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अर्दोआन को निरंकुश बनाने में 2016 के नाकाम तख़्तापलट का क्या रोल है?

साल 2016 की बात है. 15 जुलाई का दिन था. तुर्की के मिलिटरी हेडक़्वार्टर में हंगामा मचा हुआ था. शाम के चार बजे उनके पास एक खुफिया रिपोर्ट आई थी. नेशनल इंटेलिजेंस ऑर्गेनाइज़ेशन (MIT) की तरफ से. कुछ हैरतअंगेज़ जानकारियां उनके हाथ लगी थी. MIT ने फ़ौरन रिपोर्ट बनाकर आर्म्ड फ़ोर्सेस के चीफ़ ऑफ़ जनरल स्टाफ़ ‘हुुलुसी अकार’ को भेज दिया. इस रिपोर्ट में क्या था? इसमें कहा गया था कि सेना का एक गुट लंबे समय से तख़्तापलट की साज़िश रच रहा है. कल की रात देश में कुछ बड़ा होने वाला है. कहां और क्या? इस बारे में बस अनुमान लगाया गया था.

चीफ़ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ ने तुरंत राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन को फ़ोन मिलाया. प्रेसिडेंट उस समय छुट्टी मनाए मामरस गए हुए थे. मामरस तुर्की के साउथ-वेस्ट में भूमध्यसागर के तट पर बसा ख़ूबसूरत सा शहर है. अर्दोआन यहां कुछ शांति के पल बिताने आए थे. उन्हें क्या पता था कि उनके पीछे भूचाल आने वाला है. वो फ़ोन रिसीव नहीं कर पाए. ये बड़ा संकट था.

इसका रास्ता निकालना ज़रूरी था. हुलुसी अकार ने अब MIT के चीफ़ को साथ लिया. उन्होंने तय किया कि संभावित खतरे से कैसे निपटा जाए. आर्मी की यूनिट्स को कहां तैनात किया जाए, इसकी पूरी प्लानिंग की गई. उन्हें लगा कि अब किसी भी स्थिति को संभाल लिया जाएगा. लेकिन यहां पर वे दोनों गच्चा खा गए. चीफ़ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ का प्राइवेट सेक्रेटरी विद्रोही गुट के साथ मिला हुआ था. उसने मीटिंग वाली बात फौरन अपने आकाओं तक पहुंचा दी. और, यहां से मामला बिगड़ गया.

Hulusi Akar
हुलुसी अकार. (तस्वीर: एपी)

जब वायुसेना के मुखिया को किडनैप कर लिया

विद्रोही गुट तय प्लान से एक दिन पहले ही एक्शन में आ गया. शाम के सात बजे तक पूरे देश में हमले शुरू हो गए थे. इस्तांबुल के दो बड़े पुलों को बंद कर दिया गया था. उसे विद्रोही गुट ने अपने कब्ज़े में ले लिया. राजधानी अंकारा के आसमान में फ़ाइटर जेट्स उड़ रहे थे. इस्तांबुल में हेलिकॉप्टर्स से बमबारी की जा रही थी. जनता दहशत में थी. सरकार को पता नहीं चल रहा था कि हो क्या रहा है. प्रधानमंत्री ने ऐलान किया कि सेना विद्रोहियों का सामना कर रही है. थोड़ी देर में हालात ठीक हो जाएंगे.

ये ऐलान छलावा साबित हुआ. कुछ समय पहले ही अकार को अरेस्ट कर लिया गया था. उन्हें तख़्तापलट के काग़ज़ पर साइन करने के लिए कहा गया. अकार ने ऐसा करने से मना कर दिया. तब उनके साथ जोर-ज़बरदस्ती की गई. बेल्ट से उनका गला दबाने की कोशिश भी हुई. मगर वो नहीं माने. तब अकार को मिलिटरी हेडक़्वार्टर में बंधक बना लिया गया. टर्किश वायुसेना के मुखिया अबीदीन उनाल इस्तांबुल में एक शादी समारोह में हिस्सा ले रहे थे. उन्हें वहां से किडनैप कर लिया गया.

Abidin Unal With Racep Tayyip Erdogan
तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन के साथ टर्किश वायुसेना के मुखिया अबीदीन उनाल. (तस्वीर: एपी)

इस बीच विद्रोहियों की एक टुकड़ी सरकारी चैनल टर्किश रेडियो एंड टेलीविज़न कॉरपोरेशन (TRT) के दफ़्तर में दाखिल हो चुकी थी. चैनल पर उनका कब्ज़ा हो गया. उन्होंने एक न्यूज़ ऐंकर के सिर पर बंदूक रखी और ऐलान पढ़ने के लिए कहा. न्यूज़ ऐंकर ने उनका कहना मान लिया. ऐलान क्या था?

‘वर्तमान सरकार ने देश का लोकतांत्रिक और धर्मननिरपेक्ष चेहरा बिगाड़ दिया है. अब तुर्की का शासन पीस एट होम काउंसिल के हाथों में है. ये काउंसिल तुर्की के लोगों की सुरक्षा करेगी.’

पीस एट होम काउंसिल या पीस काउंसिल उसी दिन बना था. ये विरोधियों के गुट का औपचारिक नाम था. ये अगले ही दिन भंग हो जाने वाला था.

स्टेटमेंट में अर्दोआन सरकार पर कई गंभीर आरोप लगाए गए थे. मसलन, भ्रष्टाचार को बढ़ावा देना, मानवाधिकारों का उललंघन और संवैधानिक अधिकारों पर पाबंदियां आदि. विद्रोहियों ने ये भी कहा कि सभी अंतरराष्ट्रीय समझौते पहले की तरह चलते रहेंगे. वे ख़ुद को तुर्की की नई सरकार के तौर पर पेश कर रहे थे. इस ऐलान के बाद TRT ऑफ़-एयर हो गया.

तब तक टैंक्स के दस्ते सड़कों पर चौकड़ियां भरने लगे थे. संसद और प्रेसिडेंशियल पैलेस पर बम बरसाये जा रहे थे. पुलिस हेडक़्वार्टर और MIT के दफ़्तरों पर भी हमले हुए थे. कई महत्वपूर्ण संस्थान अब विद्रोहियों के कब्ज़े में थे. लेकिन अभी तक राष्ट्रपति का कोई अता-पता नहीं था. विद्रोहियों के सरगना ने फ़ाइटर जेट्स को मामरस की तरफ रवाना कर दिया. उन्हें हुक्म था, अर्दोआन जहां दिखें, उन्हें जान से मार दो.

Turkey Coup 2016
पूरे देश में विद्रोह शुरू हो गए थे. (तस्वीर: एपी)

फ़ाइटर जेट्स ने हुक्म का पालन किया. उन्होंने मामरस में अर्दोआन के रिज़ॉर्ट पर बेतहाशा बमबारी की. लगा कि विद्रोहियों का प्लान सफ़ल हो चुका है. उनके रास्ते का अंतिम कांटा निकल चुका है. लेकिन ऐसा नहीं था. हमले से कुछ मिनट पहले ही अर्दोआन वहां से निकल चुके थे. उन्हें पूरी घटना की जानकारी मिल चुकी थी.

अब बस इंतज़ार था कि अर्दोआन करेंगे क्या? उनका पहला कदम क्या होगा?

ये साफ़ हुआ, रात के साढ़े नौ बजे. राष्ट्रपति अर्दोआन सीएनएन तुर्क़ पर नज़र आए. वो मोबाइल के जरिए देश की जनता को संबोधित कर रहे थे. उन्होंने कहा कि जनता की ताक़त से ऊंची कोई शक्ति नहीं है. अर्दोआन ने लोगों से बाहर निकलने और विद्रोहियों का सामना करने की अपील की. उन्होंने ये भी कहा कि साज़िश करने वालों को इसकी भारी क़ीमत चुकानी पड़ेगी.

जैसे ही अर्दोआन सामने आए, पूरा पासा ही पलट गया. लोग अपने घरों से बाहर निकलने लगे. उनके पास जो कुछ भी था, उन्होंने उसी के सहारे लड़ने की शपथ खाई. चाकू, बर्तन, बेलन, डंडे लिए लोगों का हुज़ूम सड़कों पर था. विद्रोही सैनिकों ने शहरों में कर्फ़्यू लगा रखा था, लेकिन जनता इन सबसे बेफ़िक़र थी. उनके ऊपर हेलिकॉप्टर से गोलीबारी हुई. टैंकों के गोले दागे गए. मगर लोगों ने आगे बढ़ना नहीं छोड़ा. उन्होंने विद्रोही सैनिकों पर धावा बोल दिया. तब तक आर्म्ड फ़ोर्सेस ने ऐलान कर दिया था कि हम विद्रोह गुट से अलग हैं.

Receptayyiperdogan
तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन. (तस्वीर: एपी)

इसके बाद राष्ट्रपति की वफ़ादार सेना, पुलिस और आम जनता ने मिलकर विद्रोहियों से लोहा लिया. अगली सुबह तक पूरा हंगामा शांत हो चुका था. सरकार कायम थी. राष्ट्रपति अर्दोआन अपनी कुर्सी पर कायम थे. विद्रोहियों का प्लान फ़ेल हो चुका था. सुबह में ख़बर आई कि 700 से ज़्यादा सैनिकों ने सरेंडर कर दिया है. तख़्तापलट की साज़िश नाकाम हो चुकी है.

एक हंगामा शांत हुआ था. लेकिन एक दूसरा कतार में खड़ा था. ये शुरू होने वाला था राष्ट्रपति अर्दोआन की ज़ानिब से. तुर्की की सरकार ने तख़्तापलट का आरोप लगाया, तुर्की के धार्मिक नेता फ़तहउल्लाह गुलेन और उनके संगठन FETO पर. हमले से डेढ़ महीने पहले ही तुर्की ने FETO को आतंकी संगठन घोषित किया था.

गुलेन कौन हैं?

वो धर्म प्रचारक होने के साथ-साथ बड़े बिजनेसमैन भी हैं. उनके धार्मिक आंदोलन का नाम है ‘हिज़मत’ या सेवा. ये यूरोप, एशिया, अफ़्रीका और अमेरिका तक फैला है. उन्होंने लगभग 140 देशों में स्कूल खोले हुए हैं. जहां से वे अपने दूसरे कामों के लिए लड़ाके रिक्रूट करते हैं.

1999 से गुलेन अमेरिका के पेन्सिलवेनिया में रह रहे हैं. तुर्की में उनके अनुयायियों की बड़ी संख्या थी. उनके समर्थक सरकार, सेना, कॉलेज जैसे अहम संस्थानों में बड़े पदों पर काम कर रहे थे.

गुलेन एक समय तक अर्दोआन के करीबी हुआ करते थे. 2002 में जब अर्दोआन की जस्टिस एंड डेवलपमेंट पार्टी या AK पार्टी सत्ता में आई, तब गुलेन भी उनके साथ थे. लेकिन ये रिश्ता तब बिगड़ने लगा, जब गुलेन समर्थक पुलिस और प्रॉसीक्यूटर्स ने अर्दोआन के मातहतों पर हाथ डाला. अर्दोआन तब देश के प्रधानमंत्री थे. उन्होंने गुलेनवादियों पर कई गंभीर आरोप भी लगाए. उन्होंने यहां तक कहा कि गुलेन उनकी कुर्सी छीनना चाहते हैं.

Fethullah Gulen
तुर्की के धार्मिक नेता फ़तहउल्लाह गुलेन. (तस्वीर: एपी)

2014 में अर्दोआन राष्ट्रपति बन गए. उनका शक बरकरार रहा. मई 2016 में उन्होंने FETO को टेरर ग्रुप घोषित कर दिया. जब जुलाई 2016 में तुर्की में तख़्तापलट नाकाम हुआ, तब अर्दोआन ने फ़ाइनल अटैक का प्लान बनाया. तुर्की में मिलिटरी ने चार बार तख़्तापलट किया है. 1960, 1971, 1980 और 1997 में. 1960 के तख़्तापट में प्रधानमंत्री को फांसी पर टांग दिया गया था. अर्दोआन इस इतिहास से वाक़िफ़ थे. इसलिए, उनका फ़ाइनल अटैक ऐसा होने वाला था, जिससे कि तख़्तापलट की किसी भी संभावना को खत्म किया जा सके. और उनकी कुर्सी सलामत रहे.

अर्दोआन के इस प्लान के तहत क्या-क्या हुआ?

– एक हफ़्ते बाद ही पूरे देश में आपातकाल लगा दिया गया. ये अगले दो सालों तक चला.
– गुलेन के समर्थक जहां कहीं भी थे, उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया.
– हज़ारों की संख्या में मिलिटरी अधिकारियों, टीचर्स, पायलट, सिविल अधिकारियों, जजों आदि को नौकरी से बर्ख़ास्त कर दिया गया. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब तक एक लाख से अधिक लोगों को नौकरी से निकाला जा चुका है, जबकि पचास हज़ार से अधिक को अरेस्ट किया गया. सरकार ने जेल में जगह बनाने के लिए पुराने क़ैदियों को रिहा कर दिया.
– कई निजी मीडिया संस्थानों पर ताला लगा दिया गया.
– सरकार ने यूनिवर्सिटीज़ से रेक्टर चुनने का अधिकार छीन लिया गया. अब राष्ट्रपति अपनी मर्ज़ी से रेक्टर मनोनीत करते हैं.

इसका असर क्या हुआ?

इससे अर्दोआन के ख़िलाफ़ आवाज़ें उठने लगीं. यूरोपियन यूनियन ने आरोप लगाया कि अर्दोआन तख़्तापलट के बहाने अपने विरोधियों को निपटाना चाहते हैं. तुर्की नाटो में अमेरिका का सहयोगी है. उसने मांग रखी कि अमेरिका फ़तहउल्लाह गुलेन को उसे सौंप दे. अमेरिका ने ऐसा करने से मना कर दिया. इससे दोनों देशों के रिश्ते खराब हुए. तुर्की ने अमेरिका पर तख़्तापलट को सपोर्ट करने का आरोप भी लगाया है.

और भी कई देशों ने तुर्की पर मानवाधिकार उल्लंघन जैसे गंभीर इल्ज़ाम लगाए. मगर तुर्की को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा. अर्दोआन ने कहा था, ‘ये तख़्तापलट ईश्वर का दिया हुआ अवसर है.’

उन्होंने उस अवसर को साध लिया है. वो हर तरीक़े से अपने दुश्मनों को ठिकाने लगाने के लिए तैयार हैं.

आज इन सबकी चर्चा क्यों?

वजह है एक अदालती फ़ैसला. नाकाम तख़्तापलट में शामिल 22 पूर्व सैनिकों को कठोर आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई है. ये सैनिक TRT के दफ़्तर पर हमला करने और न्यूज़ ऐंकर से ज़बरदस्ती क़ू डिक्लेरेशन पढ़वाने के दोषी पाए गए. ये पहली बार नहीं है, जब साज़िशकर्ताओं को सज़ा मिली हो. 2017 से ही दोषियों को सज़ा देने की प्रक्रिया चल रही है. अधिकतर मामलों में आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई है. इन लोगों के बाहर निकलने की संभावना नगण्य है.

Turkey Failed Coup Trial
नाकाम तख़्तापलट में शामिल 22 पूर्व सैनिकों को कठोर आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई है. (तस्वीर: एपी)

तख़्तापलट की साज़िश तो देशद्रोह से कम नहीं, फिर अदालत फांसी का आदेश क्यों नहीं दे रही?

दरअसल, तुर्की में मौत की सज़ा का प्रावधान नहीं है. यहां आख़िरी बार 1984 में किसी को डेथ पेनल्टी मिली थी. 2002 में तुर्की ने शांतिकाल में किए अपराधों के लिए डेथ पेनल्टी को बैन कर दिया. दो साल बाद मौत की सज़ा को हमेशा के लिए हटा दिया गया. अर्दोआन तब देश के प्रधानमंत्री बन चुके थे. तुर्की को यूरोपियन यूनियन में शामिल होना था. इसी के तहत ये व्यवस्था लाई गई थी.

अब अर्दोआन इस फ़ैसले के लिए अफ़सोस जताते हैं. उन्होंने कई बार कहा है कि ‘हत्यारों को बिठाकर खाना खिलाते हुए उनका ख़ून खौलता है.’ अर्दोआन कहते हैं कि अगर संसद ने डेथ पेनल्टी का कानून पास किया तो वो बिना देर किए उसपर साइन कर देंगे. हालांकि, अभी तक ऐसा हुआ नहीं है.

अगर आज ऐसा कानून पास हो जाए तो क्या तख्‍तापलट के दोषियों को मौत की सज़ा दी जा सकती है? जवाब है नहीं. तुर्की के कानून के मुताबिक, अपराध किए जाने के समय लागू कानून ट्रायल के दौरान प्रभावी होगा. चूंकि जुलाई 2016 में मौत की सज़ा का प्रावधान नहीं था. इसलिए दोषियों को फांसी पर नहीं चढ़ाया जा सकता है.

इस कू ने रेचेप तैय्यप अर्दोआन को कैसे बदल दिया?

जानकारों की मानें तो उस घटना ने अर्दोआन को कट्टर और निरंकुश बना दिया. अया सोफ़िया म्यूज़ियम को मस्जिद में बदलना हो या अमेरिका से आंख मिलाकर बात करना. तुर्की ने सीरिया और अज़रबैज़ान-आर्मेनिया वॉर में भी अपना दखल बढ़ाया है. अर्दोआन तुर्की को उस्मानिया सल्तनत की तरह विराट और प्रभावशाली बनाना चाहते हैं. इस मकसद में कोई भी रुकावट उन्हें स्वीकार नहीं. तुर्की में अर्दोआन की आलोचना जघन्य अपराध मानी जाती है.

Hagia Sophia
तुर्की का फेमस अया सोफ़िया म्यूज़ियम अब मस्जिद है. (तस्वीर: एपी)

इसका एक उदाहरण तब देखने को मिला, जब हफ़्ते भर पहले 104 रिटायर्ड एडमिरल्स ने एक चिट्ठी रिलीज़ की. इसमें अर्दोआन के इस्तांबुल कैनाल प्रोजेक्ट की आलोचना की गई थी. कहा गया था कि इस कैनाल से 1936 की एक संधि खतरे में पड़ जाएगी और तुर्की पर बाहरी दबाव बढ़ जाएगा.

अगले ही दिन उनमें से 10 लोग जेल में थे, जबकि चार को उनके घर में नज़रबंद कर दिया गया था. सरकार ने आरोप लगाया कि ये रिटायर्ड एडमिरल्स तख़्तापलट की साज़िश रच रहे थे.

2016 के नाकाम तख़्तापलट ने अर्दोआन को ऐसी निरंकुशता बरतने का जोरदार बहाना दे रखा है. तुर्की में रहकर उनकी सत्ता पर कोई ऊंगली नहीं उठा सकता. फिलहाल, इस यथास्थिति में कोई बाधा पड़ती नहीं दिख रही है.


विडियो- आर्मेनिया और अज़रबैजान को युद्ध में झोंक रहा है तुर्की?

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