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क्या बंद हो जाएंगे ट्विटर-फेसबुक?

आज शुरुआत करते हैं एक 19 साल पुरानी मौत की कहानी से. वो कहानी, जिससे बहुत बड़े ओहदे पर बैठे एक आदमी ने फ़ायदा उठाने की कोशिश की. वो आदमी, जिसका झूठे दावे करने का रेकॉर्ड इतना लंबा-चौड़ा है कि कई अख़बारों ने उसके कहे झूठों का बही-खाता अपडेट करने के लिए ख़ास लोगों को काम पर लगा रखा है. वो आदमी इतने झूठे दावे कर चुका है, इतनी फ़र्जी बातें कह चुका है कि उसका नया झूठ अब किसी को नहीं चौंकाता. मगर इस कहानी ने सब कुछ बदल दिया. लोगों ने कहा, अब बस.

किसकी मौत, कौन सी कहानी का ज़िक्र कर रहे हैं हम?
हम ज़िक्र कर रहे हैं 28 साल की लोरी क्लॉसुतिस का. अमेरिका की रहने वाली लोरी रिपब्लिकन पार्टी के एक सांसद ‘जो स्काबोरो’ के लिए काम करती थीं. 19 जुलाई, 2001 की बात है. रोज़ की तरह उस दिन भी लोरी दफ़्तर गईं. मगर वहां से ज़िंदा वापस नहीं लौटीं. जो स्काबोरो के दफ़्तर में, जहां वो काम करती थीं, एक मेज पर सिर औंधा किए उनकी लाश मिली. जांच हुई तो पता चला कि लोरी को दिल की परेशानी थी. जिसका पता शायद उन्हें भी नहीं था. इसी वजह से उस दिन उनकी धड़कनों की रफ़्तार गड़बड़ाई और वो बेहोश हो गईं. बेहोश हालत में ही उनका सिर मेज से टकराया और उनकी जान चली गई. ये सब अजीब संयोग था, लेकिन जो था यही था. जांच अधिकारियों ने कहा, उन्हें लोरी की मौत में शक करने लायक कुछ नहीं मिला है.

मौत के समय सांसद स्काबोरो कहां थे?
हमने सांसद जो स्काबोरो के बारे में बताया था. लोरी की मौत के समय वो कहां थे? वो थे फ़्लोरिडा से करीब डेढ़ हज़ार किलोमीटर दूर वॉशिंगटन में. पुलिस ने स्काबोरो को क्लीन चिट दे दी. ये मामला यहां ख़त्म हो गया. मगर कहानी ख़त्म नहीं हुई. कई बार ये होता है कि बड़े पत्रकार पत्रकारिता छोड़कर राजनीति में जाते हैं. मगर स्काबोरो राजनीति छोड़कर पत्रकारिता में आ गए. अमेरिका में एक चैनल है- MSNBC. इसपर सुबह-सुबह ‘मॉर्निंग ज़ो’ नाम का एक न्यूज़ शो आता है. ये शो लेकर आते हैं स्काबोरो. अब आगे ध्यान से सुनिएगा. आगे के प्रसंग से हमारी आज की ख़बर का बड़ा लिंक जुड़ने वाला है. क्या है ये लिंक? असल में स्काबोरो और उनका ये प्रोग्राम बीते कुछ समय से राष्ट्रपति ट्रंप की बहुत आलोचना कर रहा था. ज़्यादातर जानकारों की तरह इनका भी मानना है कि ट्रंप की कोरोना रणनीति नाकाम रही.

Joe Scarborough
जो स्काबोरो (फोटो: एपी)

…और फिर ट्रंप ने हद कर दी
अपनी आलोचना करने वाले पत्रकारों पर काफी मौखिक तलवार भांजते हैं ट्रंप. स्काबोरो के साथ भी वो यही कर रहे थे. इसी कड़ी में 24 मई को उन्होंने एक ट्वीट किया. थॉमस पेन नाम के एक शख्स का ट्वीट शेयर करते हुए ट्रंप ने निशाना साधा स्काबोरो पर. किस मामले में? 19 साल पुरानी लोरी क्लॉसुतिस की मौत के मामले में. अपने इस ट्वीट में ट्रंप ने स्काबोरो और लोरी के बीच अफ़ेयर की तरफ इशारा किया. संकेत दिया कि शायद इस वजह से लोरी की हत्या कराई गई होगी. कोई सबूत नहीं, कोई आधार नहीं, अमेरिका के राष्ट्रपति ने बस एक छिछली सी कन्सपिरेसी थिअरी दुनिया के आगे उछाल दी.

ट्विटर CEO के पास एक चिट्ठी आई
फिर क्या था, लोग भड़क गए. यहां तक कि ट्रंप के कई समर्थकों तक ने इस बात पर ट्रंप से किनारा कर लिया. ‘न्यू यॉर्क पोस्ट’ जैसे ट्रंप समर्थक अख़बारों ने भी ट्रंप के इस ट्वीट पर खेद जताया. लोगों ने कहा कि ट्रंप इन मामलों में अपना स्टैंडर्ड भले कितना भी गिरा चुके हों, मगर ये तो हद ही है. इसके बाद फोकस घूमा ट्विटर पर. वो मंच, जिसका इस्तेमाल करके ट्रंप एक मरी हुई लड़की पर निराधार कीचड़ उछाल रहे थे. लोरी के पति टिमोथी क्लॉसूटिस ने ट्विटर के चीफ एक्ज़िक्यूटिव जैक डोरसे को चिट्ठी भेजकर उनसे ट्रंप का ये ट्वीट हटाने की अपील की. इस चिट्ठी में लिखा था-

मैं वकील नहीं हूं, एक रिसर्च इंजिनियर हूं. मगर मैंने ट्विटर के नियम और क़ायदों को अच्छी तरह पढ़ा है. राष्ट्रपति का वो ट्वीट, जिसमें उन्होंने लोरी की हत्या का संदेह जताया है, वो भी बिना सबूत के, वो ट्विटर के सामुदायिक नियमों का उल्लंघन है. मेरे जैसा एक साधारण इंसान अगर इस तरह का ट्वीट करे, तो उसका ट्विटर हैंडल निष्क्रिय कर दिया जाएगा. मगर मैं तो यहां बस राष्ट्रपति के उस ट्वीट को हटाने की मांग कर रहा हूं.

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फोटो (ट्विटर)

इस आग्रह पर ट्विटर ने क्या कहा?
उन्होंने ट्रंप का ये ट्वीट डिलीट करने से इनकार कर दिया. हां, मगर ट्विटर ने ये ज़रूर कहा कि वो इस तरह की दिक्कतों से निपटने के लिए पॉलिसी बनाने पर विचार कर रहे हैं. तो क्या ट्विटर ने विचार किया? हां किया. इस प्रकरण के बाद ट्रंप और उनकी फ़ेक न्यूज़ फैलाने की आदत रेडार में आ गए. इससे बनी एक वन्स इन अ लाइफ़टाइम वाली स्थिति. ये स्थिति जुड़ी है 26 मई को आए ट्रंप के एक ट्वीट से. जिसमें ट्रंप ने मेल-इन-बैलेट्स, यानी डाक से भेजे जाने वाले मतदाता पत्रों पर टिप्पणी की थी. उन्होंने कैलिफॉर्निया के गवर्नर गैविन न्यूसॉम पर पोस्टल बैलेट में धांधली करने का इल्ज़ाम लगाया. ट्रंप के मुताबिक, ये सब नवंबर 2020 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे प्रभावित करने के लिए किया जा रहा है. ट्रंप ने ये भी कह दिया कि इस चुनाव में धांधली होनी है.

California Gov. Gavin Newsom
कैलिफॉर्निया के गवर्नर गैविन न्यूसॉम (फोटो: एपी)

ये मेल-इन-बैलेट्स का मामला क्या है?
ये मामला जुड़ा है कोरोना से. नवंबर आने में अभी छह महीने बचे हैं. तब तक कोरोना का ख़तरा ख़त्म नहीं होगा. ऐसे में चुनाव कैसे करवाए जाएंगे, ये बड़ी चिंता है. इसी चिंता के क्रम में डाक से वोट डालने का सुझाव आया. 8 मई को कैलिफॉर्निया के गवर्नर गैविन न्यूसॉम ने ऐलान किया कि उनके प्रांत में सभी मतदाताओं को डाक के द्वारा बैलेट पेपर भेजा जाएगा. ताकि वो बिना वोटिंग बूथ पर आए वोट डाल सकें. इसके अलावा लोगों के पास सशरीर आकर वोट डालने का भी विकल्प होगा. गवर्नर न्यूसॉम ट्रंप की विपक्षी डेमोक्रैटिक पार्टी के नेता हैं. ऐसे में ट्रंप उनपर इल्ज़ाम लगा रहे थे कि दरअसल ये पूरा मामला चुनावी धांधली का है. उन्होंने कहा कि गवर्नर न्यूसॉम ग़ैर-वोटर्स को भी बैलेट पेपर भेज रहे हैं. ये आरोप ग़लत और बेबुनियाद पाए गए.

बस, इसी पॉइंट पर आकर ट्विटर ने ट्रंप पर ऐक्शन लिया. उन्होंने ट्रंप के इस ट्वीट के नीचे फैक्ट-चेक का एक लिंक लगा दिया. इस लिंक को क्लिक करने पर एक डिस्क्लेमर खुलता है. इस डिस्क्लेमर में कई मीडिया रिपोर्ट्स का हवाला देते हुए कहा गया था कि ट्रंप का लगाया इल्ज़ाम आधारहीन है.

अब सवाल है कि ट्रंप ने क्या किया?
क्या वो ग़लती मानकर चुप बैठ गए? नहीं. उन्होंने ट्विटर के खिलाफ जंग छेड़ दी. ट्विटर के ही प्लेटफॉर्म पर उन्होंने ट्विटर के खिलाफ़ मोर्चा खोल दिया. ट्रंप ने कहा कि ट्विटर 2020 के राष्ट्रपति चुनावों में दखलंदाजी करने की कोशिश कर रहा है. ट्रंप ने उसपर राजनैतिक पक्षपात का भी आरोप लगाया. इन आरोपों पर ट्विटर की भी प्रतिक्रिया आई. उनका कहना है कि ट्रंप का ट्वीट मतदाताओं को गुमराह कर सकता है. चुनावी प्रक्रिया में उनकी हिस्सेदारी पर असर डाल सकता है. इसीलिए पारदर्शिता की अपनी पॉलिसी के तहत उन्होंने ट्रंप के ट्वीट के साथ फैक्ट-चेक का लिंक लगाया.

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फोटो (ट्विटर)

तो क्या ये मामला इतने पर निपट गया?
नहीं. ट्रंप एक एक्ज़िक्यूटिव ऑर्डर लाने की तैयारी में हैं. ये ऑर्डर शायद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को मिली एक छूट ख़त्म कर देगा. वो छूट, जिसका संबंध है अमेरिका के कम्यूनिकेशन्स डिसेंसी ऐक्ट से. 1996 के इस अधिनियम का मकसद था इंटरनेट पर मौजूदा पॉर्नोग्रैफिक कॉन्टेंट पर काबू पाना. इसी ऐक्ट में एक सेक्शन 230 की व्यवस्था है. जो कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को इम्यूनिटी देती है. ये इम्यूनिटी कि वो अपने मंच पर किसी थर्ड-पार्टी द्वारा कही और लिखी गई चीजों के लिए जिम्मेदार नहीं माने जाएंगे. इस सेक्शन के 26 शब्द उस क़ानून की बुनियाद हैं, जिन्हें इंटरनेट और फिर सोशल मीडिया के फलने-फूलने का बड़ा कारण माना जाता है. क्या हैं ये 26 शब्द? ये हैं-

नो प्रोवाइडर ऑर यूज़र ऑफ़ एन इंटरेक्टिव कंप्यूटर सर्विस शैल बी ट्रीटेड एज़ द पब्लिशर ऑर स्पीकर ऑफ़ एनी इन्फ़ॉर्मेशन प्रोवाइडेड बाय अनदर इनफ़ॉर्मेश कंटेट प्रोवाइडर.

आसान भाषा में इसका मतलब कुछ यूं होगा कि मान लीजिए गूगल या यूट्यूब पर किसी ने कोई फ़र्जी आर्टिकल या विडियो डाल दिया. इसके लिए आप गूगल या यूट्यूब का गला नहीं पकड़ सकते हैं. फेसबुक या ट्विटर पर किसी की डाली किसी पोस्ट या किसी कमेंट के लिए आप उस कंपनी को जिम्मेदार नहीं मान सकते.

ख़बरों के मुताबिक, ट्रंप इस नियम में बदलाव कर सकते हैं. इसके अलावा कुछ धमकियां तो उन्होंने सीधे-सीधे दी हैं. मसलन ये कि वो कुछ बड़ा फ़ैसला लेने वाले हैं. उन्होंने सोशल मीडिया को रेगुलेट करने और इसके कुछ प्लेटफॉर्म्स को बंद करवाने की भी धमकी दी है. वाइट हाउस ने भी एक्ज़िक्यूटिव ऑर्डर लाने की बात कही. मगर क्या ऑर्डर होगा ये, इसको स्पष्ट नहीं किया.

ज़ाहिर है, ट्रंप और उनका प्रशासन अपनी चिढ़ निकालने का बहाना खोज रहे हैं. लेकिन इससे इतर अगर आप सोशल मीडिया को खंगालें, तो कुछ दिक्कतें तो साफ दिखती हैं.

क्या हैं ये दिक्कतें?
देखिए, शुरुआत में ट्विटर और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म्स की भूमिका बड़ी रोमांटिक थी. आप नए-नए दोस्त बना सकते थे. पुराने दोस्तों से जुड़ सकते थे. अपनी बात, अपनी कला बहुत सारे लोगों तक पहुंचा सकते थे. किसी मुद्दे के प्रति ज़्यादा लोगों को जागरूक कर सकते थे. इन प्लेटफॉर्म्स ने सिटीज़न जर्नलिज़म को भी ख़ूब बढ़ावा दिया. आप अरब स्प्रिंग याद कीजिए. उसके पीछे सोशल मीडिया की कितनी बड़ी भूमिका थी.

मगर फिर धीरे-धीरे इस प्लेटफ़ॉर्म का बेजा इस्तेमाल होने लगा. राजनैतिक पार्टियां इसका इस्तेमाल करके सिर्फ़ प्रचार नहीं, प्रोपगेंडा भी फैलाने लगीं. फ़ेक न्यूज़ एक बड़ी दिक्कत बन गया. ये फेक़ न्यूज़ न केवल अफ़वाहें फैलाकर लोगों को गुमराह करते हैं, बल्कि इनके कारण लोग मारे भी जा रहे हैं. वो बच्चा चोरी वाली अफ़वाहें याद हैं? इतने लोगों की जान ली उसने. ये फ़ेक न्यूज़ दंगे तक फैलाते हैं. क़ानून व्यवस्था और भाईचारे के लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं ये. जब परेशानी इतनी बड़ी है, तो क्या इन सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स की जिम्मेदारी तय नहीं होगी? इस सवाल पर दुनिया में बहस छिड़ी हुई है. सोशल मीडिया कंपनियों पर फ़ेक न्यूज़ से निपटने का दबाव बन रहा है. इसी दबाव का नतीजा है कि ट्विटर ने 26 मई को ट्रंप के ट्वीट पर फ्लैग उठाया.

Twitter Ceo Jack Dorsey
ट्विटर प्रमुख जैक डोरसे (फोटो: एपी)

फ़ेसबुक ने क्या कहा?
इस पूरे मामले पर फेसबुक मज़े ले रहा है. इसके मालिक मार्क ज़करबर्ग ने ट्रंप के ट्वीट का फ़ैक्ट-चेक करने पर ट्विटर की आलोचना की है. ज़करबर्ग के मुताबिक, सोशल मीडिया कंपनियों को ऑनलाइन कही जाने वाली सारी बातों में पंच नहीं बनना चाहिए. ट्विटर के CEO जैक डोरसी ने ज़करबर्ग की आलोचना का जवाब भी दिया है. डोरसी ने कहा है कि ट्विटर दुनियाभर में चुनाव प्रक्रिया से जुड़ी ग़लत या विवादित जानकारियों पर इसी तरह कार्रवाई करता रहेगा. डोरसी के मुताबिक, ऐसा करना पंच बनना नहीं है. बल्कि पारदर्शिता रखना है. ताकि लोगों तक सही बात पहुंचे और वो सही जानकारी के आधार पर फैसले ले सकें.

फ़ेसबुक से जुड़ा सबसे बड़ा विवाद
फ़ेसबुक का ज़िक्र चला है, तो थोड़ा उनका रेकॉर्ड भी देख लेते हैं. फेसबुक के साथ कई विवाद जुड़े हैं. उनमें सबसे बड़ा है कैम्ब्रिज़ एनालिटिका का मामला. क्या था ये केस? कैम्ब्रिज़ एनालिटिका एक कंपनी है. 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान इसने ट्रंप के लिए प्रचार किया था. अब सोशल मीडिया पर इस तरह के राजनैतिक कैंपेन चलाना ग़ैरक़ानूनी तो था नहीं, तो इससे किसी को आपत्ति क्यों होती. आपत्ति हुई 2018 में. क्यों हुई? क्योंकि न्यू यॉर्क टाइम्स और गार्डियन ने एक बड़ी संवेदनशील ख़बर ब्रेक की. इसमें ये समझाया गया था कि कैम्ब्रिज़ एनालिटिका ने किस तरह करोड़ों अमेरिकी नागरिकों का फेसबुक डेटा चुराकर ट्रंप को चुनाव जितवाने में मदद की. मार्क ज़करबर्ग इसके लिए मुआफ़ी मांग चुके हैं. फिलहाल इस मामले की जांच भी चल रही है.

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फेसबुक प्रमुख मार्क ज़करबर्ग (फोटो: एपी)

फ़ेसबुक पर बड़े सवाल
अपने प्लेटफ़ॉर्म से फ़ेक न्यूज़ और नफ़रत फैलाए जाने के प्रति फेसबुक की नीतियां बहुत गोलमोल और विवादित हैं. राजनैतिक विज्ञापनों से जुड़ी फेसबुक की पॉलिसी भी बहुत आलोचना पाती है. फेसबुक कहता है कि हम राजनेताओं द्वारा दिए गए विज्ञापनों का फैक्ट चेक नहीं करेंगे. फिर चाहे वो झूठी बातों से ही क्यों न भरा हो. जबकि गूगल और ट्विटर, दोनों ने इस मामले पर काफी काम किया है.

ट्विटर का क्या होगा?
अब फिर वापस लौटते हैं ट्विटर के अपने मूल विषय पर. सवाल है कि क्या ट्रंप ट्विटर पर कार्रवाई कर सकते हैं? क्या अपने ट्वीट का फ़ैक्ट-चेक करने पर ट्रंप उसको निशाना बना सकते हैं? क्या ट्रंप ट्विटर को बंद कर सकते हैं? अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप के पास इस तरह का क़ानूनी अधिकार नहीं है. जानकार इसके लिए अमेरिकी संविधान के फर्स्ट अमेंडमेंट का हवाला दे रहे हैं. ये फर्स्ट अमेंडमेंट कहता है कि अमेरिकी संसद अभिव्यक्ति की आज़ादी या प्रेस की आज़ादी कम करने से जुड़ा कोई क़ानून नहीं बना सकती. ऐसे में ट्रंप ट्विटर से किस तरह खुन्नस निकालेंगे, निकाल सकेंगे भी कि नहीं, ये तमाम बातें क़ानूनी दायरे में आएंगी. अमेरिकी क़ानून पहले भी कई मौकों पर प्रेस और अभिव्यक्ति की आज़ादी का पक्ष लेते हुए सरकार के विरुद्ध जा चुका है.

जहां तक ट्विटर की बात है, तो उसपर नेताओं के साथ नर्मी दिखाने का आरोप लंबे समय से लग रहा था. वो कम्यूनिटी स्टैंडर्ड का हवाला देकर कई स्पैम मेसेज और फ़ेक न्यूज़/भड़काऊ पोस्ट पर ऐक्शन लेता. मगर नेताओं को छूट दे देता. तब भी, जब वो सीधे-सीधे ग़लत जानकारी फैलाते हुए दिख रहे थे. मगर फिर जुलाई 2019 में वो राजनैतिक पोस्ट्स से जुड़ा एक नया सिस्टम लाया. इसके तहत ग़लत जानकारी या नफ़रत फैलाने वाले पोस्ट के साथ एक चेतावनी जाएगी. ट्विटर ने कहा कि वो ट्वीट डिलीट तो नहीं करेगा, मगर पारदर्शिता बरतते हुए लोगों को उसके प्रति आगाह ज़रूर कर देगा. ट्विटर के मुताबिक, ये सिस्टम जनता के हित से जुड़ा है.


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