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जब सब तेज़ गेंद फेंकते थे, रमेश पोवार अपनी स्पीड कम कर रहा था

इंडियन डोमेस्टिक क्रिकेट में एक नाम बड़ा हो रहा था. 2002-03 सीज़न में मुंबई की रणजी ट्रॉफी जीत में इसका बड़ा हाथ था. 20 विकेट निकाले थे. लेकिन साथ ही एक प्लस पॉइंट भी था. बैटिंग कर लेता था. भले ही 7 नंबर के ऊपर कभी न उतरा हो. लेकिन रन बनाता था. पूरे टूर्नामेंट में मुंबई के लिए सबसे ज़्यादा रन बनाने वालों में दूसरे नम्बर पर रहा. ज़्यादातर वक़्त अपनी टीम के मुसीबत में होने पर रन बनाये. सेलेक्टर्स को ये सब कुछ दिखाई दिया और उसे इंडियन टीम के लिए सेलेक्ट कर लिया गया. रमेश पोवार.

2004. इंडिया का पाकिस्तान टूर. इंडियन टीम 7 साल बाद पाकिस्तान की ज़मीन पर क्रिकेट खेल रही थी. रमेश पोवार पहली बार इंडियन टीम के लिए खेल रहे थे. उस वक़्त तक रणजी ट्रॉफी सरीखे मैचों को टीवी पर उतनी जगह नहीं मिलती थी. ऐसे में रणजी खेलने वाले, लेकिन नेशनल टीम में न होने वाले चेहरों को उतना नहीं जाना जाता था. इसी वजह से रमेश पोवार को पहली बार देखा जा रहा था. रावलपिंडी के दूसरे वन डे में इंडियन कैप मिली. प्लेयिंग इलेवेन में नाम था. डीप में फील्डिंग करते हुए रमेश पोवार को दिखाया गया. लम्बे बाल, बालों में तेल, छोटा कद, चेहरे पर एक मुस्कान और आंख पर चश्मा. ओक्ले का. एकदम आंखों से Ramesh Powarचिपकने वाला. लाल फ़्रेम का, काले शीशों के साथ. मज़ेदार गेट-अप.

मैच के बाईसवें ओवर में रमेश पोवार की ओर गेंद फेंकी गयी. बॉलिंग करने का आदेश मिला. कप्तान गांगुली थे. पोवार आया और गेंदें फेंकने लगा. एक छोटे से रन-अप से कुछ लम्बा रन-अप, हल्की सी तेजी में, विकेट के पास पहुंच के एक छोटी सी छलांग और गेंद हाथ से निकल पड़ती थी. गेंद में कभी भी स्पिन उतना ज़्यादा नहीं रहता था. गेंद टप्पे पे ही पड़ती थी और बेहतरीन फ्लाइट के साथ. सबसे बेहतरीन बात ये कि शोएब और समी के सामने बल्ला घुमाने वाला 7 नम्बर का ये पहला बल्लेबाज था जो ये काम सीना ठोंक के कर रहा था. सफ़लता उस हद तक नहीं मिली लेकिन उस वक़्त कोई ऐसा करने की ही सोचे, इंडिया के लिए यही बहुत था.

इस टूर के बाद पोवार को फिर से टीम में जगह नहीं मिली. 2006 में वो फिर से टीम में आया. इस बार उसके तरकश में एक नया तीर था. ड्रिफ्टर. हवा में छोड़ी गयी गेंद जो हवा में ही ड्रिफ्ट करती हुई बल्ले तक पहुंचती थी. पोवार की गेंदों को अगर क्रिकेट की बोलचाल की भाषा में कहा जाए तो लुप्पा कहेंगे. उसकी गेंदों में हमेशा वो लूप रहा है जो एक स्पिनर की गेंद में होना चाहिए. पोवार उस समय क्रिकेट खेल रहे थे जब क्रिकेट की गति अचानक से बढ़ने लगी थी. वो जिस टूर पर पहली बार गए थे उसके पहले ही मैच में इंडिया और पाकिस्तान के इतिहास का सबसे बड़े स्कोर का मैच खेला गया था. उसी टूर पर सहवाग एक ही दिन में दो सौ रन मार रहे थे. उसी दौर में युवराज, मैकुलम, क्लार्क, पीटरसन परिपक्व हो रहे थे. खेल में एक रिवोल्यूशन आ रहा था. बैटिंग में भी और बॉलिंग में भी.

बॉलिंग में उस वक़्त बैट्समैन को स्पीड से चकमा देने के गुर सिखाये जा रहे थे. ये वो समय था जब अचानक ही स्पिनर्स को स्पीड का कॉन्सेप्ट समझाया जाने लगा था. क्विकर वन्स का चलन था. उस समय में पोवार अपने लुप्पे से बैट को बीट करते दिखते थे. 2007 के इंग्लैंड टूर पर पोवार ने एक बार भी किसी बैट्समैन को बॉल की स्पीड के दम पर बीट नहीं किया. हमेशा फ्लाइट में फंसाया. ऐसे में कहा जाने लगा कि वो क्रिकेट के गोल्डन एज की याद दिलाते थे. उस टूर पर पांच मैचों में छः विकेट लिए. इकॉनमी रही 4.41 की. ये भी याद रहे कि सभी मैच हाई-स्कोरिंग मैच थे.

इंडिया ने अपने प्रैक्टिस मैच ससेक्स के खिलाफ़ खेले थे. उस दौरान सक्लेन मुश्ताक़ से हुई दस मिनट की मुलाक़ात को वो बहुत तवज्जो देते हैं. नेट्स में रमेश पोवार किसी भी इंडियन बैट्समैन को आउट नहीं कर पा रहे थे. जिससे वो खुद से काफी ख़फ़ा थे. सक़लैन ने उन्हें बताया –

“अगर तुम इन लोगों से अपनी गेंदे डिफेंड करवा रहे हो तो समझ जाओ तुम अच्छा कर रहे हो. ये मत सोचो कि तुम सचिन, गांगुली, या द्रविड़ को आउट ही कर लोगे. तुम उन्हें नेट्स में परेशान ही कर रहे हो तो ये तुम्हारे लिए अच्छा है.”

उसके बाद से पोवार में गज़ब का कॉन्फिडेंस आया. इतना कि अपनी स्पीड को और भी कम करने में कोई संकोच नहीं किया. उसने ज़्यादातर 45-55 मील प्रति घंटा की रेंज में गेंदें फेंकी. बस यदा-कदा अपनी सीधी रहने वाली गेंदों को वो 60-65 तक लेके चला जाता था. एक बार तो 41 मील प्रति घंटा की स्पीड से भी गेंद फेंक दी थी. कहता है कि उसके लिए धीमे फेंकना बहुत ही आसान है.

हेडिंग्ले में रवि बोपारा को आउट करना एक जाल था. ऐसा जाल जो पोवार ने बुना, फेंका और उसमें बोपारा फंस गया. इस बार भी सारा काम बॉल की पेस का. गेंद अभी अभी बदली गयी थी. थोड़ी सी नयी गेंद जो बाउंस दे सकती थी. पहली दो गेंदें थोड़ी तेज़. 55 मील प्रति घंटा. दोनों. रेगुलर डिलीवरी. पोवार तैयार थे. स्पिन होने ही नहीं दे रहे थे. तीसरी सीधी सीधी लुप्पा गेंद. 42.4 मील प्रति घंटा. बोपारा जब तक खुद को संभाल पाते, एक आसान रिटर्न कैच पोवार को थमा चुके थे.

बल्लेबाज क्या करने वाला है, इसका पहले ही अंदाज़ा लगा लेता था. दिमाग लगाकर दिल की बात सुनने वाला रमेश पोवार. चालाक और काईंयां. कॉलिंगवुड को खासा परेशान किया. कॉलिंगवुड चिप शॉट हमेशा मारता था. पोवार ने ठाना कि उसे ऑफ-ब्रेक ही नहीं फेकेगा. कॉलिंगवुड सच में क्रीज़ पर जकड़ गया था. झुंझला कर दूसरे बॉलर को मारना चाहा तो डीप में कैच आउट हो गया.

पोवार को वो शोहरत नहीं मिली जो वो चाहता था. डोमेस्टिक क्रिकेट में एक बड़ा नाम लेकिन इंटरनेशनल लेवल पर उस दर्जे की सफ़लता नहीं पा सका जिसका वो हक़दार था. उसका खुद का कहना था कि उसे रोज़-रोज़ सफ़लता नहीं चाहिए. इसलिए सफ़लता और असफ़लता दोनों को बहुत सीरियसली नहीं लेना चाहिए. लेकिन पोवार को सीरियसली लिया जाना चाहिए था. लिया गया भी. जिसने नहीं लिया वो फंसता था लुप्पे के जाल में.


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