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क्यूं धर्मेन्द्र ने संजीव कुमार को वीरू का रोल नहीं करने दिया था?

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15 अगस्त. साल 1975. मिनरवा थियेटर. लैमिंगटन रोड, मुंबई. एक हिंदी फ़िल्म का प्रीमियर होना है. सुबह से चकल्लस.शाम होते-होते भीड़ इकठ्ठा होती है. फ़िल्म के लेखक अपने साथ अपने दो बेटों को लाते हैं. ऐसा लग रहा था कि दोनों ही स्कूल से सीधे फिल्म देखने पहुंच गए थे. दोनों ने स्कूल का ब्लेज़र पहन रखा था.

फ़िल्म ख़त्म हुई और थियेटर तालियों से भर गया. सीटियां ही सीटियां. कई लोग रोते हुए दिखे. फ़िल्म बनाने वाले एक दूसरे को बधाई दे रहे थे. फ़िल्म लिखने वाले के दोनों बेटों को ये अहसास ही नहीं था कि उन्होंने जो देखा, वो असल में क्या था. उसका क्या होने वाला था. वो क्या करने वाला था. कब तक उसके ही बारे में बातें की जायेंगी.

फ़िल्म शोले. लिखने वाले सलीम खान. अपने बेटे सलमान खान और अरबाज़ खान के साथ पहुंचे थे. सलीम खान के साथ इस फिल्म को लिखा था जावेद अख्तर ने. वो जोड़ी जिसने इस देश को एक के बाद एक बेहतरीन फ़िल्में दीं. लेकिन उन सभी फिल्मों में सबसे बड़ा नाम – शोले.

क्रिकेट में सचिन, टेनिस में फेडरर, साइंस में आइन्स्टीन, कम्प्यूटर में विंडोज़, पॉप कल्चर में माइकल जैक्सन, ऐक्टिंग में मर्लिन ब्रैंडो, अर्थशास्त्र में चाणक्य की जो जगह है, वही जगह हिंदी फिल्मों में शोले की है. आप किसी भी बैठक में पहुंच जाइए जहां चार फ़िल्मी कीड़े बैठे हों, शोले का डायलॉग न बोला जाए, तो उनकी फ़िल्मी समझ पर शक करना शुरू कर दीजिये. समय रहते साथ भी छोड़ दीजिये. ये वही बात हुई कि किष्किन्धा कांड बिना सुग्रीव के उल्लेख के खतम हो जाये. या इंडिया वर्सेज़ पाकिस्तान की बात हो जाये और सचिन वर्सेज़ अख्तर की बात ही न हो.

शोले. फ़िल्म नहीं थी साहब! एक घटना थी. हिरोशिमा में बम फटा था. न्यूक्लियर बम. साल था 1945. मगर आज भी उसका असर देखा जा सकता है. हिंदुस्तान में शोले फ़िल्म का पर्दे पर आना वही न्यूक्लियर अटैक था. ऐटम बम. इस बम को बार-बार प्रोजेक्टर से एक पर्दे पर गिराया जा रहा था. लोग आ रहे थे, शोले में झुलस रहे थे और एक आजीवन रहने वाली बीमारी को अपने साथ लेकर जा रहे थे.

शोले! मिसाल थी दोस्ती की. जय और वीरू. जो कहते थे “तोड़ेंगे दम अगर, तेरा साथ न छोड़ेंगे.” एक कहता था कि घायल पुलिस वाले को छोड़के नहीं जाना चाहिए, तो दूजा वहीं रुक जाता था. भले ही उसका मतलब जेल तक पहुंच जाना हो. वो दोस्त जो जेल सिर्फ़ इसलिए पहुंच जाते थे, क्यूंकि उन्हें अपने ही ऊपर रखी इनाम की रकम चाहिए थी. जिसके लिए पकड़ा एक बिचौलिया. सूरमा भोपाली. वो सूरमा भोपाली Jai-Veeruजिसका नाम सूरमा भोपाली ‘एसे ई नई’ पड़ा था. जय और वीरू वो दोस्त थे कि जब वीरू को एक तांगे वाली से प्यार हुआ, वो जय उस लड़की की मौसी से बात करने पहुंच गया. और शादी की क्या बात करने पहुंचा, मौसी के दिल का बोझ हल्का करने पहुंचा. इस यकीन के साथ कि एक बार बीवी-बच्चों की ज़िम्मेदारी सर पे आ गयी, तो वीरू कमाने भी लगेगा. क्यूंकि रोज़-रोज़ तो आदमी जीत नहीं सकता है. कभी हार भी जाता है. जुआ चीज ही ऐसी होती है. लेकिन उसका दोस्त जुआरी नहीं, बल्कि अच्छा और नेक लड़का था. बस कभी जो शराब पी ली, तो उसे अच्छे और बुरे का होश नहीं रहता था.

“लोगों को आते हैं दो नज़र हम मगर
देखो दो नहीं…
हों जुदा या ख़फ़ा ऐ ख़ुदा है दुआ
ऐसा हो नहीं…
खाना-पीना साथ है,
मरना जीना साथ है
सारी ज़िन्दगी…”

शोले! मिसाल थी प्यार की. फिल्मों में जब ख़ूबसूरत, सजी-धजी, सहेली के साथ साइकिल चलाती लड़कियों से इश्क़ फरमाने का रिवाज़ था, तब हीरो एक विधवा से शादी करने के ख्वाब देख रहा था. जया भादुड़ी जो ताज़ी-ताज़ी जया बच्चन हुई थीं, लालटेन बुझाते-बुझाते कब माउथऑर्गन बजाते हुए अमिताभ के मन को भा गईं, खुद वीरू को मालूम नहीं चला. वही वीरू जो आम के बाग़ में बसंती को दो दिन में पिस्तौल से आम तोड़ने की ट्रेनिंग देने वाला था. क्यूंकि बड़े-बड़े निशानेबाज़ उसके पैर छूते थे और कहते थे “वीरू तुम्हारे जैसा निशानेबाज पैदा नहीं हुआ.” खुद जय के शब्दों में, “हां तांत्या तोपे के पोते हैं ये.” वही वीरू जो भगवान शिव की आवाज़ बन जाता है. और बसंती को रानी की तरह राज करवाने का इंतज़ाम करना चाहता है. जो बसंती को शिव बन ये अहसास कराना चाहता है कि वीरू का आदर करना बसंती का धर्म है. इसलिए कि उसी के चरणों में बसंती का स्वर्ग है. और तब उसे इस बात का अंदाज़ा हुआ कि

“हाथों में चाबुक होंठों पे गालियां
बड़ी नखरेवालियां, होती हैं तांगेवालियां.
कोई तांगेवाली जब रूठ जाती है तो
और नमकीन हो जाती है…”

शोले! मिसाल थी आतंक की. एक पुलिसवाले ने कभी गब्बर सिंह से कहा कि “ये हाथ नहीं, फांसी का फंदा है.” मुल्ज़िम गब्बर सिंह वल्द हरि सिंह को डाकाजनी और लूटमार के एवज दफ़ा 400 ताजिरातेहिन्द के तहत 20 बरस कैद-ए-बामशक्कत होती है. गब्बर इस वादे के साथ जाता है कि वो वापस आएगा. और वो आया. क्यूंकि “दुनिया की किसी जेल की दीवार इतनी पक्की नहीं कि गब्बर को बीस साल रोक सके.” ठाकुर बलदेव सिंह अपनी पुलिस की वर्दी को तह लगाकर सादे कपड़ों में जब रामगढ़ के स्टेशन पर ट्रेन से उतरे, तो उनके सामने था उनका पूरा परिवार. मृत. सफ़ेद चादर के नीचे ढका हुआ. बची सिर्फ़ उनकी बहू और नौकर. वो गब्बर जिसके बारे में कहा जाता था कि पचास-पचास कोस दूर जब कोई बच्चा रोता था, तो मांएं कहती थीं कि सो जा वरना गब्बर आ जायेगा. वो गब्बर जो खाली हाथ आने पर कालिया और उसके साथियों को जान से मार देता है. क्यूंकि उसके जीवन का एक ही दर्शन था – “जो डर गया, समझो मर गया.” वही गब्बर जिसने ईमाम साहब के मासूम बच्चे को तड़पा-तड़पा कर इसलिए मारा क्यूंकि “गोली से मरने में कहीं तकलीफ़ होती है क्या?” 

Gabbar Singh

शोले! मिसाल थी प्रतिशोध की. ठाकुर बलदेव सिंह ने जब गब्बर सिंह को कहा था कि ये हाथ नहीं फांसी का फंदा है, उसी वक़्त गब्बर सिंह ने उस बेइज्ज़ती का बदला लेने की ठान ली थी. और ऐसा-वैसा नहीं. बदला ऐसा कि जीवनपर्यंत याद रहे. ऐसा ज़ख्म मिले कि भरे ही न. और इसके लिए उसने ठाकुर के पूरे परिवार को गोलियों से भून दिया. उसके पोते को भी. ठाकुर घोड़े पर लदकर जब गब्बर को सबक सिखाने पहुंचा, तो उसे वहां पकड़ लिया गया. गब्बर ने उसके हाथ काट दिए. और इसका बदला लेने के लिए ठाकुर ने इकठ्ठा किये दो छंटे हुए बदमाश जय और वीरू. जिन्हें कभी कालिया ने हिजड़ों की फ़ौज कह कर उन पर सस्ती हंसी निपोर दी. उसी बदले के चलते वीरू ने गब्बर की जान ले लेने की ठान ली थी. लेकिन हाय दोस्ती का वास्ता जो जय ने वीरू को दिया था. वीरू को गब्बर को ज़िन्दा छोड़ना पड़ा. ठाकुर के बदले के लिए.

शोले! फ़िल्म जो बनी थी रामनगर में. कर्णाटक का एक पहाड़ी इलाका. जहां बेंगलुरु हाइवे से रामनगर के लिए एक रोड बनानी पड़ी थी. फ़िल्म बनी थी तब, जब फ़िल्मों में अमिताभ बच्चन का नाम वो नाम नहीं था, जो हमने देखा है. फ़िल्म बनी थी जब धर्मेन्द्र हेमा मालिनी के इश्क़ में पड़े हुए थे. और उन्होंने संजीव कुमार को वीरू का रोल नहीं करने दिया था क्यूंकि संजीव कुमार को भी हेमा मालिनी पसंद थीं. फ़िल्म में गब्बर सिंह के लिए डैनी डेंज़ोंगपा पहली पसंद थे. लेकिन बाद में अमज़द खान आये. अमज़द ने अपने रोल के लिए अभिशप्त चम्बल नाम की किताब पढ़ डाली. अपनी तैयारी के लिए. इस किताब को लिखने वाले थे तरुण कुमार भादुड़ी. तरुण जया भादुड़ी के पिता थे.

sholay

इस फिल्म की एक बड़ी और टेक्निकल बात. शोले यूं ही शोले नहीं बन पाई. भारतीय सिनेमा के इतिहास में शोले वो पहली फिल्म थी जिसे 70एमएम के पर्दे पर दिखाया गया था. जिसे हमने बड़ा पर्दा कहना शुरू किया. हालांकि 70एमएम कैमरे काफ़ी महंगे पड़ते थे इसलिए फ़िल्म को 35एमएम पर ही शूट किया. फ़िल्म 4:3 पर शूट होती थी और बाद में उसे 2.2:1 फ्रेम पर कन्वर्ट कर दिया जाता था.

फिल्म बनाने के दौरान बजट कई बार ऊपर निकल गया. साथ ही फिल्म बनाने में भी करीब दो-ढाई साल लग गए. इसके पीछे थी रमेश सिप्पी की परफेक्ट शॉट की ज़िद. मसलन ‘ये दोस्ती, हम नहीं तोड़ेंगे’ कुल 5 मिनट का गाना था, लेकिन उसे शूट करने में कुल 21 दिन लग गए. जब जया बच्चन लालटेन जलाती हुई दिखती हैं, उस शॉट को फिल्माने में कुछ 20 दिन का समय लग गया था. फ़िल्म की शुरुआत में जो ट्रेन डकैती दिखाई गयी है, सिर्फ उस एक डकैती को फिल्माने में कुल 7 हफ़्तों का समय लग गया था.

कुल मिला के शोले फ़िल्म का तो ऐसा है कि ये वो फिल्म है, जिसे पुश्तें देखती आ रही हैं. जिसे जनरेशन-दर-जनरेशन एक परम्परा की माफ़िक पास किया जा रहा है. और आज भी देखो तो नई लगती है. डायलॉग ऐसे कि ज़ुबान पे चढ़े हुए हैं. आज भी साम्भा और कालिया हमारे ड्रॉइंग रूम के हिस्से हैं. हर दूसरा बॉस गब्बर होता है. हर पक्के दोस्त जय और वीरू होते हैं. हर बदले की आग में जलता इंसान ठाकुर होता है. नहीं मिलती है कहीं तो दूसरी शोले.

मेरी आदत हो गयी है. अब किसी से ये नहीं पूछता हूं कि उसने शोले देखी है या नहीं. मैं अब पूछता हूं,

“क्या तुमने शोले को भोगा है?”

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Tribute to film Sholay that released 41 years ago

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