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ट्विटर का कौन सा सुरक्षा कवच छिन गया है कि उसके अधिकारियों के जेल जाने की नौबत आ सकती है?

15 जून को यूपी के गाजियाबाद में कुछ पत्रकारों के साथ-साथ ट्विटर के खिलाफ भी एक FIR दर्ज की गई. मामला एक वायरल वीडियो से जुड़ा है. गाजियाबाद के लोनी इलाके में एक बूढ़े मुस्लिम शख्स के मारपीट का वीडियो ट्विटर पर वायरल हुआ. लोगों ने इसे लेकर अलग-अलग के दावे किए. सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश भी की गई. इस मामले को तफ्सील से यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं. अब यूपी पुलिस कह रही है कि वीडियो को वायरल करने में ट्विटर भी ‘पार्टी’ है. ऐसा पहली बार हुआ है कि ट्विटर को किसी दूसरे के किए ट्वीट का जिम्मेदार ठहराया जा रहा है. आखिर ऐसा क्या हुआ कि ट्विटर पर इस तरह का मामला दर्ज कर लिया गया? पहले ऐसा कौन सा सुरक्षा कवच था जो ट्विटर बचता रहा? क्या सरकार के पास ऐसा करने की कोई नई कानूनी ताकत आ गई है? आइए ये सब तफ्सील से जानते हैं.

सबसे पहले सोशल मीडिया का सिस्टम समझ लीजिए

वैसे आज के जमाने में सोशल मीडिया के बारे में सभी जानते हैं. फिर भी थोड़ा समझ लीजिए, आगे की कानूनी कहानी समझने में मदद मिलेगी. फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम पर कोई भी उनके नियम-कायदे मानकर ही अपना अकाउंट बना सकता है. उसके बाद वह अपने विचार, पोस्ट या फोटो की शक्ल में वहां रख सकता है. इस पूरे सिस्टम में कुल मिलाकर तीन लोग इन्वॉल्व हैं. पहली सोशल मीडिया कंपनी, दूसरी सरकार और तीसरा वो जिसने सोशल मीडिया पर अकाउंट बनाया. तो अब हम जब भी थर्ड पार्टी कहें तो यह समझा जाए कि हम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के हमारे आपके जैसे यूजर की बात कर रहे हैं.

अब सवाल ये कि अगर सोशल मीडिया पर कोई खुराफात करता है तो क्या होगा? खुराफात मतलब अगर कोई फेक न्यूज, दंगा भड़काने की कोशिश, अश्लील सामग्री आदि सोशल मीडिया पर डालता है तो कौन जिम्मेदार होगा? इसे तय करने का जिम्मा सरकार पर है. वही इसके लिए नियम-कायदा बनाती है. सोशल मीडिया वेबसाइट्स के ऑपरेशन्स भारत सरकार के आईटी एक्ट 2000 के तहत आते हैं. भारत सरकार के आईटी एक्ट में तहत इन्हें इंटरमीडिएरी का दर्जा मिला हुआ है. मतलब सोशल मीडिया कंपनियां बस एक मध्यस्थ भर हैं. इनके ऊपर सोशल मीडिया पर किसी दूसरे के लिखे या पोस्ट किए की जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती. मतलब सिर्फ थर्ड पार्टी जिम्मेदार होगी. यह एक तरह का सुरक्षा कवच है जो कानून के जरिए कंपनियों को मिला हुआ है.

इंटरमीडिएरी का दर्जा कैसे मिलता है?

जैसा हमने बताया कि सभी सोशल मीडिया और इंटरनेट कंपनियों के लिए सरकार ने आईटी एक्ट 2000 के तहत नियम-कायदे बनाए हैं. यहीं पर इंटरमीडिएरी की पहली परिभाषा भी मिलती है. आईटी एक्ट के सेक्शन 2 (1)(ua)(w) के अनुसार

“इंटरमीडिएरी का मतलब ऐसे किसी शख्स या संगठन से है जो किसी दूसरे के लिए इलेक्ट्रॉनिक रेकॉर्ड रिसीव, स्टोर, ट्रांस्मिट करता है. मिसाल के तौर पर टेलिकॉम सर्विस प्रोवाइडर, नेटवर्क सर्विस प्रोवाइडर, इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर, वेब होस्टिंग सर्विस प्रोवाइडर, सर्च इंजन, ऑनलाइन पेमेंट साइट, ऑनलाइन ऑक्शन साइट, ऑनलाइन मार्केट प्लेस और साइबर कैफे”

चूंकि तकनीक रोज बदल रही है तो सरकार उस हिसाब से नियम-कायदे भी वक्त-वक्त पर बदलती रहती है. बात 2011 की है. सरकार ने इनफॉर्मेशन टेक्नॉलजी रूल्स 2011 के सेक्शन 79 में इंटरमीडिएरी स्टेटस से जुड़े कुछ और नियम जोड़े. इसमें तफ्सील से बताया कि किस कंपनी को इंटरमीडिएरी का दर्जा किस शर्त पर दिया जाएगा. इन शर्तों में मुख्य रूप से शामिल थीं-

# कंपनियां यूजर के लिए साफ-साफ नियम-कायदे समझाएं.

# किसी भी तरह की आपराधिक गतिविधि को प्लेटफॉर्म पर बढ़ावा न मिले.

# सरकार अगर कानूनी तरीके से किसी यूजर के बारे में जानकारी चाहे तो उसे जानकारी उपलब्ध कराई जाए आदि

ढेरों ऐसे नियमों के अलावा यह भी कहा गया कि कंपनी अपनी वेबसाइट पर एक ग्रीवांस ऑफिसर का नंबर उपलब्ध कराए जिससे जरूरत पड़ने पर यूजर संपर्क कर सके.

सब कुछ ठीकठाक चला. अब 10 साल आगे आते हैं. सरकार ने साल 2021 के फरवरी महीने में आईटी कंपनियों के लिए कुछ नए नियम बनाए. इन्हें आईटी रूल्स 2021 कहा गया. इन रूल्स में यह प्रावधान किया गया कि हर सोशल मीडिया कंपनी को देश में तीन अधिकारी बिठाने होंगे. ये अधिकारी होंगे चीफ कंप्लायंस ऑफिसर (CCO), नोडल ऑफिसर और रेजिडेंट ग्रीवांस ऑफिसर. इसमें एक नियम यह भी रखा गया कि नियम न मानने पर उनसे इंटरमीडिएरी होने का दर्जा छिन जाएगा.

Twitter
ट्विटर जैसी सोशल मीडिया कपनियों को सरकार की तरफ से इंटरमीडिएरी का स्टेटस देकर उन्हें कानूनी जिम्मेदारी से बचाया गया था.

इंटरमीडिएरी का दर्जा छिनने से क्या होगा?

यह दर्जा छिनने से कोई भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म सीधे-सीधे थर्ड पार्टी (यूजर) के किए धरे का जिम्मेदार होगा. मतलब यूजर जो कुछ भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर करेगा उसके लिए यूजर के साथ-साथ कंपनी पर भी मामला दर्ज हो सकेगा. ऐसा ही कुछ ट्विटर के केस में 15 जून को हुआ है. यूपी में एक FIR में ट्विटर का नाम भी डाला गया है. इस तरह के प्रावधान का वर्णन आईटी रूल्स 2021 के सब सेक्शन 1 मे मिलता है जिसमें साफ लिखा है कि

अगर कोई इंटरमीडिएरी या मथ्यावर्ती इन नियमों का पालन करने में असफल रहता है तो उसे सेक्शन 79 में मिला संरक्षण खत्म हो जाएगा. इसके बाद वह इंटरमीडिएरी भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों सहित वर्तमान में लागू किसी भी कानून के तहत दंड के लिए उत्तरदायी होगी.

ट्विटर और सरकार का पंगा क्या है?

ट्विटर, सरकारी आदेश न मानने को लेकर लगातार चर्चा में रहा है. 26 जनवरी 2021 में लालकिला हिंसा के बाद सरकार और ट्विटर आमने-सामने आ गए. गणतंत्र दिवस के दिन दिल्ली में किसानों की ‘ट्रैक्टर रैली’ हिंसक हो गई. उस दौरान ट्विटर पर कथित तौर पर कई फेक न्यूज और भड़काऊ कंटेंट शेयर किए जा रहे थे. 31 जनवरी को सरकार ने ट्विटर से कुछ अकाउंट्स के खिलाफ एक्शन को कहा. ट्विटर ने 257 अकाउंट्स को सस्पेंड कर दिया लेकिन कुछ देर बाद ही ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के नाम पर उन हैंडल्स को बहाल कर दिया. इसके बाद 4 फरवरी को सरकार ने ट्विटर को 1157 और अकाउंट्स की सूची सौंपी जो भारत-विरोधी दुष्प्रचार में शामिल थे. सरकार के मुताबिक, वे अकाउंट्स या तो पाकिस्तान से जुड़े लोगों के थे या खालिस्तान समर्थकों के. इस बार भी ट्विटर ने महज कुछ हैंडल्स को ब्लॉक किया.

सरकार की तरफ से कहा गया कि उसने क़ानूनी प्रक्रिया के तहत ट्विटर को जानकारियां मुहैया कराई थी लेकिन बावजूद इसके भड़काऊ और भ्रामक जानकारियों को ट्विटर पर प्रसारित होने दिया गया. सरकार ने अमेरिका की कैपिटल हिल हिंसा और 26 जनवरी को भारत के लाल क़िले पर हुए घटनाक्रम की तुलना भी की और ट्विटर पर दोहरे मापदंड अपनाने के आरोप लगाए.

इसके जवाब में ट्विटर ने एक ब्लॉग पोस्ट लिखा. ट्विटर ने अपने एक आधिकारिक ब्लॉग में लिखा कि

‘कंपनी ने 500 से अधिक ट्विटर अकाउंट्स को निलंबित कर दिया है जो स्पष्ट रूप से स्पैम की श्रेणी में आते थे और प्लेटफ़ॉर्म का ग़लत इस्तेमाल कर रहे थे. कंपनी ने नियमों का उल्लंघन करने वाले सैकड़ों अकाउंट्स के ख़िलाफ़ कार्रवाई की है. ख़ासतौर पर उनके ख़िलाफ़, जो हिंसा, दुर्व्यवहार और धमकियों से भरे हुए थे. इसके साथ ही कंपनी ने नियमों का उल्लंघन करने वाले कुछ ट्रेंड्स पर भी रोक लगाई है.कंपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में है और हाल ही में केंद्र सरकार ने जिस आधार पर ट्विटर अकाउंट्स बंद करने को कहा, वो भारतीय क़ानूनों के अनुरूप नहीं हैं.’

Twitter Modi Government Notice

सोशल मीडिया और सरकार में जारी तनातनी के बीच मोदी सरकार ने ट्विटर से कहा था कि वह देश के नियम-कायदे माने और दोहरे मापदंड अपनाना बंद करे. (फोटो-पीटीआई)

इसके बाद बीजेपी के कई नेताओं ने दावा किया था कि एक टूलकिट के जरिए कांग्रेस कार्यकर्ताओं से कहा गया है कि वो सोशल मीडिया पर कोरोना के एक स्ट्रेन को ‘मोदी स्ट्रेन’ कहें और ‘सुपर स्प्रेडर कुम्भ’ जैसे शब्दों और वाक्यों का इस्तेमाल करें. इस टूलकिट की तस्वीरें भी कुछ बीजेपी नेताओं और मंत्रियों ने ट्वीट की थीं. इन ट्वीट्स को ट्विटर ने ‘मैनिपुलेटेड मीडिया’ यानी भ्रामक बता दिया है. जिनके ट्वीट के भ्रामक बताया गया उनमें बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा भी शामिल थे. मई में हुई इस घटना को बीजेपी ने ट्विटर की मनमानी करार दिया.

सरकार ने ट्विटर सहित दूसरी सोशल मीडिया कंपनियों की मनमानी रोकने के लिए नए आईटी नियम 2021 बनाए औऱ 26 मई 2021 तक उन्हें मानने की शर्त भी लगा दी. नियम-कायदे की डेडलाइन के दिन, 26 मई तक ट्विटर बताए गए सभी तीन अधिकारियों को नियुक्त नहीं कर सका. ऐसे में उसका इंटरमीडिएरी स्टेटस छिन गया.

आईटी मिनिस्टर ने ट्विटर की क्लास लगाई

एक तरफ FIR होने के बाद नियम-कायदे के उल्लंघन को लेकर ट्विटर के इंटरमीडिएरी का दर्जा छिनने की चर्चा हो रही थी, तो दूसरी तरफ आईटी मिनिस्टर रविशंकर प्रसाद ने ट्विटर पर ही उसकी क्लास ली. उन्होंने 9 ट्वीट का एक थ्रेड ट्वीट किया और इस मामले पर अपनी राय रखी. उन्होंने कहा

ट्विटर को कानूनी संरक्षण को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं. हालांकि एक बात साफ है कि ट्विटर इंटरमीडिएरी गाइडलाइंस को फॉलो करने में असफल रहा है. यह उसे 26 मई तक करनी थी. इसके बाद भी ट्विटर को कई मौके दिए गए लेकिन उसके बावजूद ट्विटर ने जानबूझ कर गाइडलाइन फॉलो न करने का रास्ता चुना. भारत की संस्कृति बड़े भूभाग में बदलती रहती है. किसी एक खास मामले में सोशल मीडिया और फेक न्यूज़ की वजह से आग भड़क सकती है. इंटरमीडिएरी गाइडलाइन लाने का यही एक मंतव्य था. यह हैरान करने वाला है कि जो ट्विटर खुद को अभिव्यक्ति की आजादी का झंडाबरदार बताता है उसने जानबूझ कर इंटरमीडिएरी गाइडलाइंस का उल्लंघन किया है. इससे भी ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि भारतीय कानून के तहत ट्विटर यूजर्स की परेशानी दूर करने का सिस्टम बनाने में असफल रहा है.

इसके अतिरिक्त अपने मन से मेनिप्युलेटेड मीडिया को फ्लैग करने या न फ्लैग करने की नीति बना रखी है. जो यूपी में हुआ वह फेक न्यूज के खिलाफ लड़ने के ट्विटर के मनमाने रवैये को दिखाता है. एक तरफ ट्विटर फेक न्यूज को लेकर बहुत उत्साहित दिखता है तो दूसरी तरफ यूपी के तरह के कई केसेज के मामले में कुछ नहीं करता. भारत की कंपनियां फिर चाहें वो दवा की हों आईटी या कोई और, जब अमेरिका या दूसरे देश में बिजनेस करती हैं तो खुद ब खुद वहां के लोकल कानून मानती हैं. तो फिर ट्विटर जैसे प्लेटफॉर्म क्यों ऐसा भारत के कानून को मानने में कोताही दिखा रहा है. कानून का शासन भारतीय समाज की मजबूत नींव है.

अब ट्विटर का क्या होगा?

इस पर कानून के जानकार बंटे हुए हैं. कुछ मानते हैं कि यह फैसला कोर्ट करेगा लेकिन कुछ का कहना है कि कानून इसे लेकर साफ है. जानकार कहते हैं कि इससे ट्विटर की दिक्कत यह बढ़ेगी कि उसके ऊपर बहुत से केस लाद दिए जाएंगे. उनके मुताबिक ट्विटर के लिए ऐसा माहौल जरूर बनेगा, जिसमें उसके लिए काम करना मुश्किल हो जाएगा. इंटरनेट की आजादी के लिए काम करने वाली संस्था इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन का कहना है कि इंटरमीडिएरी के जिस नियम का हवाला सरकार दे रही है वह खुद सवालों के घेरे में हैं. फाउंडेशन का कहना है कि

इंटरमीडिएरी स्टेटस कोई खास दर्जा नहीं है जो सरकार देती है. फिलहाल जिस पर बात हो रही है वह है आईटी रूल 7. लेकिन यह सेक्शन सिर्फ इतना कहता है कि जो भी सेक्शन 79 के नियम कायदे नहीं मानेंगे वो इंटरमीडिएरी नहीं रहेंगे. लेकिन यह इंटरमीडिएरी स्टेटस सिर्फ एक टेक्निकल टर्म है जिसे आईटीएक्ट 2000 के सेक्शन 2 में रखा गया है. इसे और सेक्शन 79 को साथ-साथ पढ़ना होगा. इस तरह से देखा जाए तो साल 2021 में बने आईटी रूल्स से ही इंटरमीडिएरी को खतरा है. अगर हम एक बार मान भी लें कि नए बने आईटी रूल सही हैं तो और ट्विटर ने नियम-कायदे नहीं माने. तब भी ट्विटर इंटरमीडिएरी है यह फैसला कोर्ट करेगा न कि सरकार.

 

हालांकि आईटी कानून का जानकार पवन दुग्गल इस तर्क से इत्तेफाक नहीं रखते. उनका कहना है कि

जब पहले ही आईटी एक्ट 2000 में इंटरमीडिएरी के स्टेटस को साफ कर दिया गया है तो तर्क की कोई वजह ही नहीं बचती. मामला कोर्ट पहुंचे या न पहुंचे स्टेटस तो कानून में ही तय हो गया है. साल 2009 से लेकर 2021 तक मामला ढीलाढाला था. सरकार भी सख्ती नहीं कर रही थी. लेकिन अब कानून में सब साफ-साफ लिखा है. सरकार भी मुस्तैद है. मुझे नहीं लगता कोर्ट इसमें कोई राहत देगा. जहां तक बात इटरमीडिएरी स्टेटस छिन जाने के बाद वापस मिलने की है तो इस पर कानून चुप है. उसमें वापसी का कोई प्रावधान नहीं है. ऐसा पहली बार हो रहा है कि किसी अमेरिकी सोशल मीडिया कंपनी पर गंभीर मामलों में मामला दर्ज हुआ है. इस केस के नतीजे आगे के लिए नजीर बनाएंगे.

अब देखने वाली बात यह होगी कि ट्विटर अपने बचाव में क्या कहता है.


वीडियो – IT नियमों को लेकर केंद्र सरकार ने ट्विटर को जो लेटर लिखा, उसमें क्या कहा?

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