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किसी केस से जज खुद को अलग क्यों कर लेते हैं?

18 जून 2021 – सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की जस्टिस इंदिरा बनर्जी ने बंगाल चुनाव के बाद हुई हिंसा के केस की सुनवाई करने से मना कर दिया. खुद को इस केस से अलग कर लिया. इसके पीछे वजह बताई- ‘व्यक्तिगत कारण’.

21 जून 2021 – दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस अनूप जयराम भंभानी ने डिजिटल मीडिया हाउस और आईटी दिशानिर्देशों से जुड़े केस से खुद को अलग कर लिया.

22 जून 2021 – सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अनिरुद्ध बोस ने नारदा टेप कांड मामले की सुनवाई से खुद को अलग करने का फैसला लिया. यह मामला पश्चिम बंगाल सरकार से जुड़ा है.

पांच दिनों के अंदर जजों के किसी केस से खुद को अलग करने के ये तीन वाकये पेश आए. ऐसा क्या हुआ कि इन जजों ने खुद को इन केसों से अलग कर लिया? इस तरह से अपने को किसी केस से अलग करने का सिस्टम क्या है? क्या इसके लिए कोई तय नियम-कायदा है? आइए जानते हैं तफ्सील से.

न्याय में नज़रिए का सवाल

‘न्याय न सिर्फ होना चाहिए बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए’ ये वाक्य तकरीबन 100 साल पहले ब्रिटेन के एक जज ने अपने फैसले में लिखा था. जज का नाम था लॉर्ड हेवर्ड. इस वाक्य की भावना यही है कि न्याय सिर्फ तकनीकी आधार पर मिलते हुए ही नहीं दिखना चाहिए. न्याय की आस में अदालत की दहलीज पर पहुंचे शख्स को लगना भी चाहिए कि न्याय हुआ है. जजों का खुद को किसी खास केस की सुनवाई से हटा लेने के पीछे मुख्य कारणों में से यह एक बड़ा कारण है. सारी पैमाइश नज़रिए की है. कहीं ऐसा संदेश तो नहीं जा रहा है कि पक्षपात हो रहा है? ऐसी ही कुछ कशमकश इन 5 दिनों में तीन जजों के साथ रही होगी कि उन्होंने खुद को केस से अलग कर लिया.

क्या जजों को केस से हटने की वजह बतानी होती है?

ऐसा कोई नियम नहीं है. कुछ जज इस बात को जाहिर करते हैं, और कुछ बिना कहे ही खुद को केस से अलग कर लेते हैं. हाल में इन जजों ने जिन परिस्थितियों में केस से अलग किया, वो भी जान लीजिए.

इंदिरा बनर्जी – सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस इंदिरा बनर्जी ने बंगाल चुनाव के बाद हुई हिंसा के मामले की सुनवाई से खुद को अलग किया है. मामला चुनाव बाद हिंसा के दौरान दो भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या की सीबीआई या एसआईटी से जांच की मांग से जुड़ा है. न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी और एमआर शाह की खंडपीठ मृतक भाजपा सदस्य अविजीत सरकार के भाई बिस्वजीत सरकार द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी. जैसे ही मामला उठाया गया, पश्चिम बंगाल की रहने वाली न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी ने कहा,

“मुझे इस मामले को सुनने में कुछ कठिनाई हो रही है.”

बता दें कि इंदिरा बनर्जी कोलकाता में ही पली-बढ़ी हैं. उन्होंने कोलकाता हाईकोर्ट में 1985 से 2002 तक प्रैक्टिस की है. 5 अगस्त 2002 को वह कोलकाता हाईकोर्ट की परमानेंट जज नियुक्त की गईं. इसके बाद वो दिल्ली हाईकोर्ट में जज रहीं. 2017 में मद्रास हाई कोर्ट की चीफ जस्टिस बनीं. साल 2018 में जस्टिस बनकर सुप्रीम कोर्ट आईं.

कानूनी जानकारों का मानना है कि वह यकीनन नहीं चाहती होंगी कि उनकी पृष्ठभूमि की वजह से उनके फैसले पर सवाल उठें. ऐसे में जज अक्सर ऐसा कदम उठाते हैं.

अनिरुद्ध बोस – 22 जून को सुप्रीम कोर्ट में नारद मामले के संबंध में सुनवाई होनी थी. पश्चिम बंगाल राज्य, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और कानून मंत्री मलय घटक की याचिकाएं सामने थीं. लेकिन न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस ने याचिकाओं पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया. उन्होंने कोर्ट के सामने इसे लेकर कोई कारण नहीं बताया. बस मामले को न सुन पाने की बात कही.

जस्टिस अनिरुद्ध बोस भी कोलकाता हाईकोर्ट में जज रहे हैं. कोलकाता हाईकोर्ट की वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के अनुसार (यहां क्लिक करके देखें) जस्टिस अनिरुद्ध बोस की पैदाइश से लेकर लॉ की पढ़ाई तक कोलकाता में ही हुई. कोलकाता में ही उन्होंने अपनी वकालत की प्रैक्टिस शुरू की. साल 2004 में वो कोलकाता हाईकोर्ट में परमानेंट जज बनाए गए. साल 2018 में उन्हें झारखंड हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस, और 2019 में सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त किया गया.

कानूनी जानकार जस्टिस अनिरुद्ध बोस के इस केस से हटने की वजह भी पश्चिम बंगाल से इनके कनेक्शन को मान रहे हैं. कोई भी जज नहीं चाहता कि उसकी सुनवाई को संदेह की निगाह से देखा जाए.

अनूप जयराम भंभानी – दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस अनूप जयराम भंभानी ने 21 जून को एक केस से खुद को अलग कर लिया. कोर्ट डिजिटल मीडिया हाउस द वायर, द क्विंट और अन्य द्वारा आईटी रूल्स 2021 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था. द लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सीनियर एडवोकेट नित्या रामकृष्णन ने पहले याचिकाकर्ताओं के लिए नियमों के भाग 3 (जो डिजिटल मीडिया से संबंधित है) के तहत कठोर कदमों से अंतरिम सुरक्षा की मांग की. लेकिन बेंच ने ऐसा करने से मना कर दिया. जस्टिस अनूप जयराम भंभानी ने कहा कि

“या तो हम मामले की सुनवाई कर सकते हैं या नहीं, कोई बीच का रास्ता नहीं है.”

इतना कहते हुए उन्होंने खुद को केस को सुनवाई से अलग कर लिया.

कानून के जानकार मानते हैं कि केस को सुनना या न सुनना किसी जज के विवेक पर है. वह किसी भी वक्त या परिस्थिति में ऐसा करने से मना कर सकता है.

जस्टिस अनूप जयराम भंभानी 22 अक्टूबर 2018 से दिल्ली हाईकोर्ट में परमानेंट जज हैं.

कुल मिलाकर मामला यह है कि जब भी किसी जज को ‘कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ या हितों में टकराव दिखता है तो वह खुद को केस से अलग कर लेते हैं. वह इस तरह का इंप्रेशन नहीं देना चाहते कि वह किसी की तरफ झुके हुए हैं. वह किसी से पक्षपात कर रहे हैं. ये हितों का टकराव किसी भी तरह का हो सकता है. मिसाल के तौर पर किसी कंपनी में शेयर होना, किसी से व्यक्तिगत संबंध होना या किसी खास पृष्ठभूमि से आना. न्याय से जुड़ा हुआ सीधा सा सिद्धांत है कि कोई भी अपने मामले में जज नहीं हो सकता.

सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट के दो जजों ने 4 दिन के भीतर ही अपने को केसों से अलग कर लिया.

अलग होने का क्या कोई फिक्स नियम-कायदा होता है?

इसे लेकर किसी तरह का औपचारिक नियम-कायदा नहीं है. यह जज के अपने विवेक पर होता है. वह चाहे तो अपने हितों के टकराव या किसी खास कारण को बताकर केस से अलग हो सकता है. कई बार ऐसा भी हुआ है कि केस की सुनवाई में शामिल वकील या याचिकाकर्ता ने जज के सामने हितों के टकराव का दावा किया. लेकिन जज खुद को केस से अलग करेगा या नहीं, यह फैसला सिर्फ जज करता है.

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में जरूर इसे लेकर सफाई मिलती दिखी है. साल 1987 में रंजीत ठाकुर बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के केस में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण बातें कही थीं. कोर्ट ने माना था कि पक्षपात की संभावना का परीक्षण पक्षकारों के मन में आशंका के हिसाब से होना चाहिए, न कि जज के मन में. कोर्ट ने कहा था-

“एक जज के लिए पक्षपात को लेकर फैसला करने का सही तरीका यह नहीं है कि वह खुद से पूछे कि क्या मैं ईमानदार हूं. बल्कि वह पार्टी (जिसके केस की सुनवाई हो रही है) के मन के हिसाब से फैसला करे.”

सुप्रीम कोर्ट ने अपने कोड ऑफ एथिक्स में भी लिखा है कि एक जज को ऐसी किसी कंपनी से जुड़े मामले नहीं सुनने चाहिए, जिसमें उसने खुद शेयर ले रखे हों. जब तक कि उसने इसके बारे में पूरी पारदर्शिता से सब बता न दिया हो, और इस आधार पर सुनवाई को लेकर किसी ने आपत्ति न की हो.

क्या कोई जज केस से हटने से इंकार भी कर सकता है?

अगर किसी जज से नाम वापस लेने की रिक्वेस्ट की जाती है तो इस पर फैसले का अधिकार जज को ही होता है. कई बार ऐसा हुआ है कि हितों के टकराव का कोई सीधा मामला नहीं दिख रहा था, फिर भी जज ने केस से अपना नाम वापस ले लिया. हालांकि कई बार ऐसा भी हुआ कि जज ने आपत्ति उठने के बाद भी केस से खुद को अलग नहीं किया. मिसाल के तौर पर साल 2015 में जस्टिस अरुण मिश्रा ने कई पार्टियों के मांग करने के बावजूद एक केस से खुद को अलग करने से इंकार कर दिया था. वह उस संवैधानिक बेंच के सदस्य थे, जो उनके ही दिए फैसले पर की गई अपील पर सुनवाई कर रही थी. उनका कहना था कि अगर ये मांग मान ली गई तो न्यायपालिका की स्वतंत्रता को खतरा हो सकता है.

अयोध्या के राम जन्मभूमि केस में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस यूयू ललित ने खुद को संवैधानिक बेंच से अलग कर लिया था. केस की सुनवाई के दौरान पक्षों ने उनका ध्यान इस तथ्य की तरफ दिलाया था कि वह इस केस में कभी एक क्रिमिनल केस में वकील के तौर पर पेश हुए थे. इसके बाद उन्होंने बेंच से हटने का फैसला लिया.

जज के हटने के बाद केस का क्या होता है?

किसी केस से कोई जज जब खुद को अलग कर लेता है तो वो केस किसी दूसरे जज को सौंप दिया जाता है. अगर सुनवाई दो या अधिक जजों की बेंच कर रही होती है, तो हटने वाले जज की जगह पर किसी दूसरे जज को नियुक्त किया जाता है. कई बार बेंच ही बदल दी जाती है. बेंच बदलना है या किस जज को शामिल करना है, इसका फैसला सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस करते हैं.


वीडियो – कोर्ट के इन फैसलों को जाने बिना लिव इन रिलेशनशिप में रहना भारी पड़ सकता है!

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