Submit your post

Follow Us

पुतिन की वजह से हज़ारों मुस्लिमों को अपना घर-द्वार क्यों छोड़ना पड़ा?

बात एक प्रायद्वीप की. बेहद ख़ूबसूरत और प्राकृतिक संसाधन से परिपूर्ण. जो कुछ बरस पहले तक ‘स्वायत्त’ था, लेकिन अब उसका भविष्य एक पुरानी कड़ी से जुड़ गया है. एक पक्ष इसे ‘घर वापसी’ बताता है, जबकि दूसरा पक्ष कहता है, ये तो ‘अवैध कब्ज़ा’ है. ये किस इलाके की बात हो रही है? तकरार में शामिल पक्ष कौन-कौन से हैं? इस झगड़े का ऐतिहासिक पहलू क्या है? और, इन सबके पीछे एक ‘गिफ़्ट’ की भूमिका क्या है? सब विस्तार से बताएंगे.

ये कहानी है क्रीमिया की

ब्लैक सी में स्थित प्रायद्वीप. इकलौता देश, जिससे इसकी ज़मीनी सीमा लगती है, वो है यूक्रेन. क्रीमिया का एक और पड़ोसी है, रूस. दोनों जुड़े हैं समंदर के जरिए.

Crimea
लाल इलाके वाला क्षेत्र क्रीमिया.

अभी वाली ख़बर सुनाने से पहले बैकग्राउंड जानना ज़रूरी है. इसके लिए हमें जाना होगा इतिहास में. ये बात तब की है, जब दूसरा विश्व युद्ध खात्मे की तरफ बढ़ रहा था. साल था 1944 का. क्रीमिया का सबसे बड़ा शहर सेवस्तोपोल बुरी तरह टूटा हुआ था. जर्मन सेना ने यहां भयानक तबाही मचाई थी.

दरअसल, 1941 में जर्मनी ने क्रीमिया पर कब्ज़ा कर लिया था. उससे पहले तक क्रीमिया, रूस का हिस्सा था. स्टालिन को जर्मनी के हमले की कोई उम्मीद नहीं थी. उसने हिटलर के साथ संधि कर रखी थी. दोनों की आपसी सहमति थी कि जर्मनी और सोवियत संघ एक-दूसरे के मामले में टांग नहीं अड़ाएंगे.

Adolf Hitler
एडोल्फ़ हिटलर (तस्वीर: एपी)

वो हिटलर ही क्या जो ईमान रखे!

हिटलर को अपने साम्राज्य का विस्तार करना था. उसने वही किया. हिटलर ने स्टालिन को धोखा दे दिया. जून 1941 में जर्मन सेना सोवियत संघ में घुस आई. स्टालिन इस हमले के लिए तैयार नहीं था. सोवियत संघ शुरुआती मोर्चे पर मात खा गया. फिर स्टालिन का हुक्म जारी हुआ. और, समूची आबादी जंग में उतर गई. कुछ महीनों में ही जर्मनों के पैर उखड़ने लगे. जर्मन सेना वापस भागने लगी.

यही हाल क्रीमिया का भी था. यहां से जर्मनी को निकालने में तीन साल लग गए. 1944 की शुरुआत तक रेड आर्मी ने क्रीमिया को खाली करा लिया. इलाका तो खाली हो गया, लेकिन एक चीज शासक के दिमाग में भर गई. शक. कैसा शक? यही कि आबादी का एक हिस्सा गद्दार है. वे नाज़ियों के सहयोगी हैं.

Joseph Stalin
सोवियत यूनियन के पूर्व प्रीमियर. (तस्वीर: एएफपी)

गद्दारी का आरोप किन लोगों पर लग रहा था?

ये थे तातार मुस्लिम. मंगोलों के वंशज. जिन्होंने कई सदियों तक क्रीमिया पर शासन किया था. जब 1783 में रूस की महारानी ‘कैथरीन द ग्रेट’ ने क्रीमिया पर कब्ज़ा किया, तब उनकी हैसियत घटने लगी थी. तातार अपने ही मुल्क़ में दोयम दर्ज़े के हो गए.

बीच में कुछ समय के लिए रूस को क्रीमिया पर दावा छोड़ना भी पड़ा. लेकिन वो फिर वापस आए, और मज़बूती के साथ. 1917 के साल में बोल्शेविक क्रांति हुई. रूस में ज़ारशाही का अंत हो गया. 1922 में स्टालिन सोवियत संघ का सर्वेसर्वा बन गया. इसके साथ ही शुरू हुआ लेबर कैंप्स, गुलग और तानाशाही का दौर.

क्रीमिया के तातार भी स्टालिन के निशाने पर थे. वो बस एक मौका चाहता था. ये मिला एक रिपोर्ट की शक्ल में. अप्रैल 1944 में सीक्रेट सर्विस का मुखिया लावरेन्त बेरिया एक फ़ाइल लेकर स्टालिन से मिला. इसमें उन तातार मुस्लिमों की लिस्ट थी, जिन्होंने जर्मन सेना का सहयोग किया था. ये कुछ गिनती के लोग थे. उन्हें कठोरतम सज़ा तय थी.

Lavrentiy Beria
पूर्व सीक्रेट सर्विस का मुखिया लावरेन्त बेरिया. (तस्वीर: एएफपी)

स्टालिन ने कुछ देर के लिए फ़ाइल पर नज़र डाली. अपनी कलम से कुछ आड़ी-तिरछी लकीरें खींची और फाइल वापस लौटा दी. स्टालिन और सिगार एक-दूसरे के पूरक थे. उसने धुआं उड़ाया और ठहाका लगाने लगा. वो हंसी बेहद वीभत्स थी. जिसका असर कुछ दिनों के बाद दिखने वाला था.

मई का महीना आया. सेवस्तोपोल में शांति लौट रही थी. लोग अपनी बिखरी ज़िंदगियां जोड़ने में जुटे थे. उस रात भी माहौल कुछ ऐसा ही था. वर्षों के बाद उन्हें अच्छी नींद नसीब हुई थी. अचानक ही घरों के दरवाज़ों पर दस्तक पड़ने लगी. बाहर सोवियत सैनिक खड़े थे. बंदूकों से लैस. उनके पास एक फरमान भी था.

‘15 मिनट में अपने सामान समेट लो. तुम्हें यहां से बाहर निकलना है. ट्रेन तुम्हारा इंतज़ार कर रही है. किसी ने ऐतराज़ किया तो उसे गोली मार दी जाएगी.’

सोचने-समझने का वक़्त खत्म हो चुका था. लोगों ने अपने घरों से ज़रूरी सामान उठाए और कतारबद्ध होकर चुपचाप चलने लगे. उन्हें ले जाकर मालगाड़ियों में ठूंसा गया. और, फिर गाड़ी चल पड़ी. 18 दिनों के बाद उन्हें साइबेरिया में उतारा गया. जहां उन्हें कंसन्ट्रेशन कैंपों में रखा गया.

ऐसा सिर्फ सेवस्तोपोल के तातारों के साथ नहीं हुआ था. बल्कि पूरा क्रीमिया स्टालिन की ख़ब्त की चपेट में आया था. एक दिन में 2 लाख 30 हज़ार तातारों को अलग-थलग कर दिया. उन्हें उज़्बेकिस्तान, साइबेरिया और ऊरल पहाड़ियों के बंज़र इलाकों में फेंक दिया गया था. उन्हें अपने नसीब के सहारे ज़िंदा रहना था. उन लोगों का क्या हुआ? ये आगे बताएंगे.

पहले ये जानते हैं कि इस फ़ैसले के पीछे स्टालिन का इरादा क्या था?

उसका मकसद था, क्रीमिया में ज्यादा से ज्यादा स्लाव लोगों को बसाना. ताकि इस इलाके को हमेशा के लिए रूस के नियंत्रण में रखा जाए. स्लाव, रूस के मूलनिवासी माने जाते हैं.

स्टालिन ऐसा करने में सफल भी हुआ. रूस को इसका फायदा भी हुआ. वो भी 70 साल बाद. एक जनमत संग्रह में. जब क्रीमिया के लोगों से पूछा गया, आप रूस में शामिल होना चाहते हैं या यूक्रेन में? तब 95 फ़ीसदी लोगों ने रूस वाला ऑप्शन चुना. हिस्सा लेने वाले अधिकतर लोग स्लाव थे. जिनके पूर्वजों को स्टालिन के समय बाहर से लाकर बसाया गया था. इसलिए, इस रिजल्ट का सहज अनुमान लगाया जा सकता है. पूरे विवाद की जड़ यही जनमत संग्रह है.

अब आपके मन में दो सवाल उठ रहे होंगे. एक तो ये कि जब क्रीमिया, रूस का हिस्सा था तो इस खेल में यूक्रेन कहां से आ गया? और दूसरा सवाल, ये जनमत संग्रह करवाया क्यों गया? एक-एक करके जवाब जानते हैं.

5 मार्च, 1953 को सोवियत तानाशाह स्टालिन की मौत हो गई. सितंबर, 1953 में सत्ता की चाबी पहुंची निकिता ख्रुश्चेव के पास. ख्रुश्चेव, स्टालिन की नीतियों से खफ़ा थे. इसलिए जब उन्हें मौका मिला, उन्होंने स्टालिन को खारिज करना शुरू किया. इसी की एक कड़ी थी, ‘होल्दोमोर’ की भरपाई. ये क्या था? यूक्रेन में 1932-33 के साल में भयानक अकाल पड़ा था. इसके पीछे स्टालिन की ब्लंडर नीतियां थीं. इस अकाल में (अनुमान के अनुसार) 70 से 90 लाख लोग मारे गए. इसी घटना को ‘होल्दोमोर’ का नाम दिया गया.

यूक्रेन 1654 में रूसी साम्राज्य का हिस्सा बना था. इस अकाल के बाद वहां विरोध के स्वर उठने लगे थे. ख्रुश्चेव ने इसे रोकने के लिए उदार तरीका अपनाया. उन्होंने रूसी साम्राज्य में मिलने की 300वीं सालगिरह के मौके पर यूक्रेन को ‘गिफ्‍ट’ दिया. ये गिफ़्ट था क्रीमिया. इस तरह 1954 में क्रीमिया, यूक्रेन के पास चला गया. चूंकि यूक्रेन तब सोवियत संघ का हिस्सा था, इसलिए उस वक़्त इस उदारता का ज्यादा असर नहीं पड़ा.

असर पड़ा 1991 में, जब सोवियत संघ का विघटन हुआ. यूक्रेन ने क्रीमिया समेत आज़ादी की घोषणा कर दी. क्रीमिया में बहुसंख्यक थे स्लाव. उन्हें यूक्रेन का राज पसंद नहीं आया. उनका ईमान रूस के साथ मिला था. लेकिन विघटन के बाद रूस की हालत ख़ुद ही खराब थी. वो कहां दूसरे के फटे में टांग अड़ाता. इस बीच यूक्रेन की नजदीकी यूरोपियन यूनियन के साथ बढ़ती गई. वहां उद्योग-धंधों का विकास हुआ. इंफ़्रास्ट्रक्चर बेहतर हुआ. रूस से उनका नाता कम होता गया.

स्थिति तब पलटी, जब व्लादिमीर पुतिन रूस के राष्ट्रपति बने

रूस को पुरानी ताक़तवर पोजिशन में लौटाना उनका टारगेट था. क्रीमिया हमेशा से उनके एजेंडे में था. इसका मौका आया, 2010 में. जब विक्टर यान्कोविच यूक्रेन के राष्ट्रपति बन गए. यान्कोविच रूस के करीबी थे और पुतिन की छत्रछाया में रहना चाहते थे.

Viktor Yanukovych
यूक्रेन के पूर्व राष्ट्रपति विक्टर यान्कोविच. (तस्वीर: एएफपी)

नवंबर 2013 में एक बड़ी घटना घटी. यूक्रेन, यूरोपियन यूनियन में शामिल होना चाहता था. इसके लिए कुछ कागज़ात पर दस्तखत होने थे. ऐन मौके पर राष्ट्रपति यान्कोविच ने साइन करने से मना कर दिया. इसकी बजाय उन्होंने रूस से कर्ज़ ले लिया.

इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ प्रोटेस्ट शुरू हो गया. यूक्रेन की राजधानी है किएव. शहर के यूरो स्क़्वायर पर लोग जम गए. वो राष्ट्रपति का इस्तीफा मांग रहे थे. नवंबर 2013 में शुरू हुआ प्रोटेस्ट 22 फ़रवरी 2014 तक चला. उस दिन यान्कोविच देश छोड़कर भाग गए. उन्होंने बाद में रूस में शरण ली.

इधर रूस को लगा, उसकी बनी-बनाई पकड़ खत्म हो जाएगी. उसने क्रीमिया में खेल कर दिया. वहां के विद्रोही गुटों को मदद पहुंचाई. और, जब उससे भी बात नहीं बनी तो अपनी सेना भी उतार दी. यूक्रेन इस हमले का जवाब नहीं दे पाया. रूस ने बड़ी आसानी से क्रीमिया पर कब्ज़ा कर लिया.

European Square Protest
यूरो स्क़्वायर पर महीनों तक विरोध-प्रदर्शन होता रहा था. (तस्वीर: एएफपी)

उसने अपनी निगरानी में जनमत संग्रह करवाया. और, कथित तौर पर वैध तरीके से क्रीमिया को अपने में मिलाने का ऐलान कर दिया. 18 मार्च 2014 को रूस ने रिपब्लिक ऑफ़ क्रीमिया और सेवस्तोपोल को रूस का प्रांत घोषित कर दिया.

यूक्रेन इससे नाराज़ हुआ. लेकिन वो अकेले रूस से निपट नहीं सकता था. उसने यूरोपियन यूनियन और दूसरे विकसित देशों से मदद मांगी. मदद के तौर पर आई निंदा. यूक्रेन के दोस्तों ने जनमत संग्रह को अवैध बताया. आरोप लगाया कि वोटिंग रूसी सेना की निगरानी में हुई. यूरोपियन यूनियन ने कुछ प्रतिबंध भी लगाए. नेचुरल गैस के एक्सपोर्ट पर पाबंदी लगा दी.

उद्योग-धंधों में अव्वल टॉप के आठ देशों का समूह था, G-8. इसमें रूस भी शामिल था. बाकी सात देशों ने मिलकर रूस को बाहर निकाल दिया. कुछ समय की मोहलत दी कि क्रीमिया से बाहर निकल जाए. लेकिन रूस ने इस दबाव को अनदेखा कर दिया. दो बरस तक रूस की अर्थव्यवस्था चौपट स्थिति में रही.

2018 में रूस ने G-8 को हमेशा के लिए टाटा कर दिया. लेकिन क्रीमिया पर से अपना दावा नहीं छोड़ा.

Putin
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन. (तस्वीर: एपी)

क्रीमिया, रूस और पुतिन के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों हैं?

पहली वजह ऐतिहासिक है. क्रीमिया हमेशा से रूसी साम्राज्य का हिस्सा था. अगर ख्रुश्चेव ने यूक्रेन को वो गिफ़्ट न दिया होता तो झगड़े की नौबत ही नहीं आती. व्लादिमीर पुतिन रूस को सोवियत-काल जैसा मज़बूत बनाना चाहते हैं. इसके लिए ज़रूरी है कि अलग हो चुके हिस्सों को वापस मिलाया जाए. क्रीमिया एक छोटा-सा मोहरा भर है. जानकारों की मानें तो पुतिन ये संदेश देना चाहते थे कि रूस इज बैक.

दूसरी वजह है क्रीमिया का लोकेशन. क्रीमिया पर नियंत्रण का मतलब है ब्लैक सी पर एकाधिकार. रूस का ब्लैक सी समुद्री बेड़ा सेवस्तोपोल में ही तैनात है. इससे उसे तुर्की, बुल्गारिया और रोमेनिया जैसे देशों को दादागिरी दिखाने में आसानी रहती है. 2008 में जॉर्जिया के साथ लड़ाई में इसी बेड़े ने अहम भूमिका निभाई थी. इसके अलावा, सीरिया में असद सरकार को मदद पहुंचाने में भी आसानी रहती है. रूस, क्रीमिया में अपने डिफ़ेंस सिस्टम को और विस्तार देने में लगा है.

तीसरी बड़ी वजह है ब्लैक सी में मौजूद प्राकृ्तिक संसाधन. यहां नैचुरल गैस और तेल का अथाह भंडार है. अरबों-खरबों की क़ीमत का. रूस इस खज़ाने को अपने हाथ से क्यों ही जाने देना चाहेगा! ये तो हुई क्रीमिया से रूस की मोहब्बत के कारण.

क्रीमिया एक बार फिर से चर्चा में क्यों है?

वजह है, G-7 देशों का बयान. क्रीमिया में रूस के कब्ज़े के सात बरस पूरे हो गए हैं. इस मौके पर अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस, जापान, इटली, कनाडा और जर्मनी के विदेश मंत्रियों ने साझा स्टेटमेंट जारी किया है. इसमें यूक्रेन को समर्थन की बात दोहराई गई है.

कहा गया है क्रीमिया पर रूस का ‘टेकओवर’ अवैध था और हमेशा अवैध रहेगा. ‘रूस चाहे इसे वैध बनाने की कितनी भी कोशिशें कर ले, उसे मान्यता नहीं मिलेगी.’

Joe Biden
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन (तस्वीर: एपी)

जो बाइडन 2014 में अमेरिका के उप-राष्ट्रपति थे. अब वो राष्ट्रपति बन चुके हैं. उन्होंने भी बयान जारी कर कहा था, ‘क्रीमिया, यूक्रेन का हिस्सा है और रहेगा.’

G-7 देशों के साझा बयान में एक और लाइन थी.

‘हम क्रीमिया में रूस द्वारा तातार समुदाय के ख़िलाफ़ किए गए मानवाधिकार उल्लंघन की कड़ी आलोचना करते हैं.’

तातारों को तो स्टालिन ने हमेशा के लिए निकाल दिया था. फिर वो वापस कब आए? लेबर कैंप्स में भेजे गए तातारों में से अधिकतर तो रास्ते में ही मर गए. कैंप्स में हर रोज सात से आठ लोग मर जाते थे. भूख या टॉर्चर से. लोगों में इतनी शक्ति नहीं थी कि वो उनका अंतिम संस्कार कर सकें. ऐसी लाशों को सियार और दूसरे जानवर खा जाते थे.

जो बच गए, उन्होंने उसी दुनिया को अपना सच मान लिया. वे किसी तरह ज़िंदा रहने की कोशिश करते रहे. 1967 के साल में स्टालिन के फ़ैसले को पलट दिया गया. तब पहली बार 300 तातारों को वापस क्रीमिया लाया गया. दरअसल, ये एक प्रोपेगैंडा मिशन था.

Tatar Muslims
तातार समुदाय के लोग. (तस्वीर: एएफपी)

तातार वापस लौटे मिखाइल गोर्बाचोव के टाइम. पेरेस्त्रोइका की पॉलिसी आई. यानी सोवियत संघ बाहरी दुनिया के लिए खुला. सोवियत संघ अपनी आख़िरी सांसें गिन रहा था. तब हज़ारों की संख्या में तातार अपनी पुश्तैनी ज़मीन पर वापस आए. उन्होंने फिर से अपना घर-बार बसाया.

जब उनके जीवन में सब ठीक चल रहा था, तभी 2014 में रूस ने क्रीमिया पर कब्ज़ा कर लिया. एक बार फिर से तातारों को प्रताड़ित किया जाने लगा. उनके नेताओं की हत्या होने लगी. अभी भी सैकड़ों की संख्या में तातार रूसी जेलों में बंद हैं. कई तो अपने मुकदमे का ट्रायल शुरू होने का इंतज़ार कर रहे हैं.

2014 से अभी तक 1 लाख 40 हज़ार से अधिक तातार क्रीमिया छोड़कर भाग चुके हैं. उन्हें अपना अतीत याद है. वे वापस से उस आग में जलने से बचना चाहते हैं.

पुतिन की दादागिरी का एक स्याह पक्ष ये भी है. जो उन्हें जोसेफ़ स्टालिन के बराबर खड़ा कर देता है. तानाशाही वाली सीट पर.


विडियो- जो बाइडेन ने व्लादिमीर पुतिन को क्या धमकी दे दी जिससे रूस नाराज़ हो गया है?

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

कौन हो तुम

एक्टर शरत सक्सेना की कहानी, जिन्होंने 71 साल की उम्र में ज़बरदस्त बॉडी बनाकर सबको चौंका दिया

एक्टर शरत सक्सेना की कहानी, जिन्होंने 71 साल की उम्र में ज़बरदस्त बॉडी बनाकर सबको चौंका दिया

हीरो बनने आए शरत सक्सेना कैसे गुंडे का चमचा बनने पर मजबूर हुए?

'भीगे होंठ तेरे' वाले कुणाल गांजावाला आजकल कहाँ हैं?

'भीगे होंठ तेरे' वाले कुणाल गांजावाला आजकल कहाँ हैं?

एक वक़्त इंडस्ट्री में टॉप पर थे कुणाल और उनके गाने पार्टियों की जान हुआ करते थे.

राज कुंद्रा की पूरी कहानी, 18 की उम्र में शॉल बेचने से शुरुआत करने वाले राज यहां तक कैसे पहुंचे?

राज कुंद्रा की पूरी कहानी, 18 की उम्र में शॉल बेचने से शुरुआत करने वाले राज यहां तक कैसे पहुंचे?

IPL स्कैंडल, मॉडल्स के आरोप, अंडरवर्ल्ड कनेक्शंस के आरोप, एक्स वाइफ के इल्ज़ाम सब हैं इस कहानी में.

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रेन्सन की कहानी, जहां भी गए तहलका मचा दिया.

'सिंघम' IPS से तमिलनाडु BJP के सबसे युवा अध्यक्ष बने अन्नामलाई की कहानी

'सिंघम' IPS से तमिलनाडु BJP के सबसे युवा अध्यक्ष बने अन्नामलाई की कहानी

पहला चुनाव हार गए थे, बीजेपी ने राज्य की जिम्मेदारी सौंपी है.

'तड़प-तड़प के' जैसा प्रेमियों का ब्रेकअप एंथम देने वाले सिंगर के के आजकल कहां हैं?

'तड़प-तड़प के' जैसा प्रेमियों का ब्रेकअप एंथम देने वाले सिंगर के के आजकल कहां हैं?

उनके गाए 'पल' गाने के बगैर आज भी किसी कॉलेज का फेयरवेल पूरा नहीं होता.

कर लिया योगा? अब क्विज खेलने से होगा

कर लिया योगा? अब क्विज खेलने से होगा

आन्हां, ऐसे नहीं कि योग बस किए, दिखाना पड़ेगा कि बुद्धिबल कित्ता बढ़ा.

तमिल जनता आखिर क्यों कर रही है 'फैमिली मैन-2' का विरोध, क्या है LTTE की पूरी कहानी?

तमिल जनता आखिर क्यों कर रही है 'फैमिली मैन-2' का विरोध, क्या है LTTE की पूरी कहानी?

जब ट्रेलर आया था, तबसे लगातार विरोध जारी है.

माधुरी से डायरेक्ट बोलो 'हम आपके हैं फैन'

माधुरी से डायरेक्ट बोलो 'हम आपके हैं फैन'

आज जानते हो किसका हैप्पी बड्डे है? माधुरी दीक्षित का. अपन आपका फैन मीटर जांचेंगे. ये क्विज खेलो.

जिन मीम्स को सोशल मीडिया पर शेयर कर चौड़े होते हैं, उनका इतिहास तो जान लीजिए

जिन मीम्स को सोशल मीडिया पर शेयर कर चौड़े होते हैं, उनका इतिहास तो जान लीजिए

कौन सा था वो पहला मीम जो इत्तेफाक से दुनिया में आया?