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'पाकिस्तान से पैसा फेंकना बंद हो जाए तो कश्मीर में पत्थर फेंकना बंद हो जाएगा'

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Pradeepika Saraswatजम्मू कश्मीर के पुलवामा में शनिवार सुबह एनकाउंटर हुआ. इंडियन आर्मी ने तीन आतंकी मार गिराए. ऑपरेशन खत्म हुआ तो लोकल लोगों ने पथराव शुरू कर दिया. हमारे और आपके पास किसी एनकाउंटर के बाद बस इतनी ही खबर आती है. एनकाउंटर के बाद उस खूबसूरत घाटी में क्या होता है. इससे कम लोग ही वाकिफ हैं.

प्रदीपिका सारस्वत फ्रीलांस राइटर हैं. मीडिया की नौकरी छोड़कर इन दिनों कश्मीर में डेरा जमाए हुई हैं. पुलवामा एनकाउंटर वाले दिन भी घटनास्थल से प्रदीपिका 10 मिनट की दूरी पर थीं. एनकाउंटर खत्म हुआ तो वो अपना कैमरा उठाए पहुंच गईं. लोगों से बात की. तस्वीरें लीं. किसी एनकाउंटर के बाद क्या होता है. कश्मीर के लोग, इंडियन आर्मी के जवान क्या सोचते हैं. दी लल्लनटॉप के साथ जुड़ी प्रदीपिका ने हमें लिख भेजा है. पढ़िए प्रदीपिका की कश्मीर डायरी..


 

मेरा नाम प्रदीपिका है. प्रदीपिका सारस्वत, आपने शायद पहले नहीं सुना होगा. पापा का घर आगरा में है लेकिन अगर मुझसे पूछा जाए कि मैं कहां से हूं, तो मेरे पास जवाब नहीं होता. फुटलूज़ खानाबदोश हूं. जहां होती हूं, वहीं की हो जाती हूं. बचपन से ही लिखना-पढ़ना अच्छा लगता था तो मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई कर ली. पर डेस्क के पीछे बैठना एक खानाबदोश के लिए आसान नहीं होता. एक महीने पहले फिल्मसिटी, नोएडा की नौकरी छोड़ कर कश्मीर चली आई. कश्मीर मेरी बचपन की मुहब्बत है. शुरू के दिनों में मैं यहां की खूबसूरती की कायल रही, पर अब मुझे इसके अंदरूनी राज़ भी समझ आने लगे हैं.

आज 9वां दिन है मुझे कश्मीर में, पुलवामा में. इन नौ दिनों में काफी कुछ देखा है, समझा है. आने वाले दिनों में और भी बहुत कुछ देखने, समझने की उम्मीद है. पहले दिन कश्मीर जितना खूबसूरत दिखा था, आज उससे कुछ अलग पहलू नज़र आया. वो पहलू जो किताबों में, और कभी-कभार अखबारों में दिखता है, पर कश्मीर से बाहर रहने वाले हिंदुस्तानियों को उसके बारे में ठीक से अंदाज़ा तक नहीं होता.

कल (शनिवार) मैं सारा दिन घर पर थी. आज जागी तो ज़ाहिद (मेरा कश्मीरी दोस्त, जिसके घर पर अभी ठहरी हूं, वकील है) ने बताया कि पुलवामा में स्टोन पेल्टिंग हो रही है. उसने पूछा, आप जाना चाहेंगी वहां? बिना वक्त गंवाए मैं पुलवामा शहर की तरफ निकल गई. नेवा, जहां में रह रही हूं, वहां से कुल 10 मिनट की दूरी पर है शहर. नेवा बाज़ार से सूमो वगैरह गाड़ियां जाती हैं पुलवामा.

 

फोटो: प्रदीपिका सारस्वत
फोटो: प्रदीपिका सारस्वत

 

गाड़ी ने हमें डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल के पास उतार दिया. सड़क पर जगह-जगह जम्मू-कश्मीर पुलिस, सीआरपीएफ की बख्तरबंद गाड़ियां खड़ीं थीं. ढेरों पुलिस और बाकी सुरक्षा बलों के लोग बंद दुकानों के आगे खड़े थे. कुछ देर पहले वहां पथराव हो चुका था.

फोटो: प्रदीपिका सारस्वत
फोटो: प्रदीपिका सारस्वत

आज दक्षिणी कश्मीर के पंजगाम इलाके में हिजबुल मुजाहिदीन के मिलिटेंट होने की खबर पर पुलिस और सेना का जॉइंट छापा पड़ा था. एनकाउंटर में तीन मिलिटेंट मारे गए थे, तीनों लोकल लड़के थे. एक सिविलियन भी घायल हुआ था. इसी कार्रवाई के खिलाफ किया गया था पथराव. सुरक्षा बलों का एनकाउंटर करना और इसके खिलाफ स्थानीय युवाओं का पथराव करना यहां रोज़ की सी बात है.

‘हम पथराव नहीं करेंगे तो और क्या करेंगे. आपके लिए ये लोग आतंकवादी हैं, मिलिटेंट हैं, पर हमारे भाई हैं ये. इन्होंने हमारे लिए हथियार उठाया है, इंडिया के ज़ुल्म के खिलाफ हथियार उठाया है.’

बाज़ार में जब मैंने बंद दुकानों के सामने बैठे लड़कों से बात की, तो लगभग सबकी ज़ुबान पर यही बात थी. मैंने कहा, कैमरे पर आप ये बात कहेंगे, तो एक बोला, ‘आप क्या चाहती हैं कि हमारी लाश भी हमारे घर वालों को न मिले?’ फिर मैंने उसका नाम नहीं पूछा. 18 से 20 के बीच रही होगी उस लड़के की उम्र.

‘जब इंडिया में कहीं सरकार की किसी बात के खिलाफ लोग मार्च निकालते हैं, तो उन्हें बात करके, लाठियों से या फिर ज़्यादा से ज़्यादा वॉटर कैनन से हटाते हैं, पर कश्मीर में तो गोलियां चलती हैं, इतने सिविलियन मरते हैं, किसी को भी मिलिटेंट बताकर मार देते हैं, और हम पत्थर भी न मारें?’

उन लड़कों के पास मेरे लिए ऐसे ढेरों सवाल थे. मुझे समझ नहीं आया कि उनसे और क्या पूछूं, क्या कहूं. मुरन चौक बाज़ार से ज़रा आगे पुलवामा डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस कोर्ट है. शहर में हड़ताल थी तो वहां भी आज कोई काम नहीं हो रहा था. एडवोकेट्स और बार मेंबर्स धूप में कुर्सियां डाले बातें कर रहे थे. मेरा वहां पहुंचना लोगों के लिए दिलचस्पी की बात थी. वहां बाहर के रिपोर्टर्स नहीं पहुंचते, ऐसा उन्होंने मुझे बताया. बहुत इज़्ज़त के साथ मुझे बैठाया गया, हड़ताल होने, और दुकानें बंद होने के बावजूद मुझे चाय पेश की गई.

फोटो: प्रदीपिका सारस्वत
फोटो: प्रदीपिका सारस्वत

कश्मीर में लगभग हर आदमी पॉलिटिकली ओपीनिएटिड है. लोग मुझे कश्मीर की हिस्ट्री समझाने लगे कि कैसे मुगल बादशाह अकबर ने कश्मीर पर कब्ज़ा कर लिया, कैसे फिर अंग्रेज़ों ने उसे डोगरों को बेच दिया और फिर डोगरों ने भारत के साथ मिलकर कश्मीरी आवाम के साथ नाइंसाफी की. और वो नाइंसाफी आजतक होती आ रही है. कॉनफ्लिक्ट उसी का नतीजा है.

पथराव के मुद्दे पर लगभग सब एक ही तरह सोचते हैं, कम से कम मुझे एक ही बात बताई गई.

‘ये बच्चे नब्बे के दशक वाली कॉनफ्लिक्ट में पैदा हुए हैं, इन्होंने हमारी तरह सुकून भरा कश्मीर नहीं देखा. इन्होंने बचपन से ही एनकाउंटर्स देखे हैं, हड़तालें देखी हैं, पथराव देखा है, वही सीखा है,’

नाम न लिखने की शर्त पर एक बुज़ुर्ग एडवोकेट ने बताया. ये बुज़ुर्ग एडवोकेट कश्मीरी युवाओं के इस हाल पर काफी दुखी नज़र आए. उन सबके दिलों में मौजूदा हालात को लेकर काफी निराशा थी. सब लोगों ने काफी बातें कीं, अपने हिस्से के दर्द मुझसे बांटने की कोशिश भी की. किसी ने कश्मीर के हालात को फिलिस्तीन से जोड़ कर देखा, तो किसी ने अपनी किस्मत खुद लिखने का हक न मिलने की शिकायत की. कुछ लोगों को कांग्रेस और बीजेपी के साथ मिलकर बनने वाली ‘कठपुतली’ कश्मीरी सरकारों से शिकायत थी तो कुछ को कश्मीर में नौकरियां और डेवलपमेंट न होने से दिक्कत थी.

फोटो: प्रदीपिका सारस्वत
फोटो: प्रदीपिका सारस्वत

पर जम्मू व कश्मीर हाइकोर्ट के सीनियर क्रिमिनल लॉयर अयूब भट ने जो बात कही, वो यहां बताना मुझे ज़रूरी लगा.

‘इंडिया शुड ईदर लव अस और लीव अस,’

अयूब साहब का कहना था कि वे मानते हैं.इंडिया को कश्मीर के लिए अपनी अप्रोच बदलनी होगी. कोर्ट से निकलने के बाद, सीआरपीएफ की 182 बटालियन के कमांडेंट अमित कुमार से मिलना हुआ. ज़ाहिर है उनकी बातें, स्थानीय लोगों की बातों से अलग थीं. उनका कहना था,

‘पथराव के लिए कोई लड़का बाहर नहीं आएगा अगर पाकिस्तान समर्थकों से उन्हें मिलने वाला पैसा बंद हो जाएगा. अगर यहां पढ़ाई का माहौल ठीक हो जाएगा, अगर यहां नौकरियां होंगी.’

उन्होंने बताया कि एक बार उन्होंने पथराव करने वाले एक 20-22 साल के लड़के को गिरफ्तार किया. लड़कों में आपस में ही लड़ाई हो गई थी. मसला था पैसों के बंटवारे का. पैसा भेजने वालों ने हर पथराव करने वाले लड़के को 500 रुपये देने को कहा था, लेकिन जिसे ये बंटवारा करना था उसने हर एक को 350 रुपये ही दिए. हाय रे करप्शन. लड़कों में लड़ाई हो गई और सीआरपीएफ ने उन्हें धर पकड़ा. पत्थर फेंकने की इस रिवायत पर तीन तरह के लोगों के तीन अलग-अलग बयान थे. एक दूजे वकील बशीर अहमद का कहना था कि शुरुआत में कई छोटे लड़के रिवायती तौर पर स्टोन पेल्टिंग करते हैं पर इन लड़कों के खिलाफ इतनी एफआईआर लिख दी जाती हैं कि पुलिस और बाकी बलों से बदला लेना इनकी रोज़ की ज़िंदगी का हिस्सा बन जाता है.

फोटो: प्रदीपिका सारस्वत
फोटो: प्रदीपिका सारस्वत

इतने लोगों से बात करके मुझे यही बात समझ आई कि हिंदुस्तान को इन युवाओं के बारे में नर्मी के साथ सोचना होगा. स्टोन पेल्टिंग करने वालों में ज़्यादातर वे ही लड़के हैं, जो अभी बहुत छोटे हैं, जिनके परिवार में से कभी कोई वादी के उस पार गया नहीं है. या जिन्हें अपनी पढ़ाई और करियर के लिए बहुत ज़्यादा उम्मीदें नहीं हैं. पाकिस्तान से आने वाले पैसे पर रोक लगाना ज़रूरी है.

कमांडेंट से मिलने के बाद बाहर आने पर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के नज़दीक आकर मैंने ज़ाहिद से बात करने के लिए फोन निकाला तो देखा फोन में नेटवर्क नहीं था. ज़ाहिद ने मुझे यहीं मिलने के लिए कहा था. सामने, सड़क के उस पार खड़े कुछ लड़के मुझे अजनबी निगाहों से देख रहे थे. आपस में बातें कर रहे थे, साफ दिख रहा था बातें मेरे बारे में थीं. मैंने एसबीआई के सामने खड़े हरे चिनार को एक नज़र देखा. उसकी एक पत्ती टीन की चारदीवारी और बार्ब्ड वायर के बीच फंसकर मटमैली हो गई थी. मैंने उसकी एक तस्वीर उतारी तो बैंक से निकलते एक आदमी ने शक की निगाहों से मुझे तोलते हुए कहा कि यहां तस्वीर लेना मना है. मैंने तस्वीर उसे दिखाई, पूछा इस तस्वीर से भी किसी को नुकसान हो सकता है क्या.

फोटो: प्रदीपिका सारस्वत
फोटो: प्रदीपिका सारस्वत

चिनार की उस पत्ती की हालत मुझे कश्मीर की किस्मत जैसी लगी. टिन की चारदीवारी और कंटीले तारों के बीच फंसी कश्मीर की किस्मत. भारत-पाकिस्तान के बीच रस्साकशी की वजह बना कश्मीर.

वो लड़के मुझे अब भी देख रहे थे. जब मुझसे रहा नहीं गया तो मैंने सड़क पार कर उनसे जाकर पूछा कि उन्हें क्या परेशानी है मुझसे. वो बस मुझे देखकर क्यूरियस थे. एक अलग दिखती लड़की का कैमरा लेकर वहां घूमना, या शहर मैं पसरी हड़ताल और सन्नाटे के बीच खड़े होकर चिप्स खाना, उनके लिए अजूबा ही था.

‘मैंने आपको सुबह बाज़ार में देखा था, लड़कों से बात करते. मैं बस देख रहा था कि आपको कोई परेशानी तो नहीं है.’

काले कपड़ों और टिनटिन जैसे बालों वाले उस लड़के ने मुझे बताया जो सबसे पहले से मुझे देख रहा था. मैं वापस कोर्ट की तरफ बढ़ गई. ये सोचकर कि शायद ज़ाहिद वहीं हो. वो वहां नहीं था. फोन में सिग्नल भी नहीं था. ज़ाहिद के एक साथी एडवोकेट ने मुझे कहा कि मैं तो एक ही दिन में परेशान हो गई, पर कश्मीर में तो ये अक्सर होता है. एनकाउंटर के वक्त फोन के सिग्नल्स जैम कर दिए जाते हैं, मोबाइल इंटरनेट तो जब तब जाता ही रहता है. ज़रा सोचिए अगर एक दिन आपके, आपके दोस्तों, परिवार वालों के फोन बेकार हो जाएं तो?

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फोटो: प्रदीपिका सारस्वत

ज़ाहिद के कलीग ने मुझे नेवा तक छोड़ा. उन्होंने कहा, हमारे लिए ये जगह कितनी भी असुरक्षित हो, आपके लिए सेफ है. आपको कोई कुछ भी नहीं कहेगा. लोकल्स आपका पूरा खयाल रखेंगे. ये सच भी था. अब तक मैं यहां, जिससे भी मिली हूं, जाना-पहचाना या अजनबी, सबने पूरी मेहमाननवाज़ी बरती है. पर जम्मू से आगे जाने वाले कश्मीरियों के साथ हिंदुस्तानी अक्सर इतनी खुशदिली से पेश नहीं आते, ये शिकायत पढ़ी है मैंने यहां के लोगों के चेहरों पर. वादी का मौसम बदल रहा है. ठंड कम हो रही है. राजधानी जम्मू से श्रीनगर की ओर बढ़ रही है. उम्मीद है वादी के बाहर-भीतर और भी कुछ बदलेगा. इन कश्मीरियों के लिए, जो ‘हिंदुस्तान की इस जन्नत’ में रोज़ एक नया जहन्नुम जीने को मज़बूर हैं.

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