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जब सेनापति ही निकल आया था 'गद्दार'

व्यापार के नाम पर भारत की संपदा लूटने आई अंग्रेज़ी ईस्ट इण्डिया कम्पनी, पूरे भारत को अपने कब्ज़े में करने लगी थी. मुग़ल साम्राज्य अपने पतन पर था. देश की अधिकतर बड़ी रियासतें या तो पूरी तरह कम्पनी के कब्ज़े में थीं या तो संधियों के दबाव में उनके सारे कूटनीतिक फ़ैसले करने का अधिकार ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हाथ में था.

इस राजनीतिक टूट फूट के बीच भी एक राज्य ऐसा था जो अंग्रेज़ों के काबू न आ पाता था. सन्धि का लालच ले कर भेजे जाने वाले अधिकारियों को खान-पान करा कर इस राज-दरबार से बैरंग लौटा दिया जाता. मगर इस राज्य के पास सेना ऐसी कि जिससे अंग्रेज़ी अफसरों की हड्डियाँ कांपे! ये राज्य था- ‘सिक्ख साम्राज्य’. (थोड़ा फ़्लैश-बैक जान लीजिए) कुछ साल पहले तक जिस अफ़ग़ान सेना की बर्बरता के किस्से दुनिया भर में टहला करते थे, उस अफ़ग़ान सेना को सिक्ख सेना ने परास्त कर दिया है. और उनसे छीन लिया है मुल्तान (वही जिसके सुल्तान श्री वीरेंद्र सहवाग हैं). फिर से अफ़ग़ान-सिक्ख युद्ध होता है, इस बार सिक्ख सेना ने उनसे ‘शोपियां’ क्षेत्र खींच लिया. अगली बार के युद्ध में अफ़ग़ान सेना ‘नौशेरा’ और ‘जमरूद’ भी, सिक्ख सेना के आगे हार जाती है. जीती हुई रियासतों में सिक्ख सेना कोई क़त्ल-ए-आम नहीं करती. और सभी क्षेत्रीय रियासतों को इकठ्ठा कर के महाराज रणजीत सिंह सिक्ख-साम्राज्य को उसकी उंचाई पर पहुंचाते हैं.

मगर इतिहास में हमने पढ़ा है कि पंजाब में भी अंग्रेज़ों का कब्ज़ा था. अब सवाल ये कि जिन सिक्खों ने अफ़ग़ान सेना तक में भूसा भर दिया, वो आखिर अंग्रेज़ों के आगे कैसे हार गए? जिस सिक्ख सेना को गुरु गोबिंद सिंह ‘सवा लाख से एक लड़ाने’ के लिए तैयार कर गए थे, उस सेना पर ईस्ट इण्डिया की कम्पनी ने नकेल कैसे कसी?

सन 1839 ई० में महाराज रणजीत सिंह की मृत्यु हो गई. पंजाब का शक्ति-संतुलन सम्भालने वाले दरबारी दो धड़े में बंट गए – सिक्ख सिन्धवालियां और डोगरा. राज-दरबार में षडयंत्र शुरू हो गए. एक धड़ा महाराज की जायज़ संतानों को सिंहासन पर बिठाता, दूसरा उनकी नाजायज़ संतानों को. षडयंत्रों में हर नए राजा की हत्या हो जाती. बचे दलीप सिंह, उम्र सात-आठ वर्ष. उनकी संरक्षक बनकर साम्राज्य सम्भाला उनकी मां, महाराज की सबसे छोटी पत्नी जिंदां ने. और वज़ीर बने दलीप सिंह के मामा. षडयंत्रकारियों ने उन्हें भी मरवा दिया. आखिरकार डोगरा धड़े के राजा लाल सिंह बने वज़ीर, और सेनापति बनाया गया डोगरा धड़े के ही तेज सिंह को. इस कलह का फ़ायदा उठाया कम्पनी के अधिकारियों ने. और बंगाल-बम्बई से फ़ौजों को पंजाब के फिरोज़पुर कूच करने का निर्देश दे दिया.

सिक्ख-दरबार को ये ख़बर मिली और उन्होंने भी अपनी कार्यवाही शुरू कर दी. तय किया गया कि तेज सिंह के नेतृत्व में सेना की एक टुकड़ी, फिरोज़पुर पर करने से पहले ही, रसद और हथियार लेकर आगे बढ़ रही अंग्रेजी बटालियनों पर हमला करेंगी. गिनती में अंग्रेज़ी सेना के सामने सिक्ख सेना के योद्धा, पांच के मुकाबले एक के हिसाब में थे. मगर फ़र्क क्या पड़ता है. इन योद्धाओं को ‘चिड़ियों से बाज़ लड़ाने’ का हुनर मालूम था. महाराज रणजीत सिंह ने यूरोप के विशेषज्ञों को बुलाकर अपने योद्धाओं को ट्रेनिंग दिलाई थी. और कहते हैं, चौकड़ी भरते घोड़े पर बैठे सिक्ख योद्धा भाला मारकर तम्बू का खूंटा उखाड़ देते थे.

फिरोज़पुर की बाहरी सीमा पर, मुदकी नाम की जगह पर शाम के छुटपुटे में अंग्रेजी सेना ने पड़ाव डाला हुआ था. सिक्ख सेना की टुकड़ी गिनती में कम थी मगर अंधेरा उनका ‘सरप्राइज एलिमेंट’ था. युद्ध छिड़ा और सिक्ख टुकड़ी के ‘घुड़चढ़े’ योद्धा अंग्रेज़ों पर टूट पड़े. सिक्ख सेना के पास अत्याधुनिक यूरोपियन असला ‘ग्रेपशॉट’ (लोहे के छर्रों के गुच्छे) भी था. अंग्रेज़ी सेना अंधेरे में लड़ने की बिलकुल भी अभ्यस्त नहीं थी. युद्ध के दौरान अंग्रेज़ी सेना में लांस-नायक रहे ‘सर जेम्स होप्स ग्रान्ट’ ने इस युद्ध के बारे में लिखा है- “वास्तव में, वह भयानक और उदासी भरी रात थी. और युद्ध के इतिहास में, शायद ही कभी ब्रिटिश सेना इतने बड़े पैमाने पर विनाश के करीब थी”. ब्रिटिश मेजर जनरल सर रोबर्ट हेनरी सेल, जिसे ‘फाइटिंग बॉब’ सेल कहा जाता था, की मृत्यु इस युद्ध में हुई. इस युद्ध को अंग्रेज़ों ने ‘मिडनाइट मुदकी’ का नाम दिया था. मगर युद्ध की नियति ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने पहले ही अपने पक्ष में तय कर ली थी. कैसे? ‘डिवाइड एण्ड रूल’ से ! सिक्ख दरबार में वज़ीर रहे लाल सिंह और सेनापति तेज सिंह, दौलत और अपनी निजी रियासत के लालच में, अंग्रेज़ों से मिल चुके थे. लाल सिंह ने अपनी रणनीति की खबर चिट्ठी से, अंग्रेज़ी अधिकारियों को भिजवा दी थी.

इधर युद्ध में, अंग्रेज़ी सेना की हार लगभग तय थी. उनकी सेनाओं में घबराहट फैल चुकी थी, खेमा बिखर गया था. तभी सिक्ख सैनिकों को अचम्भित करते हुए सेनापति तेज सिंह ने आदेश दिया कि अब वापिस चलो. सैनिकों की राय थी कि अंग्रेज़ी सैनिकों की रसद और असला ही छीन लिया जाए. मगर तेज सिंह ने आगे कुछ भी करने से रोकते हुए सिक्ख सेना को लौटने का हुक्म दे दिया. लौटती हुई सेना देखकर अंग्रेज़ों की हिम्मत बढ़ी, और पीछे से आ रही सेनाओं को दूसरे रास्ते से भेजकर, सिक्ख सेना पर हमले के लिए कहा गया. युद्ध में आधे से भी ज़्यादा कम हो चुके सिक्ख सैनिक बहुत देर तक अंग्रेज़ी सेना के हमले का जवाब नहीं दे सके. हमले को गई पूरी सैन्य-टुकड़ी काल की भेंट चढ़ गई. केवल मुट्ठीभर सैनिकों को लेकर तेज सिंह ज़िन्दा लौट आया.

18 दिसंबर, सन 1845 ई० में मुदकी, सिक्ख साम्राज्य में अंग्रेज़ी घुसपैठ का पहला दरवाज़ा बना. और फ़िर धीरे धीरे ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने फिरोज़पुर, सतलुज, अलीवाल और सोबरांव पर कब्ज़ा करते हुए सिक्ख साम्राज्य में अपनी पैठ बना ली. हार से मजबूर आकर लाहौर में सिक्ख-दरबार संभाल रही रानी जिंदां को ईस्ट इण्डिया कम्पनी के साथ समझौता करना पड़ा, जिसके फलस्वरूप आठ वर्ष के राजा दलीप सिंह को सिंहासन पर बैठाकर कम्पनी ने सारे अधिकार अपने पास रख लिए. रानी को पहले नज़रबंद किया गया और आखिरकार उन्हीं के राज्य से देशनिकाला दे दिया गया.

और, लाल सिंह-तेज सिंह? ईस्ट इण्डिया कंपनी कब किसी की हुई थी! उन्हें भी आखिरकार चालों में फंसा कर मरवा दिया गया.


ये स्टोरी दी लल्लनटॉप के लिए सुबोध मिसरा ने लिखी है

 

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