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ज़मीन खरीद पर राम मंदिर के चंदे में घोटाले का सच?

घर का दरवाज़ा खटखटाकर किसी ने राम मंदिर के लिए चंदा मांगा हो और नहीं मिला हो, ऐसा कम ही हुआ होगा. देशभर में 4 करोड़ लोगों ने 10-10 रुपये दिए. चार करोड़ से कुछ कम ने 100-100 रुपये दिए. बाकी ने हज़ार, 10 हज़ार या लाखों में भी चंदा दिया. सारा मिलाकर मार्च 2021 तक 3200 करोड़ रुपये हुआ. इतनी बड़ी रकम इकट्ठी हुई आस्था के नाम पर. अयोध्या में भव्य राम मंदिर चाहने वालों ने चंदा दिया. और इस भरोसे के साथ दिया कि पैसे का इस्तेमाल ईमानदारी से राम मंदिर के लिए ही होगा. और अब उसी चंदे में से करोड़ों की हेरफेर के आरोप लग रहे हैं. विपक्षी पार्टियों ने ‘चंदा चोर’ वाले नारे बुलंद करना शुरू कर दिया है. आज लखनऊ में मुख्यमंत्री आवास के बाहर कांग्रेस महिला विंग की सदस्यों ने प्रदर्शन किया. चंदा चोर, गद्दी छोड़ो के नारे लगाए. और भी राजनीतिक पार्टियां चंदे में गड़बड़ी के नाम पर यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार और केंद्र की मोदी सरकार को घेरने में लगी हैं. जबकि राम जन्म भूमि ट्रस्ट की तरफ से कहा जा रहा है कि चंदे में कोई गड़बड़ी नहीं है. जैसे गांधी की हत्या के आरोप लगे थे, वैसे ही चंदे में गड़बड़ी के आरोप लग रहे हैं. तो ज़मीन खरीद के नाम पर चंदे में घोटाला हुआ है या नहीं, तथ्यों के आधार पर हम दोनों पक्षों को समझने की कोशिश करते हैं.

उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री और समाजवादी पार्टी के नेता पवन पांडे. इन्होंने 13 जून यानी कल कुछ दस्तावेज़ों के साथ अयोध्या में प्रेस कॉन्फ्रेंस की. ऐसी ही एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आम आदमी पार्टी के यूपी प्रभारी संजय सिंह ने लखनऊ में की. दोनों नेताओं ने आरोप लगाया कि राम मंदिर ट्रस्ट ने 2 करोड़ की ज़मीन साढ़े 18 करोड़ रुपये में खरीदी है. और यहीं से ये गड़बड़ी वाली बात बाहर आई.

इन आरोपों और दस्तावेजों के आधार पर पूरी कहानी समझते हैं

अयोध्या सदर तहसील के तहत बाग बिजैसी नाम का गांव आता है. राम जन्म भूमि से ये गांव कई किलोमीटर दूर है. इसी गांव में 12 हज़ार 80 वर्ग मीटर यानी करीब 1.2 हेक्टेयर ज़मीन का टुकड़ा है. 18 मार्च 2021 तक ये ज़मीन कुसुम पाठक और हरीश पाठक के नाम थी. हरीश और कुसुम दोनों पति-पत्नी हैं. हरीश पाठक को लोग बाबा हरिदास के नाम से भी जानते हैं. ये इनकी पुश्तैनी ज़मीन नहीं है. कुछ साल पहले इन्होंने इसे खरीदा था. स्थानीय पत्रकारों का दावा है कि पहले ज़मीन वक्फ बोर्ड की थी. वक्फ के किसी सदस्य ने ज़मीन अपने बेटे के नाम करा दी तो विवाद हुआ. जिसके बाद हरीश पाठक ने ये ज़मीन खरीद ली. इस बात के पुख्ता प्रमाण जुटाने की कोशिश फिलहाल जारी है. हरीश पाठक से भी संपर्क करने की कोशिश की गई लेकिन वो ग़ायब है.

अब 18 मार्च को इस ज़मीन का बैनामा बनाया गया. बैनामा को प्रॉपर्टी बेचने का दस्तावेज़ कह सकते हैं. सुल्तान अंसारी और रवि मोहन तिवारी के नाम ये ज़मीन ट्रांसफर हुई. कौन हैं ये दोनों. अयोध्या में प्रॉपर्टी खरीदने-खरीदने बेचने का काम करते हैं. बैनामा का वक्त 18 मार्च को शाम 7 बजकर 10 मिनट दर्ज है. इस खरीद में दो गवाह भी थे – अनिल मिश्रा और ऋषिकेश उपाध्याय. अनिल मिश्रा राम जन्म भूमि ट्रस्ट के सदस्य हैं और ऋषिकेश उपाध्याय अयोध्या के मेयर हैं. बैनामा वाले दस्तावेजों में सर्कल रेट के हिसाब से ज़मीन का बाज़ार भाव 5 करोड़ 79 लाख 84 हज़ार है. लेकिन विक्रय मूल्य लिखा है- 2 करोड़ रुपये.

अब एक और दस्तावेज़ की बात. इस पर लिखा है इकरारनामा बाकब्ज़ा. इसके मुताबिक सुल्तान अंसारी और रविमोहन तिवारी का चंपतराय के साथ करार हुआ है. जिसमें ज़मीन की तयशुदा रकम है- 18 करोड़ 50 लाख. हालांकि ज़मीन का बाज़ार भाव इस दस्तावेज़ पर भी 5 करोड़ 79 लाख ही लिखा है. सुल्तान अंसारी और रवि मोहन तिवारी के नाम ज़मीन होने के 5 मिनट बाद ही चंपत राय से ये करार हो गया. और चंपतराय कौन हैं – श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव. राम जन्म भूमि ट्रस्ट के नाम पर चंपत राय ने ज़मीन खरीदने का एग्रीमेंट किया. और इसके साथ ही सुल्तान अंसारी और रविमोहन तिवारी के खातों में 17 करोड़ 30 लाख रुपये बैंक ट्रांसफर के RTGS मोड से भेज दिए. RTGS यानी रियल टाइम ग्रॉस सेटलमेंट, बैंक से तुरंत बड़ी रकम भेजने के लिए ये तरीका काम में लिया जाता है.

2 करोड़ वाली ज़मीन साढ़े 18 करोड़ में क्यों खरीदी गई?

अब विपक्षी यहां सवाल पूछ रहे हैं कि जो ज़मीन 7 बजकर 10 मिनट पर 2 करोड़ में बिकती है उसको 5 मिनट बाद ही चंपत राय साढ़े 18 करोड़ में कैसे खरीद लेते हैं? और सवाल विपक्षियों के पूछने भर का ही नहीं है. हमारे सामने दस्तावेज़ मौजूद हैं जिनकी सत्यता पर फिलहाल कोई प्रश्न नहीं उठाया गया है. तो बहुत ही लाजिम सा सवाल है कि भाई 2 करोड़ वाली ज़मीन साढ़े 18 करोड़ में क्यों खरीदी गई. इस बारे में कल सवाल पूछा गया राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय से. वो बोले आरोपों का क्या, आरोप तो हमारे ऊपर महात्मा गांधी की हत्या का भी लगा.

चंपत राय को लगा होगा कि शायद सवाल पूछने वाले पत्रकारों को झिड़की देने से बात दब जाएगी. लेकिन ये दबने लायक होती तो आज दी लल्लनटॉप शो की लीड कुछ और होती. इसलिए देर रात को चंपत राय की तरफ से एक बयान जारी हुआ. इस बयान में लिखा कि मंदिर के पास के लोगों को पुनर्वास के लिए ज़मीन दी जाएगी. जिसके लिए ज़मीन की खरीद की जा रही है. आगे लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद देश के असंख्य लोग अयोध्या में ज़मीन खरीद रहे हैं औऱ यूपी सरकार भी ज़मीन अधिग्रहण कर रही है. इसलिए ज़मीनों के दाम एकाएक बढ़ गए हैं. जिस भूखंड पर अखबारी चर्चा चलाई जा रही है, वह भूखंड रेलवे स्टेशन के पास बहुत प्रमुख स्थान है. बयान में आगे लिखा है कि उक्त ज़मीन को खरीदने के लिए वर्तमान विक्रेतागणों ने वर्षों पूर्व जिस मूल्य पर रजिस्टर्ड अनुबंध किया था, उस भूमि को उन्होंने 18 मार्च 2021 को बैनामा कराया, जिसके बाद ट्रस्ट के साथ अनुबंध हुआ. आखिरी लाइन में लिखा है कि राजनीतिक लोग भ्रामक प्रचार कर रहे हैं और ये राजनीतिक विद्वेष है.

कुल मिलाकर चंपत राय अपने डिफेंस में कह रहे हैं कि 2 करोड़ में ज़मीन का सौदा बहुत पहले हुआ था. 18 मार्च को तो बस उसका बैनामा हुआ था. और बैनामा होने के बाद ट्रस्ट ने ज़मीन खरीदने का एग्रीमेंट कर लिया.

ट्रस्ट को जमीन बेचने वाले लोग अंडरग्राउंड हो गए?

बयान से जाहिर है कि सारी डील चंपत राय के संज्ञान में थी, यानी ऐसा कुछ नहीं हुआ जो उन्हें मालूम ना हो. अब अपने बचाव में दिए उनकी तर्क की बात करते हैं. ये बिल्कुल मुमकिन है कि किसी ज़मीन को खरीदने का एग्रीमेंट पहले हुआ हो और उसका बैनामा बाद में हो. जैसे राम मंदिर ट्रस्ट ने अभी बैनामा नहीं कराया है. ज़मीन खरीदने का एग्रीमेंट हुआ. एग्रीमेंट यानी दोनों पक्षों में क्या और कितने का सौदा हुआ है, ये स्टाम्प पेपर पर लिख दिया जाता है. एग्रीमेंट से ज़मीन का मालिकाना हक ट्रांसफर नहीं होता है. उसके लिए फिर बैमाना होता है. तो अगर 18 मार्च को सिर्फ बैनामा हुआ था तो फिर एग्रीमेंट कहां हैं. पुराना एग्रीमेंट सामने आता तो चंपत राय की बेगुनाही साबित हो जाती. लेकिन ऐसा हुआ नहीं है. इसके बजाय ज़मीन का असली मालिक हरीश पाठक गायब है. उससे खरीद कर ट्रस्ट को बेचने वाले सुल्तान अंसारी और रविमोहन तिवारी अंडरग्राउंड हो गए हैं.

दूसरा बड़ा सवाल – हरीश पाठक से सुल्तान अंसारी और रविमोहन तिवारी नाम के प्रॉपर्टी डीलर्स ने ज़मीन खरीदी है, इसमें गवाह हैं अनिल मिश्र, जो राम मंदिर ट्रस्ट के सदस्य भी हैं. इसकी वजह ना तो समझ में आती है और ना ट्रस्ट की तरफ से बताई गई है. अनिल मिश्र का नाम पहले भी विवादों में रहा है. वो गोंडा ज़िले के होम्योपैथिक चिकित्सा अधिकारी रहे हैं. इसके अलावा उत्तर प्रदेश होम्योपैथिक मेडिसिन बोर्ड लखनऊ के रजिस्ट्रार भी रहे हैं. 31 अगस्त 2020 को रिटायर हुए थे. उन पर आरोप लगा थी कि हॉम्योपैथी फार्मेसी कॉलेज खोलने वालों को मान्यता देने का नाम पर उगाही करते थे. नितेश कुमार पांडे नाम के गाज़ीपुर के पत्रकार ने अनिल मिश्र के खिलाफ मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक को चिट्ठी लिखी थी. एक अखबारी रिपोर्ट के मुताबिक अनिल मिश्र आरएसएस के प्रांत कार्यवाह रहे हैं.

अनिल मिश्र के साथ बैमाना वाली गवाही में दूसरा नाम है ऋषिकेश उपाध्याय का. अयोध्या में बीजेपी के मेयर हैं. एक कॉलेज चलाते हैं. संघ के भी करीबी हैं. 2 करोड़ की ज़मीन 18 करोड़ में खरीदने का मजबूत तर्क इनके पास भी नहीं है. कह रहे हैं कि झूठे आरोप लगाए जा रहे हैं.

चंपत राय क्या सफाई दे रहे?

ऋषिकेश उपाध्याय तो बचकर निकल जाएंगे. मेयर हैं और सिर्फ गवाह बने हैं. लेकिन घूमकर बात आती है चंपत राय पर. चंपत राय को राम मंदिर की लड़ाई में पुरानी सिपाही माना जाता है. यूपी के बिजनौर के रहने वाले हैं. 1980 में वीएचपी में शामिल हुए थे. राम मंदिर को लेकर वीएचपी के आंदोलन में शामिल रहे हैं. केस की सुनवाई को दौरान सुप्रीम कोर्ट में भी मुख्य पक्षकार थे. पिछले साल राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के सदस्यों का ऐलान हुआ तो चंपत राय को महासचिव बनाया गया. अब चंपत राय के दामन पर दाग लग रहे हैं. साबित उन्हें ही करना है कि वो पाक साफ हैं.

पूरे विवाद को लेकर सवाल राज्य की योगी आदित्यनाथ सरकार और केंद्र की मोदी सरकार से भी पूछे जा रहे हैं. मंदिर निर्माण कमेटी के प्रमुख हैं नृपेंद्र मिश्रा. पीएमओ में प्रधान सचिव रह चुके हैं. तो जाहिर है मंदिर निर्माण के काम की रिपोर्ट पीएम तक भी जाती होगी. केंद्र की सरकार से इस मामले पर कोई बयान नहीं आया है. हालांकि यूपी सरकार के मंत्रियों के बयान आ रहे हैं. एक और मंत्री मोहसिन रज़ा ने कहा है कि समाजवादी पार्टी एक समुदाय के तुष्टिकरण की राजनीति कर रही है.

सवाल है क्या इस तरह के जवाबों से बीजेपी इस मुद्दे को दबा पाएगी. यूपी में अगले साल चुनाव है. सार्वजनिक जीवन में सीधे न सही, परोक्ष रूप से तो राम मंदिर भाजपा के सीवी में जुड़ ही गया है. मंदिर के ज़िक्र बिना यूपी का चुनाव पूरा नहीं होगा. तो ज़मीन सौदे में लग रहे आरोपों से यूपी का विपक्ष इस पिच पर अपने लिए पारी की संभावना ढूंढ रहा है. समाजवादी पार्टी के अलावा यूपी में अपनी संभावना देख रही आम आदमी पार्टी भी इस मुद्दे का पूरा दोहन करने में लगी है. लेकिन क्या ये दो पार्टियां वाकई अपने आरोप सिद्ध कर पाएंगी? आम आदमी पार्टी सीबीआई और ईडी जांच की मांग कर रही है. लेकिन ऐसा हो पाना दूर की कौड़ी है. फिर इस सबसे इतर भी एक पक्ष है. उन करोड़ों लोगों का, जिन्होंने अपने खून पसीने की कमाई से चंदा दिया है, उनके प्रति सरकार और ट्रस्ट की जिम्मेदारी बनती है. उनका भरोसा बहाल करना अब इन्हीं दोनों का काम है.


विडियो- राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की खरीदी जमीन पर सपा नेता ने CBI जांच की मांग कर दी

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