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उरी फिल्म का धांसू ट्रेलर देखकर ये सवाल आपके दिमाग में आया कि नहीं?

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ऐ गुजरने वाली हवा बता, मेरा इतना काम करेगी क्या
मेरे दोस्तों मेरी दिलरुबा मेरी मां को मेरा पयाम दे
उन्हें जाके तू ये पयाम दे मैं वापस आऊंगा
मैं वापस आऊंगा

संदेसे आते हैं
संदेसे आते हैं

लिरिक्स मैं भले स्किप कर रहा हूं लेकिन फ़ील पूरी वही है. 1998 में जेपी दत्ता की फिल्म बॉर्डर देखकर आया था. आंखों में गुस्सा, दिल में देशप्रेम, दिमाग में आर्मी के लिए श्रद्धा. मथुरा दास को डांट पड़ती देख गुस्सा आ रहा था. फिर उसकी शहादत पर आंसू आए. जेपी दत्ता और बॉर्डर ने सेना से जो कनेक्शन मिलाया वो आज भी उतना ही मजबूत है. फिर 2004 में जेपी दत्ता ने ही LOC कारगिल बनाई थी. उससे तो सेना के प्रति सम्मान और पीक पर पहुंच गया. दिमाग में ये बात घूमती रही, सेना है तो हम हैं.

तब से हर साल ही सेना या सैनिक के बैकग्राउंड पर कोई न कोई फिल्म आती है. अक्षय कुमार ऑल टाइम हिट फौजी हो चुके हैं. सैनिक फिल्म के बाद बेबी, हॉलीडे जैसी तमाम फिल्मों में देश के दुश्मनों को धोया. एयरलिफ्ट में फौजी नहीं बने फिर भी भौकाल बनाया. थोड़ी सी उकताहट होने लगी. हर फिल्म में एक ही तरह का एकतरफा मैटर, अधकचरी कहानी. ट्रू इवेंट्स पर बेस्ड फिक्शन और ड्रामा. आर्मी में कभी न इस्तेमाल होने डायलॉग्स. फौजियों की पर्सनैलिटी को आम इंसान से अलग करती किंवदंतियां. सब इन फिल्मों का हिस्सा बनने लगे. इन्हीं के बीच 6 दिसंबर 2018 को आया एक धुंआधार ट्रेलर. उड़ी/उरी- द सर्जिकल स्ट्राइक. क्या तो ट्रेलर है भाईसाब. साउंड और सीन देखकर तो आंखें प्याज जैसी बाहर आ जाती हैं. कुछ डायलॉग्स पर गौर फरमाइये. लगेगा कि वीर रस की कविता सुन रहे हैं-

फर्ज़ और फर्ज़ी में बस एक मात्रा का फर्क होता है.

पाकिस्तान जो भाषा समझता है, उसी भाषा में उसको समझाने का समय अब आ गया है.

ज्यादा नाटक किया न, तो तेरे अखरोट तेरे मुंह से बाहर निकाल दूंगी.

ये हिंदुस्तान अब चुप नहीं बैठेगा, ये नया हिंदुस्तान है. ये घर में घुसेगा भी और मारेगा भी.

कमांडर्स, इंडियन आर्मी ने ये जंग शुरू नहीं की थी बट वी विल ब्लडी हेल फिनिश इट.

अपनी 72 हूरों को हमारा सलाम बोलना, कहना दावत पर इंतजार करें, हम आज बहुत सारे मेहमान भेजने वाले हैं.

ये ट्रेलर यूट्यूब पर देखने के बाद नीचे कमेंट देखे. आंखें भर आईं. सेना को प्यार करने वाले इतने सारे युवा हैं. भाईसाब थोक के भाव देशभक्त एक साथ एक जगह देखने हों तो इस ट्रेलर के नीचे कमेंट देख आओ. कोई ट्रेलर में अजीत डोवाल को आइडेंटिफाई कर रहा है. कोई कमेंट सेक्शन में घुसकर पाकिस्तान की बैंड बना देना चाहता है. इन लोगों में मैं अपना बचपन देखता हूं. 1998 में बॉर्डर देखने के बाद सेम यही फीलिंग मेरे अंदर थी. बस उसको व्यक्त करने के लिए कहीं कोई कमेंट बॉक्स नहीं था. सन्नी देओल को ट्विटर पर टैग करके बधाई नहीं दे सकता था. फेसबुक पर फिल्म की समीक्षा लिखकर खुद को सस्ते में देशभक्त साबित नहीं कर सकता था.

फिल्म में संभावित अजीत डोवाल
फिल्म में संभावित अजीत डोवाल

देश के प्रति हमारे प्रेम को भुनाने की कला फिल्मकारों को बखूबी आती है. उनको ये भी पता है कि किसी एक्शन हीरो से वायर से लटकने वाले स्टंट सीन करवा लो. वीएफएक्स से असंभव दिखने वाले सीन फिल्मा लो. पब्लिक टूट पड़ेगी. कोई भी सिविलियन ये देखने नहीं जाएगा कि इस फिल्म में जो भारी भारी डायलॉग्स बोले गए हैं, असली फौजी को उन्हें बोलने का मौका नहीं मिलता. गोलियों की तड़तड़ाहट में वो अपनी और अपने साथियों की जान के लिए संघर्ष कर रहे होते हैं. 72 हूरों वाले डायलॉग चेंपने के लिए एक सेकेंड भी नहीं गंवाते. क्योंकि वो जानते हैं उनके एक शब्द पूरा होने से पहले कहीं से कोई गोली आकर उनको मार सकती है. जब एक भी साथी खोने लायक हालात न हों, तो कोई ऐसी गलती नहीं करता. हम अभी तक बॉलीवुड से ज़रा ओरिजनल लगने वाले फाइट सीन या वॉर सीन की उम्मीद नहीं कर सकते.

बेस्ट डायलॉग
बेस्ट डायलॉग

आप किसी भी पॉलिटिकल आइडियोलजी को मानने वाले हों, लेकिन ये नहीं चाहेंगे कि ट्रू इवेंट्स पर बेस्ड कहकर आपको कोई फिक्शन थमा दे. चाहे वो उरी हो, एयरलिफ्ट हो, इंदु सरकार हो, या कोई और. अमेरिका में दिसंबर 1991 में JFK नाम की एक फिल्म रिलीज हुई थी. पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी की हत्या के ‘ट्रू इवेंट्स पर बेस्ड’ फिल्म बताकर बेचा गया. फिल्म ने अपनी लागत की चार गुनी कमाई की. बंपर हिट रही. देखने वालों के रोंगटे खड़े हो गए. एक एक सीन रीढ़ में सनसनी पैदा करने वाला था. 3 घंटे की फिल्म का क्लाइमैक्स देखने वाले लोगों ने कुर्सी से हिलना बंद कर दिया कि हिलने में कुछ मिस न हो जाए. लेकिन जब फजीहत शुरू हुई तो आजतक उसकी आलोचना की जाती है. जिन दो राइटर्स जिम गैरिसन और जिम मार्स की किताबों से इस फिल्म का प्लॉट उठाया गया था उन पर ही सवाल उठने लगे. कहा गया कि उस मर्डर की कॉन्सिपेसी थ्योरी पर ये एक और कॉन्सिपेसी थ्योरी है. सच्चाई के करीब जाने की बजाय ये और उलझा देती है. लेकिन देखने वालों को मजा आया, फिल्म हिट हुई. बनाने वालों का उद्देश्य पूरा हुआ. माफ कीजिएगा, ट्रू इवेंट्स पर बेस्ड ऐसी कहानी को प्रोपेगैंडा कहते हैं. उरी फिल्म के राइटर डायरेक्टर आदित्य धर ने अपनी फिल्म के लिए कितनी जानकारी जुटाई है, ये भी सर्जिकल स्ट्राइक की तरह एक राज़ है. सेना के ऐसे राज़ सालों बाद सामने आते हैं वो भी किसी अथॉरिटी वाले इंसान के हवाले से. आदित्य धर ने कितनी रिसर्च की है इस फिल्म के लिए ये देखने वाली बात होगी. पेपर कटिंग्स इकट्ठी करके, उनको कमरे की दीवारों पर सजाकर, डॉट से डॉट मिलाकर तो फिल्म नहीं बनाई होगी.

सर्जिकल स्ट्राइक का कोई हीरो अभी सामने नहीं आया है, इस फिल्म से पहली बार आएगा.
सर्जिकल स्ट्राइक का कोई हीरो अभी सामने नहीं आया है, इस फिल्म से पहली बार आएगा.

फिर आते हैं पॉलिटिक्स पर. आदित्य धर ने क्लियर किया है कि उन्होंने ये फिल्म इंडियन आर्मी के लिए बनाई है, किसी पॉलिटिकल पार्टी के लिए नहीं. लेकिन वो भूल रहे हैं कि आज के समय में भाषण देते हुए फम्बल से लेकर गाय, चारा, राम, मंदिर, मस्जिद, राष्ट्रगान, वंदेमातरम, शहरों के नाम, बिल्डिंग्स का कलर, इतिहास, नदी, नाला, कॉन्डम, टोपी, टीका, गाना, भजन, एक्टर, सिंगर, चाइना, पाकिस्तान, कश्मीर, कर्नाटक, सेना, पुजारी, दलित, किसान, गरीब, व्यापारी, सबका इस्तेमाल पॉलिटिकल पार्टीज कर लेती हैं. फिल्म बनाने वालों को अंदाजा भी नहीं होगा कि उनका इस्तेमाल हो गया है. कांग्रेस ने सत्ता खोने के डर से इमरजेंसी का इस्तेमाल किया, उसी इमरजेंसी का इस्तेमाल करके जनसंघ ने सत्ता हासिल की. कांग्रेस से राजीव गांधी ने मुसलमानों को खुश करने के लिए शाहबानो केस पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटने के लिए कानून बना दिया था. हिंदू वोटबैंक नाराज हो गया था. उसको खुश करने के लिए कांग्रेस ने अयोध्या की विवादित जमीन पर हिंदू संगठनों को शिलान्यास की इजाजत दे दी थी. 1989 में फिर यहीं से बीजेपी ने राम मंदिर आंदोलन शुरू किया और उसको संजीवनी मिल गई. ये रामकहानी सुनाने का मुख्य मकसद यही है कि फिल्म बनाने वाले पॉलिटिकल पार्टीज को हल्के में न लें. हालांकि वो ले भी नहीं रहे होंगे.

तो इस फिल्म के जरिए आप पहली बार सर्जिकल स्ट्राइक का एचडी वीडियो देख पाएंगे.
तो इस फिल्म के जरिए आप पहली बार सर्जिकल स्ट्राइक का एचडी वीडियो देख पाएंगे.

फिल्मों का राजनीति से गहरा संबंध रहा है. 1975 में कांग्रेस ने आंधी फिल्म बैन करवा दी थी. आरोप लगाया था कि इसका मुख्य किरदार इंदिरा गांधी से प्रेरित है. पिछले साल ही आई इमरजेंसी पर बेस्ड इंदु सरकार की रिलीज रोकने के लिए कांग्रेस ने आंदोलन छेड़ रखा था. केजरीवाल की बायोपिक ‘केजरीवाल ऐन इनसिग्निफिकेंट मैन’ के मेकर्स को सरकार के सेंसर बोर्ड ने नाच नचा दिया. फिल्मों का राजनीति बहुत अच्छे से इस्तेमाल कर सकती है. लेकिन उरी के साथ दिक्कत ये है कि इसमें फिल्म नहीं, सेना इस्तेमाल हो रही है. सेना के प्रति हमारी भावनाओं को पार्टियां भी भुना रही हैं, फिल्में भी. जब सेना का इस्तेमाल कोई पार्टी अपना उल्लू सीधा करने के लिए कर रही है तो सेना पर बनने वाली फिल्म उसके काम नहीं आएगी, ये सोचना बेवकूफी है. सेना के राजनीतिकरण के कितने नुकसान हैं ये समझना है तो पड़ोसी पाकिस्तान को देख लो. जिसको धूल चटाने का संदेश देती ये फिल्म आ रही है. और लास्ट में सबसे खास बात. जब भी आप सेना के लिए गर्व से भरते हैं तो उस फौजी तेज बहादुर यादव का चेहरा आंखों के सामने रखिए जिसने पानी वाली दाल और जली हुई रोटियों का वीडियो दिखाया था. बाद में नौकरी से निकाला गया, आज कहां है इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं.

ट्रेलर देख लें.

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