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दिल्ली में बाल कटने की अफवाह का पूरा सच

राजस्थान के नागौर और बीकानेर के बीच एक तहसील है, नोखा. 12 और 13 जून की दरम्यानी रात नोखा के पास हियादेसर गांव में उमा अपनी बच्ची को लेकर छत पर सोई हुई थीं. आधी रात के करीब उमा ने हल्ला मचाना शुरू किया. उनकी बच्ची के चेहरे पर पीला रंग लगा हुआ था. उमा के बाल काट लिए गए थे. उनके शरीर पर त्रिशूल का निशान बन चुका था. शिकायत के बाद मौके पर पहुंची पुलिस को कोई सुराग नहीं मिला. अंत में पुलिस ने इसे असामाजिक तत्वों का काम बताकर मामला खत्म कर दिया. घटना की फोटो सोशल मीडिया पर वायरल होने लगीं. इस बीच पास के गांवों से ऐसी ही घटनाओं की खबरें आने लगीं.

धीरे-धीरे मामले में नई बातें जुड़ने लगीं. मसलन बाल काटने वाला मक्खी बनकर उड़ जाता है. बाहर से ऐसे कोई पचास लोगों का गैंग आया हुआ है या ये एक साधुओं की बड़ी टोली है. ये अलग-अलग टीम में बंटकर इस काम को अंजाम दे रहे हैं. हर बार पीड़ित द्वारा बाल काटने वाले का जो हुलिया बयान किया जाता, वो पिछले ब्योरे से बहुत अलग होता है. लेकिन पहले सोशल मीडिया और फिर अखबार और टीवी के जरिए ये अफवाह फैलती रही.

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राजस्थान से निकलकर ये अफवाह हरियाणा के मेवात और झज्जर होते हुए अब दिल्ली के मुहाने पर पहुंच गई है. गुड़गांव में एक रात में 6 मामले दर्ज किए गए. मेवात में 24 घंटे में 16 मामले दर्ज किए हैं. दिल्ली देहात के छावला में 3 महिलाओं के बाल कटने की खबर 31 जुलाई के अखबारों पर पहले पेज पर थीं. दक्षिणी पश्चिमी दिल्ली के थाना छावला के अंर्तगत गांव कांगनहेड़ी में मुनेश, ओमवती ओर श्रीदेवी नामक 3 महिलाओं की रहस्यमय तरीके से चोटी कट गई. एक ही गांव में एक साथ ही तीन वारदातों के बाद दिल्ली देहात में दहशत में हैं. लोग रातभर जागकर अपने घरों की पहरेदारी कर रहे हैं. पुलिस थाने में शैतान के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवा दिया गया. घरों के बाहर नीम की टहनियां और मेंहदी के निशान बनाए जा रहे हैं. इस पूरे मामले ने 2001 की गर्मियों की याद ताजा कर दी.

मई 2001, गर्मियां अपने उफान पर थीं. बिजली विभाग ने कटौती के जरिए इसे और बद्तर बानाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. गर्मी से परेशान लोग रात को खुले में सोते थे. इसी समय दिल्ली से सटे गाज़ियाबाद में एक काले रंग के बंदर के देखे जाने की बात सामने आई. 5 फीट के करीब का यह बंदर इंसान की तरह दो पैरों पर चलता था और लोगों पर हमला करता था. एक सप्ताह के भीतर पूरी दिल्ली एक अनजान काले बंदर के खौफ से लकवे का शिकार हो गई थी.

लोगों ने शाम ढले घरों से निकलना बंद कर दिया. एक के बाद एक 350 के करीब मामले दर्ज किए गए. 3 लोग भागने के दौरान छत से गिरकर मर गए. तरह-तरह की अफवाह फ़ैलाने लगी. कोई कहता कि बन्दर आठ फीट का है. किसी ने उनका अकार 5 फीट बताया. कोई कहता कि बंदर के शरीर पर बल्ब लगे हुए थे. कोई बताता कि वो इतना काला था कि आंखों के अलावा कुछ नहीं दिखाई देता. कोई कहता कि वो कई फीट की छलांग लगाकर एक छत से दूसरी छत कूदता हुआ फरार हो गया. किसी के हिसाब से पक्षी बनकर उड़ गया. बंदर की पूंछ के बारे में भी लोगों के बयान अलग-अगल थे.

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ये दिल्ली पुलिस थी, जिसके लिए काला बंदर गधे का सींग साबित हो रहा था. तमाम छानबीन के बावजूद कोई सुराग हाथ नहीं लग रहा था. करीब 3000 जवानों की टास्क फ़ोर्स गठित की गई. अखबारों में काला बंदर का सुराग देने वाले को पचास हजार का इनाम देने की घोषणा की गई. काला बंदर मजे से लोगों पर हमले कर रहा था. हर रात दिल्ली पुलिस की हेल्पलाइन इस किस्म की वारदात पर दर्जनों कॉल आने लगे. यह समझने में देर लग गई कि एक जानवर एक साथ इतने लोगों पर एकसाथ हमला नहीं कर सकता.

पुलिस ने जांच के लिए फॉरेंसिक लैब का सहारा लिया. काला बंदर के शिकारों से नए सिरे से पूछताछ शुरू हुई. उनके जख्मों के मुआयने किए गए. इस जांच को अंजाम देने वाले एसके वर्मा को जो नतीजे मिले, उसने सबको चौंका दिया. एसके वर्मा कहते हैं, “हर जानवर के शरीर की अलग बनावट होती है. मसलन बंदर के दांतों की संरचना हमसे अलग होती है. उसके काटने पर एक तयशुदा निशान शरीर पर बनेंगे. हमने पाया कि लोगों के शरीर पर जो निशान थे वो किसी जानवर के नहीं थे.”

एक आदमी और था, जो अपने तरीके से इस गुत्थी को सुलझाने में लगा हुआ था. भारतीय तर्कशास्त्र असोसिएशन के अध्यक्ष सनल एडामारकू. वो लगभग 40 शिकारों के पास गए और उनका विस्तृत इंटरव्यू किया. सनल याद करते हैं,

‘हम लोग अपनी पड़ताल के दौरान काले बंदर का शिकार हुए लोगों के पास जाते थे और बंदर के हुलिए से लेकर हमले के तरीके तक हर चीज पर लंबी पूछताछ करते थे. इस दौरान हमें सुधा नाम की एक महिला मिली थी. हमने उससे पूछा कि आपके शरीर पर नाख़ून के चार निशान हैं, लेकिन बंदर के हमले में तो तीन खरोंच के निशान होते हैं. पहले तो उसने कुछ भी बोलने से मना कर दिया. हमने उस पर सच बोलने के लिए थोड़ा दबाव बनाया. उसने बाद में बताया कि वो हमले के वक़्त बेहोश हो गई थी. जब वो होश में आई, उसने अपने हाथ में खाना खाने के लिए काम में लिया जाने वाला कांटा पाया. इस बयान ने हमारे जांच को जरूरी दिशा दी. हमने पाया कि ये 1995 में देवताओं के दूध पीने जैसा ही मास हिस्टीरिया का मामला है.’

इधर दिल्ली पुलिस ने केस को सुलझाने के लिए मनोचिकित्सकों का सहारा लिया. नए सिरे हुई पूछताछ और एसके वर्मा के निष्कर्षों के जरिए पुलिस इस नतीजे पर पहुंची कि ये महज एक अफवाह है. पुलिस के नतीजे अलगे दिन के अखबारों में छपे. अख़बारों के जरिए लोगों को बताया गया कि मास हिस्टीरिया किस तरह से काम करता है. इस खबर के छपने के बाद कोई नया मामला सामने नहीं आया.

क्या है ये मास हिस्टीरिया

हमारे प्रधानमंत्री अक्सर रेडियो पर मन की बात कहते हैं. हमारे समाज में कई लोग ऐसे हैं, जो मन की बात दूसरों के सामने नहीं कह पाते. वो अंदर ही अंदर घुटते रहते हैं. महिलाओं के साथ यह ज्यादा होता है, क्योंकि अक्सर उनकी दुनिया घर तक ही सीमित कर दी जाती है. ऐसे में वो अपने अंदर पैदा हो रही असंगति को किसी के सामने बयान नहीं कर पातीं. जब वो ऐसी अफवाह फैलाती हैं, तो आदमी इसे मौके की तरह लेता है. यह एक जरिया है, जिससे वो लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींच सकें.

अक्सर ऐसी अफवाह, जो पहले से हमारी मान्यता में हो, तेजी से फैलती है. बाल काटने के मामले में ही लें, तो सिंदूर, कुमकुम, बाल काटना या फिर त्रिशूल के निशान हमें सहज ही ये भरोसा दिला देते हैं कि ये किसी किस्म की तांत्रिक क्रिया का नतीजा है.

जब ऐसी कोई घटना होती है, तो सबसे पहले इस पर वो लोग भरोसा करते हैं, जिनके मन में इस किस्म का डर पहले से मौजूद हो. फिर इस किस्म की घटनाएं एक से ज्यादा बार होती हैं. इसके बाद यह बड़े पैमाने पर फ़ैल जाती हैं. मसलन जर्मनी के एक कॉन्वेंट में 15वीं सदी में एक नन ने लोगों को काटना शुरू कर दिया. अगले कुछ दिनों में कॉन्वेंट की कई ननों को यही बीमारी हो गई. जर्मनी से शुरू हुई यह घटना हॉलैंड और इटली के कई कॉन्वेंट में फ़ैल गई.

भरोसा बहुत धोख़ेबाज़ शब्द है. ये हमें चीजों को तार्किक तरीके से देखने से रोकता है. हमारी मान्यताओं के चलते अक्सर हम ऐसी बातों पर विश्वास कर बैठते हैं. न सिर्फ विश्वास करने लगते हैं, बल्कि इसे किसी न किसी तरह से आगे बढ़ाने लग जाते हैं. लल्लनटॉप आपसे निवेदन करता है कि इस किस्म की अफवाह पर भरोसा न करें. न ही इन्हें आगे फैलाएं. अपने आस-पास के लोगों को तार्किक तरीके से समझाएं.

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