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सौरव गांगुली की दादागिरी के पांच किस्से

8 जुलाई 1972. कलकत्ता में चंडीदास गांगुली और निरूपा गांगुली को दूसरा बेटा हुआ. नाम रखा गया सौरव चंडीदास गांगुली. आगे चलकर जिसे कलकत्ता का प्रिंस, ऑफ़ साइड का भगवान और दादा कहा गया. खिलाड़ी ऐसा कि इंडिया के लिए पहला मैच खेला तो सीधे लॉर्ड्स पर. और पहले ही मैच में सेंचुरी जमा दी.

कप्तान ऐसा कि देश को जीतने की आदत डलवा दी. अपनी ज़िद, अपने कथित अहंकार और जैसे को तैसा कहने की फ़ितरत से. एक कोच की सिफारिश की, बाद में उसकी कोचिंग नहीं समझ आई तो मुंह फाड़ के कह दिया. बहुत बवाल हुआ लेकिन दादा तो फिर दादा थे. डटे रहे. कई सालों बाद रवि शास्त्री ने कहा कि उन्हें टीम इंडिया का कोच गांगुली की वजह से नहीं बनाया गया. तो एडिटोरियल बोर्ड के प्रेसिडेंट दादा ने कह दिया कि शास्त्री को बैंकॉक में छुट्टी मनाने की बजाय सबके सामने प्रेज़ेन्टेशन देनी चाहिए थी.

उसी सौरव गांगुली की कुछ ऐसी बातें जब वो अड़ गए. अपनी बात पर. या ज़िद कर बैठे. और दुनिया को सिखा दिया कि असली दादा है कौन.

1. मोहम्मद यूसुफ़ से कहा “तू टाइम नोट कर ले.”

इंडिया वर्सेज़ पाकिस्तान.  पाकिस्तानी टीम बैटिंग कर रही थी. मोहम्मद यूसुफ़ क्रीज़ पर थे. यूसुफ़ थोड़ा सा चोटिल और थके हुए भी थे. उन्होंने एक बार ड्रिंक्स के लिए टाइम ब्रेक लिया. फिर कोहनी में चोट लगने पर फिज़ियो को बुला लिया. अब ऐसे में गांगुली की मुश्किल ये बढ़ गयी कि इनिंग्स का निर्धारित टाइम ओवर हो रहा था. ऐसे में अगर दिए गए समय में इंडियन टीम 50 ओवर नहीं फेंक लेती है, तो इंडियन टीम के कप्तान यानी गांगुली पर फाइन लग सकता था.

बस, गांगुली बिफ़र पड़े. लम्बे बालों वाले धोनी के कंधे पर हाथ रखा और यूसुफ़ से कहने लगे,

‘नहीं नहीं तेरी बात नहीं कर रहा हूं. मैं अपनी बात कर रहा हूं. तू रेस्ट ले मेरे को प्रॉब्लम नहीं है… नहीं मैं ये नहीं बोल रहा हूं जान बूझ के कर रहा है तू. तू टाइम नोट कर ले बस.’

ये बातें स्टम्प माइक पर रिकॉर्ड हो गयीं और दुनिया जहान ने टीवी पर इसे लाइव सुना.


2. रसेल अर्नाल्ड पिच पर दौड़ रहा था, उसको वहीं धर लिया.

रसेल अर्नाल्ड. श्री लंका के ऑल राउंडर. बैटिंग कर रहे थे. कुम्बले की एक गेंद पर रन चुराना चाहते थे लेकिन नॉन स्ट्राइकिंग एंड पर खड़े बैट्समैन ने मना कर दिया. उलटे पांव लौट पड़े. बात तबकी है जब द्रविड़ कीपिंग करते थे. द्रविड़ ने तुरंत अर्नाल्ड को टोका. अर्नाल्ड पिच पर दौड़ रहे थे. बल्लेबाजों के जूतों में स्पाइक्स लगी होती हैं. इन्हें पहन कर पिच पर दौड़ने से पिच खुरदुरी हो जाती है. अर्नाल्ड यही कर रहे थे.

गांगुली चल कर उनके पास आये. ओवर भी खतम हो चुका था. गांगुली ने अर्नाल्ड को समझाया कि विकेट पर नहीं दौड़ना है. और बस यहीं दोनों के बीच बहस शुरू हो गयी. गांगुली ने धर के वहीं अर्नाल्ड को समझाया. अंपायर के बीच-बचाव के बावजूद वो फिर उसके पास पहुंच गए. उसे ‘समझाने’.


3. “मैं तब तक रूम से बाहर नहीं जाऊंगा जब तक हरभजन टीम में नहीं आएगा.”

Harbhajan

बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी. साल 2001. टीम सेलेक्शन चालू था. कप्तान थे दादा. मैच होना था कलकत्ता में. ईडेन गार्डन्स. सेलेक्शन मीटिंग में सौरव गांगुली फिर अड़ गए. उन्हें अपने मैदान, वहां की कंडीशंस वगैरह सब कुछ मालूम था. साथ ही अपनी टीम के प्लेयर्स के बारे में भी भली तरह से जानते थे.

उन्हें टीम में हरभजन सिंह चाहिए था. सेलेक्टर्स भज्जी से उतना प्रभावित नहीं थे. उस वक़्त हरभजन नए नवेले ही थे.  लेकिन दादा को हरभजन चाहिए था तो चाहिए था. गाड़ दिया खूंटा. उन्होंने साफ़ ऐलान कर दिया,

‘जब तक हरभजन टीम में नहीं आयेगा, मैं इस कमरे से बाहर नहीं जाऊंगा.’

बहुत मान-मनौती के बाद भी जब वो नहीं माने तो सेलेक्टर्स ने गिव-अप कर दिया. हरभजन टीम में आ गए. आगे की कहानी इतिहास में दर्ज है. सुनहरे अक्षरों में.

हरभजन ने पहली इनिंग्स के बहत्तरवें ओवर में पोंटिंग, गिलक्रिस्ट और शेन वॉर्न को आउट कर हैट्रिक ली. इनिंग्स में कुल सात विकेट लिए. अगली इनिंग्स में भज्जी ने 30 ओवर में 6 विकेट लिए. मैच में कुल 13 और साथ ही मैन-ऑफ़-द-मैच. और एक बार फिर दादागिरी सब पर भारी पड़ गयी थी.

4. “जब गांगुली ने पहला मैच खेला तब ब्रॉड डायपर पहनते थे.”

2007. केनिंग्टन ओवल. इंग्लैण्ड ने पहले बैटिंग करते हुए 316 रन बनाये. इंडिया को 317 के विकट स्कोर का पीछा करना था. सचिन और गांगुली की ऐतिहासिक ओपेनिंग जोड़ी तेजी में रन बना रही थी. लग रहा था कि जीतने के उद्देश्य से ही उतरे हैं. स्टुअर्ट ब्रॉड इनिंग्स का नौवां ओवर फेंक रहे थे. आखिरी गेंद पे सौरव गांगुली ने आगे बढ़ के मारना चाहा लेकिन पर्याप्त रूम न होने की वजह से वो ऐसा कर नहीं पाए. एक भी रन नहीं मिला.

स्टुअर्ट ब्रॉड चलते हुए गांगुली की तरफ आये और कुछ भला-बुरा कहा. बस. इतना काफी था गांगुली को भड़काने के लिए. उन्होंने दम भर ब्रॉड को खरी-खोटी सुनाई. न जाने क्या क्या कहा. कमेंट्री पर बैठे हर्षा भोगले और सुनील गावस्कर भी मज़े लेने लगे. सुनील गावस्कर ने कहा कि

‘सौरव क्या कह रहे हैं ये सुनाई तो नहीं दे रहा है लेकिन वो स्टुअर्ट को शायद ये बता रहे हैं कि जब मैंने पहला मैच खेला था तब तुम नैपी पहन कर घूमा करते थे.’

चूंकि ओवर खतम हो गया था इसलिए गांगुली को 6 गेंदों का इंतज़ार करना पड़ा. जब स्टुअर्ट ब्रॉड अपना अगला ओवर फेंकने आये तो ओवर की दूसरी गेंद पर दादा क्रीज़ पर थे. एक ओवरपिच की हुई गेंद और दादा ने अपने कंधे खोल दिए. उन्हें आगे ही नहीं बढ़ना पड़ा और दुधमुंहे स्टुअर्ट ब्रॉड के सर के ऊपर से गेंद उडती हुई बाउंड्री पार गिरी.


5. लॉर्ड्स और दादा की टीशर्ट

सौरव गांगुली की शायद सबसे यादगार तस्वीर. इंडिया की लॉर्ड्स में 2002 नेटवेस्ट ट्रॉफी की जीत.  लॉर्ड्स की बालकनी में इंडियन कैप्टन ने अपनी टीशर्ट निकाली और लहरा दी. साथ ही कुछ मंत्रोच्चार भी किये. ये जवाब था एंड्रू फ़्लिंटॉफ़ को. फ़्लिंटॉफ़ ने मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में इंडिया पर जीत के बाद अपनी टीशर्ट निकालकर मैदान में दौड़ लगायी थी. दादा ताक में थे. मौका मिल गया था. लॉर्ड्स. इस मैदान से बड़ी जगह और कुछ नहीं हो सकती थी. सो दादा चूके नहीं.


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