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अमेरिका क्यों चाहता है कि भारत, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और रूस G7 से जुड़े?

इस ख़बर की शुरुआत करेंगे दो साल पुरानी एक वायरल तस्वीर से. एक तस्वीर, जिसने दुनिया के सबसे ताकतवर और सबसे अमीर देशों के बीच पसरे टेंशन की चुगली कर दी. इस फ़ोटो में वैसे तो कई सपोर्टिंग कलाकार थे, लेकिन मुख्य किरदार थे दो. एक, जो मेज की दाहिनी तरफ कुर्सी पर बैठा सामने खड़े लोगों को ताक रहा था. दूसरी वो, जो मेज की बाईं तरफ हथेलियों को टेबल पर टिकाए उस आदमी को घूर रही थी. ये दोनों लोग न केवल अपने-अपने देश के मुखिया थे, बल्कि अपनी सोच और पॉलिटिक्स में भी ये दो अलग-अलग धुरियों पर खड़े थे.

कौन थे ये दोनों?
ये थे, अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप, जो कि कुर्सी पर बैठे थे. और उन्हें घूरने वाली शख्सियत थीं जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल. इन दोनों के अलावा इसमें फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों, तत्कालानी ब्रिटिश प्रधानमंत्री टरीज़ा मे, जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे समेत और कई लोग थे. ये तस्वीर खींची थी जर्मन कैबिनेट के आधिकारिक फटॉग्रफ़र जेस्को देन्ज़ ने. देन्ज़ की खींची इस फ़ोटो को पहले तो जर्मन सरकार ने जारी किया. और फिर ख़ुद एंजेला मर्केल ने ये फ़ोटो अपने इंस्टाग्राम पर डाली. मानो ट्रंप के साथ चल रहे तनाव और उनके प्रति अपने डिस्टेस्ट को दुनिया के सामने रख रही हों.

तुलना: बिफ़ोर, आफ़्टर
तस्वीरें बहुत कुछ बयां करती हैं. जैसे ट्रंप और मर्केल की ये तस्वीर. और इसकी तुलना कीजिए ओबामा और मर्केल की उस पांच साल पुरानी तस्वीर से, जिसमें हरी घास के एक लॉन में बेंच पर बैठे हैं बराक ओबामा. उनका चेहरा सामने खड़ी मर्केल के आगे है. इधर बेंच पर बैठे ओबामा की बांहें जितनी फैली हैं, कमोबेश उसी क्षेत्रफल में मर्केल का भी हाथ फैला है. दोनों में कुछ गहरी बातें हो रही हैं, जिसका अंदाज़ बहुत दोस्ताना है. एकदम पिक्चर परफ़ेक्ट.

Merkel Obama
बराक ओबामा और एंजेला मर्केल (फोटो: रॉयटर्स)

क्या है इन तस्वीरों का संदर्भ?
मर्केल-ओबामा और ट्रंप-मर्केल की तस्वीरों में ठीक तीन साल का फासला था. पहली फ़ोटो खींची गई थी जून 2015 में. दूसरी खींची गई जून 2018 में. अगर बस इस एक तस्वीर को ही उठा लें, तो आप समझ जाएंगे कि इन तीन सालों में जर्मनी और अमेरिका कितने दूर हो गए थे. ये दूरी, ये असहमतियां अमेरिका और उसके पुराने सहयोगी देशों के रिश्तों पर भी असर डाल रही है. ये उस सालाना आयोजन के प्रभाव पर भी असर डाल रही है, जो इन दोनों तस्वीरों और हमारी आज की मुख्य ख़बर के बीच का कॉमन संदर्भ है.

क्या है ये संदर्भ?
ये संदर्भ है G7,जो कि ग्रुप ऑफ़ सेवन का ज़्यादा प्रचलित शॉर्टकट है. हर साल गर्मियों में G7 का सालाना सम्मेलन होता है. मेजबानी की जिम्मेदारी बारी-बारी से सदस्य देशों पर आती है. इस बार मेजबानी की बारी अमेरिका की थी. जून में अमेरिका के मैरीलैंड स्थित कैंप डेविड में G7 की मीटिंग होनी थी. मगर कोरोना के कारण इस सम्मेलन का तय समय पर हो पाना मुश्किल लग रहा था. मार्च महीने में ट्रंप ने कहा कि वो कोरोना के कारण ये सम्मेलन रद्द कर रहे हैं. ट्रंप ने कहा, विडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिये बातचीत कर लेंगे सब. मगर फिर पिछले हफ़्ते ट्रंप ने एकाएक ट्वीट करके कहा कि वो सशरीर उपस्थिति वाला सम्मेलन बुलाने पर फिर से विचार कर रहे हैं. बाद में पता चला, ये ऐलान करने से पहले ट्रंप ने बाकी सदस्य राष्ट्रों के साथ कोई मशविरा नहीं किया. नतीजतन बाकी सदस्य ट्रंप के प्रस्ताव पर ठंडे रहे. एंजेला मर्केल ने तो साफ कह दिया कि कोरोना की स्थितियों को देखते हुए वो नहीं आएंगी सम्मेलन में. जवाब में ट्रंप को अपनी बात से पीछे हटते हुए कहना पड़ा कि वो G7 सम्मेलन को फिलहाल स्थगित कर रहे हैं.

Donald Trump
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप (फोटो: एपी)

भारत का नाम किस संदर्भ में लिया ट्रंप ने?
मगर ट्रंप के इस ऐलान में दिलचस्पी का असल पॉइंट कुछ और था. पॉइंट ये था कि ट्रंप ने G7 में विस्तार की बात कही. उन्होंने कहा कि G7 बहुत आउटडेटेड हो चला है. इसमें नई जान फूंकने की ज़रूरत है. ट्रंप के मुताबिक, इसमें नए सदस्यों को शामिल किया जाना चाहिए. ट्रंप ने नई सदस्यता के लिए जिन देशों का नाम लिया, वो हैं- भारत, ऑस्ट्रेलिया, साउथ कोरिया और रूस. इस ऐलान में तीन मुख्य बातें हैं. एक, G7 को लेकर ट्रंप की महत्वाकांक्षाएं. दूसरा, रूस को फिर से ग्रुप में वापस लाने की उनकी रट. और तीसरी मुख्य बात है चीन का ऐंगल. ये सारा माज़रा जानने से पहले ज़रूरी है कि हम एक बार G7 का संक्षिप्त परिचय भी आपको रिवाइज़ करवा दें.

G7: वन्स अपन अ टाइम
ये बात है 70 के दशक की. कोल्ड वॉर का टाइम था. साम्यवाद और पूंजीवाद की दो धुरियों पर दुनिया घूम रही थी. G7 की पैदाइश हुई पूंजीवाद धड़े में. नॉनकम्यूनिस्ट पक्ष की बड़ी अर्थव्यवस्था वाले लोकतांत्रिक देशों ने अपनी एक बैठकी बना ली. ऐसी बैठकी, जहां इन्हें साथ मिलकर अपनी आर्थिक चिंताओं पर मशविरा करना था और आपसी सहयोग के रास्ते तलाशने थे. ये मिलकर डीलिंग करने वाली बात के पीछे आइडिया ये था कि अकेले-अकेले रहने से बात नहीं बनेगी. बाकी संगी-साथी आबाद रहें, हम में एकता रहे, इसी में सबका भला है. यही सोचकर साल 1975 में छह देशों ने एक ‘ग्रुप ऑफ़ सिक्स’ बनाया. इसके सदस्य थे- अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, जापान और पश्चिमी जर्मनी. पश्चिमी जर्मनी इसलिए कि तब जर्मनी के दो हिस्से थे- पूर्वी और पश्चिमी. दोनों के बीच बर्लिन दीवार खड़ी थी. सोवियत प्रभाव वाले पूर्वी जर्मनी में साम्यवादी सिस्टम था. वेस्ट के प्रभाव वाले पश्चिमी जर्मनी में कैपिटलिज़म था.

Group Of Six
ग्रुप ऑफ़ सिक्स (फोटो: एपी)

छह से हुए सात, सात से हुए आठ
ये ‘ग्रुप ऑफ़ सिक्स’ अगले साल, यानी 1976 में कनाडा के साथ आने से ‘ग्रुप ऑफ़ सेवन’ बन गया. 1981 से यूरोपियन यूनियन भी इसमें भागीदारी करने लगा. EU की भागीदारी बतौर सदस्य नहीं थी, वो बस साझा यूरोपीय हितों का प्रतिनिधित्व करता था. 1991 में सोवियत संघ का विघटन होने के सात साल बाद 1998 में रूस भी इनके साथ आ गया. अब ये समूह हो गया ग्रुप ऑफ़ ऐट. उम्मीद जगी कि इस बहाने पूरब और पश्चिम के बीच की जो खाई है, वो भी पटेगी. अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ेगा.

क्या करते थे आठ जांबाज?
ये G8 ग्रुप ज़रूरी मसलों पर बातचीत के लिए हर साल एक बार मिलता था. ग्रुप की अध्यक्षता बारी-बारी से सदस्य देशों के बीच घूमती. जिसके पास प्रेज़िडेंसी होती, वो न केवल उस साल के सम्मेलन का अजेंडा तय करता. बल्कि सम्मेलन से जुड़ी बाकी जिम्मेदारियां भी उठाता. पहले इस ग्रुप का मुख्य फ़ोकस अर्थव्यवस्था पर था. फिर इसमें अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ी नीतियां भी आ गईं.

मानोगे तो माने, ज़बरदस्ती नहीं है कोई
इस ग्रुप की सफ़लता इसके सदस्यों की समझदारी और सहयोग करने के उनके ईमानदार मंसूबों पर ही टिकी थी. ऐसा क्यों था? क्योंकि संयुक्त राष्ट्र और नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन, जिसे कि शॉर्ट में NATO कहते हैं, उसकी तरह ये G8 कोई औपचारिक संगठन नहीं था. ये एक अनौपचारिक जुटान की तरह था. यहां क़ानून की पोथी नहीं थी कि आपके ऊपर कोई अनिवार्य फैसला थोपा जाए. सारी कुंजी आपसी सहयोग और समझ में ही थी.

Nato
संयुक्त राष्ट्र और नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन का झंडा (फोटो: एएफपी)

पुर्नमुषको भव
आपसी समझ बनाने की बात कहने में आसान लगती है. असलियत में ये बड़ा मुश्किल टास्क है. इसलिए मुश्किल है कि अब दुनिया बदल गई है. देशों के आपसी समीकरण पहले जैसे नहीं रहे हैं. खेमेबाजियों वाले गुट भी बदल गए हैं. व्यापार, ग्लोबल पॉलिटिक्स और सुरक्षा जैसे ज़रूरी मसलों में G8 के सभी सदस्यों का हित मैच नहीं करता. इसकी सबसे बड़ी मिसाल है 2014. क्या हुआ था इस साल? इस साल G8 घटकर फिर G7 बन गया.

गिनती कैसे घटी?
ये घटनाक्रम असल में रूस के विरुद्ध एक प्रतिक्रिया थी. इस प्रतिक्रिया का बैकग्राउंड यूक्रेन के स्वायत्त प्रांत क्रीमिया से जुड़ा था. पश्चिमी देश और रूस, दोनों यूक्रेन में अपना प्रभाव बनाना चाहते थे. इस होड़ में जीत मिली पुतिन को और मार्च 2014 में रूस ने क्रीमिया को आधिकारिक तौर पर ख़ुद में मिला लिया.

यूक्रेन में जो कुछ हुआ, वो कोल्ड वॉर दौर की पुनरावृत्ति थी. पश्चिमी देशों ने कहा कि रूस ने क्रीमिया पर अवैध कब्ज़ा किया है. जबकि रूस अपनी कार्रवाई को वैध बता रहा था. वैध और अवैध के इस झगड़े में दोनों पक्षों का आपसी सहयोग नहीं बन सकता था. इसका सीधा असर पड़ा G8 ग्रुप पर. इस साल रूस को सम्मेलन की मेजबानी करनी थी. बाकी सदस्यों ने इस सम्मेलन में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया. उन्होंने रूस को इस संगठन से भी बाहर निकाल दिया.

Putin
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (फोटो: एपी)

गुलज़ार लिखते हैं- सौ दर्द हैं, सौ…
ये इस संगठन के स्कोप के लिए बड़ा झटका था. अगला बड़ा झटका थे ट्रंप. 2017 में पदभार संभालने के बाद ट्रंप और बाकी सदस्य राष्ट्रों के बीच लगातार तनाव बढ़ता रहा. तनाव के सबसे बड़ा सोर्स थे, अमेरिका और जर्मनी-फ्रांस. ट्रंप लगातार अपने साथी देशों की अनदेखी कर रहे थे. वो विक्टिम कार्ड खेल रहे थे. ट्रंप का कहना था कि सहयोग करने के चक्कर में अमेरिका का नुकसान हो रहा है. उनको शिकायत थी कि जर्मनी के साथ व्यापारिक रिश्तों में अमेरिका निर्यात के मुकाबले आयात कहीं ज़्यादा कर रहा है. उन्होंने जर्मनी की कारों के अमेरिका में आयात को रोकने की धमकी दी. इसके अलावा क्लाइमेट से जुड़ी फ्रांस और जर्मनी की चिंताओं से भी ट्रंप की असहमति थी. ट्रंप ने अमेरिका को पैरिस क्लाइमेट डील से अलग कर लिया.

ऐसी लागी रटन…
ऐसे हालात बन गए कि G7 के बीच असहमतियों का अंबार खड़ा हो गया. दिक्कत तब और बढ़ गई, जब ट्रंप रूस को वापस शामिल करने पर ज़ोर देने लगे. 2018 के कनाडा G7 समिट में रूस को वापस लाने की इसी ज़िद ने इतना माहौल ख़राब किया कि कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो बोले कि उनका देश अमेरिका के दबाव में नहीं आएगा. G7 की स्थिति अमेरिका बनाम अन्य हो गई. सदस्य देशों के लीडरान और ट्रंप के बीच सार्वजनिक आलोचनाओं का सिलसिला शुरू हो गया. भरोसे की इतनी कमी हो गई कि 2019 के G7 सम्मेलन में कनाडा और बाकी देशों ने सम्मेलन का अजेंडा एकदम आख़िरी समय तक ट्रंप से छुपाकर रखा.

जो ग़ाएब भी है हाज़िर भी
G7 देशों के लीडर्स, ख़ासतौर पर जर्मनी, फ्रांस और कनाडा के साथ ट्रंप के संबंध इतने ख़राब हो गए कि मीडिया इस ग्रुप को G7 माइनस वन कहने लगी. ग्रुप के भविष्य पर सवाल उठने लगे. ये ग्रुप कुछ सकारात्मक हासिल नहीं कर पा रहा था. जानकार कहने लगे कि अगर 2020 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप की जगह कोई और लीडर चुनकर आएगा, तभी इस ग्रुप की उम्मीदें बची रहेंगी.

मुश्किलें मुझपर इतनी पड़ीं कि…
इस ग्रुप की परेशानी बस ट्रंप और पुतिन तक सीमित नहीं थी. और भी कई स्तर पर तनाव थे. मसलन, ब्रिटेन. ब्रेग्ज़िट, यानी यूरोपियन यूनियन से ब्रिटेन के बाहर होने को लेकर 2017 से ही लंदन और EU के बीच तनाव है. दोनों के हित एक-दूसरे के आड़े आ रहे हैं. एक और बड़ी चुनौती ये है कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग बनाने के लिहाज से ये बहुत छोटा संगठन है. दुनिया की बमुश्किल 10 फीसद आबादी का प्रतिनिधित्व करता है ये संगठन. कई तेज़ी से उभर रही अर्थव्यवस्थाएं इसका हिस्सा नहीं हैं. वैश्विक अर्थव्यवस्था में हिस्सेदारी के लिहाज से भी इसका प्रतिशत लगातार सिकुड़ रहा है. 70 के दशक में जहां ग्लोबल GDP में इस संगठन की भागीदारी 65 फीसद से ज़्यादा थी, वहीं 2019 आते-आते ये घटकर 40 फीसद रह गई. असर के लिहाज से ये ग्रुप इतना अव्यवहारिक हो गया है कि चार लोग कमरे में बैठकर बतिया लें और सोचें कि वो सारी दिक्कतें सुलझा लेंगे.

Xi Jinping
चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग (फोटो: एपी)

रेड रेड, ड्रैगन ड्रैगन…
इन सारी वजहों से G7 धीरे-धीरे अपनी प्रासंगिकता खो चुका है. लेकिन इसकी उम्मीदें ख़त्म नहीं हुई हैं. इन्हीं उम्मीदों से जुड़ा है ट्रंप का वो प्रस्ताव, जिसमें उन्होंने G7 की सदस्यता बढ़ाने की बात कही है. साउथ कोरिया, भारत और ऑस्ट्रेलिया के आने से इसमें दुनिया का प्रतिनिधित्व बढ़ेगा. आप ध्यान दीजिए, इस प्रस्ताव में चीन का ज़िक्र नहीं है. यानी इसे चीन के जवाबी हथियार के तौर पर विकसित करने की प्लानिंग हो सकती है. वेस्ट, ख़ासतौर पर अमेरिका के साथ चीन के रिश्ते एकदम धड़ाम हो गए हैं. ऐसे में ट्रंप की कोशिश है कि G7 में विस्तार करके चीन को घेरा जाए. ये चीन से जुड़ा वही ऐंगल है, जिसका ज़िक्र हमने विडियो की शुरुआत में किया था. चीन की बुलिइंग से जुड़ी कई चिंताएं हैं दुनिया के आगे. इनमें से कुछ बड़े पॉइंट यूं हैं-

– दक्षिण और पूर्वी चाइना सी में एकाधिकार कायम करने की कोशिश
– फ़ाइव जी टेक्नॉलजी से बाकी देशों के राष्ट्रीय हितों को ख़तरा
– ग्लोबल ट्रेड में चीन पर निर्भरता
– कोरोना पर चीन द्वारा जानकारियां छुपाना और दूसरे देशों को अंधेरे में रखना
– ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के सवाल उठाने पर चीन का द्विपक्षीय व्यापार के सहारे उनको धमकाने की कोशिश
– हॉन्ग कॉन्ग और ताइवान में बढ़ रही चीन की आक्रामकता

डबल पांडव: D10
पिछले दिनों ख़बर आई कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन भारत समेत दुनिया के 10 लोकतांत्रिक देशों के बीच एक साझा सिस्टम बनाना चाहते हैं. ऐसा सिस्टम, जहां ये देश मिलकर चीन की 5G टेक्नॉलजी का जवाब खोज सकें. इस प्रस्तावित ग्रुप के लिए टर्म चल निकला- D10.

अगर D10 (डेमोक्रैटिक 10) की पहल मुमकिन हुई, तो ये चीन के सामने एक समानांतर ग्लोबल सहयोग के और कई मोर्चे खोल सकती है. इस सिस्टम में समुद्री सुरक्षा, आर्टिफिशल इंटेलिजेंस पर व्यापक सहयोग और व्यापारिक हित भी शामिल होंगे. ये ऐसे मामले हैं, जहां दो-चार देशों के सहयोग से बात नहीं बनने वाली. अगर G7 देश अपने आपसी मतभेद किनारे रखकर व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने पर सहमत हो जाएं, तब जाकर वाकई में तगड़ी उम्मीदें बन सकती हैं. हालांकि अभी तो ये बड़ा मुश्किल लग रहा है. सबसे बड़ी मुश्किल तो रूस के नाम पर है. दूसरी मुश्किल ये है कि G7 का विस्तार हो भी सकता है कि नहीं, इसपर भी सवाल है.


विडियो- रूस पर आरोप लगाकर USA के ‘ओपन स्काइज़ ट्रीटी’ छोड़ने से क्या होगा?

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