीद की बातें लेकर कल के अपने शो में फिर हाज़िर होंगे. तब तक के लिए अलविदा.


वीडियो: कोविड मरीजों की मदद करते NRI और बेघरों को खाना खिलाते पुलिसवाले समेत 6 उम्मीद वाली कहानियां

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