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क्या बस फोटो खिंचवाने साबरमती आश्रम गए थे डॉनल्ड ट्रंप?

23 फरवरी, 2020. भारत में शाम के तकरीबन पौने नौ बजे थे. अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने एक विडियो ट्वीट किया. इसमें लिखा था-

मेलानिया के साथ भारत रवाना हो रहा हूं.

24 फरवरी, 2020. दोपहर तकरीबन साढ़े 11 बजे ट्रंप भारत पहुंच गए. एयर फोर्स वन की सीढ़ियों से उतरते हुए ट्रंप और मेलानिया. सीढ़ी के नीचे ज़मीन पर उनके स्वागत में खड़े भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. दोनों गले मिले. अपनी-अपनी गाड़ियों में बैठे. पहला स्टॉप लिया- साबरमती आश्रम. चरखा चलाते हुए मेलानिया और ट्रंप का विडियो आया. बगल में खड़े मोदी उन्हें कुछ बता रहे थे. साबरमती आश्रम में एक ‘विजिटर बुक’ है. यहां आने वाले लोग इसमें अपने संदेश लिखते हैं. इस विजिटर बुक में ट्रंप ने लिखा-

मेरे बेहद अच्छे दोस्त प्रधानमंत्री मोदी के लिए, इस अद्भुत यात्रा के लिए शुक्रिया.

 

ट्रंप के संदेश में गांधी का जिक्र भी नहीं था.

इस रोज़ से ठीक 61 साल और 14 दिन पहले- 10 फरवरी, 1959 की बात है. उस रोज़ भी अमेरिका से कोई हिंदुस्तान आया था. वो, जो गांधी को अपना नायक मानता था. वो, जो गांधी की हत्या के 11 साल बाद उसके वतन आया था ताकि एक महीने यहां रहकर अपने हीरो को श्रद्धांजलि दे सके. उन्हें ज़्यादा जान सके. वो, जिसने कहा था-

ईसा मसीह ने हमें राह दिखाई थी. और गांधी ने भारत में हमें दिखाया कि वो राह सच में काम करती है.

वो, यानी मार्टिन लूथर किंग जूनियर. अमेरिकी सिविल राइट्स मूवमेंट के हीरो. अमेरिकी अश्वेतों के नायक. पूरे छह दिन की यात्रा के बाद किंग दिल्ली पहुंचे थे. इंडिया गेट के पास के एक होटल की लॉबी में जमा करीब दो दर्जन पत्रकारों से बात करते हुए किंग ने कहा-

मैं बाकी देशों में किसी तरह पर्यटक की तरह जा सकता हूं, मगर भारत तो मैं तीर्थयात्री बनकर आया हूं.

 

ट्रंप और साबरमती आश्रम के जिक्र से मार्टिन लूथर किंग जूनियर की बात उठी. क्योंकि जैसे गांधी हमारे पुरखे, वैसे ही किंग ट्रंप के पुरखे. किंग और गांधी में कई समानताएं थीं. गांधी के अहिंसक आंदोलन ने किंग को अमेरिकी नस्लवाद का विरोध करने की राह दिखाई थी. मगर क्या ट्रंप में इन दोनों से मिलती कोई बात है? क्या साबरमती आश्रम जाकर गांधी का चरखा छूने के अधिकारी थे ट्रंप? क्या ट्रंप के शासन में रत्तीभर भी गांधीत्व या मार्टिनत्व है? चलिए, दो अहम पैमाने देखते हैं-

1. ट्रंप की इमिग्रेशन पॉलिसी-

राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप एक कुख्यात नियम लाए- ट्रेवल बैन. इसके तहत कुछ देशों के लोगों के अमेरिका आने पर प्रतिबंध लगा दिया गया. ये देश हैं- ईरान, लीबिया, सोमालिया, सीरिया, यमन, वेनेजुएला और नॉर्थ कोरिया. फरवरी 2020 में छह और देशों के नाम जोड़ दिए गए इस ट्रैवल बैन में. ये हैं- नाइजीरिया, एरट्रिया, तंजानिया, सूडान, किर्गिस्तान और म्यांमार. ट्रंप की इमिग्रेशन पॉलिसी का सबसे क्रूर हिस्सा वो था, जब अमेरिका में असाइलम तलाश रहे जोड़ों से उनके बच्चों को अलग कर दिया गया. फेडरल फैमिली डिटेंशन सेंटर खोले गए. जहां इमिग्रेंट परिवारों को बंद रखा जाता है, तब तक जब तक कि इमिग्रेशन कोर्ट में उनकी अपील पर फैसला न आ जाए.

आंकड़े बताते हैं कि इन अदालतों में 10 लाख से ज़्यादा बैकलॉग चल रहा है. इसके अलावा ट्रंप की एक ‘माइग्रेंट प्रॉटेक्शन प्रोटोकॉल’ पॉलिसी भी है. इसका ऑरिजनल नाम है- रिमेन इन मैक्सिको. इसमें मैक्सिको से सटी सीमा के रास्ते अमेरिका में शरण आ रहे लोगों को अमेरिकी सीमा में घुसने ही नहीं दिया जाता. उन्हें मैक्सिको में ही रहकर इंतज़ार करने को कहा जाता है. कितने दिनों तक, ये भी साफ नहीं होता. 20 जनवरी, 2017 को राष्ट्रपति पद का कार्यभार संभालने के बाद से अब तक ट्रंप करीब 20 प्रेजिडेंशल ऐक्शन ले चुके हैं इमिग्रेशन पर. कई नियम बदले गए. असाइलम मांगने वालों, शरणार्थियों को चोट पहुंचाने के साथ-साथ स्थायी नागरिकता देने से जुड़े आवेदनों को भी धीमा कर दिए जाने की शिकायतें आईं. मोटा-मोटी ट्रंप की इमिग्रेशन पॉलिसी की ‘विशेषताएं’ हैं-

गरीब देशों से आने वाले इमिग्रेंट्स पर निशाना.
मुस्लिम देशों से आने वाले इमिग्रेंट्स पर निशाना.
अपने देश में हिंसा से भागकर आ रहे इमिग्रेंट्स पर निशाना.

 

2. नस्लीय भेदभाव/अपमान-

उनके पास जन्म प्रमाणपत्र नहीं है. और अगर है भी तो उसपर कुछ ऐसा लिखा है जो कि उनके लिए बहुत बुरा है. किसी ने मुझसे कहा कि सर्टिफिकेट में जहां धर्म बताने की जगह है, वहां शायद मुस्लिम लिखा है. मुझे नहीं पता ये उनके लिए खराब बात है कि नहीं, मगर शायद ये खराब ही हो (ओबामा पर टारगेट करते हुए)

मैक्सिको से आने वाले इमिग्रेंट्स अपराधी और बलात्कारी होते हैं.

अमेरिका आने वाले सारे मुस्लिमों पर बैन लगा देना चाहिए.

ये तीनों बयान ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने से पहले दिए. कैंपेनिंग की राह बनाने के दौरान. राष्ट्रपति बनने के बाद दिए गए कुछ बयान पढ़िए-

(वाइट सुपरमेसिस्ट प्रोटेस्ट के बाद) हिंसा के लिए कई पक्ष जिम्मेदार हैं. वाइट सुपरमेसिस्ट्स में भी कुछ लोग बेहद अच्छे हैं.

ये ‘शिटहोल’ देशों के लोग अमेरिका क्यों आते हैं? (हैती और कुछ और अफ्रीकी देशों के संदर्भ में) अमेरिका को नॉर्वे जैसे देशों से ज़्यादा लोग लेने चाहिए.

एक बार अमेरिका देख लेने के बाद नाइजीरिया के आए इमिग्रेंट्स वापस अपनी झोंपड़ी में लौटकर नहीं जाएंगे.

‘प्रोग्रेसिव’ डेमोक्रैट कांग्रेस की महिला सदस्य ऐसे देशों से हैं, जहां की सरकारें पूरी तरह से बर्बाद हैं. सबसे बुरी, सबसे भ्रष्ट और अयोग्य. ये महिलाएं दुनिया के सबसे महान, सबसे ताकतवर देश अमेरिका के लोगों को सिखाती हैं कि हमारी सरकार को कैसे काम करना चाहिए. ये वहीं क्यों नहीं चली जातीं, जहां से ये आई हैं. उस बर्बाद और अपराध से जकड़ी जगहों को ठीक करने में मदद क्यों नहीं करतीं? (प्रोग्रेसिव डेमोक्रैटिक कांग्रेसविमिन का ये ग्रुप ‘द स्क्वैड’ कहलाता है. इसमें चार महिलाएं हैं- इलहान ओमर, अलेक्जांद्रिया कोरटेज़, राशिदा तलेब और अयाना प्रेसले.)

और विजेता (इस साल के ऑस्कर की) है दक्षिण कोरिया की एक फिल्म. ये क्या था? हमारे पास पहले ही साउथ कोरिया से जुड़ी काफी दिक्कतें हैं. मसलन- व्यापार. ऊपर से ये उन्हें साल की सबसे अच्छी फिल्म का अवॉर्ड भी दे देते हैं. वो अच्छी फिल्म थी? मुझे नहीं पता. इतनी सारी अच्छी फिल्में थीं, लेकिन विजेता बनी साउथ कोरिया की फिल्म. 

 

गांधी नस्लवाद के विरोधी थे. मार्टिन, जिन्होंने गांधी से अपने आंदोलन की प्रेरणा ली, उनका पूरा संघर्ष ही नस्लवाद के मुकाबले थे. ट्रंप इन दोनों को ही निराश करते हैं. गांधी कहते थे- बुरा मत देखो, बुरा मत बोलो, बुरा मत सुनो. ट्रंप कई बार लोगों के लिए अपमानजनक बयान देते हैं. खिल्ली उड़ाते हैं. विरोध में निजी खुन्नस निकालने पर चले जाते हैं. मौजूदा राजनीति में ये चीजें भले बहुत मेन स्ट्रीम हो गई हों, मगर ये गांधी का तरीका नहीं था.


दिल्ली सरकार के स्कूलों में डॉनल्ड ट्रंप की पत्नी के प्रोग्राम में केजरीवाल-सिसोदिया की नो-एंट्री

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